घाट

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घाट (पूर्वी तथा पश्चिमी) भारत के दक्षिण के पठार के पूर्वी एवं पश्चिमी किनारे पूर्वी घाट तथा पश्चिमी घाट के नाम से विख्यात हैं। भूगर्भशास्त्रियों के मतानुसार पठार का पश्चिमी भाग टूटकर अरब सागर में डूब गया तथा उसका किनारा प्रपाती ढलान के रूप में कन्याकुमारी तक फैला है। ताप्तो के दक्षिण में लगभग 250-300 मील तक इसकी औसत ऊँचाई 3000 फुट से 4000 फुट है जब कि चोटियाँ 4,500-5,000 फुट तक पहुंच जाती हैं। इस भाग में कटाफटा प्रपाती ढलान है जो सँकरे कोंकण तट में समाप्त होता है। गोआ के निकट घाट दीवार के समान खड़ा है जिससे होकर नदियों ने सँकरी एवं गहरी घाटियाँ बनाई हैं। गोआ के दक्षिण में लगभग 200 मील तक घाट 3,000 फुट से नीचा है किंतु नीलगिरि में पुन: उसक ऊँचाई 8,760 फुट तक पहुँच जाती है। लगभग 800 मील की लंबाई में केवल तीन दर्रे भोर घाट, थार घाट तथा पाल घाट हैं, जिनसे होकर यातायात मार्ग तट तक जाते हैं। इनमें पालघाट सबसे चौड़ा है।

पूर्वी घाट नदियों की घटियों के बीच टुकड़ों के रूप में है तथा इसकी औसत ऊँचाई कहीं भी 3,000 फुट से अधिक नहीं है। गोदावरी और कृष्णा के बीच लगभग 100 मील तक पूर्वी घाट नहीं है। उत्तर में महानदी एवं गोदावरी के बीच में प्राचीन चट्टानों के कटे फटे प्रदेश हैं। मध्य में कृष्णा तथा कावेरी के बीच नल्लमलै, वेल्लीकोंडा तथा पालकोंडा नाम की प्राचीन पर्वतशृंखलाओं के अवशेष हैं तथा दक्षिण में शेवारॉय तथा पांचमलाई के रूप में नाइस (gneiss) चट्टानों के भाग हैं। उड़ीसा के पूर्वी घाट सघन वनों से ढका पिछड़ा हुआ प्रदेश है। अन्य भागों में यद्यपि ऊँचाई अधिक नहीं है, तथापि कुछ भागों में अत्यधिक कटा फटा होने के कारण यातायात असंभव है। (प्रमिला वर्मा)

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