पान

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पान इसी नाम की लताविशेष (Piper betle) का पत्ता है, जो भारत में सर्वत्र अतिथि की अभ्यर्थना का अत्यंत प्रचलित साधन है। अनुमान है कि इसका प्रसार जावा से हुआ। इसकी पैदावार उष्ण देश में सीली जमीन पर होती है। इसकी कृषि भारत, लंका और बर्मा में होती है। इसमें ताप और जल का समान महत्व है। भारत के विभिन्न प्रदेशों में इसकी खेती की विभिन्न विधियाँ हैं।

पान की लताओं की बड़ी सावधानी के साथ देखभाल करनी पड़ती है। इनमें कई प्रकार के रोग लग जाते हैं, जैसे : (1) पान के पत्तों पर काले दाग पड़ जाते हैं तथा इनका आकार धीरे धीरे बढ़ता है और पत्ते नष्ट हो जाते हैं; (2) पान के डंठलों का काला पड़ना और अंत में पत्तों का झड़ जाना; (3) पत्तों का सूखकर क्रमश: मुरझाने लगना; (4) पत्तों के किनारे किनारे लाली पड़ना; (5) किनारों पर पत्तों का मुड़ने लगना; (6) अंगारी (यह रोग संक्रामक है। यह लता की गाँठ में होता है जिससे लता सूखकर काली हो जाती है। लता में रोग होते ही उसे उखाड़ फेंकना चाहिए और जड़ की काफी मिट्टी भी फेंक देनी चाहिए, नहीं तो अन्य लताओं में भी रोग हो जाता है) तथा (7) गांदी, जिसमें लता की जड़ लाल हो जाती है और लता सूखने लगती है। इन रोगों में लता की मिट्टी में लहसुन का रस देना लाभदायक होता है।

सुश्रुत के अनुसार पान के अनेक लाभ हैं। यह सुगंधित, वायुहारी, धारक और उत्तेजक होता है। नि:श्वास को सुगंधित करता है और मुख के विकार नष्ट करता है। अनेक औषधों के अनुपान में पान का रस काम अता है। अधिक पान खाना हानिकारक है। अधिक पान मंदाग्निकारक है और दाँत, कान, केश, दृष्टि और शरीरबल का क्षयकारक है एवं पित्त और वायु की वृद्धि करता है। सिर के दर्द में पान के पत्तों को भिगो कर कनपटी पर रखना लाभदायक होता है। बच्चों के गुदा भाग में प्रयोग करने पर उनकी कोष्ठबद्धता दूर करता है। गाल और गले की सूजन में, स्तनपीड़ा और फोड़ों पर तथा अनेक अन्य रोगों पर वैद्यक में पान का प्रयोग विहित है।

भावप्रकाश के अनुसार पान सुपारी के सेवन से पहली बार बना हुआ रस विषतुल्य है, दूसरी बार भेदक और दुर्जर है तथा तीसरी बार बना हुआ रस अमृतोपम रसायन होता है। अतएव पान का वही रस सेवन करना चाहिए जो तीसरी बार चबाने पर निकलता है। प्रात:काल के पान में सुपारी अधिक, दोपहर के समय कत्था अधिक और रात में चूना अधिक खाना चाहिए (देखें तांबूल)।

(माधवाचार्य)

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