रँगाई (Dyeing)

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रँगाई (Dyeing) प्राय: सभी तंतुमय पदार्थों में जल अवशोषण की क्षमता होती है। यदि जल में कोई रंजक (dye) उपस्थित हो और उसे तुंतुमय पदार्थ के सपर्क में रखा जाए, तो जल के विलयन से रंजक निकलकर, तंतुमय पदार्थ से संबद्ध होकर, उसपर वितरित हो जाता है। इसके फलस्वरूप जल में रंजक की मात्रा कम हो जाती है और विलयन का रंग हलका हो जाता है। विलयन का विलोडित करने और तंतुमय पदार्थ को प्रक्षुब्ध करते रहने से उपर्युक्त क्रिया शीघ्र और एक रूप में संपन्न होती है। उपर्युक्त क्रिया में रंग ग्रहण किए हुए तंतुमय पदार्थ को रंजित पदार्थ, क्रिया को रँगाई या रंजन प्रक्रम (dyeing process) कहते है। रंजक के विलयनवाले पात्र को रंजककुंडिका (dye bath) तथा रँगाई के उपरांत बचे हुए विलयन को निर्गत (exhausted) रंजक विलयन कहते हैं। रँगाई की उपर्युंक्त सरलतम क्रिया में केवल विशिष्ट रासायनिक रंजक का उपयोग किया जा सकता है। रँगाई वास्तव में इतनी सरल क्रिया नहीं है जितनी उपर्युक्त उदाहरण से मालूम होती है। रँगाई में विशिष्ट तंतुमय पदार्थों की संतोषप्रद रूप से प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि रंजक के विलयन में कुछ अन्य पदार्थ भी डाले जाएँ। इन्हें विरंजक सहायक कहते हैं। इसे अतिरिक्त कुछ परिस्थितियों में तंतुमय पदार्थ में रंजक के उपयुक्त स्थिरीकरण तथा रंग के विकास के लिए कुछ विशिष्ट धातुओं के आयन की आवश्यकता होती है, जिन्हें रंगवंधक (mordants) कहते हैं। रंगवंधकों का उपयोग रँगाई के पूर्व अथवा बाद में, या रंजकों के साथ साथ, किया जाता है।

रंजकों के यौगिकों के अणुओं में धातुविशेष अभिन्न अंग के रूप में स्थित होता है। यदि रंगबंधक का उपयोग रँगाई के पूर्व करना होता है, तो उस दशा में तंतु, सूत या वस्त्र को रंगबंधक द्रव में पहले से निमज्जित कर लेते हैं। इसके लिए रंजक का जल में विलेय होना, अथवा जल के साथ महीन निलंबन के रूप में होना अत्यावश्यक है। रँगाई के उपरात प्रयुक्त रंगबंधक के प्रयोग की दशा में उन्हीं रंजकों का उपयोग किया जा सकता है, जो जल में विलेय होते हैं। रँगाई में कभी कभी रंजक की रासायनिक संरचना में परिवर्तन करना संभव होता है। ऐसा तभी किया जाता है जब रंजक जल में अविलेय होता है। रंजक की रासायनिक संरचना में उपयुक्त परिवर्तन उत्पन्न करके ऐसा परिवर्तित उत्पाद तैयार किया जाता है जिसका जल में परिक्षेपण (dispersion) बन सके। रँगाई में सूतों को परिक्षेपण में ऐसे निमज्जित किया जाता है कि रंजक सूत पर चिपक जाए। इसके बाद रंजित वस्तु का वायु में रखा जाता है। इससे परिवर्तित रंजक की रासायनिक संरचना प्रारंभिक संरचना में परिवर्तित होने से उत्प्रेरित होती है। ऐसी रँगाई में जल अविलेय, वैट (vat) रंजक का उपयोग होता है। ऐसी रँगाई पक्की होती है।

