वन अधिकार कानून, 2006 एक सिंहावलोकन

Submitted by birendrakrgupta on Sat, 04/04/2015 - 10:38
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योजना, सितम्बर 2008
खामियों के बावजूद इस कानून का असर भारत के व्यापक वन क्षेत्रों में अच्छा पड़ा है जबकि इस पर अमल अभी शुरू ही हुआ है, वन क्षेत्रों में आमूल बदलाव नजर आ रहा है जहाँ से वन अधिकारियों को वापस किया जा रहा है संसद ने 18 दिसम्बर, 2006 को सर्वसम्मति से अनुसूचित जाति एवं अन्य पारम्परिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2006 पारित किया था। यह मात्र एक अन्य कानून भर नहीं है। इसके पारित होने के समय से तथा बाद के वर्षों में यह कहकर इसकी आलोचना की जाती रही है कि यह वनों के निजीकरण का प्रयास है, इससे बाकी बचे बाघों का विनाश हो जाएगा और वोट बैंक बनाने के मकसद वाले राजनीतिज्ञों द्वारा यह कल्याणकारी उपाय किया गया है। एक लेखक ने तो 1947 से अब तक की अवधि में पारित कानूनों में इसे अति खतरनाक कानून बताया था। 31 दिसम्बर, 2007 को इसे लागू करने की अधिसूचना जारी होने के बाद समाचारपत्रों ने इसे भारत के हाल के इतिहास का एक अति विवादास्पद कानून बताया था जबकि पारित होने के एक साल बाद इसे अधिसूचित किया गया।

परन्तु, वास्तव में यह कानून न तो किसी को भूमि प्रदान करता है और न भूमि का अधिकार। यह वनों का निजीकरण भी नहीं करेगा और निश्चित रूप से इसके परिणामस्वरूप भारत के बाघों का विलोप भी नहीं होगा। इसके बजाय इस कानून के ही शब्द और हर अनुच्छेद में भारत के गरीब लोगों के जीविकोपार्जन के लिए संघर्ष और संसाधनों तथा राष्ट्र के वनों पर जनतान्त्रिक नियन्त्रण कायम करने की लड़ाई, चाहे वह छोटी सीमा तक ही हो, की कहानी है। यह समझने के लिए कि यह कैसे हुआ और कंजर्वेशन (संरक्षण) कैसे ऐसा पारिभाषिक शब्द बन गया, जिसके पीछे बहुसंख्यक निहित स्वार्थी तत्वों ने छिपने की कोशिश की, हमें सबसे पहले भारत के वन कानूनों के इतिहास को समझना होगा।

भारत के वन कानून


एक सदी से अधिक समय से भारत के वनों की शासन व्यवस्था उन भारतीय वन कानूनों के प्रावधानों के अनुसार की जाती रही है जो 1876 से 1927 तक पारित किए गए थे। 1927 का कानून भारत का केन्द्रीय वन कानून बना रहा। इन कानूनों का पर्यावरण संरक्षण से कोई लेना-देना नहीं था। इसके बजाय ब्रिटिश शासकों ने इमारती लकड़ी का इस्तेमाल एवं प्रबन्धन अपने हाथ में लेना चाहा, जिसके लिए जरूरी था कि सरकार वनों पर अपना अधिकार जमाए और पारम्परिक सामुदायिक वन प्रबन्धन की प्रणालियों को दबा दे जो देश के अधिकतर हिस्सों में लागू थीं। इन कानूनों ने सरकार को वनों के किसी भी क्षेत्र को रिजर्व और संरक्षित करने के लिए अधिसूचित करने का अधिकार दे दिया, जिसके बाद वन बन्दोबस्त अधिकारी (भूमि, वनोत्पाद, चरागाह आदि सम्बन्धी अधिकार) दावों की जाँच करेगा।

