खेत में रासायनिक जहर का भूजल और नदियों पर असर, प्राकृतिक खेती से रुकेगा जलनिधियों का क्षरण
नदियों के निर्मलीकरण और संरक्षण की जब भी बात होती है, समस्त विषय गंगा और कुछ अन्य नदियों की दशा सुधारने की चिंता तक सिमट जाता है। इसके कारण तमाम प्रयासों के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। यह समझने की आवश्यकता है कि गंगा हो या कोई अन्य नदी, वह अपने आप में एकीकृत इकाई नहीं होती, वरन अनंत जलधाराओं का समेकित स्वरूप होती है। अतः नदियों की हालात सुधारनी है तो पहले समझना होगा कि छोटी नदियों को सजल और निर्मल बनाए बिना बड़ी नदियों की दशा नहीं सुधर सकती। इसी को ध्यान में रखते हुए गोमती नदी के संरक्षण में संलग्न लोक भारती का प्रयास रहा है कि न केवल प्रमुख नदियों का संरक्षण किया जाय, बल्कि सहायक नदियों को भी संरक्षित एवं पुनर्जीवित किया जाए।
लोक भारती ने 2010 में नदियों की बिगड़ती दशा पर काम करने के भाव से लखनऊ में माँ गंगा समग्र चिंतन बैठक का आयोजन किया। इसमें देश भर से नदी पर कार्य करने वाले विशिष्ट जन एकत्र हुए। बैठक में नदियों की प्रकृति और हमारी बदलती जीवनशैली का अध्ययन भी किया गया और यह तय हुआ कि नदी की धारा में उतरकर काम करना होगा तभी कुछ परिणाम आएंगे। गोमती नदी लखनऊ की जीवनरेखा है। इसलिए इस अभियान की शुरुआत गोमती तटों से हुई। 2011 में गोमती अध्ययन यात्रा आयोजित की गई, इस यात्रा में मां गोमती की वास्तविक स्थिति का अध्ययन कर पाया गया कि अनेक स्थानों पर जलधारा समाप्त होने को है। इसके बाद स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए आवश्यक कार्यों की सूची बनाई गई। गोमती को आदिगंगा कहा गया है, इसके जल में तप की प्रकृति है। गोमती तट पर ही मनु-सतरूपा ने तपस्या कर पुत्र रूप में भगवान राम का वरदान पाया। देवराज इंद्र ने शापमुक्ति हेतु सम्पूर्ण गोमती तट पर 101 शिव मंदिरों की स्थापना की, इनमें से अधिकांश अस्तित्व में हैं और पूजे जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में अनेक स्थानों पर गोमती की धारा सूख गई और इसके वनक्षेत्र पर अतिक्रमण हो गया। यदि गोमती के क्षरण को थामने के समुचित प्रयास नहीं किए गए तो अपनी सहायक नदियों की तरह इसके भी दम तोड़ देने का खतरा है। सबकी प्यास बुझाने वाली गोमती आज सिसक रही है और प्रतीक्षा कर रही है कि कलयुग में भी कोई भगीरथ आए और उसके आंसू पोंछे।
नदी क्षेत्र से संबंधित ग्राम पंचायतें मनरेगा अथवा ऐसी किसी योजना से प्रति वर्ष नदियों के प्रवाह क्षेत्र की सफाई कराएं ताकि संपूर्ण नदी क्षेत्र अतिक्रमणमुक्त हो और जलप्रवाह के लिए अनुकूल स्थिति बने। नदी तट को वृक्षारोपण हेतु अतिक्रमणमुक्त किया जाए। नदी तट पर दोनों किनारे रासायनिक खेती को पूर्णतः प्रतिबंधित किए जाने की आवश्यकता है।
नमामि गंगे योजना के अंतर्गत गंगा के तटीय क्षेत्र में प्राकृतिक कृषि को प्रोत्साहित किए जाने की योजना संचालित की जा रही है। आवश्यकता है कि इसका विस्तार समस्त नदियों तक किया जाए।
रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंच रही है। नदियों के पानी को गंदा, प्रदूषित एवं अपवित्र करने में रासायनिक कृषि के संसाधन निर्मित उद्योगों की सबसे बड़ी भूमिका है। साथ में कॅडमीयम, आर्सेनिक, पारा, और सीसा जैसे अत्यंत जहरीले पदार्थ और विकिरण फैलाने वाले तत्व जैविक खेती से भूजल और नदियों में आते हैं। इसका अर्थ है कि अगर नदियों का पानी शुद्ध करना है तो रासायनिक खेती के संसाधन निर्मित करने वाले उद्योगों को बंद करना होगा। रासायनिक कृषि संसाधनों संकर बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशी दवा, खरपतवार नाशी दवा और ट्रैक्टर आदि का उपयोग करने वाली रासायनिक खेती पर भी पाबंदी लगानी होगी।
