वैकल्पिक ऊर्जा साधन और स्वयंसेवी संस्थाएँ

Submitted by Hindi on Mon, 03/06/2017 - 13:14
Source
योजना, 26 जनवरी 1991

आज केवल भारत ही नहीं अपितु पूरा विश्व ऊर्जा के संकट से गुजर रहा है। भारत जैसे विकासशील देशों में तो यह स्थिति और भी भयावह है। इस ऊर्जा संकट ने 1973 के संकट के बाद विश्व का ध्यान विशेष रूप से आकृष्ट किया है। वैसे तेल, कोयला तथा लकड़ी आदि ऊर्जा के स्रोत सीमित हैं जिनमें तेल के भाव कब और कितने बढ़ जाएँ, कोई नहीं जानता। इसलिये वैकल्पिक ऊर्जा का पता लगाना बहुत आवश्यक है। यह पर्यावरण की दृष्टि से भी काफी उपयोगी हो सकता है। इसमें स्वयंसेवी संस्थाएँ काफी योगदान कर सकती हैं। लेखक, जो कि जाने-माने विज्ञान लेखक हैं, ने इस लेख में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर प्रकाश डालते हुए भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा किए गए कार्यों का संक्षिप्त विवरण दिया है।

प्रारम्भ में सरकार ने भी स्वयंसेवी संस्थाओं को प्रोत्साहित करने के लिये सहयोग तथा मदद उपलब्ध करायी। इस सहयोग से जो स्वयंसेवी संस्थाओं को जानकारी उपलब्ध हुई उसका उपयोग करके उन्होंने राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति में अपना सहयोग प्रदान किया। एक ओर तो सरकार के लक्ष्य पूरे हुए और दूसरी ओर स्वयंसेवी संस्थाओं में जानकारी और कुशलता में भी वृद्धि हुई।

ऊर्जा की आपूर्ति जिन साधनों से देश में हो रही है वह आम तौर पर व्यावसायिक स्तर पर उपलब्ध हैं और उनकी खपत भी अधिकतर शहरी क्षेत्रों में ज्यादा है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी यातायात और बिजली की आपूर्ति के लिये उन व्यावसायिक साधनों का दोहन किया जाता है। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू ऊर्जा की पूर्ति के लिये जैविक ऊर्जा साधनों, जैसे कि जलाऊ लकड़ी और गोबर का उपयोग किया जाना शामिल है। शहरी क्षेत्रों में भी कही-कहीं इन साधनों का उपयोग किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आम जनता का रुझान इस वजह से अधिक है कि यह साधन मुफ्त ही उपलब्ध हो जाते हैं।

नये ऊर्जा स्रोतों का महत्त्व


पिछले 40 वर्षों में विकास प्रक्रिया जिस प्रकार से चालू रही है उसको देखते हुए ऊर्जा के व्यावसायिक स्रोतों का महत्त्व अधिक बढ़ गया है। इनका उपयोग आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के कारण महत्त्वपूर्ण हो गया है। वर्ष 1973 में तेल संकट के बाद विश्व का ध्यान कोयला और तेल दोनों ही साधनों के दुष्परिणामों की ओर अधिक केन्द्रित रहा। कच्चे तेल पर तो इस कारण से कि उसका व्यावसायिक मूल्य कब कितना बढ़ जाये यह किसी को कहना सम्भव नहीं था और कोयले का दुष्परिणाम पर्यावरण को उत्पन्न खतरे के कारण। इन बातों को ध्यान में रखते हुए भारत जैसे देश में वैकल्पिक ऊर्जा साधनों की ओर ध्यान केन्द्रित होना स्वाभाविक ही है। इन साधनों के दोहन में सही प्रौद्योगिकी के उपलब्ध न होने के कारण कुछ दिक्कतें आवश्य हो रही हैं। परन्तु इन साधनों का एक बड़ा उपयोग यह भी है कि ये सब देश में ही उपलब्ध हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय तौर पर इनका दोहन सदियों से होता आ रहा है। क्योंकि ग्रामीण जनता को इन साधनों के उपयोग की आदत है इसलिये कोई भी नयी प्रौद्योगिकी अपनाने में इनको कोई दिक्कत नहीं होगी।

