वे कचरे को कंचन बनाते हैं

Submitted by Hindi on Mon, 05/02/2016 - 13:05
Source
योजना, जून 1994

कचरा मात्र कचरा नहीं होता, चाहे वह घरेलू हो या औद्योगिक। जिस कूड़े को हम एक बार कचरा पात्र में डालने के बाद भूल जाते हैं, उसी कचरे से हमारे देश में ही लाखों व्यक्ति अपना जीवन-यापन करते हैं। लेकिन अब कचरे से ऊर्जा और उसके पुनर्प्रयोग की बात वैज्ञानिक भी करने लगे हैं। दुनिया भर में कचरे को कंचन बनाने की प्रक्रिया पर काम हो रहा है। इसकी एक खोज खबर दे रहा है यह लेख।

कचरे का सबसे बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जाए। इसका सबसे बढ़िया उदाहरण हमारे देश की सड़कों और गलियों में कचरा बीनने वाली महिलाएँ और बच्चे हैं। लेकिन हमारे यहाँ बहुत अच्छी निगाहों से नहीं देखा जाता है। परन्तु अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं कि वे कचरे से कंचन निकालते हैं जिस पदार्थ को हम एक बार कूड़ेदान में डालने के बाद भूल ही जाते हैं वे उसे फिर काम योग्य बनाते हैं।

पिछले कुछ वर्षों से हमारे यहाँ शहरीकरण की प्रक्रिया में काफी तेजी आई है। उसी गति से शहरों में कचरे की मात्रा भी बढ़ी है। और आज दिल्ली और बम्बई जैसे महानगरों में यह समस्या बन गई है कि कूड़ा-करकट कहाँ डाला जाए? दिल्ली में प्रतिदिन लगभग साढ़े चार हजार मीट्रिक टन कूड़ा उत्पन्न होता है। इसे पाँच स्थानों पर गिराया जाता है और फिर उसे जलाकर या मिट्टी के अंदर दबाकर नष्ट करने की प्रक्रिया चलती रहती है। लेकिन अब यह भाराव-स्थल भी कूड़े के ढेरों से इतने अधिक भर गए हैं कि वहाँ कूड़ा डालना असम्भव होता जा रहा है। दिल्ली नगर निगम और डी.डी.ए के पास ऐसे बड़े भूखण्ड भी नहीं बचे हैं जोकि आबादी से दूर हों और जिन्हें रोजाना एकत्र होने वाले हजारों टन कूड़े के लिये भराव स्थलों में बदला जा सके।

पिछले दिनों पर्यावरण विशेषज्ञों के एक अमरीकी दल ने दिल्ली के भलस्वा क्षेत्र में ऐसे ही एक भराव स्थल को देखने के बाद व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि ‘दिल्ली की जनसंख्या को कम करने का यह एक बहुत अच्छा तरीका है।’ घर हो या ऑफिस हम अपने दिन भर के कार्यकलापों द्वारा जाने अथवा अनजाने में कई तरह का कचरा उत्पन्न करते हैं। इसमें कागज, प्लास्टिक, पॉलीथीन, शीशे के समान, लकड़ी, सब्जी के छिलके से लेकर घरेलू बर्तन तक शामिल हैं। औद्योगिक कचरे का एक अलग भंडार तो है ही और अभी हालत यह हो गई है कि यह कचरा धीरे-धीरे हमारे लिये बोझ बनता जा रहा है।

शहरों में घरेलू कचरे के निपटान की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होती है। दिल्ली में लगभग सभी कॉलोनियों में कचरा फेंकने का उचित स्थान बनाया गया है लेकिन वह अक्सर भरा ही रहता है। और उसके चारों तरफ कचरा बुनने वाले, कुत्ते और मवेशियों का जमावड़ा लगा रहता है। छोटे शहरों में सड़कों पर कचरे के ढेर देखे जा सकते हैं कुछ चिकित्सकों का कहना है कि अवैज्ञानिक तरीकों से कचरे का प्रबंधन जन स्वास्थ्य के लिये घातक हो सकता है। लेकिन अब नये शोधों से वैज्ञानिकों को यह कचरा किसी कंचन से कम नहीं लग रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कचरे के वैज्ञानिक इस्तेमाल से अनेक आर्थिक और सामाजिक फायदे हैं। कचरे से बिजली भी पैदा की जा सकती है। अब तो वैज्ञानिक कचरे के अनेक इस्तेमाल बता रहे हैं।

वास्तव में कचरे का इस्तेमाल और उसका पुनः चक्रण की हमारे देश में पुरानी परम्परा रही है। लाखों परिवार इस कचरे के व्यवसाय से गुजर बसर करते हैं। केवल दिल्ली में दो लाख लोग कचरे के व्यवसाय से जुड़े हैं। कचरे का एक जटिल बाजार है, जिसमें विशेष चुनना, छंटाई करना, फिर इस्तेमाल में लाने योग्य बनाना तथा वितरण करना शामिल है।

