उत्तराखण्ड के विकास की समस्याएँ एवं समाधान

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योजना, 30 सितम्बर 1993

शासन को नियोजन एवं नीतियों के निर्धारण में स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग को, समाजसेवियों, राजनीतिज्ञों एवं स्थानीय परिवेश से परिचित तकनीकी विशेषज्ञों से सहायता एवं परामर्श कर विकास नीति के निर्धारण एवं क्रियान्वयन की व्यवस्था करनी चाहिए। पर्वतीय विकास के लिये यदि उपर्युक्त सुझावों को ध्यान में रखा जाता है। तो निःसंदेह विकास प्रक्रिया के चिन्तन एवं व्यवहार को और अधिक प्रभावी और दिशापूर्ण बनाया जा सकता है।

भारत की उत्तरी सीमा में पूर्व से पश्चिम तक हिमालय क्षेत्र फैला हुआ है। हिमालय अनन्तकाल से भारत का प्रहरी ही नहीं वरन भारत की समृद्धि का स्रोत भी रहा है। यह एक शाश्वत सत्य है कि हिमालय से ही भारत और भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु नियंत्रित होती है तथा अतीतकाल से ही हिमालय भारतीय सभ्यता, संस्कृति एवं साहित्य से जुड़ा रहा है।

इसी विशाल हिमालय के मध्यवर्ती भाग में नेपाल, भूटान तथा उत्तर प्रदेश के गढ़वाल और कुमाऊँ मण्डल आते हैं। कुमाऊँ मण्डल में पिथौरागढ़, अल्मोड़ा तथा नैनीताल तीन जनपद और गढ़वाल मण्डल में चमोली, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून पाँच जनपद आते हैं। वर्तमान में कुमाऊँ तथा गढ़वाल मण्डल के ये आठ पर्वतीय जनपद ही उत्तराखण्ड अथवा उत्तरांचल के नाम से जाने जाते हैं। इस पर्वतीय सीमान्त प्रदेश ‘उत्तराखण्ड’ की लगभग 320 किलोमीटर लम्बी सीमा तिब्बत से तथा लगभग इतनी ही नेपाल से लगती है। सीमा क्षेत्र में अनेक गिरिद्वार हैं जिनसे होकर सदियों से हिमालय के आर-पार आवागमन होता था। इसी कारण सामरिक दृष्टि से भी यह पर्वतीय प्रदेश अत्यधिक महत्त्व रखता है। गंगा-यमुना, रामगंगा व काली आदि नदियों का यह जल ग्रहण क्षेत्र है।

उत्तराखण्ड का कुल क्षेत्रफल 51,121 वर्ग किलोमीटर और 1911 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या 48,35,682 है, जिसमें 24,68,000 पुरुष तथा 23,67,712 महिलाएँ थीं। कुल जनसंख्या का 81.7 प्रतिशत हिस्सा 14,970 गाँवों में बसा हुआ है। कुल जनसंख्या में से कुमाऊँ में 38.05 प्रतिशत तथा गढ़वाल में 40.49 प्रतिशत व्यक्ति साक्षर थे। कुमाऊँ तथा गढ़वाल कमिश्नरियों में कुल आबादी में से क्रमशः 34.89 प्रतिशत तथा कुल 33.87 प्रतिशत ग्रामीण और क्रमशः 54.33 प्रतिशत तथा 66.48 प्रतिशत नगरीय आबादी साक्षर थी।

प्रशासनिक दृष्टि से उत्तराखण्ड को कुल 30 तहसीलों में बाँटा गया है। कुल विकासखण्डों की संख्या 89 है।

उत्तराखण्ड का अधिकांश भाग पर्वतीय है। इस कारण कृषि का उत्पादन अधिक नहीं हो पाता। फिर भी रोजगार के अन्य साधन न होने के कारण जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा कृषि से जुड़ा हुआ है। जबकि कुल कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल भी अपेक्षाकृत न्यून है। कुल ग्रामीण किसानों में से 85.9 प्रतिशत सीमान्त एवं लघु कृषक हैं, जिनके पास कुल कृषि योग्य भूमि का 50.6 प्रतिशत भाग है। हिमालय के इस भाग में कुल क्षेत्रफल के 15.5 प्रतिशत भाग में बुआई की जाती है और उसमें केवल 14.1 प्रतिशत भाग सिंचित है। कृषि उत्पादन की दृष्टि से मानसून पर निर्भर है। यह भूमि ढालू तथा सीढ़ीदार होने के कारण तथा इस पर लागत अधिक होने के कारण यह कम लाभदायक है। कृषि भूमि की उत्पादकता कम है। फलतः कृषि उत्तराखण्ड के निवासियों को आत्मनिर्भर बनाने में सक्षम नहीं रही है। कृषि जीविका का एक प्रधान साधन होने के कारण निर्धनता की स्थिति उत्पन्न हुई है तथा प्रति व्यक्ति औसत आय बहुत कम है।