चूँकि इन कानूनों का प्राथमिक मकसद वन भूमि पर कब्जा लेना तथा सम्बन्धित समुदायों को उनके अधिकारों से वंचित करना था, इसलिए बन्दोबस्त की इस प्रक्रिया का विफल होना निश्चित था। वास्तव में ऐसा ही हुआ। सर्वेक्षण का काम भी अक्सर अपूर्ण रहा अथवा किया ही नहीं गया। मध्य प्रदेश के 82.9 प्रतिशत वन खण्डों का आज तक सर्वेक्षण नहीं किया गया जबकि ओडिशा में 40 प्रतिशत से ज्यादा राज्य के वनों को रिजर्व वन माना जाता है, जहाँ अधिकार सम्बन्धी बन्दोबस्ती का काम नहीं हुआ है। जहाँ दावों के निस्तारण का काम हुआ भी है, वहाँ सामाजिक रूप से कमजोर समुदायों, खासकर आदिवासियों के अधिकारों के दावों को मुश्किल से ही दर्ज किया गया है। ये समुदाय बन्दोबस्त प्रक्रिया तक पहुँच बनाने में असमर्थ रहे।

आजादी के बाद तो हालात तब और बदतर हो गया जब रजवाड़ों, जमीन्दारों तथा निजी मालिकों द्वारा ‘वन’ के रूप में घोषित जमीनों को एक सामान्य अधिसूचना जारी कर उन्हें वन विभाग को स्थानान्तरित कर दिया गया। ऐसे अधिकतर स्थानान्तरण बिना किसी बन्दोबस्ती प्रक्रिया को अपनाए किए गए जहाँ पूर्ववर्ती सरकार ने इन भूखण्डों पर कुछ अधिकारों को मान्यता प्रदान की अथवा उनके इस्तेमाल की इजाजत दी। इन अधिकारों की अक्सर उपेक्षा की गई और इसलिए वे स्थानान्तरण की प्रक्रिया के बाद रद्द हो गए (जैसा कि मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में जंगलों की निस्तारी के बाद देखा गया)।

परन्तु, इस कानून का मसविदा तैयार होने के एक सप्ताह के भीतर पर्यावरण एवं वन मन्त्रालय ने प्रेस में एक पत्र का यह विवरण प्रकट कर दिया कि प्रत्येक आदिवासी परिवार को ढाई एकड़ वन-भूमि दी जाएगी। यह सफेद झूठ था क्योंकि विधेयक के मसविदे में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं था। पत्र में कहा गया था कि कब्जा निर्धारण की एक आधार तिथि (25 अक्तूबर, 1980) को आदिवासियों की जोतवाली जमीन, अधिकतम प्रति परिवार ढाई हेक्टेयर नियमित कर दी जाएगी। जो परिवार जमीन नहीं जोत रहा हो उसे न जमीन मिलेगी और न जमीन का अधिकार। इस गलत जानकारी के कारण हंगामा शुरू हो गया। इस गलत जानकारी को कुछ अंग्रेजी मीडिया तथा वन से सम्बन्धित नौकरशाहों के निकटवर्ती कट्टरपंथी वन्य-जीव संरक्षकों ने हवा देना शुरू कर दिया। यह हंगामा तथा विवाद अभी तक जारी है और आज भी इस कानून के बारे में अफवाह जारी है। सर्वोच्च न्यायालय में इसके खिलाफ दायर याचिका के पीछे भी इसी अफवाह का हाथ है।

