टपक (ड्रिप) सिंचाई प्रणाली

Submitted by admin on Mon, 01/12/2009 - 07:59

 

.ड्रिप प्रणाली सिंचाई की उन्नत विधि है, जिसके प्रयोग से सिंचाई जल की पर्याप्त बचत की जा सकती है। यह विधि मृदा के प्रकार, खेत के ढाल, जल के स्त्रोत और किसान की दक्षता के अनुसार अधिकतर फसलों के लिए अपनाई जा सकती हैं। ड्रिप विधि की सिंचाई दक्षता लगभग 80-90 प्रतिशत होती है। फसलों की पैदावार बढ़ने के साथ-सथ इस विधि से उपज की उच्च गुणवत्ता, रसायन एवं उर्वरकों का दक्ष उपयोग, जल के विक्षालन एवं अप्रवाह में कमी, खरपतवारों में कमी और जल की बचत सुनिश्चित की जा सकती है।

इस विधि का उपयोग पूरे विश्व में तेजी से बढ़ रहा है। सीमित जल संसाधनों और दिनों दिन बढ़ती हुई जलावश्यकता और पर्यावरण की समस्या को कम करने के लिए ड्रिप सिंचाई तकनीक निःसन्देह बहुत कारगर सिद्ध होगी। जिन क्षेत्रों में भूमि को सममतल करना मंहगा और कठिन या असंभव हो उन क्षेत्रों में व्यावसायिक फसलों को सफलतापूर्वक उगाने के लिए ड्रिप सिंचाई तकनीक सर्वाधिक उपयुक्त है। ड्रिप तंत्र एक अधिक आवृति वाला ऐसा सिंचाई तंत्र है जिसमें जल को पौधों के मूलक्षेत्र के आसपास दिया जाता है। ड्रिप सिंचाई के द्वारा पौधे को आवश्यकतानुसार जल दिया जा सकता है। ड्रिप सिंचाई के द्वारा 30-40 प्रतिशत तक उर्वरक की बचत, 70 प्रतिशत तक जल की बचत के साथ उपज में 100 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इसके अतिरिक्त खरपरवारों में कमी, ऊर्जा की खपत में बचत और उत्पाद की गुणवत्ता में बढ़ोतरी भी होती है।

 

 

तालिका : सतही सिंचाई विधि की तुलना में ड्रिप सिंचाई के मुख्य लाभ

क्र.सं.

कारण

ड्रिप सिंचाई

सतही सिंचाई

1.

जल की बचत

70 प्रतिशत तक जल की बचत सिंचाई का जल सतह पर बहकर और जमीन में मूलक्षेत्र से नीचे नहीं जाता है।

सिंचाई के जल का बड़ा हिस्सा वाष्षन, रिसाव और जमीन में ज्यादा गहराई तक जाकर बर्बाद होता है।

2.

जल के उपयोग की दक्षता

 80 से 90 प्रतिशत तक

30-50 प्रतिशत, क्योंकि बहुत सारा सिंचाई का जल फसल तक पहुँचने में और खेत में वितरण में बर्बाद हो जाता है।

3.

श्रम की बचत

 ड्रिप तंत्र को लगभग प्रतिदिन शुरू और बन्द करने के लिये श्रम की बहुत कम आवश्यकता होती है।

इसमें प्रति सिंचाई ड्रिप से ज्यादा श्रम की जरूरत होती है।

4.

खरपतवार की समस्या

मिट्टी का कम हिस्सा नम होता है, इसलिये खेत में खरपतवार भी कम होते हैं।

खरपतवार अधिक होते हैं।

5.

खारे जल का उपयोग

जल्दी-जल्दी सिंचाई करने के कारण जड़ तंत्र में अधिक नमी रहती है और लवणों की सान्द्रता हानिकारक स्तर से कम रहती है।

लवणों का सान्द्रण जड़ तंत्र में बढ़ जाता है, जिससे जड़ों की वृद्धि रुक जाती है, इसलिये खारे जल का उपयोग नहीं कर पाते हैं।

6.

बीमारियों और कीड़े-मकोड़े की समस्या

पौधों के आस-पास वायुमण्डल में नमी की सान्द्रता कम रहती है, इसलिये पौधों में बीमारियों और कीड़े-मकोड़े लगने की सम्भावना कम रहती है।

बीमारियों और कीड़े-मकोड़े के होने की सम्भावना अधिक होती है।

7.

खराब मृदाओं में उपयुक्तता

ड्रिप सिंचाई द्वारा मृदा में जल के वितरण को मृदा की प्रकार के अनुसार नियोजित किया जा सकता है। इसलिये, ड्रिप सिंचाई सब प्रकार की मृदाओं के लिये प्रयुक्त की जा सकती है।

खराब मृदाओं में सतही विधि से सिंचाई करना सम्भव नहीं है।

8.

जल का नियंत्रण

बिल्कुल सही और सरल ढंग से सम्भव।

जल वतिरण पर नियंत्रण कम होता है।

9.