यह सर्वसम्मत है कि ग्रामीण जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अपनी न्यूनतम आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं कर पा रहा है और गरीबी की रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहा है।

उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी समस्या पहाड़ी जनमानस का तीव्रगति से शहरों की ओर पलायन है। स्वतंत्रता के पश्चात यह पलायन इतना प्रभावशाली बन गया है कि इसने पूरे इलाके में आर्थिक एवं सामाजिक ढाँचे को बदलकर रख दिया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पहाड़ी आबादी का शहरों की ओर पलायन बुरा सिद्ध हो रहा है।

कृषि योग्य भूमि की अपर्याप्तता, कष्टप्रद जीवन, रोजगार की तलाश, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सम्बन्धी सुविधाओं के अभाव के कारण पर्वतीय क्षेत्र से पुरुष कार्यकारी शक्ति का पलायन होता जा रहा है। पिछले चार दशकों के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि पुरुष की कुल जनसंख्या का प्रतिशत लगातार गिरता जा रहा है, जबकि सम्पूर्ण जनसंख्या को यदि विभिन्न आयु वर्गों में बाँट कर देखा जाए तो पता चलता है कि कार्यकारी आयु वर्ग में (15 से 60 वर्ष) अधिक भाग महिला काश्तकार हैं।

कृषि जनमानस का दिल उचट रहा है। पढ़लिखकर युवा वर्ग खेती जैसे दुरूह और कष्टदायक कार्य को नहीं अपनाना चाहता है। खासकर उस स्थिति में जबकि कृषि में अधिक उपलब्धि नहीं दिखाई देती।

पुरुषों के पलायन के कारण गृहस्थी तथा कृषि अर्थव्यवस्था का सम्पूर्ण बोझ महिलाएँ सम्भाले हुए हैं। पर्वतीय भू-भाग में कृषि का मूल आधार महिला है। खेत में बीज खाद निराई, गुड़ाई, फसल, कटाई, मण्डाई, सफाई एवं घर का रख-रखाव सभी कार्य महिलाओं द्वारा किए जाते हैं। खेती, पशुपालन, ईंधन, चारे व पानी आदि की दैनिक व्यवस्था में सुबह से शाम तक जुटे रहना नारी की स्थिति बन गई है। वस्तुतः दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये महिलाओं को प्रतिदिन 12 से 14 घंटे तक कठोर परिश्रम करना पड़ता है।

आज गढ़वाल मण्डल के सुदूर ग्रामीणों की अर्थव्यवस्था मनीऑर्डरों पर टिकी है। गढ़वाल के अधिकांश परिवार प्रतिमाह मनीऑर्डर पर निर्भर रहते हैं। इसीलिये यहाँ की अर्थव्यवस्था को ‘मनीऑर्डरी अर्थव्यवस्था’ भी कहा जाता है।

पशुपालन, पर्वतीय क्षेत्र में कृषि परक व्यवसाय माना जाता है। इसका महत्त्व मात्र दुग्ध या सम्बन्धित उत्पादनों की दृष्टि से ही नहीं है वरन फसलों में खाद की आवश्यकताओं की पूर्ति की दृष्टि से भी पशुपालन की अहमियत है। दुधारू पशुओं की तुलना में उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में दुग्ध उत्पादन कम है। क्योंकि अधिकांश पशु उन्नत प्रजाति के नहीं हैं। ऊन उत्पादन पर्वतीय क्षेत्र का एक पशुजन्य उद्योग है। लेकिन अभी भी देशी भेड़ों की संख्या क्रास ब्रीड भेड़ों की तुलना में तीन गुनी अधिक है, जिनसे ऊन का उत्पादन कम होता है। इसके साथ ही चारागाह की समस्या अथवा चारागाहों के अभाव के कारण भी पशुपालन और भेड़ पालन से लोगों का मोह भंग हो रहा है। पशुओं की सेवा और सुश्रूषा के नाम पर बने चिकित्सालय और पशुधन में सुधार कार्यक्रम भले ही पर्वतीय क्षेत्र के शहरी क्षेत्रों में सुचारु रूप से चल रहे हों लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित चिकित्सालयों में आवश्यकताओं के अनुरूप सुविधाओं का नितान्त अभाव है।

