वनों को संरक्षित करता लाख उद्योग

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 03/12/2015 - 07:51
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योजना, नवम्बर 2009
लाख उद्योग एक ऐसा मुनाफे का उद्योग है जो कम लागत के साथ आरम्भ किया जा सकता है। इस उद्योग के जरिये जहाँ लाखों ग्रामीण बेराजगारों को रोजगार के अवसर सुलभ होते हैं, वहीं पर्यावरण का भी संरक्षण होता है। लाख में अनेक प्रकार के तत्व पाए जाते हैं जैसे— राल 68-90 प्रतिशत, मोम 6 प्रतिशत, रांगा 2-10 प्रतिशत, खनिज तत्व 3-7 प्रतिशत, जल 3 प्रतिशत एवं एल्बुमिन 5-10 प्रतिशत आदि।भारत की जैव-विविधता में लाख कीट एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। अब तक ज्ञात लाख कीट प्रजातियों की 21 प्रतिशत विविधता भारत में पाई जाती है। लाख उद्योग, जैसाकि नाम से स्पष्ट है, लाख कीट और उसके संवर्धन पर आधारित है। लाख एक प्राकृतिक राल है जो एक जटिल पदार्थ है। लाख उद्योग में लाख कीट का संवर्धन लाख के साथ ही मोम व रंग प्राप्त करने के लिए किया जाता है। भारत में लाख उद्योग का एक लम्बा इतिहास रहा है। प्राचीन ग्रंथों जैसे— महाभारत में भी लाख के भवन यानी लाक्षागृह का उल्लेख मिलता है, जिसका निर्माण कौरवों ने पाण्डवों के विनाश के लिए किया था। अबुल फजल ने सन् 1590 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक आईन-ए-अकबरी में भारत के लाख उद्योग का जिक्र किया है। इसके पश्चात लाख कीट उत्पादन एवं लाख के उत्पादों की जानकारी सन् 1782 में वोर एवं ग्लोबर द्वारा इतिहास में दर्ज की गई है।

भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोन्द संस्थान, राँची के अनुसार विश्वभर में भारत सबसे बड़ा लाख उत्पादक देश है। यहाँ विश्व के कुल लाख उत्पादन का लगभग 50-60 प्रतिशत उत्पादन होता है। वर्तमान में भारत में करीब 20,000 मीट्रिक टन लाख उत्पादन प्रतिवर्ष किया जा रहा है। देश में लाख का सर्वाधिक उत्पादन छोटानागपुर के पठारी क्षेत्रों में होता है। छोटानागपुर का पठारी क्षेत्र मुख्यतः झारखण्ड राज्य में आता है एवं इसकी सीमाएँ बिहार, पश्चिम बंगाल व ओडिशा आदि राज्यों को छूती हैं। देश का सर्वाधिक लाख उत्पादन करने वाला राज्य झारखण्ड देश के कुल लाख का करीब 57 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ 23 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल 12 प्रतिशत जबकि ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश और असम अपेक्षाकृत छोटे उत्पादक राज्यों में आते हैं। इन राज्यों में रहने वाले करीब 30 लाख आदिवासी लाख उद्योग के माध्यम से जीवनयापन कर रहे हैं। झारखण्ड के आदिवासियों की संपूर्ण कृषि सम्बन्धी आय का लगभग 35 प्रतिशत लाख उद्योग द्वारा सम्पूरित होता है।

लाख उत्पादन में प्रतिवर्ष लगभग 10 लाख मानव दिवस लाख संवर्धन में संलग्न उद्योगों द्वारा सृजित किए जाते हैं। हर वर्ष लाख के निर्यात से भारत लगभग 120 से 130 करोड़ तक की विदेशी मुद्रा अर्जित करता है। लाख का राल (रेजिन) पूर्णतः प्राकृतिक, जैव अपघटनकारी होने के साथ जहरीला भी नहीं है अतः इसकी माँग भोजन, कपड़ा और औषधि उद्योग में अधिक है। इसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स व अन्य क्षेत्रों में लाख से जुड़ी रोजगार की बड़ी सम्भावनाएँ हैं।