जब रासायनिक खाद भूमि में डाले जाते हैं तो उनमें मौजूद बहुत कम रासायनिक खाद्यतत्वों का जड़ें उपयोग करती हैं। शेष बहुतांश रासायनिक खाद के सारे जहरीले अवशेष भूमि में संग्रहित होते रहते हैं। ये तत्व वर्षा काल में वर्षा जल में घुलकर या सिंचाई के पानी में घुलकर आखिर में झरनों-नालों के माध्यम से नदियों के पानी में आ जाते हैं। नदियों का पानी इन अवशेषों से भयावह रूप से प्रदूषित हो जाता है। साथ में जहरीले कीटनाशी और फफूंदनाशी दवाओं के अवशेष, उसके साथ हार्मोन्स के और जहरीले खरपतवार दवाओं के अवशेष भी विशाल मात्रा में बारिश के पानी के साथ या सिंचन के पानी में घुलकर अंत में नदियों के पानी में आ जाते हैं और नदियों का पानी प्रदूषित करते रहते है। उसी तरह जैविक खेती में से भी जहरीले जड़ पदार्थ अवशेष के रूप में नदियों के पानी में घुलकर आते रहते हैं। जब तक रासायनिक खेती और जैविक खेती चलती रहेगी, तब तक गंगा, यमुना और अन्य सभी नदियों का जल इन अत्यधिक जहरीले प्रदूषकों से प्रदूषित, जहरीला और गंदा बनता रहेगा।
अगर सरकारों को और नदियों की निर्मलता और अविरलता पर काम करने वाले लोक भारती जैसे अनेक सेवाभावी या गैर सरकारी संगठनों को सही मायने में नदियों को प्रदूषण मुक्त करना है, तो रासायनिक खेती और जैविक खेती पर पाबंदी लगानी ही पड़ेगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो सरकार का और देशी-विदेशी फंडिंग एजेंसियों से आर्थिक मदद के रूप में मिलने वाला अरबों रुपया, जो अभी नदी जल शुद्धीकरण के लिये लग रहा है वह पूरा बरबाद होगा, हो रहा है। रासायनिक खेती और उससे भी खतरनाक जैविक खेती जब तक चलती रहेगी, तब तक गंगा, यमुना और अन्य नदियां कभी भी प्रदूषण मुक्त, औषधीय और पवित्र नहीं बनेगी। इस वास्तविकता को स्वीकार करना ही पड़ेगा।
डॉ. सुभाष पालेकर द्वारा विकसित प्राकृतिक कृषि में एक देशी गाय के गोबर गोमूत्र से तीस एकड़ की खेती होती है। इसमें कोई गोबर की खाद नहीं डालनी है, कंपोस्ट या वर्मी कंपोस्ट खाद नहीं डालनी है, कोई जैविक खाद बाजार से खरीद कर नहीं डाली जाती। साथ में कोई भी रासायनिक खाद बिल्कुल नहीं डालनी है। यानी खाद नाम की कोई चीज डालनी ही नहीं। उसी तरह जहरीली रासायनिक कीटनाशी दवा और फफूंदनाशी दवा नहीं छिड़कनी है, खरपतवारनाशी दवा का उपयोग नहीं करना है, कोई भी रासायनिक संजीवक यानी हार्मोन्स का उपयोग नहीं करना होता है।
प्राकृतिक खेती में किसान को कोई भी रसायन खरीदकर छिड़कना नहीं पड़ता। लेकिन इसके बाद भी उत्पादन रासायनिक खेती से और जटिल बाजार आधारित जैविक खेती से कम नहीं, बल्कि ज्यादा मिलता है। पहले ही साल से उत्पादन अधिक मिलने लगता है। रासायनिक खेती की तुलना में इस विधि में केवल दस प्रतिशत पानी और बिजली लगती है, दोनों की नब्बे प्रतिशत बचत है। क्योंकि हम भूमि से पानी कम लेते हैं, हवा से पानी ज्यादा लेते हैं। चूंकि हमारा प्राकृतिक कृषि उत्पादन जहरमुक्त, पोषण मूल्यों से भरपूर और औषधि तुल्य है, इसलिए शहरी उपभोक्ता हमें बड़ी खुशी से बाजार मूल्य से डेढ़ या दोगुने दाम दे देते हैं। सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की कोशिश कर रही है, लेकिन प्राकृतिक खेती विधि में किसान को इससे भी अधिक आय होती है। जब कोई रासायनिक खाद डालनी ही नहीं है, कोई रासायनिक जहरीली कीटनाशी दवा और खरपतवारनाशी दवा का उपयोग करना ही नहीं है, तो नदी के पानी में उनके अवशेष जाकर जल प्रदूषण का सवाल ही पैदा नहीं होता। मौजूदा कृषि और पर्यावरणीय संकटों से निबटने के लिये सरकारों के प्रयासों के साथ-साथ बहुत बड़े जन आंदोलन की भी आवश्यकता है।
- लेखक लोक भारती के राष्ट्रीय संपर्क प्रमुख एवं उ.प्र. कृषक समृद्धि आयोग के सदस्य हैं।
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