पातालकोट घाटी,PC-Wikipedia
पातालकोट घाटी,PC-Wikipedia

बोतल बंद पानी और आर.ओ. छोड़िए, प्राकृतिक उपचार से भी पानी होता है शुद्ध

पातालकोट गहरी खाई में बसा 2500 वनवासियों का प्राकृतिक आवास है जो करीब 16 गांवों में फैला हुआ है। चारों ओर विशालकाय पहाड़ों और चट्टानों से घिरी इस घाटी की बनावट ऐसी है कि बारिश खूब होती है लेकिन ज्यादातर पानी बह जाता है। गर्मियों के आगमन के साथ पीने योग्य पानी की समस्या आम हो जाती है। पातालकोट के वनवासियों को कृषि से लेकर पेयजल तक के लिए वर्षा पर पूर्णतः निर्भर रहना पड़ता है। तेज चलने वाली हवाओं के साथ मिट्टी और धूल के कण, पेड़ की शाखाएं आदि इस पानी में गिरकर इसे मटमैला और दूषित कर देती हैं, इनमें मौजूद सूक्ष्मजीव जैसे बैक्टिरिया, वायरस, प्रोटोजोआ आदि इस पानी को संक्रमित बनाते हैं। पातालकोट वनवासी पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने पारंपरिक तरीकों से अशुद्ध पानी को पीने लायक बनाते हैं। निर्गुडी, निर्मली, सहजन, कमल, खसखस, इलायची जैसी वनस्पतियों का इस्तेमाल कर आज भी जल का शुद्धीकरण करते हैं, इन देशी तकनीकों को आम शहरी लोग भी घरेलू स्तर पर अपना सकते हैं।
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बोतलबंद पानी को लेकर चौंकाने वाली खबर आई है। अमेरिका में हुई रिसर्च में पता चलता है कि विभिन्न कंपनियों के पानी में प्लास्टिक के खतरनाक कण मिले हैं। आर.ओ. को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं, इसलिए आज हम आपको पानी को साफ करने के कुछ खास तरीके बता रहे हैं। पानी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पानी अगर दूषित हो, गंदा हो तो आप की जान भी ले सकता है। हो सकता नहीं बल्कि ये कहिए कि उन लाखों लोगों की जान पानी हर साल ले लेता है, जिन्हें शुद्ध पानी नहीं मिलता।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में होने वाली कुल मौतों में अगर 3.7 फीसदी लोग कैंसर, 4.9 फीसदी एड्स से मरते हैं तो पानी की बीमारियों से 10 फीसदी लोगों की जान जाती है। इसलिए जरूरी है आप शुद्ध पानी पिएं।

देश के कुछ शहर और गांव के वे लोग खुशनसीब हैं जिन्हें पर्याप्त मात्रा में अच्छा पानी मिल रहा है। देश में उन लोगों की संख्या भी लाखों में होगी जिन्होंने घरों में आर.ओ. लगवा रखे हैं, लेकिन अनगिनत लोगों के पास न तो साफ पानी है और न ही आर.ओ.लगवाने के लिए पैसे इनके पास तो इतने पैसे भी नहीं कि ये सामान्य फिल्टर ही ले पाएं। वैसे भी आरओ. के पानी की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। 

इस लेख में हम आपको कुछ ऐसी विधियां बता रहे हैं, जिनसे न सिर्फ आप दूषित पानी को शुद्ध कर पाएंगे बल्कि अपने पैसे भी बचाएंगे और सेहत भी बनेगी। वैसे भी आज से कुछ वर्ष पहले न आरओ. थे और न ही वाटर फिल्टर, इसलिए लोग घरेलू चीजों से पानी को शुद्ध करते थे। हमारे देश में एक जगह है पातालकोट, यहां के आदिवासी बिना सरकारी या किसी दूसरी संस्था की मदद के प्राचीनकाल से पारंपरिक नुस्खों का उपयोग कर पानी को साफ कर रहे हैं। वे अपने पारंपरिक ज्ञान के आधार पर उपलब्ध जलस्रोतों से जल एकत्र कर उनका शुद्धिकरण करते हैं। 

patalkot

पातालकोट वनवासी

निर्गुड़ी,

सोर्स - जल चेतना 

शुद्धिकरण की कुछ विधियां

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के मुख्यालय से करीब 80 किमी दूर पातालकोट घाटी सदियों से वनवासियों का घर रहा है। गोंड और भारिया जनजाति के वनवासी यहां सैकड़ों सालों से मूल निवासी हैं। बाकी दुनियां से कटा ये इलाका समाज की मुख्यधारा से सैकड़ों साल पीछे है।

