तटबन्धों के साथ जीवन निर्वाह

Submitted by Hindi on Sat, 09/15/2012 - 16:02
Author
डॉ. दिनेश कुमार मिश्र
Source
डॉ. दिनेश कुमार मिश्र की पुस्तक 'दुइ पाटन के बीच में'

तटबन्ध की पूरी लम्बाई में विभिन्न स्थानों पर तटबन्ध टूटने की स्थिति में कहाँ-कहाँ तक पानी जायेगा, कौन-कौन से इलाके डूबेंगे और वहाँ पानी की गहराई क्या होगी इसके नक्शे पहले से तैयार रखने चाहिये। यह नक्शे प्रत्येक 3 किलोमीटर के फासले पर तटबंध् के टूटने के लिए बनाये जा सकते हैं। एक बार यह नक्शे बना लिए जायें तो यह तय करना आसान हो जायेगा कि कहाँ-कहाँ के कितने लोगों को वहाँ बाढ़ के समय शरण दी जा सकती है।

पिछले अध्यायों में हमने देखा कि तटबन्ध किस तरह से बाढ़ सुरक्षा देने में विफल रहे हैं। कभी कभी तो वह खुद टूट कर व्यापक तबाही का कारण बनते हैं जिससे उनके बीच और उनके बाहर दोनों तरफ ही लोग मुश्किल में पड़ते हैं। तटबन्धों की सुरक्षा सम्बद्ध विभागों का काम है लेकिन इस सुरक्षा में व्यापक द्वन्द्व है। तटबन्ध अगर सुरक्षित रहते हैं तो उनके बीच रहने वाले लोग निश्चित रूप से परेशान होंगे और उनके जीवन पर खतरा हमेशा बना रहेगा। इन लोगों की मुराद यही रहती है कि किसी तरह से तटबन्ध टूटें ताकि उनके यहाँ नदी का पानी उतर जाये। तटबन्ध अगर टूट जाता है तब बाढ़ सुरक्षित क्षेत्रों में लोगों पर क्या गुजरती है यह किसी से छिपा नहीं है। इस तरह से तटबन्धों को लेकर हमारे पास जो विकल्प हैं वह बड़े ही सीमित हैं।

इसलिए यह जरूरी है कि तटबन्ध की पूरी लम्बाई में विभिन्न स्थानों पर तटबन्ध टूटने की स्थिति में कहाँ-कहाँ तक पानी जायेगा, कौन-कौन से इलाके डूबेंगे और वहाँ पानी की गहराई क्या होगी इसके नक्शे पहले से तैयार रखने चाहिये। यह नक्शे प्रत्येक 3 किलोमीटर के फासले पर तटबंध् के टूटने के लिए बनाये जा सकते हैं। एक बार यह नक्शे बना लिए जायें तो यह तय करना आसान हो जायेगा कि कहाँ-कहाँ के कितने लोगों को वहाँ बाढ़ के समय शरण दी जा सकती है। शरणार्थियों की संख्या तय हो जाने के बाद उनके लिए भोजन, पानी, सेनिटेशन, ईंधन, प्राथमिक उपचार तथा पशुओं के लिए चारे आदि की व्यवस्था पर ध्यान दिया जा सकता है। यह स्थान और यह सुविधाएँ अगर सबको पहले से मालूम रहेंगी तो बाढ़ के समय लोगों के बीच भगदड़ नहीं मचेगी। 1978 की बाढ़ के बाद पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में खंभों पर बने प्राइमरी स्कूलों के पक्के भवनों का निर्माण हुआ था। बाढ़ के समय क्लास रूम को रिहाइश के लिए खोल दिया जाता है। प्रथम तल पर हैण्डपम्प की मदद से पीने के पानी की व्यवस्था भी इन स्कूलों में की गई है।

बाढ़ के बढ़ते तल के हिसाब से तटबन्धों के अन्दर के गाँवों के भी डुबान के नक्शे बनाये जाने चाहिये। तटबन्ध के मजबूती से टिके रहने की स्थिति में तटबन्धों के अन्दर बाढ़ का लेवेल बढ़ेगा और लोगों को सुरक्षित स्थानों तक ले जाने की व्यवस्था करनी पड़ेगी। वास्तव में बड़ी संख्या में इन क्षेत्रों से लोग पहले से ही तटबन्ध पर आकर बस जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में तटबन्धों पर से लोगों को उजाड़ने के बजाय उनके बचाव और बेहतरी की व्यवस्था होनी चाहिये।

डुबाव के नक्शे उपलब्ध होने पर एक ओर जहाँ राहत कार्यों के संचालन में सुधार आयेगा वहीं इन कामों में भ्रष्टाचार पर भी लगाम कसी जा सकेगी। पंचायती राज संस्थाओं को इस पूरी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

तटबन्ध टूट जाने के बाद उस गैप को वापस भर दिया जाय या तटबन्ध को खुला ही छोड़ दिया जाय, यह निर्णय करने का अधिकार स्थानीय जनता का होना चाहिये।

बाढ़ चेतावनी की व्यवस्था


बाढ़ से बचाव की यह सारी व्यवस्थायें बेकार साबित होंगी अगर लोगों को समय रहते आने वाली बाढ़ की चेतावनी न मिल पाये। तटबन्धों के कटाव के बारे में तो यह सूचना और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों जैसे रेडियो और टी.वी. और अब मोबाइल की मदद से तो आने वाली बाढ़ के बारे में जानकारी निश्चित रूप से लोगों तक पहुँचाई जा सकती है मगर स्थानीय तौर पर सबसे कारगर व्यवस्था लाउडस्पीकरों के माध्यम से ही की जा सकती है। ग्रामीण इलाकों में बहुत से मन्दिरों और मस्जि़दों में लाउडस्पीकर की व्यवस्था रहती है। इन धार्मिक स्थलों के पुजारियों तथा इमामों को इस बात के लिए प्रेरित किया जा सकता है कि वह बाढ़ के खतरे से लोगों को समय रहते आगाह करें। पंचायतों को आधुनिक संचार के उपकरणों से जोड़ना चेतावनी देने की दिशा में एक उचित और जरूरी कदम होगा।

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