इन प्रौद्योगिकियों के उपयोग और फैलाव में सुविधा इस कारण से और भी है कि बहुत सी प्रौद्योगिकियाँ पहले ही उपयोग में आ चुकी हैं। परन्तु पिछले कुछ वर्षों से उनका उपयोग नहीं हो रहा था। इसका मुख्य कारण ऊर्जा के व्यावसायिक स्रोतों की उपलब्धता ही था। अब जबकि देश को यह फैसला करना है कि ऊर्जा की उपलब्धता हो या न हो तो कम क्षमता वाली प्रौद्योगिकियों की ओर भी ध्यान जाना आवश्यक है।

वैकल्पिक ऊर्जा साधनों पर जोर


1980 के दशक में वैकल्पिक ऊर्जा साधनों का कार्यक्रम अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नैरोबी में अगस्त 1981 के सम्मेलन के बाद प्रारम्भ हुआ। इसकी सिफारिशों के अधीन ही भारत में वैकल्पिक ऊर्जा साधनों, जिनका कि पर्यावरण पर दुष्परिणाम बहुत ही कम है, की ओर ध्यान दिया जाने लगा। इन वैकल्पिक ऊर्जा साधनों से एक तरफ तो ऊर्जा आपूर्ति होती है और दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण भी। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग में सबसे पहले एकक के रूप में अनुसंधान और विकास कार्यों क लिये 1974-75 में कार्य प्रारम्भ किया गया था। 12 मार्च 1981 को जब अतिरिक्त ऊर्जा साधन आयोग की स्थापना की गई तो इन साधनों के लिये देशव्यापी कार्यक्रम बनाया गया। इस व्यापकता को देखते हुए देश में एक अपारम्परिक ऊर्जा स्रोत विभाग 6 सितम्बर 1982 को स्थापित किया गया। इसके साथ ही देश में विभिन्न एजेंसियों ने कार्य करना प्रारम्भ कर दिया।

व्यावसायिक ऊर्जा साधनों में सरकार को ऊर्जा साधन की खरीद, परिवहन एवं वितरण का सारा खर्च उठाना पड़ता है। परन्तु वैकल्पिक ऊर्जा साधनों में खुद आम जनता को ही इन सारी प्रक्रियाओं पर खर्च वहन करना पड़ता है। इसलिये यह आवश्यक था कि उपभोक्ताओं को भी इस कार्यक्रम में बड़े पैमाने पर लगाया जाए। यह उद्देश्य तो अत्यन्त सराहनीय था परन्तु यह केवल सरकारी माध्यमों से ही पूरा किया जाना प्रारम्भिक स्थिति में सम्भव नहीं। इसको ध्यान में रखते हुए स्वयंसेवी संस्थाओं और महिला संस्थाओं का सहयोग प्रारम्भिक काल में काफी सक्रिय रूप से लिया गया। विशेष तौर पर बायोगैस चूल्हा और सौर कुकर जैसे कार्यक्रमों, जिनका कि घरेलू ऊर्जा की आपूर्ति में महत्त्वपूर्ण स्थान था, को स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से प्रभावकारी रूप से चलाया जा सका।