पातालकोट गहरी खाई में बसा 2500 वनवासियों का प्राकृतिक आवास है, जो करीब 16 गांवों में फैला हुआ है। चारों ओर विशालकाय पहाड़ों और चट्टानों से घिरी इस घाटी की बनावट ऐसी है कि बारिश खूब होती है> लेकिन ज्यादातर पानी बह जाता है। गर्मियों के आगमन के साथ पीने योग्य पानी की समस्या आम हो जाती है। पातालकोट के वनवासियों को कृषि से लेकर पेयजल तक के लिए वर्षा पर पूर्णतः निर्भर रहना पड़ता है। तेज चलने वाली हवाओं के साथ मिट्टी और धूल के कण, पेड़ की शाखाएं आदि इस पानी में गिरकर इसे मटमैला और दूषित कर देती हैं, इनमें मौजूद सूक्ष्मजीव जैसे बैक्टीरिया, वायरस, प्रोटोजोआ आदि इस पानी को संक्रमित बनाते हैं।

पातालकोट वनवासी पीढ़ी- दर-पीढ़ी अपने पारंपरिक तरीकों से अशुद्ध पानी को पीने लायक बनाते हैं। निर्गुडी, निर्मली, सहजन, कमल, खसखस, इलायची जैसी वनस्पतियों का इस्तेमाल कर आज भी जल का शुद्धीकरण करते हैं, इन देशी तकनीकों को आम शहरी लोग भी घरेलू स्तर पर अपना सकते हैं।

पातालकोट में मंडा रास्ता, घुरनी और मालनी जैसे कस्बे दूरस्थ इलाकों में बसे हैं। सुबह गांवों की महिलाएं मटका एवं कांसे और पीतल की घुड़ियां सिर पर लेकर पहाड़ों की तलहटी में बनी झिर्रियों तक जाते हैं। झिर या झिरियां पहाड़ों और पहाड़ों की दरारों से पानी के धीमे-धीमे रिसकर नीचे आने का स्थान होता है। यहां बनवासी एक कुंड या मध्यम आकार का गोल-गड्डा बनाकर पानी को रोक लेते हैं। सुबह महिलाएं इस पानी को अपने बर्तनों में लेकर घर तक ले आती हैं। गर्मियों में पानी से भरी घुड़ियों को ये लोग अपने घरों के ऊपर खपरैल से बनी छत पर सूर्य प्रकाश में रख देते हैं। यहां के बुजुर्गों का मानना है कि ऐसा करने से दिनभर धूप की गर्मी पानी पर पड़ती है और शाम होते-होते पानी की सारी अशुद्धियां पीछे खत्म हो जाती हैं। सूरज के ढल जाने के बाद शाम से इस पानी को पीने योग्य माना जाता है ।

‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल रिसर्च एंड साइंस’ में डॉ. आर. राजेंद्रन ने एक रिव्यू लेख में बताया है कि यूनिसेफ भी इस बात को मानता है कि 24 घंटों तक पानी को कांच के जार या बर्तन में सूरज की रोशनी या धूप में रखा जाए तो पानी में बसे 99.9% एस्टरेसिया कोलाई नामक बैक्टीरिया का सफाया हो जाता है।

निर्गुड़ी द्वारा पानी का शुद्धिकरण

निर्गुड़ी यानी पानी की पत्ती (विटेक्स नेगुंडो) का पेड़ इस घाटी में खूब देखा जा सकता है। स्थानीय भाषा में इसे पानी-पत्ती भी कहा जाता है। इसके बीजों का इस्तेमाल भी पानी को साफ करने के लिए किया जाता है। पातालकोट घाटी के राथेड़ गांव की महिलाएं राजा की खोह नामक घाटी के पोखरों से पानी भरती हैं, सामान्यतः गहराई में बसे होने के कारण खोह का पानी मटमैला हो जाता है। पानी में से मिट्टी के कण, कीचड़ तथा अन्य गंदगियों को साफ करने के लिए महिलाएं निर्गुड़ी नामक पौधे की पत्तियों का प्रयोग करती हैं। इस मैले पानी को घड़े या मटके में भर लिया जाता है और आधे तक निर्गुड़ी की पत्तियों को भर दिया जाता है और इसे आधे से एक घंटे के लिए ढक कर रखा जाता है। ऐसा करने से पानी में मौजूद गंदगी नीचे बैठ जाती है और पानी साफ हो जाता है। कुछ लोग इस पानी में इलायची को कूटकर डाल देते हैं ताकि पानी में मिट्टी की गंध हो तो वह दूर हो जाए। वनवासियों के अनुसार निर्गुड़ी की पत्तियां मिट्टी के कणों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं जिससे गर्त या कण इनकी सतहों पर लिपट जाते हैं और मिट्टी के भारी कणों के साथ सूक्ष्मजीव भी इन सतहों तक चले आते हैं। आयुर्वेद में भी निर्गुड़ी के बीजों में जल शुद्धीकरण की उपयोगिता का जिक्र किया गया है।