रँगाई की तीन रीतियाँ अधिक महत्व की हैं। एक रीति में तंतु की रँगाई के समय रंजक का निर्माण होता है। विशेष रासायनिक कारकों के जलीय विलयन में तंतु के निमज्जित करने से तंतु के ऊपर इन कारकों का महीन लेप चढ़ जाता है। ऐसे प्राप्त तंतुओं को निश्चित परिस्थितियों में गरम करने पर तंतु के स्तर पर स्थित कारकों की परस्पर क्रिया से वास्तविक रंजक का निर्माण होता है। इस प्रकार रँगाई रासायनिक रीति से संपन्न होती है। ऐसे रंजकों में प्रमुख रंजक ऐनिलीन ब्लैक है। सेलुलोस तंतुओं, सूत और रेयन के लिए यह विशेषरूप से उपयुक्त हैं। इससे लकड़ी की भी रँबाई की जा सती है। दूसरी रीति में सूत को रंजक के एक घटक में जलीय विजयन में निमज्जित कर, दूसरे घटक के जलीय विलयन में निमज्जित करते हैं। रंजकों के दोनों घटकों की पारस्परिक क्रिया से सूत पर रंग का विकास होता है। सूतदोनों घटकों की क्रिया से अविलेय रंजक बनता है। ऐसी रँगाई पक्की होती है। ऐसे रंजकों में पैरानाइट्रो ऐनिलीन रेड, ऐल्फा नैफ्थीलेमिन क्लारेट, ब्रैंथोल, नेफ्टॉल, नैफ्टाजोल प्रमुख हैं।

तीसरी रीति में जल में अविलेय ऐसे रंजकों का प्रयोग होता है जो सूत या वस्त्र के साथ रासायनिक प्रक्रिया द्वारा रग ग्रहण करते हैं। यहाँ रंग का विकास रासायनिक क्रिया द्वारा होता है। ऐसे रंजकों का पहले सूक्ष्म कणों में विभाजित, जलीय निलंबन तैयार करते हैं। ऐसे विलयन में सूत या वस्त्र को निमज्जित करने से रंग का विकास होता है। ऐसे रंजक सेलुलोस एस्टर के लिए अधिक उपयुक्त हैं। सामान्यत: ये प्रतिस्थापित ऐंथाक्विनोनॉयड या ऐंज़ो प्रकार के होते हैं।

आधुनिक रंगाई का उद्देश्य ऐसा रंजित पदार्थ तैयार करता है जिसपर एक सी वर्ण आभा उत्पन्न हो और उसपर धुलाई, धूप, वर्ष आदि का कोई प्रभाव न पड़े। रंगाई ऐसी है कि पूर्वनिश्चित रंग आभा से पूर्णतया मेल खाता हो। जिस प्रकार रंगाई के लिए निश्चित स्तर का निर्धारण किया जाता है, उसी प्रकार रंजकों में भी विशिष्ट गुणों का होना अत्यावश्यक माना जाता है। इसके लिए आदर्श रंजक ऐसा होना चाहिए कि रंगाई सरलतम रीति से उदासीन, या मंद अम्लीय, या मंद क्षारीय विलयनों में संपन्न हो जाए। रंगाई में रंजक की रंग आभा में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। रंजक विलयन की एक यह भी विशेषता होनी चाहिए कि तंतुओं में वह सरलता से प्रविष्ट हो जाए ताकि रंजित वस्त्र में एक सी रंग आभा प्राप्त हो।

आधुनिक रंगाई में आज बहुत प्रगति हुई है और वांछित रंग आभा का प्राप्त होना अब संभव हो गया है। आदर्श रंगाई के निम्नलिखित उदाहरण हैं :

(1) ऊन, या ऊनी वस्त्रों के लिए अम्लीय रंजकों के तीन वर्णसंयोजन का उपयोग। (2) प्रकाश, या सूर्यकिरणों में स्थायी रहनेवाले रजकों की शृंखला का विकास। (3) पक्के ऐज़ो रंजकों का निर्माण। (4) विलेय वैट रंजकों का विकास। (5) विलये रंगबंधक रंजकों की श्रृंखला का विकास। रंगाई केवल आदर्श रंजकों पर ही निर्भर नहीं करती वरन्‌ उसके लिए विशेष अनुभव की भी आवश्यकता होती है।

रंजक साधारणतया जल में विलेय होते हैं पर कुछ रंजक रँगने के समय विशेष उपचार द्वारा विलेय बनाए जाते हैं। रँगाई के बाद वे फिर अविलेय हो जाते हैं। विलेय रंजक तंतुओं की संरचना में कैसे प्रविष्ट कर जाते हैं इसका भौतिकीय और रासायनिक रीति से विश्लेषण हुआ है। यहाँ अवशोषण, लवणनिर्माण, हाइड्रोजन बद्धता से आभासी रासयनिक संयोजन, ईथर बंधन, या विशेष परिस्थितियों में केवल विलयन प्रभाव हो सकता है। अंतिम परिणाम यह होता है कि तंतु के ऊपर रंजक व्याप्त हो जाता है, या तंतु के साथ रंजित पदार्थ के रंग में कोई अंतर नहीं आता तो ऐसे रंग को पक्का रंग कहते हैं।