संसद ने 18 दिसम्बर, 2006 को सर्वसम्मति से अनुसूचित जाति एवं अन्य पारम्परिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2006 पारित किया था। यह मात्र एक अन्य कानून भर नहीं है। इसके पारित होने के समय से तथा बाद के वर्षों में यह कहकर इसकी आलोचना की जाती रही है कि यह वनों के निजीकरण का प्रयास है, इससे बाकी बचे बाघों का विनाश हो जाएगा विधेयक की आलोचना के कारण इसे संसद में दिसम्बर 2005 तक नहीं पेश किया जा सका और पेश किए जाने के बाद उसे संयुक्त संसदीय समिति के पास विचार के लिए भेज दिया गया। विधेयक को क्षत-विक्षत रूप में पेश किया गया था तथा कानून के अनेक मुख्य तत्वों को वापस कर लिया गया था, जिससे इस बात की झलक मिलती है कि सरकार में वन सम्बन्धी नौकरशाही कितनी ताकतवर है और उस पर खान तथा औद्योगिक लॉबी कितना हावी है जो वन-भूमि पर आसान कब्जा चाहती है। संयुक्त संसदीय समिति ने विधेयक की व्यापक छानबीन की, उसे अधिक जनतान्त्रिक बनाने के लिए उसके कई हिस्सों को फिर से लिखा और गैर अनुसूचित जनजाति को इस सुविधा के पात्र के रूप में वनवासी के रूप में शामिल किया (इससे बहुत से भारत के भारी भूभागों में गैर-अनुसूचित जाति वनवासियों की आबादी का महत्त्व झलकता है। इनमें से अधिकतर उतने ही संवेदनशील हैं जितनी अनुसूचित जनजातियाँ)। इसने निर्धारण की आधार तिथि में भी बदलाव किया ताकि वह ज्यादा औचित्यपूर्ण हो सके और भूमि पर अधिकार के लिए 27 वर्षों का कब्जा जरूरी न हो। इसने दूसरे कई बदलाव भी किए।

23 मई, 2006 को समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी। रिपोर्ट सौंपने के बाद सरकार, संयुक्त संसदीय समिति तथा वामदलों के बीच काफी समय तक विचार-विमर्श जारी रहा। अन्त में सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति की अनेक बड़ी सिफारिशें मान लीं, परन्तु अन्तिम क्षण में अनेक बदलाव किए गए। इन बदलावों के साथ कानून पास हुआ, परन्तु कानून के पास होने से पहले आदिवासी मामलों के मन्त्री को अनेक आश्वासन देने पड़े कि वे नियमों तथा संशोधनों के माध्यम से कानून की खामियों को दूर करेंगे। आज तक वे आश्वासन काफी हद तक पूरे नहीं किए गए। इस कानून के पास होने के बाद भी कानून विरोधी तत्व एक साल तक यानी 31 दिसम्बर, 2007 तक इसकी अधिसूचना को रोक रखने में सफल रहे जबकि अगस्त में ही इसके नियमों का मसविदा भी तैयार कर लिया गया था।

हर चरण में राजनीतिक दलों के सदस्यों ने कानून को विफल बनाने की जोरदार कोशिश की। इसके लिए अनेक राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन भी हुए, जिनमें लाखों लोग शामिल हुए। इसका आयोजन वनवासी समुदायों के बीच सक्रिय विभिन्न गैर-राजनीतिक संगठनों ने किया था। इस दबाव और जन आन्दोलनों के फलस्वरूप ही कानून पास हो सका, परन्तु सरकारी अधिकारियों ने अपनी मंशा साफ कर दी कि वे प्रयास करेंगे कि यह कानून खासकर संयुक्त संसदीय समिति द्वारा संशोधन के बाद प्रभावहीन बना रहे।

कानून की विषय-वस्तु


यह कानून तीन मामलों में एक बुनियादी ढाँचा प्रस्तुत करता है, जो निम्नलिखित हैं :

पात्रता


इस कानून के तहत पात्रता के दो चरण हैं। प्रथमतः किसी भी दावेदार को यह साबित करना है कि वह ‘मुख्यतः वनों के वाशिन्दा’ है और जीविकोपार्जन के लिए वनों तथा वन-भूमि पर निर्भर है (अपने वास्तविक जीविकोपार्जन के लिए)। द्वितीयतः दावेदारों को यह साबित भी करना है कि उपर्युक्त स्थिति पिछले 75 साल से बनी हुई है और इस मामले में वे अन्य पारम्परिक वनवासी हैं - धारा 2(ओ), अथवा वे अनुसूचित जाति के हैं और उस इलाके में रह रहे हैं जहाँ वे अनुसूचित - धारा 2(सी) और 4(1) हैं और वे वनवासी अनुसूचित जनजाति के हैं।