देश में लाख शोध कार्यों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा राँची में ‘इण्डियन लाख रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (आईएलआरआई) स्थापित किया गया है, जो लाख कीट के संरक्षण एवं लाख उद्योग के प्रोत्साहन के लिए कार्यरत है। आईएलआरआई का गठन अंग्रेजों द्वारा 20 सितम्बर, 1924 को राँची में किया गया था। अप्रैल 1966 से भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद ने आईएलआरआई को अपने नियन्त्रण में ले लिया। इस प्रकार यह संस्थान पिछले 85 वर्षों से लाख के क्षेत्र में अपनी सफल सेवाएँ दे रहा है। 20 सितम्बर, 2007 को इस संस्थान को नया नाम दिया गया। अब यह संस्थान इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ नेचुरल रेजिन एण्ड गम्म (भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोन्द संस्थान) के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1951 एवं 1956 के दौरान देश में लाख पैदावार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से चार रीजनल फील्ड रिसर्च स्टेशनों का गठन झालदा (पश्चिम बंगाल), दमोह, उमरिया (महाराष्ट्र) और मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) में किया गया।

लाख उद्यमियों को सलाह

लाख उद्योग आरम्भ करने से पूर्व विशेषज्ञ वैज्ञानिकों से सलाह-मशविरा करना न भूलें। निम्नांकित बिन्दु भी लाख उद्योग में सहायक हो सकते हैं :

1. अपने क्षेत्र में बेहतर पोषक वृक्षों को चिह्नित करें एवं लाख कीट की प्रजाति के विषय में भी सम्बन्धित प्रयोगशालाओं से सलाह लें ताकि आपको बेहतर लाख पैदावार मिल सके।

2. लाख कीट को आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न वृक्षों जैसे लीची, आम, आँवला, अमरूद, सेब आदि के साथ लेमेन्जिया पर पोषित करें, जिससे अतिरिक्त आय हो।

3. सूखा सम्भावित क्षेत्रों जैसेगुजरात और राजस्थान में विपरीत परिस्थितियों में लाख के पोषक वृक्षों की टहनियाँ पशुओं को खिला दी जाती हैं। ऐसी स्थिति लाख उद्योग के सामने संकट ला देती है।

4. ब्रूडलाख एक सप्ताह से अधिक एकत्र नहीं किया जा सकता और इसकी उपलब्धता लाख संवर्धन की शुरुआत का महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।

5. शोध संस्थानों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही तकनीकी जानकारी व संसाधनों की विस्तृत जानकारी आवश्यक है इसे हासिल कर लें।


भारत पूरे विश्व की लाख माँग के 55-60 प्रतिशत की आपूर्ति करता है। भारत में उत्पादित 80 प्रतिशत लाख उत्पादन का निर्यात दस बड़े देशों जैसे— इण्डोनेशिया, पाकिस्तान, अमेरिका, मिस्र, बांग्लादेश, जर्मनी, स्पेन, इटली, लन्दन, यूएई और एआरपी में किया जाता है। यहाँ से बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है। भारतीय लाख कीट की प्रजाति केरिया लैक्का अन्य लाख उत्पादक देशों, जैसे— चीन, इण्डोनेशिया व थाइलैण्ड से प्राप्त लाख की तुलना में उच्च गुणवत्ता वाला होता है। भारतीय लाख में उत्कृष्टता के मानक पाए जाते हैं। यहाँ के लाख का बहाव, ठण्डे व गर्म अल्कोहल में अघुलनशीलता, रंग सूचकांक, ताप बहुलता, विरंजन सूचकांक, चमक व चिकनाई का गुण शामिल होता है जो चीन, इण्डोनेशिया व थाइलैण्ड के लाख में नहीं है।

