प्राकृतिक खेती ले ही सुधरेगा खेती का भविष्य (छवि: ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद)
प्राकृतिक खेती ले ही सुधरेगा खेती का भविष्य (छवि: ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद)

महाराजगंज के युवा किसान नवरतन ने थामा प्राकृतिक कृषि का हाथ 

नवरतन तिवारी ने सुभाष पालेकर से प्रेरणा लेकर महाराजगंज में प्राकृतिक कृषि को अपनाया। 6 एकड़ भूमि पर विषमुक्त खेती का उत्कृष्ट मॉडल स्थापित किया।
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पद्मश्री से सम्मानित आदरणीय सुभाष पालेकर की अनेक दशकों की तपस्या के सुपरिणाम देश के विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई पड़ते रहते हैं। उनसे प्रेरणा लेकर सहस्त्रों युवा विषमुक्त कृषि के इस अभियान से जुड़ गए हैं। नवरतन तिवारी ऐसे ही एक युवा किसान हैं। बाबा गोरक्षनाथ की तपोस्थली क्षेत्र में नेपाल की सीमा से लगे जनपद महाराजगंज के सिसवा बाजार में 'सुभाष पालेकर कृषि केंद्र' के नाम से 6 एकड़ भूमि पर विषमुक्त कृषि का उत्कृष्ट मॉडल स्थापित है जिसका संचालन नवरतन तिवारी करते हैं।

नवरतन तिवारी ने तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर लगभग 6 वर्ष तक इस क्षेत्र में महानगर में सेवाएं दीं। 2019 में नवरतन यूट्यूब के माध्यम से ‘सुभाष पालेकर’ जी से जुड़े। इसके उपरांत नवरतन ने श्री पालेकर जी से अनेक अवसरों पर प्रत्यक्ष शिक्षा प्राप्त की। इस अभ्यास ने नवरतन के जीवन को नवीन दिशा प्रदान की। पिछले ४ वर्षों की कठिन तपस्या से नवरतन ने गौ आधारित प्राकृतिक कृषि का उत्कृष्ट मॉडल स्थापित किया है।

प्रारंभ में नवरतन ने भूमि सुपोषण की आवश्यकता पूर्ति हेतु 3 गौवंश की व्यवस्था की जो वंश वृद्दि से अब 15 हो गई है। नवरतन तिवारी जीवामृत को चमत्कार मानते हैं और बताते हैं कि कितनी भी जलवृष्टि हो जाए, इनके खेत की मेड़ से जल बाहर की ओर प्रवाहित नहीं होता और न ही जलभराव होता है। अपने अनुभव के आधार पर नवरतन कहते हैं कि भूजलस्तर सुधार के लिये प्राकृतिक कृषि सर्वोत्तम विधि है।

नवरतन ऋतु अनुसार समस्त सब्जियों, फलों , दलहन एवं अन्य फसलों का उत्पादन देशी बीजों के माध्यम से करते हैं। मुख्य फसलों में हल्दी, अदरक, गन्ना, लहसुन, प्याज, सहजन, केला, हरी मिर्च, बैंगन, सुरंग, कपास, पपीता, मौसमी, नासपाती, अमरूद, नींबू, गेंदा, अरहर, कद्दू, पेठा, लौकी, करेला, उड़द, मूंग, मक्का आदि का उत्तम उत्पादन लेते हैं।

कृषि उत्पाद प्रसंस्करण आत्मनिर्भर कृषि का आवश्यक अंग है। अतः नवरतन अधिकांश कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण भी करते हैं। गन्ने से गुड़, हल्दी पाउडर के साथ ही गौमाता के गोबर से धूपबत्ती बनाना आदि प्रमुख कार्य हैं। सुभाष पालेकर कृषि की संपूर्ण व्यवस्था सुचारू रहे, इस निमित्त नवरतन ने अपने कृषि श्रमिकों को भी प्रशिक्षित किया है।

वर्तमान में जब केंद्र सरकार सहित उत्तर प्रदेश सरकार भी विषमुक्त कृषि के विस्तार हेतु गंभीर है, इस प्रकार के उत्कृष्ट मॉडल की महत्ता बढ़ जाती है। संबंधित विभाग ऐसे कृषि मॉडलों को अपनी सूची में लें, इसकी आवश्यकता है। 

