तो जल बिन तरसेगा कंठ

Submitted by Hindi on Sun, 04/03/2016 - 09:37
Source
राजस्थान पत्रिका, 03 अप्रैल, 2016

सूखता पानी, बरसती आफत : गर्मी की दस्तक के साथ सिमट रहे हैं देश में जलस्रोत

जल जल ही जीवन है। बिन पानी सब सून। जीवन के लिये जरूरी ये अमृत पाताल पैंदे में जा पहुँचा है। गर्मी की दस्तक के साथ ही कंठ सूखने लगे हैं। जलस्रोत रीत रहे हैं। इंसानी लालच ने पानी की अतिदोहन कर हालात को और भी भयावह बना दिया है। बिन पानी पृथ्वी पर हमारा अस्तित्व नहीं होगा। इस अमूल्य निधि को सहेज कर रखना है वैश्विक महाशक्ति बनने के लिये हम दावे कर रहे हैं पर दूसरी तरफ देश के ग्रामीण इलाकों में आज भी महिलाएँ मीलों का सफर तय कर पानी लाती हैं। जल संरक्षण के सरकारी दावे कागजों की नौका के समान हैं। केन्द्र सरकार 4 अप्रैल से जल सप्ताह (वॉटर वीक) मना रही है। ऐसे सरकारी समारोह पूर्व में भी होते रहे हैं, लेकिन बेनतीजा। कागजों में सिमट जाते हैं वादे और दावे। हमारे पास आज बामुश्किल गुजारे लायक जल है, लेकिन कल क्या होगा...

जेब भी रीतेगी...

तीन-चौथाई रोजगार हैं पानी पर निर्भर


पानी की कमी को आप केवल प्यास तक ही सीमित न करें। ये आपके जेब को भी रीत सकती है। पानी की कमी के कारण खाद्यानों के उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव तो पड़ता ही है, ये रोजगार पर भी असर डालता है। आर्थिक विकास पर भी पानी की अनुपलब्धता रोक लगाती है। इस वर्ष विश्व जल दिवस पर यूनेस्को ने जल-रोजगार गठजोड़ (वॉटर-जॉब्स नेक्सस) नामक रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर के तीन-चौथाई रोज़गार पानी पर सीधे तौर पर जुड़े हुये हैं। कार्बन डिस्कलोजर प्रोजेक्ट की रिपोर्ट के अनुसार अगले 3 साल में पानी की कमी से कई तरह के व्यवसाय पानी की कमी के कारण प्रभावित होंगे। 2015 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने पानी की कमी अगले दशक का सबसे बड़ा खतरा बताया था।

2.8 अरब पर असर


दुनिया भर में पानी पर 2.8 अरब रोजगार निर्भर हैं। इनमें से 1.6 अरब यानी लगभग 42 फीसदी रोजगारों की जीवन-रेखा ही पानी है। यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार इन रोजगारों में कृषि, मत्स्य और ऊर्जा उत्पादन शामिल है।

4.75 करोड़ कामगार


विश्व औद्योगिक सेक्टर में 4.75 कामगार सम्बन्धी रोजगार पानी की उपलब्धता पर पूर्ण आश्रित हैं। ये आँकड़ा विश्व के औद्योगिक रोजगार का 30 फीसदी है। इसमें फूड प्रोसेसिंग, टैक्सटाइल्स और फार्मा इंडस्ट्रीज़ शामिल है।

...6 माह में सूख जाएँगे जलस्रोत!