किसी भी अर्थव्यवस्था के लिये उद्योगों का विकास आर्थिक विकास का प्रमुख द्योतक है। परन्तु पर्वतीय क्षेत्र इस दृष्टि से काफी पिछड़ा हुआ है। वस्तुतः उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था का एकांगी एवं असंतुलित विकास हुआ है। पर्वतीय क्षेत्र में कृषि पर निर्भरता अधिक है और अच्छी कृषि के लिये जो उद्योग विकसित होने चाहिए, वे भी विकसित नहीं हो पाए हैं। बाजार की असुविधा और तकनीकी कौशल की कमी भी प्रायः पर्वतीय क्षेत्र में औद्योगिक विकास के मार्ग में बाधक रहे हैं। औद्योगिक विकास के बिना आर्थिक विकास की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकती। औद्योगिक विकास का अभिप्राय है, देश में उपलब्ध प्राकृतिक सम्पत्ति का संतुलित शोषण, वस्तुओं और सेवाओं की अधिकतम उत्पत्ति, अधिक आमदनी, जीवनस्तर में उन्नति, रोजगार की सुविधाएँ और राष्ट्र का आर्थिक विकास। ये ही सिद्धान्त क्षेत्रीय विकास पर लागू होता है। पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन असंतुलित रूप से हुआ और फलतः इन संसाधनों के अनुरूप औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करने में प्रभावशाली प्रयास नहीं हो पाए।

जनसंख्या की वृद्धि, बेरोजगारी की समस्या, कच्चे माल के बहिर्गमन की समस्या, तकनीकी कौशल की कमी, औद्योगीकरण का अभाव, वैज्ञानिक कृषि पद्धति का अभाव, बागवानी एवं उद्यानिकी को समुचित प्रश्रय न मिलने तथा लघु एवं कुटीर उद्योगों की उपेक्षा के परिणामस्वरूप पर्वतीय अर्थव्यवस्था में वांछित सुधार और पर्वतीय जनमानस को आत्मनिर्भरता प्राप्त नहीं हो पाई है। इससे न केवल पलायन की समस्या बढ़ी है वरन सामाजिक-आर्थिक विकास के लिये भी गम्भीर चुनौती पैदा हुई है।

अतः परिवर्ति परिस्थितियों में उत्तराखण्ड हिमालय के विकास के लिये वांछित उपायों का अवलम्बन किया जाना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्र के प्रबुद्ध व्यक्तित्व, समाजसेवी, बुद्धिजीवी एवं राजनीतिज्ञ विगत वर्षों से इस बारे में चिन्तन करने लगे हैं, यह एक सौभाग्य की बात है।

उत्तराखण्ड हिमालय विकास के लिये नियोजन करते समय अथवा नीति निर्धारित करते समय कतिपय महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। इस दृष्टि से कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव निम्नवत हैं -

1. उत्तराखण्ड हिमालय के क्षेत्रीय विकास एवं आत्मनिर्भरता की दृष्टि से सर्वप्रथम स्थानीय मानवीय संसाधनों, स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों, वित्तीय संसाधनों, भौगोलिक परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं का गहन अध्ययन तथा सर्वेक्षण किया जाए तथा तदनुरूप नीतियों का निर्धारण एवं कार्यक्रमों का संचालन किया जाए।

विगत पंचवर्षीय योजनाओं में पर्वतीय विकास के लिये अरबों रुपयों का प्रावधान किया गया, लेकिन न ही पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं का निराकरण हुआ और न ही आर्थिक आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त हुआ। उपलब्ध संसाधनों का संतुलित दोहन न होने के कारण पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं का वांछित निराकरण नहीं हो पाया। पर्वतीय विकास के लिये धन तो दिया गया, लेकिन धन के समुचित नियोजित उपयोग की व्यवस्था नहीं की गई। वस्तुतः स्थानीय आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुसार नियोजन की कारगर व्यवस्था नहीं की गई। जिसके परिणामस्वरूप आज तक पर्वतीय जनजीवन के वास्तविक कष्टों का अन्त नहीं हो पाया है।

2. पर्वतांचलों के क्षेत्रीय विकास के लिये नियोजन निर्धारण के समय महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान के कार्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में महिलाएँ घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित रही हैं। अतः किसी भी विकास कार्यक्रम की सफलता के लिये यह आवश्यक है कि उसके निर्माण तथा क्रियान्वयन में उनकी सक्रिय सहभागिता हो। वस्तुतः लघु उद्योग, कृषि, पशुपालन, वन शिक्षा और स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यक्रमों के नियमन तथा क्रियान्वयन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया जाए तो उसके वांछित परिणाम निकलेंगे।

