विभिन्न जनसंगठन करेंगे विकास की पैरवी, संयुक्त मंच का हुआ गठन

Submitted by RuralWater on Sat, 07/25/2015 - 13:46
जो लोग सदियों से वन बचाने के कार्य को अपने काम का एक हिस्सा मानते थे वे अब वन संरक्षण के कार्य से कोसों दूर हो रहे हैं। क्योंकि ग्रामीणों के द्वारा बचाए गए वनों का मुनाफ़ा सरकार की बपौती हो चुकी है। इस दौरान लोगों ने कहा कि कम-से-कम जो लोग वन बचाने के कार्य को करते आ रहे हैं उन्हें तो ग्रीन बोनस का लाभ मिलना ही चाहिए। अच्छा हो कि राज्य के निवासियाों को ग्रीन बोनस का लाभ एलपीजी के रूप में दे देना चाहिए। एक तरफ उत्तराखण्ड राज्य में पलायन एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रहा है तो दूसरी तरफ राज्य में हो रहे विकास कार्य लोगों के लिये खतरा बनकर आ रहा है। इस समस्या को हम लोग ही पनपा रहे हैं। यह बातें मुखर रूप से नैनीताल में हुई विभिन्न जन संगठनों की दो दिवसीय मंथन शिविर में सामने आई है। दो दिन तक चले इस शिविर में निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं को राज्य के भविष्य के लिये खतरा बताया गया है और गाँव में लोगों के लिये शिक्षा स्वास्थ्य मुफिद ना होना ही पलायन का मुख्य कारण माना गया है।

ऑक्सफेम इण्डिया के सहयोग से उत्तराखण्ड स्थायी विकास मंच से जुड़े विभिन्न संगठनों के लोगों ने विकास से पिछड़ते राज्य के लिये अब तक की सरकारों को दोषी ठहराया है। इस शिविर में राज्य भर से पहुँचे लोगों ने कहा कि विकास से पिछड़ना सिर्फ बजट का वारा-न्यारा ही नहीं राज्य में और भी कई विपरीत परिस्थितियाँ खड़ी हैं। जैसे समाज में मौजूद भेदभाव भी विकास की धार को कुन्द करता है।

यही नहीं कहा कि राज्य की पहली निर्वाचित सरकार ने विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया था कि राज्य के भूमिहिनों को कम-से-कम 63 नाली कृषि भूमि दे देनी चाहिए। मगर इस विशेष प्रस्ताव पर एक धेला तक का कार्य नहीं हो पाया। और तो और स्थानीय उत्पादों के लिये बाजार की कोई सुलभ व्यवस्था राज्य सरकार के पास नहीं है। यही वजह है कि राज्य के उत्पाद लोगों की आजीविका नहीं बन पा रही है। आरोप है कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं का कमजोर अनुभव और ज्ञान का अभाव भी पिछड़ते राज्य का कारण बनता जा रहा है।

ज्ञात हो कि हाइड्रो पावर को विकास का पैमाना मानने वाली सरकारें यह बताने को कतई तैयार नहीं हैं कि साल 2013 की आपदा में जो नुकसान निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं के कारण हुआ उसकी भरपाई शायद ही कभी हो पाएगी? जो सम्भव नहीं है। यहाँ तक कि कैग ने भी राज्य के आपदा प्रबन्धन पर सवाल खड़ा किया है। बता दें कि 2013 की आपदा में 19 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट क्षतिग्रस्त हुए और पाँच लाख लोगों पर आपदा का सीधा प्रभाव पड़ा। अर्थात 300 गाँव पूर्ण क्षतिग्रस्त तथा 400 गाँव आपदा से प्रभावित हुए जो क्रमशः रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी के हैं।

शिविर में आपदा का प्रमुख कारण मौसम परिवर्तन को ही बताया गया। कहा कि वर्तमान विकास का नियोजन मौसम परिवर्तन को केन्द्र में रखकर नहीं किया जा रहा है। जबकि मौजूदा सरकारों के पास सतत विकास का नहीं बल्कि आर्थिक विकास का पैमाने को वे अपनी उपलब्धि मान रहे हैं। हालात इस कदर है कि वर्ष 2000 के बाद अब तक राज्य में 30 हजार हेक्टेयर वनों की कटान हुई है। इस भारी-भरकम वन कटान से क्या राज्य में पर्यावरण का स्वरूप बिगड़ा है कि नहीं इसका जबाब किसी भी सरकार के पास नहीं है।