02 हजार अरब लीटर पेयजल की कमी
देश के 91 प्रमुख जलस्रोतों की 17 मार्च, 2016 की साप्ताहिक समीक्षा में उपलब्ध जल कम पाया गया। 43 अरब क्यूबिक मीटर पानी शेष है। प्रत्येक भारतीय की रोज की पानी की खपत 200 लीटर मानें तो ये 6 महीने में खत्म हो जयेगा।

माँग और आपूर्ति में बढ़ता अंतर


843 अरब क्यूबिक मीटर पानी चाहिये 2025 में
सरकार ने संसद में वर्ष 2015 में पेश रिपोर्ट में बताया कि देश में 1,123 अरब क्यूबिक मीटर पानी की सालाना उपलब्धता है। केन्द्रीय जल आयोग के अनुसार 2050 तक देश में 1,180 अरब क्यूबिक मीटर पानी की जरुरत होगी।

 

देश में 7.6 करोड़ लोग स्थायी पेयजल स्रोतों से वंचित हैं

30 प्रतिशत अधिक दोहन, वर्षाजल पुनर्भरण की तुलना में

¾ ही पानी शेष है जलस्रोतों में पिछले 10 साल की तुलना में

हर दस में से एक भारतीय के पानी में रासायनिक प्रदूषण

देश में 85 फीसदी पेयजल भूमिगत जलस्रोतों से प्राप्त होता है

70 हजार करोड़ रु. जल मिशन पर खर्च, 3 लाख करोड़ और चाहिये

18% ग्रामीण आबादी के पास ही शुद्ध पानी उपलब्ध है जबकि 41 फीसदी ग्रामीणों के पास हैं मोबाइल फोन

20% ग्रामीण आबादी देश की ऐसी है जो असुरक्षित जलस्रोतों पर निर्भर

3 लाख बच्चे मरते हैं दुनिया में हर साल दूषित पानी पीने से


 

एक तिहाई घरों में पाइपलाइन कनेक्शन


29 फीसदी भारतीय घरों में पेयजल पाइप कनेक्शन
नेशनल सैम्पल सर्वे डाटा के निष्कर्षों के अनुसार 16 फीसदी ग्रामीण घरों में ही पेयजल के लिये पाइपलाइन कनेक्शन हैं जबकि शहर में 54 फीसदी घरों में सुविधा उपलब्ध है। केन्द्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय पेयजल मिशन के अंतर्गत वर्ष 2017 तक देश 55 फीसदी ग्रामीण घरों तक पाइपलाइन कनेक्शन पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

...तरस रहे बच्चे


नियोजित जल संसाधनों के अभाव से बड़ी आबादी जूझ रही है। बढ़ते निजीकरण, औद्योगिक व मानवीय अपशिष्टों से पेयजल संकट बढ़ा है। आज 10 करोड़ घरों में बच्चों को पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा। इनमें हर दूसरा बच्चा कुपोषित है।

बीमारी की जड़


वर्ल्ड बैंक के अनुसार भारत में 21 फीसदी संक्रामक बीमारियाँ दूषित पानी की वजह से होती फ्लोराइड, आर्सेनिक, लेड (सीसा) और यूरेनियम तक पानी में घुला है। बड़ी आबादी पेट के संक्रमण से लेकर कैंसर तक की चपेट में है।

ये भी कारण

बदला बारिश का पैटर्न


घटते जल स्तर के बड़े कारण और बढ़ते शहरीकरण में जल संरक्षण के क्या खास उपाय हों, बता रहे हैं, सीएसई के उपनिदेशक, चंद्रभूषण…भारत में भूजल स्तर के नीचे जाने के दो प्रमुख कारण हैं। पहला, भूजल पर बहुत ज्यादा निर्भरता बढ़ना। दूसरा, बारिश के पैटर्न में तेजी से बदलाव आना। अब मानसून के दिन कम होते जा रहे हैं और जब बारिश होती है तो बहुत तीव्र होती है। इसके कारण अधिकांश पानी बेकार बह जाता है। पहले बारिश की गति मॉडरेट रहती थी जिससे पानी रुकता था और जमीन में ज्यादा रिचार्ज होता था।

ये हों उपाय

झील, तालाब ही बचाएँगे


जितनी मात्रा में पानी का दोहन हो रहा है, उस मात्रा में भूजल रिचार्ज नहीं हो रहा है। कंक्रीट के जंगलों में पानी रोकने के इंतजाम नहीं किये गये।आज रेनवॉटर हार्वेस्टिंग की सख्त जरूरत है। खासतौर पर शहरों में तो पानी रोकने का यही बड़ा जरिया है। पर उस पर बहुत कम काम हो रहा है। बाहरी इलाकों, गाँवों में तालाब, झीलों और जोहड़ का फिर निर्माण करना होगा। क्योंकि इनके जरिये ही अधिक गति से होने वाली बारिश को रोका जा सकता है, जिससे भूजल रिचार्ज हो पायेगा। साथ जितना हो सके, वेटलैंड की व्यवस्था रहनी चाहिये।

नहीं चेते तो...