3. पर्वतीय क्षेत्रों से युवाओं का पलायन रोकने और बढ़ती बेरोजगारी दूर करने के लिये यह आवश्यक है कि पर्वतीय अंचलों के अनुरूप योजनाएँ बनाकर उद्योग धन्धे स्थापित किए जाएँ। बेरोजगारी की समस्या के निराकरण के लिये लघु उद्योग कारगर हो सकते हैं। अतः स्थानीय संसाधनों के अनुरूप लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना का प्रयास किया जाना चाहिए। ये उद्योग व्यक्तिगत तथा सरकारी तौर पर चलाए जा सकते हैं। ऐसे उद्योगों में लकड़ी उद्योग, माचिस, जड़ी-बूटी पर आधारित उद्योग; कंबल, कालीन उद्योग और फल उद्योग आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। हिमाचल क्षेत्र में स्थानीय संसाधनों पर आधारित अनेक पारम्परिक कुटीर उद्योग भी प्रचलन में रहे जो गुणात्मक आधार पर उपयोगिता रखते हैं। ऐसे उद्योगों में कृषि यंत्रों का निर्माण, भीमल व तोण की रस्सियों का निर्माण, रिंगाल व बांस द्वारा विभिन्न उपयोगी वस्तुओं का निर्माण, करघा निर्मित कंबल व ऊनी वस्तुओं को शामिल किया जा सकता है। दुर्भाग्य से पूरे पर्वतीय क्षेत्र से परम्परागत उद्योग गाँवों से लुप्त होते जा रहे हैं। मौजूदा समय में पर्वतीय विकास नीतियों के अन्तर्गत इन उद्योगों को संरक्षण दिए जाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही गैर पारम्परिक उद्योगों जैसे अंगौरा खरगोश पालन, कुक्कुट पालन, मीनपालन, मशरूम उत्पादन तथा रेशम उत्पादन को प्रोत्साहित करके क्षेत्रीय जनता की अर्थव्यवस्था को सुधारने का प्रयास किया जा सकता है। नवीन अपारम्परिक उद्योगों के विकास के साथ ही पारम्परिक व्यवसायों के पुनरुद्धार एवं संरक्षण की भी आवश्यकता है और इस पर यथोचित ध्यान दिया जाना चाहिए।

4. क्षेत्रीय विकास के लिये शिक्षा का विशेष महत्त्व होता है। पर्वतीय क्षेत्रों में सरकार ने प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल, उच्चतम विद्यालय, इण्टर कॉलेज एवं महाविद्यालय खुलवाए हैं। लेकिन अधिकांश विद्यालयों में छात्र संख्या के अनुपात में शिक्षक नहीं हैं। अतः शिक्षक पर्याप्त मात्रा में नियुक्त किए जाने चाहिए तथा विद्यालयों में शिक्षण सुविधाओं को समुचित मात्रा में जुटाया जाना चाहिए ताकि शिक्षा का स्तर उन्नत हो।

5. शैक्षिक विकास के साथ ही आत्म निर्भरता की दृष्टि से तकनीकी शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अभी भी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना के बावजूद पर्वतीय इलाकों में तकनीकी शिक्षा का पूर्णतः अभाव बना हुआ है। स्थानीय, भौगोलिक एवं भौतिक परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों को प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है ताकि युवा वर्ग आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो सके।

6. पर्यटन उद्योग के विकास की पर्वतीय क्षेत्रों में निःसंदेह असीमित सम्भावनाएँ हैं। यह उद्योग स्थानीय रोजगार के साधनों की वृद्धि कर सकता है। इस उद्योग के विकास में इस बात को अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि इससे पर्यावरण, स्थानीय संस्कृति तथा सभ्यता प्रभावित न हो।

7. कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु जहाँ कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक साधनों को प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है, वहीं कृषि निवेश, खाद, बीज हेतु बिक्री केन्द्र, सिंचाई साधन, खाद्यान्न मार्केट की भी व्यवस्था कीये जाने की आवश्यकता है। विगत योजनाओं में इस क्षेत्र में कुछ प्रयास किए गए हैं, जिन्हें और अधिक सबल और विस्तृत किए जाने की आवश्यकता है।