एक अन्य अनुमान के अनुसार एक व्यक्ति साल भर में 4 टन कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा वातावरण में छोड़ता है और एक वृक्ष वर्ष भर में एक टन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है। इस प्रकार लाख की खेती से जहाँ वर्ष में एक वृक्ष से अच्छी आमदनी हो रही है वहीं कई हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा प्रतिवर्ष वातावरण से अवशोषित होती है।देश में लाख के प्रसंस्करण में पश्चिम बंगाल अग्रणी भूमिका निभाते हुए कुल लाख उत्पादन में 32.6 प्रतिशत का योगदान कर रहा है। दूसरे स्थान पर झारखण्ड 21.3 प्रतिशत तथा महाराष्ट्र 5.37 प्रतिशत के योगदान के साथ हैं। वर्ष 2006-07 में लाख एवं इसके मूल्यवर्धित उत्पादों का कुल निर्यात 7,525.46 टन रहा, जिसका मूल्य 147.72 करोड़ था। लाख उद्योग कम लागत में अधिक आय देने वाला, पर्यावरण के लिए अनुकूल एवं जल, वायु, मिट्टी, वनों व वृक्षों का संरक्षण करने वाला एक आदर्श उद्योग साबित हुआ है।

ग्लोबल वार्मिंग पर गठित अन्तर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्ट के अनुसार आज मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड वैश्विक तापमान में वृद्धि का मुख्य कारण है। एक अन्य अनुमान के अनुसार एक व्यक्ति साल भर में 4 टन कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा वातावरण में छोड़ता है और एक वृक्ष वर्ष भर में एक टन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है। इस प्रकार लाख की खेती से जहाँ वर्ष में एक वृक्ष से अच्छी आमदनी हो रही है वहीं कई हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा प्रतिवर्ष वातावरण से अवशोषित होती है। आज लाख उद्योग के बढ़ते आकर्षण से न केवल पेड़ों का कटना रूका है बल्कि वनों का स्वतः संरक्षण होने लगा है। पलाश का एक वृक्ष अपनी जड़ों में दो लीटर पानी संग्रहित करता है। इस प्रकार लाख की खेती से बड़ी मात्रा में जल का संचय हो रहा है। लाख उद्योग में संलग्न बायोवेद शोध संस्थान, इलाहाबाद द्वारा आयोजित लाख की खेती के प्रशिक्षण के पश्चात कोई भी किसान अथवा साधनहीन व्यक्ति प्रतिमाह 3,000 से 5,000 रुपए आसानी से कमा सकता है।

क्यों बेहतर है लाख उद्योग


बायोवेद शोध संस्थान के अनुसार आज एक आम किसान को सिंचाई आदि के साधन उपलब्ध होने के बाद, दो मौसमी फसलें उगाने के बाद एक एकड़ खेत से मात्र 800 रुपए की औसत मासिक आमदनी होती है जबकि तेजी से बढ़ने वाले लाख पोषक वृक्ष लेमेन्जिया के एक एकड़ में मेड़ के किनारे लगने वाले 1,000 वृक्षों से 4 से 5 हजार रुपए प्रतिएकड़ की मासिक औसत आमदनी होती है और यह लगातार सात वर्षों या इससे भी अधिक समय तक बगैर किसी लागत के होती रहती है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक 50 प्रतिशत किसान आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण खेती छोड़ना चाहते हैं, लेकिन लाख की खेती एक उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है जो खेती भी है और उद्योग भी। आज लाख उद्योग में छोटे, बड़े, बूढ़े, महिला, पुरुष, साधनहीन सबके लिए सम्भावनाओं के द्वारा खुले हैं।