उर्वरक उपयोग की दक्षता

निक्षालन और अपवाह न होने के कारण पोषक तत्व नष्ट नहीं होते हैं, इसलिये इनके उपयोग की दक्षता बढ़ जाती है।

पोषक तत्व निक्षालन और बहाव में नष्ट हो जाते हैं, इसलिये उनके उपयोग की दक्षता निम्न होती है।

10.

भूक्षरण

मिट्टी की सतह का आंशिक और नियंत्रित हिस्सा ही गीला होता है, इससे भूक्षरण नहीं होता है।

जल की धारा ज्यादा बड़ी होती है, इसलिये भूक्षरण की अधिक सम्भावना होती है।

11.

पैदावार में बढ़ोत्तरी

जल्दी-जल्दी सिंचाई से मिट्टी में जल तनाव नहीं रहता है और पौधों की वृद्धि अधिक होती है, जिससे पैदावार 100 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।

जल के वितरण असमान एवं सिंचाइयों में अधिक अन्तराल से मृदा में उत्पन्न जल तनाव के कारण पैदावार में कमी होती है।

 

 

ड्रिप सिंचाई के साथ-साथ उर्वरीकरण (फर्टिगेशन) के लाभ


फर्टिगेशन दो शब्दों फर्टिलाइज़र अर्थात् उर्वरक और इर्रिगेशन अर्थात् सिंचाई से मिलकर बना है। ड्रिप सिंचाई में जल के साथ-साथ उर्वरकों को भी पौधों तक पहुँचाना फर्टिगेशन कहलाता है। ड्रिप सिंचाई में जिस प्रकार ड्रिपरों के द्वारा बूंद-बूंद कर के जल दिया जाता है, उसी प्रकार रासायनिक उर्वरकों को सिंचाई जल में मिश्रित करके उर्वरक अंतः क्षेपक यंत्र की सहायता से ड्रिपरों द्वारा सीधे पौधों के पास पहुँचाया जा सकता है। फर्टिगेशन उर्वरक देने की सर्वोत्तम तथा अत्याधुनिक विधि है।

फर्टिगेशन को फसल एवं मृदा की आवश्यकताओं के अनुरूप उर्वरक व जल का समुचित स्तर बनाए रखने के लिए अच्छी तकनीक के रूप में जाना जाता है। जल और पोषक तत्वों का सही समन्वय अधिक पैदावार और गुणवत्ता की कुंजी है। फर्टिगेशन द्वारा उर्वरकों को कम मात्रा में जल्दी-जल्दी और कम अन्तराल पर पूर्वनियोजित सिंचाई के साथ दे सकते हैं, इससे पौधों को आवश्यकतानुसार पोषक तत्व मिल जाते हैं और मूल्यवान उर्वरकों का निच्छालन द्वारा अपव्यय भी नहीं होता है।

सामान्यतः फर्टिगेशन में तरल उर्वरकों का ही प्रयोग किया जाता है परन्तु दानेदार और शुष्क उर्वरकों को भी फर्टिगेशन के द्वारा दिया जा सकता है। फर्टिगेशन के द्वारा शुष्क उर्वरकों को देने से पूर्व उनका जल में घोल बनाया जाता है। उर्वरकों के जल में घोलने की दर उनकी विलेयता और जल के तापमान पर निर्भर करती है। उर्वरकों के घोल को फर्टिगेशन से पहले छान लेना चाहिए।

 

फर्टिगेशन से लाभ


� फर्टिगेशन जल एवं पोषक तत्वों के नियमित प्रवाह को सुनिश्चित करता है जिससे पौधों की वृद्धि दर तथा गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
� फर्टिगेशन द्वारा पोषक तत्वों को फसल की मांग के अनुसार उचित समय पर दे सकते हैं।
� फर्टिगेशन पोषक तत्वों की उपलब्धता और पौधों की जड़ों के द्वारा उनका उपयोग बढ़ा देता है।
� फर्टिगेशन उर्वरक देने की विश्वस्तरीय और सुरक्षित विधि है। इससे पौधों की जड़ों को हानि पहुँचने का भय नहीं रहता है।
� फर्टिगेशन से जल और उर्वरक पौधों के मध्य न पहुंचकर सीधे उनकी जड़ों तक पहँचते हैं इसलिए पौधों के मध्य खरपतवार कम संख्या में उगते हैं।
� फर्टिगेशन से भूमिगत जल का प्रदूषण नहीं होता है।
� फर्टिगेशन से फसलों के पूरे वृद्धि काल में उत्पादन को बिना कम किए, उर्वरक धीरे-धीरे दिए जा सकते हैं।� उर्वरक-उपयोग की किसी अन्य विधि की तुलना में फर्टिगेशन सरल एवं अधिक सुविधाजनक है जिससे समय और श्रम की बचत होती है।
� ड्रिप सिंचाई द्वारा फर्टिगेशन करने से बंजर भूमि (रेतीली या चट्टानी मृदा) में जहां जल एवं तत्वों को पौधे के मूल क्षेत्र के वातावरण में नियन्त्रित करना कठिन होता है, फसल ली जा सकती है।
� उर्वरक-उपयोग की दक्षता बढ़ती है और उर्वरक की कम मात्रा में बावश्यकता होती है (तालिका 8)
 

 

 

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