8. फलोद्यान पर्वतीय अंचल में आर्थिक समृद्धि के लिये विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। क्योंकि पर्वतीय अंचल में कृषि व्यवसाय बहुत अधिक लाभ कर रही है। यद्यपि बागवानी विकास के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। परन्तु मार्केटिंग और प्रोसेसिंग को उपयुक्त एवं स्थाई ढाँचे का अभी अभाव है। फलोद्यान से पर्याप्त लाभ प्राप्त करने के लिये इस कमी को दूर किया जाना चाहिए तथा फलों के भण्डारण, वितरण की भी व्यवस्था की जानी चाहिए, साथ ही उद्यानिकी के प्रशिक्षण के लिये ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर विभिन्न प्रशिक्षण शिविर लगाए जाने चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोग इस ओर प्रवृत्त हों।

9. पर्वतीय क्षेत्रों में पशुपालन तथा दुग्ध विकास कार्यक्रम को सहायक व्यवसाय के रूप में विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं और उसके लिये विभिन्न अवस्थापन सुविधाओं, प्रसार सुविधाओं तथा प्रबन्ध व्यवस्था आदि के लिये विनियोजन में उत्तरोत्तर वृद्धि की गई है। लेकिन मिश्रित वनों के लुप्त होने, चारागाहों के विनाश और तराई के शीतकालीन चारागाहों में कृषि के कारण पशुपालन का ह्रास हुआ है। इसके साथ ही पशुओं की नस्ल एवं संख्या का भी यथोचित विस्तार नहीं हो पाया है। दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से स्थानीय दुधारू पशुओं की क्रास ब्रीड तथा अन्य उन्नत नस्ल के पशुओं के प्रतिस्थापन की आवश्यकता है। क्षेत्र की विषम भौगोलिक स्थिति को देखते हुए पशु चिकित्सालय, पशु सेवा केन्द्र आदि अवस्थापना सम्बन्धी सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता है। इसी प्रकार ऊन उद्योग के विकास के लिये देशी भेड़ों को क्रास ब्रीड तथा शुद्ध नस्ल की भेड़ों में परिवर्तन की प्रक्रिया तेज की जानी चाहिए ताकि अधिक ऊन उत्पादन हो सके एवं ऊन पर आधारित उद्योगों से भी अधिक रोजगार उपलब्ध हो सके।

10. पर्वतीय क्षेत्र में विगत वर्षों में वन सम्पदा का काफी ह्रास हुआ तथा पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण संतुलन में भी ह्रास हुआ है। पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी संतुलन एक राष्ट्रीय महत्त्व की समस्या होने के कारण इस कार्यक्रम को भी अवश्य प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पर्वतीय क्षेत्र में भूस्खलन एवं भूक्षरण को रोकने के लिये तथा पर्यावरण की समस्या को देखते हुए वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण के कार्यक्रम को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए।

11. उत्तराखण्ड के समग्र विकास के लिये पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में कतिपय सुविधाओं का भी विस्तार किए जाने की आवश्यकता है। पेयजल आपूर्ति, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, सड़क एवं परिवहन व्यवस्था, ऊर्जा विकास आदि कार्यक्रमों के भी यथोचित विस्तार एवं प्रसार की आवश्यकता है।

उपर्युक्त सुविधाओं के विस्तार के साथ ही सामाजिक जीवन की कतिपय समस्याओं एवं बुराईयों की रोकथाम की भी आवश्यकता है, जो पर्वतीय जन जीवन की सरलता, सादगी एवं संस्कृति को दूषित कर सकती है। इस दृष्टि से मद्यपान की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जाना चाहिए तथा विवाहोत्सव आदि पर जो पारम्परिक सादगी थी, उसे बरकरार रखा जाना चाहिए। दहेज जैसी सामाजिक बुराई पर्वतीय क्षेत्र में प्रवेश कर विकराल रूप न ले ले, प्रबुद्ध समाज को इसके प्रति सजग रहना चाहिये।

शासन को नियोजन एवं नीतियों के निर्धारण में स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग को, समाजसेवियों, राजनीतिज्ञों एवं स्थानीय परिवेश से परिचित तकनीकी विशेषज्ञों से सहायता एवं परामर्श कर विकास नीति के निर्धारण एवं क्रियान्वयन की व्यवस्था करनी चाहिए। पर्वतीय विकास के लिये यदि उपर्युक्त सुझावों को ध्यान में रखा जाता है। तो निःसंदेह विकास प्रक्रिया के चिन्तन एवं व्यवहार को और अधिक प्रभावी और दिशापूर्ण बनाया जा सकता है।

वरिष्ठ प्रवक्ता, राजनीति विज्ञान विभाग, एच.एन.बी; गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल)

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