संयुक्त राष्ट्र की संस्था हैबीटैट का कहना है कि एशिया के महानगरों में कूड़ा-करकट चुनने और बेचने वाले अब इन अवशेषों के निबटारे की बढ़ती हुई समस्या के समाधान के लिये भी कारगर हो सकते हैं। हैबीटेट के एक अध्ययन के अनुसार एशियाई शहरों में अभी केवल आठ प्रतिशत कूड़े का ही फिर से इस्तेमाल किया जाता है।

अमरीका में तो कुड़ा साफ करना अब एक बड़ा कारोबार बन गया है हालाँकि वहाँ सारा काम सरकारी नियमों को ध्यान में रखकर चलाया जा रहा है। वहाँ नई कूड़ा व्यवस्थापन प्रौद्योगिकी को विकसित किया जा रहा है। लेकिन हैबीटेट के अनुसार अधिकांश एशियाई देशों के शहरों के अधिकारी आमतौर पर कूड़ा करकट चुनने वालों को एक समस्या मानते हैं। उनका मानना है कि कूड़ा चुनने वाले और अन्य कामों से संबद्ध लोग गंदगी फैलाते हैं और सरकारी गतिविधियों में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं। जबकि अधिकारियों को अवशेषों के पुनः इस्तेमाल के इन छोटे, अदृश्य भूमिगत प्रतिष्ठानों का समर्थन करना चाहिए।

दिल्ली की एक संस्था सेवा के अनुसार दिल्ली शहर में केवल एक लाख कचरा चुनने वाले बच्चे हैं। सेवा ने दिल्ली में कचरा चुनने वाले बच्चों को प्लास्टिक के ऐसे थैले दिए जिनके भीतर पॉलीथीन की चादर थी। ये बच्चे अक्सर जूट के बदबूदार बोरों में कूड़ा बीनते थे, जिससे बोरा फट जाता था और कूड़ा बाहर लटकता रहता था। इससे दुर्घटना का भी खतरा रहता था। यही नहीं सेवा ने कई बार इन बेचारे गरीब बच्चों को लाजपत नगर, श्रीनिवासपुरी और डिफेंस कालोनी के थानों से छुड़वाया क्योंकि इलाके में कहीं भी कोई चोरी हो तो पुलिस इन बच्चों को पकड़ कर ले जाती थी क्योंकि इनके सर पर किसी का भी हाथ नहीं रहता है।

बम्बई शहर में लगभग एक लाख व्यक्तियों का पेट कचरे के कारण ही भरता होगा। काफी समय से लगभग 700 ट्रकों द्वारा प्रतिदिन शहर की बाहरी सीमा पर कचरा फेंका जाता रहा है। लेकिन यह जगह भी अब भर गई है। अब राज्य सरकार की मदद से बम्बई नगरपालिका ने शहर के सीमावर्ती समुद्र की खाड़ी में कचरा डालने की योजना तैयार की है। लेकिन एक कचरा व्यापारी का कहना है कि कचरे के इतने अधिक इस्तेमाल सामने आ रहे हैं कि अब वह दिन दूर नहीं लगता कि दिल्ली व बम्बई के कचरे के ढेर नीलाम होंगे।

एक अमरीकी लेखक कहते हैं कि आधुनिक जीवन में बढ़ते कूड़े का सबसे बड़ा कारण हमारे गलत मूल्य हैं। कूड़े की समस्या के लिये किसी देश, समाज या व्यक्ति के जीवन दर्शन के अलावा देश की शासन व्यवस्था की भी जिम्मेदारी होती है। जैसे जर्मनी के एकीकरण के केवल एक साल में पूर्वी जर्मनी में कूड़े की मात्रा दुगुनी हो गई। सबसे पहले हमें इस बात के ही प्रयास करने चाहिए कि हम कचरा ही कम पैदा करें क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिये हानिकारक भी होता है।

वास्तव में कचरा कहीं फेंका जाए, वातावरण से ऑक्सीजन लेकर गलने लगता है। केवल दिल्ली में कचरे के भराव स्थलों से लगभग 40 हजार क्यूबिक मीटर गैस प्रतिदिन निकलती है और यह दिल्ली के आस-पास के वायुमंडल में घुल जाती है। दिल्ली नगर निगम के एक अधिशासी अभियन्ता के अनुसार कचरे के भराव स्थलों से लगातार निकल रही जहरीली गैसें दिल्ली के वायुमंडल को जहरीला बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। श्री जैन के अनुसार एक मीट्रिक टन कचरे के ढेर से कम-से-कम दो क्यूबिक मीटर जहरीली मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड गैसें उत्पन्न होती हैं।

कचरे की एक बड़ी मात्रा के निपटान की व्यवस्था अभी हमारे यहाँ सरकार नहीं कर पा रही है। लेकिन छोट-छोटे नन्हें लाखों हाथ अवश्य सक्रिय हैं, ये एक तरह से सरकार का ही काम करते हैं। इससे सरकारी खर्च कम होता है। भविष्य में यह एक छोटा उद्योग बन सकता है और रोजगार के नए स्रोत पैदा कर सकता है। बस जरूरत है इन नन्हें हाथों को सुरक्षित दस्तानों की, ताकि वे कचरे को कंचन बनाते रहें।

डी 690, सरस्वती विहार, दिल्ली-110 034

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