बायोगैस महत्त्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत


बायोगैस कार्यक्रम के अन्तर्गत दिसम्बर 1989 तक लगभग 12.4 लाख बायोगैस संयंत्र घरेलू आकार के स्थापित किये जा चुके थे। इन संयंत्रों से 148.8 करोड़ घन मीटर गैस उत्पन्न की जा रही थी जिससे कि 43.8 लाख टन लकड़ी की बचत हो रही थी। इसकी कुल कीमत 175.6 करोड़ रुपये आंकी गई। इसके साथ ही इन संयंत्रों से जो अपशिष्ट पदार्थ निकलता था उसका उपयोग खलिहानी खाद के रूप में किया जा सकता था और इस प्रकार 2 करोड़ टन से अधिक खाद उपलब्ध हो सकती थी जिसकी कीमत 174.5 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष आंकी गई। बायोगैस संयंत्र के उपयोग से एक ओर तो धुँआ रहित वातावरण में खाना पकाया जाता और दूसरी ओर खेतों में अन्न की पैदावार अधिक हो सकती है। गोबर के साथ ही अन्य अपशिष्ट का उपयोग भी बायोगैस संयंत्र में किया जा रहा है। इस प्रकार के लगभग 70 हजार बायोगैस संयंत्र देश में कार्य कर रहे हैं। बड़े आकार के बायोगैस संयंत्र, जिनसे कि कई परिवारों को बायोगैस उपलब्ध करायी जा सके, भी उपलब्ध कराये गये। इस तरह के 500 संयंत्रों में गोबर तथा अन्य अपशिष्टों का उपयोग किया जा रह है।

दिसम्बर 1983 में एक राष्ट्रीय चूल्हा कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया जिसके अन्तर्गत दिसम्बर 1989 तक 80 लाख कुशल चूल्हों को स्थापित किया गया। इन चूल्हों के उपयोग से 56 लाख टन लकड़ी की बचत की जा सकी, जिसकी कीमत 224 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष आंकी गई।

स्वयंसेवी संस्थाओं का योगदान


बायोगैस कार्यक्रम एवं चूल्हा कार्यक्रम दोनों में ही अनुसंधान तथा विकास कार्यक्रम काफी तेजी से चल रहे हैं और इनके अन्तर्गत फील्ड प्रदर्शन कार्यक्रम भी आवश्यक हैं। ये कार्यक्रम स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से अधिक प्रभावकारी रूप से किये जा सकते हैं।

स्वयंसेवी संस्थाओं में कार्य कुशल विशेषज्ञ भी होते हैं और साथ ही इस तरह के अन्य सदस्य भी जोकि आम जनता की भावनाओं से पूरी तरह परिचित हों और जिन पर जनता को पूरा विश्वास भी हो। जब ये व्यक्ति किसी बात की सिफारिश करते हैं तो ग्रामीण क्षेत्रों में विश्वास की भावना जागृत हो जाती है। साथ ही ये स्वयंसेवी संस्थाएँ सरकारी एवं अन्य वित्तीय संस्थाओं के साथ भी उसी प्रकार का सामंजस्य रख सकती हैं। इस प्रकार से सरकार एवं आम जनता के बीच में स्वयंसेवी संस्थाएँ एक सेतु का कार्य करती हैं और दोनों को पास में लाने में स्वयंसेवी संस्थाओं की प्रभावकारी भूमिका रही। एक ओर तो उन स्वयंसेवी संस्थाओं ने राष्ट्रीय नीतियों को समझा है और उनके उपयोग में लाये जाने के लिये निर्धारित कार्यक्रम एवं निर्देशों का अध्ययन किया है, तो दूसरी ओर आम जनता की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किस प्रकार से विभिन्न कार्यक्रमों को चलाया जाय, इसके बारे में भी काफी विस्तृत योजनाएँ बनाई। यदि यह कार्य नहीं किया जाता तो हो सकता था कि वैकल्पिक ऊर्जा कार्यक्रम आज इस स्थिति में न पहुँच पाता।

