वन संरक्षण की नीतियों में जनहित को नहीं दी जाती तरजीह

Submitted by Hindi on Thu, 07/14/2011 - 16:37
Source
नैनीताल समाचार, 27 मई 2010

उत्तराखण्ड का तकरीबन 45 फीसदी भाग वनों से ढँका पड़ा है। अगर उच्च हिमालय की वनस्पतिरहित, सदा हिमाच्छादित चोटियों को छोड़ दिया जाये, तो वन यहाँ के 66 फीसदी क्षेत्रफल को घेरे हैं। भारत में कुल क्षेत्रफल का 33 फीसदी वन क्षेत्र होना पर्याप्त माना गया है। इस दृष्टि से हम एक समृद्ध राज्य हैं। इन वनों के प्रबंधन के लिए उत्तराखण्ड सरकार ने तमाम नीतियाँ बनाई हैं और बेतहाशा बजट खर्च किया है। लेकिन ये नीतियाँ इन्हीं जंगलों के साये में रहने वाले जनसमुदाय को जंगलों का दुश्मन मानती हैं और इन्हें जंगलों से बेदखल करना अपना लक्ष्य। वनों, वन्य जीवों और पारिस्थितिकी के संरक्षण के नाम पर ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर से ही सरकार ने जनता के जंगलों के अधिकारों पर कानून बनाकर कब्जा कर लिया था, जो आज भी अनवरत जारी है। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में हिमालयी वनों को सरकार ने प्रचुर कच्चे माल के ख़जाने के तौर पर देखा। मुख्य रूप से वनों से प्राप्त लकड़ी के लिए जंगलों को बेतहाशा काटा गया। पहाड़ों पर तीव्रता से लुढ़कती नदियों पर लकड़ी को बहाकर मध्य हिमालय की तलहटी के मैदानी क्षेत्रों में पहुँचाया जाता था। तभी यहाँ तक लकड़ी के ढुलान के लिए रेल भी पहुँचा दी गई थी। एक ओर से वनों का बेतहाशा विदोहन हुआ तो दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार ने वनों के अध्ययन एवं नये प्रबन्धन के लिए देहरादून में फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना कर स्वयं को वन प्रेमी और संरक्षक दिखलाने का भ्रम भी बनाये रखा। यह स्थिति आजादी के बाद भी बरकरार है।

1936 में मशहूर कार्बेट नेशनल पार्क बनाकर स्थानीय जनता के जंगलों से जुड़े हकों को छीनने की शुरूआत हुई। पार्क के 520 वर्ग किमी के क्षेत्र में आने वाले तमाम गाँवों के बाशिंदों के अपने जंगल अब अपने नहीं रहे। जंगलों से जुड़ी उनकी छोटी जरूरतें भी पार्क के कानूनों की मोहताज थीं। भारत की आजादी के बाद से अब तक उत्तराखण्ड में इसके क्षेत्रफल के 11 प्रतिशत में छः राष्ट्रीय उद्यान (नेशनल पार्क) और छः पशु विहार (सेंचुरी) बनाए गए हैं। कार्बेट पार्क के अलावा इन पाँच राष्ट्रीय उद्यानों में 1982 में चमोली जिले में नन्दादेवी राष्ट्रीय उद्यान और फूलों की घाटी को 625 और 87.50 वर्ग किमी में बनाया गया। 1983 में हरिद्वार और देहरादून जिलों में 820 वर्ग किमी में राजाजी नेशनल पार्क को, 1989 में उत्तरकाशी जिले में 2,390 वर्ग किमी में ‘गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान’ और 1990 में उत्तरकाशी जिले के ही 472 वर्ग किमी में ‘गोविन्द नेशनल पार्क’ भी बनाया गया। इसके अतिरिक्त छः वन्य जीव विहारों में 1955 में उत्तरकाशी जिले के 485 वर्ग किमी में ‘गोविन्द पशु विहार’, 1972 में चमोली के 975 वर्ग किमी में ‘केदारनाथ वन्य जीव विहार’, 1986 में पिथौरागढ़ के 600 किमी में ‘अस्कोट वन्य जीव विहार’, 1988 में अल्मोड़ा के 47 वर्ग किमी में बिनसर वन्य जीव विहार, 1993 में देहरादून के 10 वर्ग किमी में ‘मसूरी वन्य जीव विहार’ और 1997 में पौड़ी जिले में 301 वर्ग किमी में ‘सोना नदी वन्य जीव विहार’ बनाये गये। वनों और वन्य जीवन के संरक्षण के नाम पर इन पार्कों और सेंक्चुरियों की तय सीमाओं के भीतर आने वाले हजारों गाँवों के लोगों को उनके जंगलों से लकड़ी, घास, पत्ती, औषधि, पानी आदि के उनके हकों से वंचित कर दिया गया। कृषि उत्पादन पर ही आजीविका चलाने वाले इन ग्रामीणों के जंगल से जुड़े सीधे हक प्रभावित हो गये हैं। जंगली जानवर उनकी खेती तबाह कर देते हैं, पालतू जानवरों को मार डालते हैं। इंसानों पर हमला होना आम बात हो गयी है। वन कानूनों से बँधे ये ग्रामीण मूकदर्शक बनकर रह जाते हैं।

