तिब्बत की नदियां और दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा

Submitted by HindiWater on Wed, 10/21/2020 - 16:38
Source
दैनिक लोकमत

 

सन 2005 से हर साल सितंबर माह के चौथे रविवार को विश्व नदी दिवस पूरी दुनिया में मनाया जाता है। मनाये जाने के उद्देश्य के बारे में सिर्फ इतना ही कहा गया कि हम अपनी नदियों को ज्यादा से ज्यादा जाने और उनकी सुरक्षा औ संवर्धन में अपना योगदान दें। इस बार यह 27 सितम्बर को मनाया जा रहा है। इस मौके पर ,हम तिब्बती पठार यानी कि तिब्बत से उत्पन्न होने वाली नदियों और एशिया के बडे भाग में जल सुरक्षा को जानने समझने का प्रयास करते हैं। भारत के उत्तर- पूर्व में स्तिथ तिब्बत का पठार दुनिया का तीसरा ध्रुव कहलाता है क्योंकि इस पर उत्तर और दक्षिणी ध्रुव  के  बाद प्राकर्तिक बर्फ का सबसे बडा भंडार है।यह 46000 से अधिक ग्लेशियरों का घर भी है,जो कि 105000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। 

 

इसीलिये यह दुनिया की सबसे बडी पानी की टंकी भी है। सिंधु, सतलज, ब्रह्मपुत्र, इरावदी, सालबन और मेकांग सहित एशिया की 10 प्रमुख नदियाँ तिब्बती पठार से उत्पन्न होती हैं। जो कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, चीन, बांग्लादेश, म्यांमार(बर्मा), थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम के लोगो,जीव जंतुओं,पेड पौधों के लिये जीवन रेखा का काम करतीं हैं। ये देश दुनिया की जनसँख्या का 47 हिस्सा बनाते हैं। 5.6मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक में रहने वाले 43 अरब लोगो का जीवन तिब्बत से निकलने वाली इन्ही नदियों  के स्वास्थ पर निभर्र करता है।

तिब्बत से निकलनेवाली और भारत मे बहने वाली प्रमुख नदी-ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलज हैं। गंगा में मिलने वाली नेपाल की कुछ नदियां भी तिब्बत में ही उत्पन्न होती हैं उनमें सबसे प्रमुख नदी है-कर्राली। तिब्बत काली गण्डकी नदी, बूढी गंडक और त्रिभुली नदी के बडे हिस्से का भी उदगम स्थल है। जो कि नेपाल की गण्डकी नदी प्रणाली की प्रमुख सहायक नदियां हैं। इसी प्रकार कोसी नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ जैसे सूर्य कोसी/भोट कोसी , तम कोसी और अरुण की उत्पत्ति भी तिब्बत में हुई है। एक तरफ सिंधु पूरे पाकिस्तान को पार के अरब सागर में मिलती है तो दूसरी तरफ मेकाँग, लोअस, थाईलैंड कंबोडिया और वियतनाम से होकर दक्षिणी चीन सागर में गिरती है। तो हम देख रहे है कि पानी एक है । 

साझी प्रकार्तिक सम्पदा/धरोहर(संसाधन)है इसलिये इस पर सिर्फ मनुष्य का ही नहीं, बल्कि सभी जीव जंतुओं पेड पौधों का हक होना चाहिये। नदी पानी की उपलब्धता और उपयोग, हमारे आज के (और साथ ही पहले के भी) राजनीतिक सीमाओं से बंधा नहीं है। हालांकि तेजी से बढती जनसंख्या और ग्लोबल वार्मिंग जैसे विभिन्न कारणों से पानी की कमी और पानी तक पहुंच 'की कमी दुनिया में लगातार बढ रही है।और एशिया तो दुनिया का सबसे सूखा महादीप माना जाता है। 