प्रारम्भ में सरकार ने भी स्वयंसेवी संस्थाओं को प्रोत्साहित करने के लिये सहयोग तथा मदद उपलब्ध करायी। इस सहयोग से जो स्वयंसेवी संस्थाओं को जानकारी उपलब्ध हुई उसका उपयोग करके उन्होंने राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति में अपना सहयोग प्रदान किया। एक ओर तो सरकार के लक्ष्य पूरे हुए और दूसरी ओर स्वयंसेवी संस्थाओं में जानकारी और कुशलता में भी वृद्धि हुई। हालाँकि स्वयंसेवी संस्थाओं को अपने संस्थागत कार्य के लिये भी साधन जुटाने में कई बार दिक्कतों का सामना करना पड़ा है परन्तु उनका सहयोग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा।

लगभग 50 स्वयंसेवी संस्थाओं ने बायो गैस कार्यक्रम चलाने में सहयोग प्रदान किया। इसके लिये अपारम्परिक ऊर्जा स्रोत विभाग ने तकनीकी एवं आर्थिक सहायता प्रदान की जिससे कि संयंत्रों के बनाने और रख-रखाव के प्रशिक्षण के कार्यक्रम चलाये जा सकें। देश में स्थापित 8 प्रशिक्षण एवं विकास केन्द्रों में से एक, स्वयंसेवी संस्था कस्तूरबा ग्राम के इंदौर केन्द्र में कार्यरत है। इन केन्द्रों के माध्यम से जो प्रशिक्षण दिया जाता रहा है उससे विभिन्न कार्यक्रमों को तेजी से चलाये जाने में सहायता मिली है। स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से ही 25 राज्य एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में 6 हजार से अधिक ग्रामीण कारीगरों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। यह भी पाया गया है कि स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा बनाये गये बायो गैस संयंत्र अधिक कुशलता से कार्य कर रहे हैं।

नये चूल्हे बनाने का कार्यक्रम


इसी प्रकार से चूल्हा प्रोग्राम में भी स्वयंसेवी संस्थाओं एवं महिला संस्थाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद घर-घर में कुशल चूल्हा तकनीक को फैलाने में महत्त्वपूर्ण रही। इसी प्रकार से गाँव के स्तर से प्रशिक्षण प्राप्त स्वयंसेवी कार्यकर्ता गाँवों में चूल्हें लगाने का कार्यक्रम काफी तेजी से कर रहे हैं। चूल्हा कार्यक्रम को पहाड़ी क्षेत्रों, द्वीप समूहों, उत्तर पूर्व प्रदेशों में तथा ऐसे स्थानों में जहाँ पर कि जंगल का कटाव काफी तेजी से हो रहा है बहुत प्रभावकारी रूप से स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से किया गया। चूल्हा कार्यक्रम में चार मुख्य कार्यों पर ध्यान केन्द्रित किया गया जिसमें कि अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम, चूल्हा बनाने का कार्यक्रम तथा उनके बारे में जानकारी का कार्यक्रम महत्त्वपूर्ण अंग हैं। यह पाया गया है कि स्वयंसेवी संस्थाओं ने इन तीनों ही क्षेत्रों में प्रभावकारी भूमिका निभाई हैं।

महिला स्वयंसेवी संस्थाओं का भी विशेष योगदान रहा है। क्योंकि अधिकतर कार्यक्रम ऐसे हैं जिनका कि प्रभाव महिलाओं पर अधिक है। इसीलिये महिला स्वयंसेवी संस्थाएँ अपना उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को आसानी से समझा सकी हैं। महिला कारीगरों को प्रशिक्षण तथा उन संयंत्रों एवं उपकरणों के उपयोग पर प्रशिक्षण देने में भी महिला स्वयंसेवी संस्थाओं का विशेष योगदान रहा है।

स्वयंसेवी संस्थाओं का एक विशेष रूप है जिसके कारण वह राष्ट्रीय कार्यक्रमों को भी समझ सकते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों की आवश्यकताओं की भी पूरी जानकारी रखते हैं। साथ ही उनको यह भी समझ है कि इन दोनों में सामंजस्य कैसे बैठाया जाए। इन स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका भविष्य में क्या रहेगी यह राष्ट्रीय नीतियों पर आधारित है।

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