कुकरैल नदी संरक्षण अभियान, फोटो साभार - लोकभारती
कुकरैल नदी संरक्षण अभियान, फोटो साभार - लोकभारती

जन, जल, जंगल, ज़मीन को समर्पित लखनऊ का संगठन लोकभारती

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प्रकृति के एक चक्र के टूटने से अनेक चक्र टूटते हैं, जैसे परस्पर सहकार, स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता, मानवता और वसुधैव कुटुंबकम की श्रेष्ठ भावना। किसमें निहित है शोषण नहीं पोषण, भोग नहीं उपभोग, सहअस्तित्व, प्रकृति से जितना लेना, उतना लौटाना और सबसे महत्वपूर्ण है शाश्वतता का सिद्धांत, जिसे आधुनिक विकास ने पूर्णतः ध्वस्त किया, अब सस्टेनेबल की खोज में लगे हैं। 

लोकभारती से जुड़े कर्मयोगी बंधुओं! हमारा प्रत्येक पल, प्रत्येक क्षण संकल्पवान हो, दिव्य हो, समृद्ध व प्रेरणादायक हो, लोकभारती से जुड़े सभी बंधु इसी भाव से निरंतर कर्म योग की साधना में रत हैं। साधना में अपने लिए संकल्प अमृत स्मरण रखना आवश्यक है आता जानते हुए भी अपने ध्येय के प्रति समर्पित लोकभारती की गतिविधियों का पुनः स्मरण करना मुझे उपयुक्त लगता है।

लोकभारती की गतिविधियां 

1 - गौ आधारित प्राकृतिक कृषि -

हम सब जिसे शून्य लागत प्राकृतिक कृषि सुभाष पालेकर प्राकृतिक कृषि या गौ आधारित प्राकृतिक कृषि के नाम से पुकारते हैं, जो पूर्णतः प्राकृतिक सिद्धांत पर आधारित है। हम चाहते हैं कि अन्नपूर्णा कृषि भूमि सदा उर्वरा बनी रहे, उसकी उत्पादकता, गुणवत्ता, पोषकता और आरोग्यवर्धन की क्षमता निरन्तर उपलब्ध होती रहे। इसके साथ ही भूजल स्तर, जैव विविधता और पर्यावरण के संरक्षण के अनुरूप कृषि कार्य और किसान समृद्धि हेतु गौ आधारित प्राकृतिक कृषि एक मात्र हमारा संकल्प है। इस पद्धति से उत्पादकता, गुणवत्ता के साथ ही प्रकृति प्रदत्त एक दूसरे की पूरकता के शाश्वत सिद्धांत का पोषण व संरक्षण निहित है, जैसे भूमि की उर्वरता और पशुधन तथा कृषि उत्पाद के अवशेष एक दूसरे के पूरक हैं। आधुनिक कृषि विज्ञान ने उस चक्र को तोड़ने का कार्य किया है। प्रकृति के एक चक्र के टूटने से अनेक चक्र टूटते हैं, जैसे परस्पर सहकार, स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता, मानवता और “वसुधैव कुटुम्बकम' की श्रेष्ठ भावना। जिसमें निहित है शोषण नहीं पोषण, भोग नहीं उपभोग, सहअस्तित्व, प्रकृति से जितना लेना उतना लौटाना और सबसे महत्वपूर्ण है शाश्वतता का सिद्धांत, जिसे आधुनिक विकास ने पहले पूर्णतः ध्वस्त किया और अब सस्टेनेबल की खोज में लगे हैं। गौ आधारित प्राकृतिक कृषि उपरोक्त व उनसे जुड़ें समस्त प्रश्नों का समाधान है।

गौ आधारित प्राकृतिक कृषि पद्धति के प्रमुख आधार बिन्दु-

सूक्ष्म जीवाणु -

सूक्ष्म जीवाणु भारतीय गाय (गौवंश) के एक ग्राम गोबर में 3 से 5 हजार करोड़ तक सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं, जिन्हें वैज्ञानिक किण्वन (फर्मेंटेशन) पद्धति से अनंत गुना विकसित कर खेत में दिया जाता है।

जीवामृत-घन जीवामृत -

आच्छादन (मल्चिंग)-

सह फसल -

देशी बीजों का उपयोग -

कीट और रोग नियंत्रण -

बीज शोधन -

विस्तार और प्रभाव-

किसानों के मध्य गौ आधारित प्राकृतिक खेती के कलस्टर विकसित किए जा रहे हैं और समाज में इसके उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है।