निर्मली के बीज भी करते हैं पानी को साफ

पातालकोट के हर्रा का छार गांव के वनवासी झिरियां के करीब छोटे-छोटे गड्डे करके पीने का पानी प्राप्त करते हैं। साफ पानी प्राप्त करने के लिए निर्मली के बीजों का खूब इस्तेमाल किया जाता है। निर्मली जल शुद्धीकरण का जिक्र आयुर्वेद में भी आता है। इसके पके हुए 2-3 फलों को मसलने के बाद पानी से भरे बर्तनों में डाल दिया जाता है और 2 से 3 घंटे के बाद इस पानी को पीने योग्य माना जाता है। कई लोग इसके पके फलों को मटके या धुंडी की आंतरिक सतह पर रगड़ देते हैं और बाद में इस पात्र में झिरिया का पानी डाला दिया जाता है। निर्मली के बीजों पर किये गये शोधों से ज्ञात हुआ है कि इनमें एनऑयनिक पॉलीइलेक्ट्रोफाइट्स पाए जाते हैं जो को-ऑग्युलेशन की प्रक्रिया के कारक हो सकते हैं।

पानी का फिल्टर दही 

इसी इलाके के बनवासी एक अन्य प्रक्रिया के तहत झिरिया किनारे बने गड्डे में एक कप दही डाल देते हैं, एक दो घंटे में पानी में घुले मिट्टी के कण तली में बैठ जाते हैं और आहिस्ता-आहिस्ता पानी को ऊपरी सतह से एकत्र कर लिया जाता है। माना जाता है कि दही सूक्ष्म जीवों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है क्योंकि सूक्ष्मजीव दही में अपना भोज्य पदार्थ पाते हैं। यह पानी पीने योग्य हो जाता है। शहरों में लोग आसानी से इस पद्धति का इस्तेमाल कर सकते हैं और पानी को फिल्टर करने का यह एक उत्तम उपाय हो सकता है।

कई गांवों में लोग दही के साथ खस-खस के बीज भी मिलाते हैं, हिन्दुस्तानी सभ्यता में करीब 4000 सालों से इसे अलग-अलग तरह से इस्तेमाल में लाया जाता रहा है। करेयाम गांव के गोंड और भारिया बनवासी पीने के पानी को शुद्ध करने के लिए सहजन या मुनगा की फलियों और तुलसी की पत्तियों को मटके में डाल देते हैं। इस पात्र में पोखरों और झिरिया से एकत्र किया अशुद्ध या मटमैला जल डाल दिया जाता है। दो से तीन घंटों के बाद पात्र की ऊपरी सतह से पानी को निथारकर या एकत्र कर साफ सूती कपड़े से छानते हुए किसी अन्य पात्र में डाल दिया जाता है जो कि अब पीने योग्य हो जाता है। 

वनवासी हर्बल जानकारों के अनुसार सहजन की के  फलियों और तुलसी की पत्तियों में पानी में उपस्थित अनेक सूक्ष्मजीवों को मारने की क्षमता होती है साथ ही सहजन की फलियों और इसके बीजों का लसलसा पदार्थ पानी में घुलित कणों को अपनी ओर आकर्षित करता है जिससे कुछ समय में पात्र के ऊपरी हिस्से का पानी पीने योग्य हो जाता है। सूखाभांड गांव की वनवासी महिलाएं सहजन की परिपक्व फलियां एकत्र कर लेती हैं, फलियों को तोड़कर इसके बीजों को एकत्र कर लिया जाता है। और इन बीजों को एक साफ सूती कपड़े में डालकर पोटली तैयार कर ली जाती है। प्रत्येक दिन सुबह-शाम एक-एक बार इस पोटली को पानी से भरे पात्र के भीतर 30 सेकन्ड के लिये घुमाया जाता है, इन महिलाओं का मानना है कि ऐसा करने से पानी के भारी कण और सूक्ष्मजीव इस पोटली की सतह पर चिपक जाते हैं। बाद में पोटली से बीजों को बाहर निकाल लिया जाता है और अन्य साफ सूती कपड़े में लपेट दिया जाता है ताकि अगली बार इस पोटली के सहजन का पुनः उपयोग हो सके। 