गाँव के नवयुवक खेती में अधिक श्रम के कारण शहरों में नौकरी ढूँढ रहे हैं लेकिन लाख उद्योग में कम लागत, अल्प श्रम व अधिक आय एवं सालाना व्यस्तता यानी पूरे वर्ष रोजगार की उपलब्धता से भी लाख उद्योग एक बेहतर उद्योग साबित हुआ है। लाख की खेती स्वयं में तो एक उद्योग है ही, साथ ही इससे कई कुटीर उद्योगों के रास्ते खुल जाते हैं। लाख की खेती से वन संरक्षण, जल संरक्षण और पर्यावरण सन्तुलन के साथ इमारती व ईन्धन की लकड़ी भी उपलब्ध होती है। लाख उद्योग में लाख उत्पादन के साथ ही मोम, रंग एवं शहद के उत्पादन से दोहरे लाभ के अवसर रहते हैं। लाख के खेत में मधुमक्खी पालन से शहद का अधिक उत्पादन होता है साथ ही मधुमक्खियों से स्वपरागण बढ़ने से अन्य फसलों का उत्पादन भी बढ़ता जाता है।

लाख उद्योग की आधारीय प्रक्रिया : लाख संवर्धन


लाख कीट की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं जैसे मेटाकार्डिया, लेसिफर, टेकोडिएला, ऑस्ट्रोटाकारिडिया, टेकाडिना लेकिन इन सभी में जो प्रजाति लाख उद्योग में साधारणतः प्रयुक्त होती है, वह है केरिया लैक्का। केरिया लैक्का कीट विशेष वृक्षों की टहनियों पर पलते हैं और वृक्ष के लोयम रस या सैप को अपना भोजन बनाते हैं इस दौरान प्राकृतिक राल निकलता है। लाख कीट अपने शरीर को सुरक्षित रखने के लिए भी तरल पदार्थ (राल) निकालता है, जो सूखकर कवच बना लेता है और उसी कवच के भीतर कीट जीवित रहता है। इसी कवच को लाख या लाह कहते हैं। इसके साथ ही मादा कीट द्वारा मुख्य रूप से प्रजनन के पश्चात निकलने वाला स्राव भी राल बनाता है। इस प्रकार हजारों-लाखों नन्हें-नन्हें लाख के कीड़े अपने आश्रयदाता वृक्ष या पोषक वृक्ष की टहनी पर एक घनी कॉलोनी बनाकर रहते हैं और राल रंजक स्रावित करते हैं।

लाख संवर्धन में लाख कीट या निम्फ को पोषण देने वाले आश्रयदाता वृक्षों की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। लाख की गुणवत्ता मुख्यतः इन्ही आश्रयदाता वृक्षों पर निर्भर करती है, जो लाख कीट को पोषण प्रदान करते हैं। कुसुम, बबूल, पलाश और बेर के साथ लेमेन्जिया वृक्षों से प्राप्त उत्कृष्ट कोटि का भारतीय लाख आज विश्व में अपनी एक अलग पहचान और स्थान रखता है।

लाख के कीट अनेक ऐसे वृक्षों पर पलते हैं जो आर्थिक, औषधीय व सामाजिक महत्व के होते हैं। लाख उद्योग को बढ़ाने और प्रोत्साहित करने से हम हरियाली के संरक्षण में बहुत कुछ योगदान कर सकते हैं।लाख संवर्धन प्रक्रिया विभिन्न चरणों वाली एक जटिल प्रक्रिया होने के साथ-साथ प्रकृति की प्रयोगशाला का एक रोचक अनुभव भी कराती है, ऐसा मानना है लाख संवर्धन से जुड़े विशेषज्ञों का। आश्रयदाता वृक्ष पर लाख कीट का स्थापित होना लाख संवर्धन का पहला चरण है। यह प्राकृतिक व कृत्रिम दो तरह से होता है। प्राकृतिक प्रक्रिया एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसमें लाख के निम्फ झुण्ड बनाकर बार-बार एक ही वृक्ष पर एकत्रित होते हैं और वृक्ष की टहनियों की लोयम कोशिकाओं से लोयम रस या सैप को चूसते हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया में अनेक कमियाँ हैं, जैसे कि यह प्रक्रिया एक अनियमित प्रक्रिया है, इसमें अनेक प्रकार के वातावरणीय कारकों जैसे तेज वर्षा, तीव्र प्रकाश और वायु आदि के कारण निम्फ पोषक वृक्षों पर ठीक प्रकार स्थापित नहीं हो पाते। लाख के कीट लगातार एक पौधे की टहनी से पोषक पदार्थों को ग्रहण करते हैं, जिसमें कुछ समय पश्चात पोषक वृक्षों का विकास रूक जाता है। इस प्रकार आश्रयदाता वृक्ष में पोषक पदार्थों के अभाव से न तो लाख के कीट का विकास हो पाता है और न ही लाख का उत्पादन हो पाता है। लाख के कीट पर अनेक परजीवी पाए जाते हैं, यदि समय पर लाख का उत्पादन नहीं किया जाता, तो लाख पर अनेक परभक्षी आक्रमण करके लाख के कीट के विकास को प्रभावित करते हैं।