अन्य करणीय कार्य -

(2) पर्यावरण संरक्षण-

पर्यावरण एक व्यापक शब्द है। लोकभारती अपनी पहुँच और सामर्थ्य के अनुसार पर्यावरण सम्बन्धी निम्न विषयों पर कार्यरत है-

वृक्षारोपण-

हरियाली माह-

हरिशंकरी सप्ताह -

सघन हरिशंकरी रोपण -

(3) जल, जलस्रोत एवं नदी संरक्षण-

जल ही जीवन है। इस जीवन रूपी जल का संरक्षण वर्तमान और भविष्य दोनों के लिये आवश्यक है। पश्चिम की भोगवादी विकास की अंधी दौड़ ने पर्यावरण के क्षरण के साथ ही भूगर्भ जल का दोहन नहीं अपितु इतना अधिक शोषण किया है कि भूजल पाताल की ओर जा रहा है। इस के कारण नदियों, झीलों, तालाबों में निकलने वाले सोते सूख गए हैं। इसके कारण अनेक हैंडपंप, कुएं सूख गए हैं। अनेक तालाब और अनेक छोटी नदियां या तो पूरी तरह सूख गई हैं या सूखने के कगार पर हैं। लखनऊ की जीवन रेखा एवं गंगा की सहायक नदी गोमती अपने उद्गम

से आगे अनेक स्थानों पर सूख गई है। इसके साथ ही गोमती की 22 सहायक नदियों में से एक तिहाई नदियां सूख चुकी हैं। यह भूजल दोहन ऐसे ही चलता रहा और वर्षा जल भंडारण पर कार्य नहीं हुआ तो भविष्य में जल की बहुत भयावह स्थिति बनेगी। लोकभारती ने इस स्थिति को 2010 से पूर्व ही समझ लिया था।

अतः उसी समय से लोकभारती ने इस दृष्टि से समाज जागरण, जागृत लोगों का संयोजन, समन्वय एवं अध्ययन के साथ प्रत्यक्ष कार्य प्रारम्भ कर दिया था, जिसका संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है-

बुन्देलखण्ड जल संकट संगोष्ठी-

माँ गंगा चिन्तन संगोष्ठी-

गोमती अध्ययन एवं अलख यात्रा-

अध्ययन के साथ ही समाज जागरण हेतु गोमती उद्गम माधो टांडा, पीलीभीत से गंगा मिलन स्थल कैथी घाट, वाराणसी तक दो बार उसके प्रवाह क्षेत्र के 13 जिलों के 33 स्थानों में रुकते हुए 660 किमी की यात्रा की जिसमें सभी 33 स्थानों पर गोमती मित्र मण्डलों का गठन किया गया। पहली यात्रा के एक सप्ताह में प्रदेश सरकार के सचिव स्तर के अधिकारियों की टोली माधो टांडा पहुंची और पीलीभीत जिले में 45 किमी गोमती संरक्षण का कार्य शासन द्वारा प्रारम्भ हुआ। तब से किसी न किसी रूप में सरकार, समाज और लोकभारती द्वारा गोमती संरक्षण का कार्य किया जा रहा है, जो गोमती की अविरल और निर्मलता के लक्ष्य प्राप्ति तक चलता रहेगा।

विविध नदियों पर कार्य-

बन्धुओं द्वारा कार्य किया जा रहा है। इसके परिणाम स्वरूप विभिन्न अन्य संगठनों द्वारा इसके अतिरिक्त 2 दर्जन नदियों पर कार्य किया

जा रहा है।

जल एवं जलस्रोत संरक्षण अभियान-

घाट स्वच्छता एवं व्यवस्था -

(4) बंगो लोकभारती का गठन-

बंगाल से विषम परिस्थितियों में विस्थापित हुए परिवार कालोनियों के रूप में देश के लगभग 18 राज्यों में रह रहे हैं। लोकभारती ने इन्हें रचनात्मक, सकारात्मक, स्वाभिमानी और प्रेरक दिशा देने के लिए बंगो लोकभारती का गठन किया है। इस अभियान के संयोजक लखनऊ से डह देव ज्योति, सह संयोजक लखीमपुर से तपन विश्वास और दूसरे सह संयोजक उत्तराखंड से संजय मण्डल हैं। इस अभियान का केंद्रीय कार्यालय लखीमपुर जिले में मोहम्मदी तहसील के आदर्श गांव रवीन्द्र नगर को बनाया है, जहां पर इसी वर्ष पहला सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड एवं महाराष्ट्र के 50 चयनित प्रतिनिधियों की सहभागिता रही।