यंहा ताडे पानी की उपलब्धता,उत्तरी अमेरिका की एक चौथाई और यूरोप की अपेक्षा एक तिहाई से भी कम है। इस पर तुर्रा यह कि 1950-57 से पानी की दुनिया की सबसे बड़ी टंकी-तिब्बत-पर चीन का कब्जा है।और इस तरह तिब्बत के निकलने वाली नदियों और भौगोलिक पोजिशन के कारण उनका पानी भी उसके नियंत्रण में है।चीन ने लंबे समय से ही प्राकृतिक संपदा को कब्जाने की एक व्यापक रणनीति अपनाई है।अब चीन पानी के स्रोतों पर अपनी नजर गढ़ाए है। बीजिंग चुपचाप चुपचाप ,तिब्बत से उतपन्न इन अन्तर्राष्ट्रीय नदियों और उनके पानी पर 1989-90 के बाद से ही अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है,बढा रहा है। आज तथ्य यह है कि चीन तिब्बत से शुरू होने वाली इन अंतरराष्ट्रीय नदियों पर विशालकाय बांध बना और्‌ नदी पानी की धाराओं को मोडने वाले स्ट्रक्र व अन्यसं रचनाओं जैसे पन बिजली संयंत्रओ का निर्माण करके,एशिया की इस नदियों के ऊपरी जल(अप्स्ट्रीम)का नियंत्रक बन,इनके पानी का ज्यादा से ज्यादा दोहन(टैपिंग) कर रहा है। 

 मेकाँग नदी पर बने बांधो के कारण दक्षिण एशिया मसलन थाईलैंड/लाओस,कंबोडिया,वियतनाम में सूखा लगातार बढ रहा है। इसी तरह ब्रह्मपुत्र के तिब्बती हिस्से में बांधो की एक श्रृंखला बन रही है,जिसका बढा प्रभाव,कम पानी वहाव के रूप में,भारत के साथ साथ बांग्लादेश परज़्यादा ,पडेगा,जो कि नीचे की तरफ है। नेपाल की नदिओं पर पडने वाला असर जैसे कर्णाली नदी पर,बाद में गंगा पर ही पडेगा क्योंकि गंगा के पानी में 46% नेपाल की उन नदियों से आता है, जो तिब्बत से निकलती हैं। तब गंगा का क्या होगा? साथ ही पिछले दो तीन सालों से चीन हैड्रोलॉजिकल डेटा(नदी पानी बहाव सम्बन्धी आकडे)की आपूर्ति का भी इस्तेमाल एक रणनीतिक औजार की तरह कर रहा है। 

जिसके कारण भौगोलिक रूप से निचले देशो के इलाको में बाढ की पूर्व चेतावनी प्रणाली चरमरा जाती है। जो कि जान माल के बडे विनाश 'का कारण बनती है ऐसा हम असम में कुछ सालों से कई बार देख चुके हैं। दुनिया के कई हिस्सों कौ तरह,तमाम अंतरराष्ट्री जल सन्धियों को धता बताते हुये, तिब्बत में बांधो,नदी मोड परियोजना के निर्माण के चीन के एक तरफा फैसले के कारण दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में तनाव बढ रहा है। यह समझा जा सकता है,कि अंतरराष्ट्रीय नदियों पर जितने अधिक बांध, पानी मोडने के स्ट्रक्तर,विधुत संयंत्र होते हैं, यह उतना ही अधिक पानी को एक कुटनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की क्षमता बढ जाती है। दक्षिण एशिया में शांतिःसदभाव और इकोलॉजी के अनुरूप विकास के लिये नदी पानी से संबंधित मामलों में पारदर्शिता, सहयोग, जल विज्ञान डेट का सतत लेन देन,विवाद निपटान तंत्र का सुचारू व अंतरराष्ट्रीय जल सन्धियों के अनुरूप होना अत्यंत आवश्यक है।अपस्ट्रीम के देशों, को इनमे आगे आकर सहयोग करना चाहिये।अन्यथा पानी की मीनार-तिब्बत-की नाजुक 'पारिस्थिकी बहुत ही घातक स्तिथि में पहुंच,अपने अंत की  तरफ बढ चलेगी जिसके जिम्मदार हम सब होंगे।

 

 

 

 

 

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