कृषि

इस्कुट, जिसे स्थानीय लोग चायोटे कहते हैं, मिज़ोरम के लोगों के लिए केवल एक सब्ज़ी नहीं, बल्कि उनकी रोज़ी-रोटी का ज़रिया रहा है।
कपास की खेती में कीटनाशकों और रसायनों का लगातार प्रयोग, छिड़काव के सुरक्षित साधनों की कमी और खेतिहर मज़दूरों में जानकारी के अभाव का असर इसे पैदा करने वालों की आंखों पर हो रहा है।
रामसूरत साहनी मखाना एकत्र करते हैं। उम्र बढ़ने की वजह से पानी में उतरना कठिन हो गया है, पर उनकी निपुणता अब भी कायम है।
हालात और जलवायु परिवर्तन की मार से कश्‍मीर में सिमटती जा रही है चावल की पारंपरिक खेती।
पुडुचेरी में श्री अरबिंदो सोसाइटी की अगुवाई में किसान कर रहे हैं कम लागत वाली होम्योपैथी खेती, जिसे एग्रो-होम्योपैथी के रूप में पहचान मिल रही है।
पंजाब के किसानों ने सिंचाई के लिए वैकल्पिक गीला-सूखा (Alternate Wetting and Drying) यानी एडब्लूडी विधि अपनाना शुरू कर दिया है।
तस्वीर में मौजूद टैंक में बारिश का पानी भरा हुआ है। मंदसौर ज़िले में गुरडिया प्रताप गांव के कालूराम पाटीदार के बेटे अर्जुन पाटीदार इस पानी की मदद से वर्मी कंपोस्ट बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
खमढ़ोडगी में सिंचाई क्रांति
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