उत्तराखण्ड के अलग राज्य बनने के बाद से गुलदार, भालू, बाघ, सुअर आदि जंगली जानवरों ने 300 मनुष्यों को मार डाला है। जानवरों के हमले में 800 लोग गम्भीर रूप से घायल भी हुए हैं। चाहे इन उद्यानों और विहारों के वन जनता के लिए दुर्लभ हो गऐ हों, लेकिन कुप्रबन्धन के चलते तस्करों के लिए ये उद्यान लगभग खुले हैं। यहाँ से वन्य सम्पदाओं और वन्य जीवों की बेतहाशा तस्करी होती रहती है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार राज्य बनने के बाद अब तक 43 बाघ, 457 गुलदार और 173 हाथियों की जान जा चुकी है। इनमें प्राकृतिक रूप से केवल 8 बाघ, 132 गुलदार और 15 हाथी ही मरे हैं। शेष शिकारियों और तस्करों का निशाना बने।

वन्य संरक्षण के लिए घोषित इन क्षेत्रों में अमीर पर्यटकों के लिए बड़ी कम्पनियों व एनजीओ आदि द्वारा वन भूमि पर ही बनाए गये बड़े-बड़े होटल, रेस्त्राँ आदि को वन विभाग ने इको टूरिज्म के विस्तार के नाम पर छूट दे रखी है। वन एवं वन्य जीव संरक्षण के नाम पर तमाम सेंक्चुअरी और पार्क बनाने के अलावा, वन अधिनियम सरीखे कानून ने पूरे राज्य के जंगलों से जनता को बेदखल कर दिया है। जितने जंगल अब भी जनता के पास ‘वन पंचायतों’ के जरिए हैं, उनकी हालत वन विभाग के जंगलों से बेहतर है। दरअसल जनता के जंगलों से भावनात्मक रिश्ते भी हैं, जबकि वन विभाग का रिश्ता व्यावसायिक ही रहा है। वनों के प्रति जनता और वन विभाग की मानसिकता को परखने के पर्याप्त उदाहरण यहाँ हैं। वन पंचायत के जंगलों को, ग्रामीण तय अवधि तक स्थानीय देवी देवताओं को चढ़ा देते हैं। धार्मिक आस्थाओं के चलते इस अवधि में जंगलों से किसी भी किस्म का विदोहन सफल रूप से प्रतिबन्धित हो जाता है और जंगल भर उठते हैं। वहीं वन विभाग ने पूरे प्रदेश में बेतहाशा बजट लुटा कर जो जंगल तैयार किए हैं, उनमें पतली पत्ती वाले चीड़ के जंगलों की प्रचुरता है। पतली पत्ती के जंगलों के बजाय चौड़ी पत्ती के जंगल जैव विविधता के आधार पर ज्यादा उपयोगी माने जाते हैं। लेकिन चीड़ के जंगल बिना अधिक मेहनत के उग आते हैं, इनका विस्तार तीव्रता से होता है और वन विभाग के लिए ‘लीसा’ उत्पादन कर यह भारी कमाई करते हैं। सो विभाग चौड़ी पत्ती के जंगलों के बजाय चीड़ के जंगलों को प्राथमिकता देता है।

विगत दिनों देहरादून में एफ. आर. आई. से जुड़ी एक फोटो गैलरी का उद्घाटन करते हुए केन्द्रीय पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने कहा कि ‘‘क्षेत्रीय जनता को साथ लिए बिना जंगलों का वास्तविक संरक्षण संभव नहीं है। उन्हें साथ लेना जरूरी है।’’ दरअसल ये जरूरी बातें मंचों में ही सिमट कर रह जाती हैं। सवाल यह है कि जंगलों के संरक्षण के लिए बनने वाली वास्तविक नीतियों में क्षेत्रीय जनता को कितनी तरजीह दी जाती है और वन से जुड़ा प्रशासन और नीति नियंता किस गहराई तक इस बात को समझ पाते हैं।
 

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