...फिर बिन पानी सब सून


हर साल गर्मी की दस्तक पर घटते भूजल स्तर पर विलाप तो होता है पर ज्यों ही मानसून आता है तो बेशकीमती पानी नालों में बेकार बहता है।ऐसी कई जगह हैं, जहाँ पिछले 2 साल में 25-30 फीट तक भूजल नीचे चला गया है। फरवरी में ही बाँध सूख रहे हैं। कोरे विलाप से प्यास बुझाने के भी लाले पड़ेंगे। एक ओर ग्लोबल वॉर्मिंग से तापमान बढ़ा है, वाष्पीकरण तेज हुआ है। मृदा से नमी खत्म हो रही है और खेती में पानी की माँग बढ़ी है। वहीं, शहरी जीवनशैली में ज्यादा उपभोग और बेतरतीब शहरीकरण के कारण यह समस्या और भयावह हुई है।

संवैधानिक हक है पानी


सरकारी जिम्मा

 

केरल हाईकोर्ट ने वर्ष 1990 में अपने एक आदेश में अनुच्छेद 21 के संदर्भ में साफ पानी को नागरिकों का हक बताया था।

कोर्ट के अनुसार संविधान प्रदत्त जीने के अधिकार में स्वच्छ पानी और हवा भी शामिल है।

बंबई हाईकोर्ट ने भी वर्ष 2014 के अपने एक फैसले में पानी को नागरिकों का हक बताया।

यूनेस्कों ने भी पानी को जीने के अधिकार के तहत बुनियादी अधिकार घोषित किया था।


 

लातूर का कसूर

 

पानी की किल्लत के चलते महाराष्ट्र के लातूर जिले में हैण्डपम्पों व जलस्रोतों के आस-पास धारा 144 लगाई है।

हालात ये हैं कि लातूर जिले में 30 दिन में एक बार ही पानी की सप्लाई होती है।

वर्ष 2015 के मानसून के दौरान लातूर का मुख्य बाँध एक फीसदी ही भर पाया था।

महाराष्ट्र सीएम रहे विलासराव व पूर्व केन्द्रीय मंत्री शिवराज पाटील का गृहजिला है लातूर।


 

3 गुना उत्सर्जन

 

पैसिफिक इंस्टीट्यूट के मुताबिक अमरीका में 1 टन मिनरल वाटर बॉटल बनाने में 33 टन कार्बन उत्सर्जन होता है।

एक लीटर मिनरल वाटर बनाने पर 5 लीटर साफ पानी खर्च करना पड़ता है।

भारत में बोतलबंद पानी शुद्ध लगभग 100 कम्पनियाँ और 1200 बॉटलिंग प्लाण्ट हैं।

दुनिया भर में हर साल बोतलबंद पानी खरीद पर लगभग 100 अरब डॉलर खर्च किया जाता है।


 

जाँच ही नहीं


 

भारतीय मान ब्यूरो के पास बोतलबंद पानी की जाँच की कोई व्यवस्था नहीं है।

सीएसई के शोध में बोतलबंद पानी में मैलेथियॉन, डीडीटी, ऑर्गेनोक्लोरींस जैसे कैंसर जनक कीटनाशक पाये गये।

वर्ष 2018 तक देश में मिनरल वॉटर इंडस्ट्री 160 अरब रुपये की हो जाने का अनुमान है।

अमरीकी खाद्य प्रशासन के अनुसार 40 फीसदी बोतलबंद पानी असुरक्षित होता है।


 



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