लाख संवर्धन की कृत्रिम प्रक्रिया में पोषक वृक्षों की टहनियों को निम्फ एकत्रित होने से पूर्व करीब 20-30 से.मी. की लम्बाई में काट लिया जाता है, फिर इन कटी हुई टहनियों को वृक्ष से इस प्रकार बाँधा जाता है, जिससे कि हर टहनी वृक्ष की अन्य शाखाओं से सम्बद्ध हो जाए और एक प्रकार के सेतु का निर्माण करे। इस प्रकार निम्फ आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं और अलग-अलग शाखा या टहनी पर उचित फैलाव हो जाता है। कीटों के एकत्रित होने के पश्चात इन टहनियों को पोषक वृक्ष से अलग कर लिया जाता है। इस प्रक्रिया में इस बात की बहुत सावधानी रखी जाती है कि उनमें उचित मात्रा में निम्फ हो और वे पूर्ण रूप से स्वस्थ हों एवं टहनियाँ परजीवियों से पूरी तरह मुक्त हों। कुछ समयान्तरालों पर पोषक वृक्ष को भी बदलते रहना उचित होता है ताकि निम्फ को उचित पोषक पदार्थ प्राप्त हो सकें।

आश्रयदाता पोषक वृक्षों से मुख्यतः दो प्रकार की लाख— परिपक्व लाख एवं अपरिपक्व लाख एकत्रित की जाती है। अपरिपक्व लाख को लाख कीटों के झुण्ड में एकत्रित होने से पूर्व ही इकट्ठा कर लिया जाता है। इस प्रकार की लाख एरी लाख कहलाती है। परिवक्व लाख को लाख कीटों के झुण्ड बनाकर एकत्रित होने के पश्चात इकट्ठा किया जाता है। इस प्रकार की लाख को परिपक्व लाख कहते हैं। बड़े पैमाने पर लाख के उच्चकोटि के उत्पादन के लिए परिपक्व लाख को ही प्रोत्साहित किया जाता है।

लाख की फसल जब पूरी तरह परिपक्व हो जाती है, तब लाख को पोषक वृक्ष से अलग कर लिया जाता है। लाख का कुछ भाग पोषक वृक्ष पर ही लगा रह जाता है। जिस टहनी में अण्डों सहित लाख पाया जाता है, उस टहनी को बू्रड लाख टहनी कहा जाता है और इससे प्राप्त लाख बू्रड लाख या स्टिक लाख कहलाता है। इस लाख को टहनी से अलग कर विभिन्न प्रकार की अशुद्धियों को लाख से अलग करके लाख को शुद्ध बनाया जाता है। यह छोटी-छोटी गोलियों के रूप में होता है, अतः इस लाख को सीड लाख के नाम से जानते हैं। इसका उपयोग वार्निश आदि के उत्पादन में किया जाता है। इस प्रकार की लाख का उपयोग अमेरिका में 18वीं शताब्दी की शिकारी बन्दूकों को तैयार करने में या उन्हें अन्तिम रूप देने में किया जाता था।