रासायनिक संरचना और व्यावहारिक उपयोगिता की दृष्टि से रंजकों को कई वर्गों में विभक्त किया गया है (देखे रंजक)। अम्लीय रंजकों में सल्फोनिक समूह का लवण रहता है। इससे ऊन, रेशम और नाइलॉन रंगे जाते हैं।

क्षारक रंजकों में क्षारक समूह के लवण रहते हैं। इनसे ऊन और रेशम रंगे जाते हैं। कपास सूत पर इनका प्रभाव नहीं पड़ता, सिवाय उस दशा में जब रंगबंधक का उपयोग हो।

क्रोम रंजकों में क्रोमियम यौगिकों के साथ रंजक व्यवहृत होता है। ये रजक ऊन के लिए बड़े अच्छे हैं और पक्का रंग देते हैं। क्रोमियम यौगिक रंगाई के पूर्व, या मध्य में, या बाद में डाला जा सकता है। इन्हें रंगबंधक रंजक भी कहते हैं। प्रत्यक्ष रंजक रेयन, रेशम और कपास में प्रयुक्त होते हैं। इन रंजकों में ऐज़ो समूह रहते हैं। इनका रंग पक्का नहीं होता पर ये अम्लों और क्षारों से जल्द आक्रांत होते हैं। सस्ता होने, सरलता से रँगे जाने और विभिन्न आभा उत्पन्न करने के कारण इनका व्यवहार व्यापक रूप से होता है।गंधक रंजकों में गंधक रहता है। इनसे सूती वस्त्र रंगे जाते हैं। धुलाई से इनका रंग जाता नहीं। प्रकाश से कुछ कम हो जाता है। यह सस्ता होता है और सामान्यत: काला, धूसर, या नीला रंग देता है।

बैट रंजक में अधिकांशत: नील, या ऐंथ्राक्विनोन किस्म के रंजक होते हैं। इनके अपचयन से विलेय रूप प्राप्त होता है और तंतु पर बैठाकर हवा में खुला रखने से विलेय रूप ऑक्सीकृत हो अविलेय रूप में बदल जाता है। इससे सूती रेशे और रेयन रंगे जाते हैं और प्रकाश तथा धुलाई के प्रति बड़े स्थायी होते हैं। ये कुछ महँगे पड़ते हैं।

ऐज़ो रंजक कपास और रेयन के लिए उपयुक्त हैं। इनसे चमकीले और धुलाई में स्थायी तथा प्रकाश में अपेक्षया स्थायी रंग प्राप्त होते हैं। ये जल में पूर्णतया अविलेय होते हैं और तंतु पर ही रंग का विकास होता है।

डाइएज़ो रंजक, या विकसित रंजक एक विशिष्ट प्रकार के प्रत्यक्ष रंजक हैं। इनमें डाइएज़ो समूह रहता है। इन रंजकों से रंगे जाने के बाद रेशे तो तनु खनिज अम्ल में ले जाते है जिसमें सोडियम नाइट्राइट रहता है। तंतु पर डाइएज़ो रंजक बनता है और उसे नैफ्थॉल, या इसी प्रकार के अन्य यौगिकों के साथ मिलाने से रंग विकसित होता है जिससे रंग पक्का हो जाता है। यह कपास, रेयन और रेशम रंगने में प्रयुक्त हो सकता है।

ऐसीटेट रेयन और नाइलॉन के रंगने में ऐसीटेट रेयन रंजक प्रयुक्त होते हैं। ये समान्यत: ऐज़ो, या ऐंथ्राक्विनोन वर्ग के होते हैं। इनमें सल्फोनिक समूह नहीं होता। ये शीघ्रता से प्रकीर्णित होकर कोंलायडी परिक्षेपण (dispersion) बनते हैं, जिसे सेलुलोस ऐसीटेट जल्द ग्रहण कर लेता है। (अभय सिन्हा)

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