आधुनिक विज्ञान तुलसी के द्वारा सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोके जाने की पुष्टि कर चुका है। सन् 1995 में एल्सवियर लिमिटेड  से प्रकाशित जर्नल के 29वें अंक में प्रकाशित एक शोधपत्र से प्राप्त परिणामों के अनुसार वास्तव में सहजन के बीजों में हल्के अणुभार वाले कुछ प्रोटीन्स होते हैं जिन पर धनात्मक आवेश होता है और ये प्रोटीन्स पानी में उपस्थित ऋणात्मक आवेश वाले कणों, जीवाणुओं और क्ले आदि को अपनी ओर आकर्षित करते हैं जिससे ना सिर्फ पानी शुद्ध होता हैं, बल्कि इसकी कठोरता भी सामान्य हो जाती है। ये शोध परिणाम आधुनिक विज्ञान में अब प्रकाशित हो रहे हैं लेकिन इसका आधार और उपयोग सदियों पहले से वनवासी करते चले आ रहे हैं।

“कई गांवों में लोग दही के साथ खस-खस के बीज भी मिलाते हैं, हिन्दुस्तानी सभ्यता में करीब 4000 सालों से इसे अलग-अलग तरह से इस्तेमाल में लाया जाता रहा है। करेयाम गांव के गोंड और भारिया वनवासी पीने के पानी को शुद्ध करने के लिए सहजन या मुनगा की फलियों और तुलसी की पत्तियों को मटके में डाल देते हैं। इस पात्र में पोखरों और झिरिया से एकत्र किया अशुद्ध या मटमैला जल डाल दिया जाता है। दो से तीन घंटों के बाद पात्र की ऊपरी सतह से पानी को निथारकर या एकत्र कर साफ सूती कपड़े से छानते हुए किसी अन्य पात्र में डाल दिया जाता है जो कि अब पीने योग्य हो जाता है।”

जामुन और अर्जुन की छाल भी असरदार

जामुन और अर्जुन की छाल भी असरदार,

सोर्स - जल चेतना 

जामुन और अर्जुन की छाल भी असरदार

चिमटीपुर, रातेड़ और मालनी जैसे गांवों के भारिया जनजाति के वनवासी जल शुद्धीकरण के लिए दूषित पानी में तुलसी की पत्तियां, जामुन की छाल और अर्जुन छाल का प्रयोग करते हैं। इन सबकी समान मात्रा लेकर पानी में डाल दिया जाता है, एक रात इसी तरह रखने के बाद अगले दिन एक सूती कपड़े की सहायता से इस पानी को छान लिया जाता है। यह पानी शुद्ध होता है और हर्बल जानकारों की मानी जाए तो यह पेट से जुड़ी समस्याओं के इलाज के लिए उत्तम माना जाता है, साथ ही हृदय के रोगियों के लिए अति उत्तम होता है। इसके अलावा पातालकोट में वनवासी पेयजल के रखरखाव के लिए पीतल या तांबे के बर्तनों का उपयोग करते हैं। प्लास्टिक के विपरीत पीतल या तांबा बैक्टीरिया को पनपने नहीं देता है।

अब वक्त आ चुका है, अब हमें मिलकर आधारभूत स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल जैसी व्यवस्थाओं की उपलब्धताओं पर कार्य करना होगा। जैसे-जैसे दुनियाभर में जनसंख्या दबाव बढ़ता जा रहा है, मूलभूत आवश्यकताओं की मांग भी तेजी से बढ़ रही है और ऐसे में पीने योग्य पानी के लिए त्राहि-त्राहि होना तय है। क्या हम पातालकोट के वनवासियों के पारंपरिक ज्ञान पर आधारित पेयजल सफाई युक्तियों पर कोई आधुनिक शोध कर इसे प्रमाणित कर इन वनस्पतियों को बतौर उत्पाद या आसानी से उपलब्ध संसाधन के तौर पर नहीं ला सकते? वनवासियों के पारंपरिक हर्बल ज्ञान को स्रोत मानकर इस पर गहन अध्ययन किया जाए तो निश्चित ही आमजन तक शुद्ध पेयजल आसानी से पहुंच जाएगा। बायोरेमेडिएशन जैसी तकनीकों द्वारा इस पारंपरिक ज्ञान का परीक्षण भी किया जाना चाहिए ताकि प्राप्त परिणाम वनवासियों के इस पारंपरिक हर्बल ज्ञान की पैठ दुनिया को दिखा सके, अनुभव करा सके। ये नुस्खे ना सिर्फ शुद्ध पानी प्राप्ति के लिए कारगर हैं। बल्कि पानी का प्राकृतिक ट्रीटमेंट होना बेहतर सेहत के लिए अनेक तरह से फायदेमंद भी है।

सोर्स - जल चेतना 

लेखक का संपर्क: डॉ. माणिक लाल गोयल,

सेक्टर एफ.एच. 369, स्कीम नम्बर 54,

विजय नगर, इंदोर, मध्य प्रदेश

-452010 9340538466, 9425382228

ईमेल: sunilgoyal1967@gmail.com

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