अधिकार


तीन बुनियादी अधिकारों को मान्यता दी गई है :
1. विभिन्न प्रकार की जमीन, जिसकी निर्धारण की आधार तिथि 13 दिसम्बर, 2005 है (अर्थात उस तिथि से पूर्व से उस पर उसका कब्जा है और वह उसे जोत रहा है) और यदि कोई दूसरा दस्तावेज उपलब्ध न हो तो प्रति परिवार 4 हेक्टेयर की भू-हदबन्दी लागू होगी।
2. पारम्परिक रूप से लघु वनोत्पाद, जल निकायों, चरागाहों आदि का उपयोग कर रहा हो।
3. वनों एवं वन्य-जीवों की रक्षा एवं संरक्षण। यह वह अन्तिम अधिकार है जो इस कानून का अति क्रान्तिकारी पक्ष है। यह उन हजारों ग्रामीण समुदायों के लिए महत्त्वपूर्ण है जो वन माफियाओं, उद्योगों तथा जमीन पर कब्जा करने वालों के खतरों से अपने वनों तथा वन्य जीवों की रक्षा में लगे हुए हैं। इनमें से अधिकतर वन विभाग की साँठगाँठ से इस काम को अंजाम देते हैं। पहली बार यह वास्तविक रूप से भावी जनतान्त्रिक वन प्रबन्धन का द्वार खोलता है और इसकी सम्भावना पैदा करता है।

प्रक्रिया


कानून की धारा 6 में तीन चरण वाली इस प्रक्रिया की व्यवस्था है जिसके अनुसार, यह तय किया जाएगा कि किसे अधिकार मिले। प्रथम ग्राम सभा (पूरी ग्राम सभा, ग्राम पंचायत नहीं) सिफारिश करेगी कि कितने अरसे से कौन उस जमीन को जोत रहा है, किस तरह का वनोत्पाद वह लेता रहा है, आदि। यह जाँच ग्राम सभा की वनाधिकार समिति करेगी, जिसके निष्कर्ष को ग्राम सभा पूरी तरह स्वीकार करेगी। ग्राम सभा की सिफारिश भी छानबीन के दो चरणों से गुजरेगी- ताल्लुका और जिला स्तरों पर। जिला स्तरीय समिति का फैसला अन्तिम होगा (धारा 6 (6) देखें)। इन समितियों में छह सदस्य होंगे − तीन सरकारी अधिकारी और तीन निर्वाचित सदस्य। दोनों − ताल्लुका और जिला स्तरों पर कोई भी व्यक्ति, जो यह समझता है कि दावा गलत है, इन समितियों के सामने अपील दायर कर सकता है और यदि उसका दावा साबित हो जाता है तो दूसरों को अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा (धारा 6 (2) और 6 (4) देखें)। अन्तिम, इस कानून के तहत स्वीकृत जमीन न बेची जा सकेगी और न उसका अधिकार दूसरे को हस्तान्तरित किया जा सकेगा।

खामियाँ, अमल और भविष्य


कानून के पास होने के समय भी इसके लागू करने के लिए हुए आन्दोलनों के दौरान इस कानून की अनेक खामियों की ओर सरकार का ध्यान खींचा गया था। इन खामियों में यह बात शामिल है कि मूल रूप से वन में निवास करने सिर्फ वे ही पात्र होंगे जिनके घर वनों में होंगे। वनवासियों के बीच भी ऐसी स्थिति मुश्किल से होती है। उनमें से अधिक लोगों के स्थायी घर भू-राजस्व वाली जमीन में होते हैं। जो वास्तव में वन-भूमि में रहते भी थे उनमें से अधिकतर को पहले ही वहाँ से जबरन हटा दिया गया है अथवा वन विभाग ने उनके घर को छोड़कर अपनी चारदीवारी बना ली है (ताकि उनसे प्रत्यक्ष संघर्ष को टाला जा सके)।