गौ आधारित प्राकृतिक कृषि विधि से मात्र विषमुक्त उत्पादन ही नहीं प्राप्त होता अपितु कृषि के माध्यम से प्रकृति संरक्षण का यह सर्वोत्तम माध्यम है। इस माध्यम से गौपालन को प्रोत्साहन मिलता है और यह विधि उत्पादन व्यय को न्यूनतम करते हुए कृषक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।

प्राकृतिक खेती का मुख्य आधार देसी गाय है। प्राकृतिक खेती कृषि की प्राचीन पद्धति है। यह भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है। प्राकृतिक खेती में रासायनिक कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है। इस प्रकार की खेती में जो तत्व प्रकृति में पाए जाते है, उन्हीं को खेती में कीटनाशक के रूप में काम में लिया जाता है।

प्राकृतिक खेती में कीटनाशकों के रूप में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फसल अवशेष और प्रकृति में उपलब्ध खनिज आदि द्वारा पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं। प्राकृतिक खेती में प्रकृति में उपलब्ध जीवाणुओं, मित्र किट और जैविक कीटनाशक द्वारा फसल को हानिकारक जीवाणुओं से बचाया जाता है। 

पिछले कई दशकों से खेती में काफी नुकसान देखने को मिल रहा है। इसका मुख्य कारण हानिकारक कीटनाशकों का उपयोग है। इसमें लागत भी बढ़ रही है। भूमि के प्राकृतिक स्वरूप में भी बदलाव हो रहे हैं, जो काफी नुकसान भरे हो सकते हैं। 

रासायनिक खेती से प्रकृति में और मनुष्य के स्वास्थ्य में काफी गिरावट आई है। किसानों की पैदावार का आधा हिस्सा उनके उर्वरक और कीटनाशक में ही चला जाता है। यदि किसान खेती में अधिक मुनाफा या फायदा कमाना चाहता है तो उसे प्राकृतिक खेती की तरफ अग्रसर होना होगा। खेती में खाने-पीने की चीजें उगाई जाती है जिसे हम उपयोग में लेते है। इन खाद्य पदार्थों में जिंक और आयरन जैसे कई सारे खनिज तत्व उपस्थित होते है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक होती है। रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से ये खाद्य पदार्थ अपनी गुणवत्ता खो देते है। जिससे हमारे शरीर पर बुरा असर पड़ता है।

रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से जमीन की उर्वरक क्षमता खो रही है। यह भूमि के लिए बहुत ही हानिकारक है और इससे तैयार खाद्य पदार्थ मनुष्य और जानवरों की सेहत पर बुरा असर डाल रहे है। 

रासायनिक खाद और कीटनाशक के उपयोग से मिट्टी की उर्वरक क्षमता भी बहुत कम हो गई है। मिट्टी के पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ गया है। इस घटती मृदा उर्वरक क्षमता को देखते हुए प्राकृतिक कृषि पद्धति का उपयोग जरूरी हो गया है।

अधिक उत्पादन पाने और लाभ कमाने की मृग-मरीचिका के कारण हमारे खेतों में दशकों से जारी रासायनिक उवरकों-कीटनाशकों के अत्यधिक या कहें कि अंधाधुंध प्रयोग से हमारे खाद्य पदार्थ जहरीले होते जा रहे हैं। हमारे शरीर में खाने के साथ ही बड़ी मात्रा में कीटनाशक दवाइयों का अंश जहर के रूप में जा रहा है। ये जहरीले रसायन हमारे शरीर में जाकर कोशिकाओं में धीरे-धीरे जमा होते रहते हैं और फिर कैंसर, शुगर और हाइपरटेंशन जैसी खतरनाक बीमारियों को जन्म देते हैं।

ऐसे में हमें नवरतन तिवारी जैसे अनेक कृषकों की आवश्यकता है। प्राकृतिक कृषि एवं युवा कृषकों के लिए नवरतन तिवारी जी एक आदर्श हैं। उन्हें अनंत शुभकामना। 

प्राकृतिक कृषि के संबंधित परामर्श हेतु नवरतन से 6516131643 पर संपर्क कर सकते हैं।

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