राँची

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राँची नगर बिहार राज्य के छोटा नागपुर पठार के 2,100 फुट ऊँचे स्थल पर बसा हुआ है। यह एक जिला भी है। 18वीं शती के प्रारंभ में कुछ गाँव और झोड़ियाँ ही यहाँ थीं। उस समय यहाँ के निवासियों की जीविका खेती, जंगली फलमूल, पशुओं का शिकार और मछलियाँ थीं। गवर्नर जनरल के प्रथम एजेंट, कैप्टन विल्किंसन, ने 1834 ई. में किशुनुर गाँव में अपना कार्यालय बनाया और डोरौडा में छावनी बनाई। तभी 'आर्ची' गाँव के नाम पर स्थान का नाम राँची पड़ा और उसका विकास शुरू हुआ। एक किंवदंती के अनुसार रंची नामक कोई आदिवासी मुँडा था जिसने एक गाँव बसाया और उसी के नाम पर इसका नाम पहले रंची पड़ा जो पीछे राँची हो गया।

गवर्नर जनरल के एजेंट पहले लोहरदगा में रहते थे। वहाँ से उनका कार्यालय 1842 ई. में राँची चला आया। राँची स्थापित होने के कुछ ही समय पहले 1831-32 ई. में आदिवासी कोल लोगों ने विद्रोह कर दिया था। इससे ऐसे स्थान का होना आवश्यक था, जो केंद्र में पड़ता हो और जहाँ से आवागमन में सुविधा हो। पीछे छोटा नागपुर मंडल का राँची केंद्र बन गया। 1914 ई. में ख्राष्टीय प्रचारक यहाँ आए और उन्होंने आदिवासियों के बीच ख्राष्टीय मत का प्रचार शुरू किया। बिहार प्रांत बनने के पश्चात्‌ 1912 ई. में बिहार सरकार की यह ग्रीष्मकालीन राजधानी बन गया। इसी वर्ष यहाँ महालेखाकार (एकाउंटैंट जनरल) का कार्यालय खुला। 1914 ई. में राँची के निकट नामकुम में राज्य वैक्सीन संस्था की स्थापना हुई। पीछे इसी स्थान पर लैक रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना हुई। प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात्‌ सैनिकों को रखने के लिए यह स्थान चुना गया और द्वितीय विश्वयुद्ध काल में पूर्वी कमान का प्रधान कार्यालय यहाँ स्थापित हुआ। स्वतंत्रता प्राति के पश्चात्‌ आस-पास में खनिजों के बाहुल्य और स्थान के स्वास्थ्यप्रद होने के कारण यह बहुत आकर्षक बन गया। इसके आसपास कोयले और लोहे की महत्वपूर्ण खानें हैं, जिससे नैशनल कोल डेवेलपमेंट कॉरपोरेशन और हेवी मेशिनरी कॉरपोरेशन, हिंदुस्तान स्टील लिमिटेड आदि की स्थाना हुई। चेकोस्लोवाकिया की सहायता से इन्सुलेटेड पदार्थों का कारखाना डेढ़ मील लंबे और पौन मील चौड़े क्षेत्रफल में यहाँ खुला है। इस कारखाने में पाँच टन भार की ढलाई एक बार में हो सकती है। इसकी आबादी अब बढ़कर 1,39,437 (सन्‌ 1961) हो गई है। यहाँ के आदिवासी अधिकांश हिंदू और शेष में आदिवासी, मुसलमान तथा क्रिश्चियन हैं। यहाँ हिंदी के अतिरिक्त ओराँव, उर्दू, बंगाली, मुड़ारी आदि भाषाएँ बोली जाती है। यह प्रवासियों का नगर है। यहाँ के आदिवासियों की रहन सहन, संस्कार संस्कृति आदि में बहुत अंतर आ गया है।

राँची झरनों का देश है। यहाँ कई जलप्रपात अपनी मनोहरता के कारण यात्रियों को आकर्षित करते हैं। यहाँ शिक्षा का प्रचार भी बड़ी शीघ्रता से हो रहा है। विश्वविद्यालय के अतिरिक्त कई महाविद्यालय, एक मेडिकल कालेज, एक इंजीनियरी कालेज (मेसरा में), लॉ कालेज, इंजीनियरी स्कूल और अनेक विद्यालय हैं। रूस के सहयोग से भारी मशीनरी के कारखाने के खुलने से इस नगर की रौनक और चहल पहल बहुत बढ़ गई है। शीघ्र ही, देश के बड़े औद्योगिक नगरों में इसका स्थान महत्व का हो जाएगा।

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