जबकि राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में 66 फीसदी लोग खेतीहर मजदूर हैं। ये वे किसान हैं जिनकी सम्पूर्ण आजीविका खेती पर ही टिकी है। ये पहाड़ी किसान अपनी छोटी जोत में बहुविविधता की फसलों को उगाते हैं, जिनसे उनकी रोजमर्रा की जिन्दगी चैन से चलती है। परन्तु लोग आपदा और बड़ी-विशाल परियोजनाओं के कारण खेती से हाथ धो रहे हैं। जिसके एवज में उन्हें पलायन का रूख करना पड़ रहा है। उधर वनाधिकार कानून 2006 राज्य में क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। यही वजह है कि लोग वनों को सरकार की सम्पत्ति मानते हैं।

जो लोग सदियों से वन बचाने के कार्य को अपने काम का एक हिस्सा मानते थे वे अब वन संरक्षण के कार्य से कोसों दूर हो रहे हैं। क्योंकि ग्रामीणों के द्वारा बचाए गए वनों का मुनाफ़ा सरकार की बपौती हो चुकी है। इस दौरान लोगों ने कहा कि कम-से-कम जो लोग वन बचाने के कार्य को करते आ रहे हैं उन्हें तो ग्रीन बोनस का लाभ मिलना ही चाहिए। अच्छा हो कि राज्य के निवासियाों को ग्रीन बोनस का लाभ एलपीजी के रूप में दे देना चाहिए। बिडम्बना यह है कि राज्य के लोगों ने जंगलों को बचाने के लिये भावनात्मक लड़ाईया लड़ी है। मगर ‘‘ग्रीन बोनस’’ वाले बजट को सरकार में बैठे अफसरान तय कर रहे हैं।

बड़ी समस्या


आज का युवा दिशाहीन इसलिये हो रहा है कि उसे अपना भविष्य कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। आर्थिक संसाधनों को जोड़ने के लिये प्राकृतिक संसाधनों की बली चढ़ाया जाता है। राज्य में मैदानी मानकों का विरोध यदा-कदा बना रहता है। 2013 की आपदा के बाद राज्य में विकास और लोग अस्थिर हो गए हैं। राज्य का अपना पंचायतीराज एक्ट होता तो ग्राम विकास में अस्थायीत्व होता।

क्या करना होगा


विकेन्द्रीकरण विकास प्रणाली को राज्य में विकसित करनी होगी। पंचायतीराज संस्थाएँ अब तक विकेन्द्रीकृत नही हो पायी। यदि पंचायतीराज संस्थाएँ सशक्त हो जाए तो विकास का पैमाना राज्य के अनुरूप आगे बढ़ेगा। पानी का संरक्षण, जंगल का संरक्षण, नगदी फसलों को बढ़ावा, प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षण करने के लिये भावनात्मक अभियानों की जरूरत बताई गई है। खेती किसानी के लिये सबसे पहले स्थानीय बीज बचाने चाहिए। ताकि कृषि कार्य को बढ़ावा मिल सके। वनाधिकार कानून 2006 के बाबत लोग दावा प्रस्तुत करें। गंगा ही नहीं गंगा को फीडबैक करने वाली सभी सहायक नदियों के पुनर्जीवन के लिये कार्य करना होगा।

विकास के लिये पाँच सूत्र


1. राज्य का पंचायतीराज एक्ट हो।
2. देशज ज्ञान का संरक्षण हो और इसे लोग अपनाएँ।
3. महिला सशक्तिकरण हो।
4. खेती/किसानी को बढ़ावा मिले।
5. स्थानीय स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।

राज्य के वित्त आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि पिछले वित्त आयोग की सिफारिशों से राज्य का बजट हर वर्ष सरप्लस हो जाता है। यही कारण है कि राज्य में केन्द्र से बजट कम आ रहा है। आरटीआई से सरकार में जागृति आई है। कहा कि उत्तराखण्ड में पलायन का मुख्य कारण स्वास्थ्य व शिक्षा का अभाव ही बना है। वन संरक्षण का फायदा सीधे गाँवों को मिलना चाहिए। ग्रामीणों को एलपीजी के रूप में हो या आर्थिक संसाधन के रूप में।

इनसे निजात पाने के लिये ‘‘उत्तराखण्ड स्थायी विकास मंच’’ का गठन किया गया है, जो एक ओर जनभागीदारी की पैरवी करेगा तो दूसरी ओर रचनात्मक कार्यों को जन-जन तक पहुँचाने के लिये सरकार के साथ समन्वय स्थापित करेगा।

उत्तराखण्ड स्थाई विकास मंच की कोर टीम में डॉ. रवि चोपड़ा, महेन्द्र कुँवर, सुरेश भाई, डॉ. मोहन पँवार, अरुण तिवारी, केसर सिंह, कंचन भण्डारी, रघुतिवारी, तरुण जोशी, बसन्त पाण्डे, इस्लाम हुसैन, रमेश मुमुक्षु, डा. सुनिल कैंथोला, बैसाखी लाल, भरत नेगी, लक्ष्मण नेगी सम्मलित हुए हैं।

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