जलाक्रांत (Waterlogged) क्या है? अर्थ, परिभाषा, कारण, प्रभाव और महत्व

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जलाक्रांत (Waterlogged) क्या है? अर्थ, परिभाषा, कारण, प्रभाव और महत्व

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जलाक्रांत वह स्थिति है, जब किसी भूमि या मिट्टी में आवश्यकता से अधिक पानी जमा हो जाता है और मिट्टी के छिद्र पानी से भर जाते हैं। ऐसी स्थिति में पौधों की जड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे उनकी वृद्धि प्रभावित होती है।

सरल शब्दों में, जब किसी खेत या भूमि में लंबे समय तक अत्यधिक पानी भरा रहता है और मिट्टी संतृप्त हो जाती है, तो उसे जलाक्रांत या जलभराव कहा जाता है। जलाक्रांत भूमि कृषि, पर्यावरण और भूमि की उर्वरता के लिए एक गंभीर समस्या मानी जाती है।

जलाक्रांत की परिभाषा

भूमि या मिट्टी में अत्यधिक जल भर जाने तथा जड़ों के क्षेत्र में ऑक्सीजन की कमी होने की स्थिति को जलाक्रांत कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे Waterlogged या Waterlogging कहा जाता है।

जलाक्रांत कैसे होता है?

जलाक्रांत की स्थिति प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारणों से उत्पन्न हो सकती है।

  • अत्यधिक वर्षा - लगातार या अधिक वर्षा होने पर भूमि में पानी भर जाता है।

  • खराब जल निकासी - यदि खेत या भूमि से पानी बाहर निकलने की उचित व्यवस्था न हो, तो जलभराव हो जाता है।

  • अत्यधिक सिंचाई - आवश्यकता से अधिक सिंचाई करने पर मिट्टी जलाक्रांत हो सकती है।

  • भूजल स्तर का बढ़ना - भूजल सतह के ऊपर आने से भी जलभराव की समस्या उत्पन्न होती है।

  • बाढ़ - नदियों के उफान या बाढ़ के कारण लंबे समय तक भूमि में पानी जमा रह सकता है।

जलाक्रांत के प्रमुख कारण

  • अत्यधिक वर्षा

  • अनुचित सिंचाई

  • जल निकासी की कमी

  • नहरों से रिसाव

  • बाढ़

  • समतल एवं निम्न भूमि

  • शहरीकरण और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों का अवरुद्ध होना

जलाक्रांत के प्रकार

  • अस्थायी जलाक्रांत (Temporary Waterlogging) - कुछ समय के लिए जलभराव होना, जो पानी निकलने के बाद समाप्त हो जाता है।

  • स्थायी जलाक्रांत (Permanent Waterlogging) - जब भूमि लंबे समय तक जलमग्न रहती है और कृषि कार्य प्रभावित होते हैं।

कृषि में जलाक्रांत का प्रभाव

जलाक्रांत की स्थिति फसलों के लिए हानिकारक होती है।

प्रमुख प्रभाव

  • पौधों की जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिलती।

  • बीज अंकुरण प्रभावित होता है।

  • फसलों की वृद्धि धीमी हो जाती है।

  • उत्पादन और गुणवत्ता में कमी आती है।

  • जड़ सड़न (Root Rot) जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ता है।

पर्यावरण पर जलाक्रांत का प्रभाव

  • मिट्टी की उर्वरता में कमी

  • मृदा लवणता (Soil Salinity) बढ़ने की संभावना

  • मच्छरों और रोग फैलाने वाले कीटों का प्रजनन

  • जैव विविधता पर प्रभाव

  • जल प्रदूषण का खतरा बढ़ना

जलाक्रांत से होने वाली समस्याएँ

  • कृषि भूमि अनुपयोगी होना

  • किसानों की आर्थिक हानि

  • मिट्टी की संरचना का बिगड़ना

  • पेड़-पौधों का नष्ट होना

  • संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ना

जलाक्रांत की रोकथाम के उपाय

  • उचित जल निकासी व्यवस्था - खेतों और शहरी क्षेत्रों में प्रभावी ड्रेनेज सिस्टम विकसित करना।

  • संतुलित सिंचाई - फसलों की आवश्यकता के अनुसार ही सिंचाई करना।

  • वर्षा जल प्रबंधन - अतिरिक्त वर्षा जल का संग्रह और पुनर्भरण सुनिश्चित करना।

  • भूमि समतलीकरण - खेतों को समतल बनाकर पानी के ठहराव को कम करना।

  • जलभराव सहनशील फसलें - ऐसी फसलों का चयन करना जो जलभराव की स्थिति में भी बेहतर वृद्धि कर सकें।

जलाक्रांत के उदाहरण

  • मानसून के दौरान खेतों में लंबे समय तक पानी भर जाना।

  • बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की कृषि भूमि।

  • खराब जल निकासी वाले धान के अतिरिक्त खेत।

  • शहरी क्षेत्रों में भारी बारिश के बाद सड़कों और खाली भूखंडों में जलभराव।

जलाक्रांत का महत्व

जलाक्रांत की समस्या को समझना कृषि, जल संसाधन प्रबंधन और शहरी नियोजन के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रमुख उपयोग

  • कृषि प्रबंधन

  • सिंचाई योजना

  • भूमि संरक्षण

  • पर्यावरण प्रबंधन

  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण

जलाक्रांत (Waterlogged) वह स्थिति है, जिसमें भूमि या मिट्टी में अत्यधिक पानी जमा होने से पौधों की जड़ों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती और कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। यह समस्या अत्यधिक वर्षा, खराब जल निकासी, बाढ़ और अनुचित सिंचाई के कारण उत्पन्न होती है। प्रभावी जल निकासी, वैज्ञानिक सिंचाई प्रबंधन और वर्षा जल संरक्षण जैसे उपाय अपनाकर जलाक्रांत की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह कृषि उत्पादकता, पर्यावरण संरक्षण और सतत जल प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

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