आगामी सम्मेलन उत्तराखंड के रुद्रपुर जिले के भगवानपुर में प्रस्तावित है। इस अभियान के द्वारा प्रतिमाओं का विकास, स्वच्छता, गहन हरियाली, पर्यावरण संरक्षण, गौ आधारित प्राकृतिक कृषि, प्रेरक व्यवस्थाएं और राष्ट्रभाव जागरण के प्रतिमान जागृत करना है।

(5) ग्रामोदय अभियान-

ग्राम तथा ग्राम समूह को जाग्रत कर लोकभारती द्वारा लिए गए विभिन्न कार्यों को विकसित कर प्रेरणा क्षेत्र के रूप में स्थापित करना है। इस दिशा में शाहजहांपुर के पुवांया और बंडा विकास खण्ड, बहराइच तथा वाराणसी के सेवापुरी विकास खण्ड को लिया गया है।

(7) मेरा गांव मेरा तीर्थ-

नगरों, महानगरों में अनेकों गांवों के बंधु रहते हैं। उनमे से अनेक अपने गांव से नियमित जुड़े रहते हैं, जिनमें से अनेक अपने गांव के विकास के लिए कुछ अच्छा कर रहे हैं, कुछ अच्छा करना चाहते हैं। लोकभारती नगरों में ऐसे लोगों को खोज कर, उन्हें जोड़ने और उनके द्वारा अपने गांव के लिए कुछ अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित करने का कार्य किया जाता है। उनको कुछ कार्यों के लिए परामर्श भी दिया जाता है- गांव जाने पर गांव के स्कूल में मित्रवत जाएं। अध्यापकों से परिचय करें। उनकी अनुमति से किसी न किसी कक्षा में जा कर जो विषय आता हो, पढ़ायें। स्कूल में शैक्षणिक प्रतियोगिताओं का आयोजन कराएं। चयनित को सम्मानित करें। स्कूल में वार्षिक उत्सव का आयोजनों कराएं और उस अवसर पर गांव के जो बंधु कहीं बाहर रहते तो उन्हें भी आमंत्रित किया जाए। उनके अंदर की भावना को जाग्रत कर अपने गांव के लिए कुछ करने हेतु प्रेरित किया जाये। कुछ श्रेष्ठ करने वालों को सम्मानित किया जाए।

(7) मंगल परिवार-

व्यक्ति से परिवार, परिवार से गांव, मोहल्ला, कालोनी अर्थात्‌ समूह और समूह से संकुल। संकुल से क्रमशः देश बदलता है। इसलिए लोकभारती से जुड़े परिवारों में वह सब विशेषताएं जीवन में आयें, जिनके लिए लोकभारती कार्य करती है-

परिवार भाव, स्वच्छता एवं व्यवस्था, हरियाली (रसोई वाटिका), जल प्रबंधन, पर्यावरण के अनुरूप समस्त कार्य, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, मितव्ययिता, सहभागिता, सेवा, श्रम, एवं सहकार, पारिवारिक संस्कार, आदर भाव, व्यवस्थित दिनचर्या, योग-व्यायाम, समर्थ और समृद्ध परिवार आदि। प्रस्तुत विषयों में से अनेक गुण पहले से अनेक परिवारों में रहते हैं। स्मरण होने पर क्रमशः अन्य गुण भी धीरे-धीरे विकसित होते हैं। ऐसे परिवार दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनाते हैं। लोकभारती इनके संयोजन, विस्तार और प्रसार के लिए कार्य करती है। 

इसमें से कुछ कार्यो के लिए अभियान के कार्यक्रम भी संचालित करती है। वह इस प्रकार हैं- हरित कचरा निस्तारण एवं रसोई वाटिका- लखनऊ, गाजियाबाद, शाहजहांपुर जैसे नगरों के हजारों परिवारों में हरित वानस्पतिक रसोई, घरेलू कचरा (फल, सब्जी के छिलके, पत्ते और पूजा के फूल) एक नियोजित डिब्बे में डालते हैं, उनके गलन के लिए एक कल्वर का प्रयोग प्रारम्भिक अवस्था में कुछ दिन करते हैं, जिससे डिब्बे में डाले गए कररे में दुर्गन्‍्ध नहीं होती और वह तरल खाद के रूप में नीचे टोटी में लगाए किसी पात्र, बोतल में एकत्र होता है। उस तरल खाद को 15-20 गुना पानी मिलाकर अपनी रसोई वाटिका की सिंचाई करते हैं। इस प्रयोग से घर पर हरियाली, घर का तापमान 2-3 डिग्री कम, नगर पालिका के कचरे में 30-40 प्रतिशत की कमी, स्वच्छता का वातावरण बनने के साथ परिवार स्वाभिमान से कह सकता है कि सड़क पर कहीं प्रदूषण की दुर्गन्‍ध है तो उसमें हमारी हिस्सेदारी नहीं है।