सीड लाख में 3 से 5 प्रतिशत अशुद्धियाँ होती हैं। इस सीड लाख को जल में धोकर, सूर्य के प्रकाश में सुखाकर, एक झोले में रखकर, गर्म करके पिघला लिया जाता है। तत्पश्चात लाख को ठण्डा करके ठोस रूप में एकत्र कर लिया जाता है। इस प्रकार की लाख को बटन लाख कहते हैं। जब इस शुद्ध लाख को एक परत पर बिछाया जाता है तो यह शेल लाख कहलाता है। लाख की गुणवत्ता मुख्य रूप से उसके पोषक वृक्ष पर निर्भर करती हैं। कुसुमी लाख सबसे उत्तम प्रकार का लाख माना जाता है।

लघु उद्योग के रूप में लाख उद्योग


लघु उद्योग के रूप में लाख उद्योग में अपार सम्भावनाएँ हैं। लाख का उपयोग अनेक प्रकार के खिलौने एवं कृत्रिम चमड़े आदि के निर्माण में किया जाता है। सुनार लाख का उपयोग विभिन्न प्रकार के स्वर्ण आभूषणों जैसे कंगन एवं हार आदि को भरने के लिए भी करते हैं। आज ही नहीं बल्कि सदियों से महिलाओं को लाख की चूड़ियाँ पसन्द आती रही हैं। लाख का प्रयोग पॉलिश, वार्निश एवं रंग आदि बनाने के लिए भी होता है, जिसका प्रयोग फर्नीचर और दरवाजों की चमक को बढ़ाने में किया जाता है। लाख का उपयोग फोटोग्राफिक पदार्थों के निर्माण एवं विद्युत के ऐसे उपकरणों के निर्माण में होता है, जिसमें विद्युत प्रवाह से करंट लगने का खतरा न हो।

आज लाख उद्योग या लाख की खेती परोक्ष रूप से कई शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के लघु उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध करा रही है। लाख सौन्दर्य उद्योग, इलेक्ट्रिकल वस्तुओं से जुड़े उद्योग, चमड़ा, भोजन, वार्निश, रंगीन इंक, चिपकाने वाले सामान आदि के उद्योगों से सीधा जुड़ा हुआ है। आज लाख पर कलाकारी से सौन्दर्य वस्तुओं के अलावा सजावटी व दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुएँ भी बनाई जा रही हैं और एक बड़ा बाजार लाख उद्यमियों के कुटीर उद्योगों की प्रतीक्षा कर रहा है। हीरे को काटने से लेकर आभूषण, पॉलिश किए गए पत्थर, बायोफर्टिलाइजर व बायोयेस्टीसाइड्स, सीलिंग वैक्स और पॉलिश आदि के निर्माण में उपयोग किया जा रहा है यानी लाख लाखों की बात कर रहा है।

लाख उद्योग में बड़े पैमाने पर लाख संवर्धन उद्योग की सम्भावनाएँ हैं। लाख की खेती से कटाई के बाद उसकी साफ-सफाई का काम कई चरणों में होता है और संवर्धन के उद्योगों में हजारों की तादाद में ग्रामीण महिलाएँ व पुरुष अपनी आजीविका चला रहे हैं।

लाख के कीट अनेक ऐसे वृक्षों पर पलते हैं जो आर्थिक, औषधीय व सामाजिक महत्व के होते हैं। लाख उद्योग को बढ़ाने और प्रोत्साहित करने से हम हरियाली के संरक्षण में बहुत कुछ योगदान कर सकते हैं। आज भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोन्द संस्थान, राँची द्वारा लाख संवर्धन पर प्रौद्योगिकी स्थानान्तरण कार्यक्रमों एवं अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल होकर एवं संस्थान से सम्पर्क करके लाख उद्योग को स्थापित करने की दिशा में एक ठोस कदम उठाया जा सकता है।

(लेखक विज्ञान प्रसार, नोएडा में वरिष्ठ वैज्ञानिक, विज्ञान संचार हैं)
ई-मेल : nimish2k@rediffmail.com

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