इसके अलावा 75 साल की आवासीय शर्त लगाने के कारण गैर-आदिवासियों के कुछ अति संवेदनशील समूह इस सुविधा से वंचित हो जाएँगे। इनमें वे लोग भी शामिल हैं जो वन ग्रामों में रहते हैं। अधिकारों की मान्यता देने की प्रक्रिया में उच्चतर समितियों को मिले व्यापक अधिकारों के कारण भ्रष्टाचार की भारी सम्भावना बनी हुई है। साथ ही कानून में यह स्पष्ट नहीं किया जा सका है कि इस कानून पर अमल के मकसद से जिस ग्राम सभा का उल्लेख है वह वहाँ के वासियों की होगी अथवा पुनर्वास बस्तियों की जो न तो ग्राम पंचायत है और न राजस्व गाँव, क्योंकि यह अपेक्षाकृत वृहत अस्तित्व वाली बस्ती होगी, जिनमें अनेक वास्तविक पुनर्वास बस्तियाँ शामिल होंगी। कानून में कुछ अनिश्चितता भी है जैसे यह कहा गया है कि इसे लागू अन्य कानूनों का अनुखण्ड माना जाएगा, न कि उनका अनादर। (देखें धारा 13)।

इन सारे बिन्दुओं पर संयुक्त संसदीय समिति ने अपनी ठोस तथा स्पष्ट सिफारिशें की थी, परन्तु सरकार ने उन्हें खारिज कर दिया। ये खामियाँ अब अमल के दौरान उभरकर सामने आ रही हैं, जो मार्च 2008 के दौरान मध्य भारत के अनेक राज्यों में देखने को मिली। कानून की इस अस्पष्टता के कारण अनेक लोग अपने अधिकारों से वंचित हो गए और कुछ क्षेत्रों में वनाधिकार समितियों के गठन में गड़बड़ियाँ करना आसान हो गया।

इन खामियों के बावजूद इस कानून का असर भारत के व्यापक वन क्षेत्रों में अच्छा पड़ा है जबकि इस पर अमल अभी शुरू ही हुआ है, वन क्षेत्रों में आमूल बदलाव नजर आ रहा है जहाँ से वन अधिकारियों को वापस किया जा रहा है (वास्तव में गुजरात में उन्हें यह निर्देश दिया गया है कि वे अधिकार मान्यता प्रक्रिया से बाहर रहें जब कि गोवा में वे कानून के प्रावधानों से अपने को अवगत करने के लिए पुनप्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं)। वन अधिकार समितियों में गोलमाल करने की कोशिशों का ग्रामीण स्तर पर प्रतिरोध किया जा रहा है, अपने अधिकारों का दावा किया जा रहा है, बेदखली के खिलाफ संघर्ष किया जा रहा है और सामुदायिक वन संसाधनों का सीमांकन किया जा रहा है।

इन बदलावों के ठोस परिणाम सामने आने में अनेक वर्षों का समय लगेगा, परन्तु मौलिक बदलाव सहज है। डेढ़ सौ साल की अवधि के बाद पहली बार वनवासी समुदायों के जीवन, जीविकोपार्जन तथा घर की जमीन पर किसी का वर्चस्व खत्म हो गया है। इस बदलाव को रोकने, बदलने तथा भारत के तथाकथित सबसे बड़े जमीन्दार का वर्चस्व कायम करने की कोशिशें जारी हैं। इन कोशिशों में इस कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली अदालत में दायर याचिकाएँ शामिल हैं। इनमें से चार याचिकाएँ तीन उच्च न्यायालयों तथा दो सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई हैं। इसके अलावा इस कानून के खिलाफ मीडिया द्वारा अभियान चलाया जा रहा है। वन्य-जीव संरक्षण को नौकरशाही के समान बताया जा रहा है। लेकिन, इन सारी कोशिशों का कुछ स्तर पर विफल होना निश्चित है। यह संघर्षरत लोगों की विजय है क्योंकि उन्हें अब अपने ही घर में रहने पर अपराधी, चोर और घुसपैठिया नहीं माना जाएगा। वे वनों में जनतन्त्र की स्थापना की दिशा में पहला कदम उठा चुके हैं और अब कोई विशिष्ट वर्ग उन्हें पीछे की ओर धकेलने में सफल नहीं होगा।

(लेखक कैम्पेन फॉर सर्वाइवल एण्ड डिग्निटी संगठन के संयोजक हैं)

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