डिब्बा 2 से 3 वर्ष में भरता है तब अवशेष निकल कर सूखी खाद बन जाती है। इस विधि का प्रयोग मन्दिरों में भी किया जा सकता है। पारिवारिक कार्यक्रम पर्यावरण अनुरूप- उत्सव, दावतों में पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली किसी भी व्यवस्था में परिवर्तन, जैसे- दोने, पत्तल, गिलास प्लास्टिक, थर्माकोल के प्रयोग नहीं करना। कूड़ेदान और स्वच्छता की व्यवस्था

का संस्कार सुनिश्चित करना। 

सहभोज एवं सहकार -

उत्तम नगर अभियान-

कार्यकर्ता टोली का विकास। इस दिशा में लखनऊ के अतिरिक्त लखीमपुर जिले के मोहम्मदी नगर, शाहजहांपुर जिले के पुवायां नगर, हमीरपुर, मुरादाबाद और मेरठ नगर में प्रारम्भिक गतिविधियां प्रारम्भ हुई हैं।

बुन्देली प्राकृतिक पर्यटन अभियान -

दिसंबर को बांदा, दिसंबर माह मे चित्रकूट, जनवरी में झांसी आयोजन के बाद फरवरी, मार्च माह में पूरे बुन्देलखण्ड की सामूहिक यात्रा रहेगी जिसमें स्थान-स्थान पर उन सभी प्रमुखों को जोड़ने की योजना है, जिनका इस अभियान को मूर्त रूप देकर बुन्देलखण्ड की प्रगति वह समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा। इस हेतु प्रदेश के पर्यटन मंत्री, वन मंत्री, सिंचाई मंत्री, उपमुख्यमंत्री एवं प्रशासनिक अधिकारियों को इस अभियान से अवगत कराया जा चुका है। 

25 नवंबर को उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव पर्यटन श्री मुकेश मेश्राम के साथ “बुन्देली प्रकृति पर्यटन अभियान' के सम्बन्ध में लोकभारती की केंद्रीय टोली की बैठक हुई, जिसमें उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे। इस अवसर पर श्री मेश्राम ने लोकभारती के बुन्देली प्रकृति पर्यटन अभियान में प्रदेश के पर्यटन विभाग की पूर्ण सहभागिता पर बल देते हुए यह भी कहा कि इस अभियान में प्राकृतिक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों के साथ एग्रो टूरिज्म (गोआधारित प्राकृतिक कृषि दर्शन) को भी जोड़ा जाए। इस हेतु लोकभारती से ऐसे स्थलों और गावों की सूची बनाकर पर्यटन विभाग को उपलब्ध कराने का आग्रह किया है। 

तीर्थ विकास -

सरयू नदी उद्गम यात्रा - भारतीय संस्कृति में भगवान राम और अयोध्या का बहुत महत्व है। लेकिन सरयू के बिना अयोध्या अधूरी है। वर्तमान में सरयू उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले तक अपने उद्गम स्थल से सरयू कहलाती है और चम्पावत जिले में काली नदी मिलते ही शारदा कहा जाने लगा है। लखीमपुर जिले में घाघरा के मिलने पर घाघरा और अयोध्या प्रवेश से अयोध्या तक सरयू नाम रह कर पुनः घाघरा कही जाने लगती है। यह पिछले कालखंड में अयोध्या को न्यून करने की सोची समझी नीति का हिस्सा लगता है। जैसे अयोध्या से ऊपर फैजाबाद हो गया था, वैसे ही सरयू के ऊपर घाघरा और शारदा नाम राजस्व में जोड़ कर प्रभावी बना दिए गए। अतः लोकभारती ने इस वर्ष के प्रारम्भ में रुद्रप्रयाग से सरयू उद्गम तक यात्रा आयोजित की और सरयू उद्गम का जल लाकर अयोध्या धाम, पवित्र सरयू में महंत वेदांती जी महाराज द्वारा समर्पित किया और राम जन्मभूमि के न्यासी चम्पत राय को सरयू उद्गम जल कलश एवं सरयू नदी का मानचित्र भेंट किया। इस मुहिम को आगे बढ़ाने के एक कदम के रूप में बलिया-बिहार के सरयू-गंगा संगम पर सरयू जल समर्पण का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

(लेखक लोकभारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री हैं)

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