आखिर काम आये वही पुराने तालाब

मेजा के एक गाँव में 90 से अधिक तालाब



इलाहाबाद। कमजोर बारिश से इस साल खरीफ व रबी, दोनों सीजन में किसानों के लिये थोड़ा सा भी जल आशा की किरण नजर आ रहा है। पानी की कीमत क्या हो सकती है? इलाके में पानी का अतिभोग करने वाले किसानों को अब इसका ज्ञान हो रहा है।

यही नहीं जब इस साल पानी के तमाम स्रोत जवाब दे गए तो किसानों की नजर गाँव के पुराने, जर्जर तालाबों पर पड़ी। सूखे के संकट के समय भी तालाबों में पर्याप्त पानी देख गाँव वाले अचम्भित हुए।

कई वर्षों से किसी का भी ध्यान इन तालाबों की तरफ नहीं जा रहा था। किसानों ने पहली बार महसूस किया कि वास्तव में ये तालाब तो बड़े काम के हैं। ऐसे में जब चारों तरफ जल के तमाम स्रोत सूख रहे हैं, इस गाँव के तालाब जल ही जीवन है का अतुलनीय उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

इलाहाबाद जनपद में एक तहसील है, मेजा। इस तहसील के भइयाँ गाँव में 90 से अधिक तालाब हैं। अकेले एक ग्राम पंचायत में 90 तालाब पानी की जरूरत को रेखांकित करते हैं। एक सवाल मन में आता है कि मात्र एक गाँव में इतने अधिक संख्या में तालाबों की आवश्यता क्यों पड़ी होगी। इसका जवाब किसान मुन्ना सिंह से सुनिए- दरअसल यह लापर इलाक़ा है।

लापर का मतलब ही सूखाग्रस्त होता है। सैकड़ों साल पहले लापर क्षेत्र अकाल से जूझ रहा था। बेलन नहर थी नहीं। कुओं में भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता था, क्योंकि पानी का स्रोत सैकड़ों फिट नीचे है। थोड़ी बारिश हुई भी तो पानी नाले में बह जाता था। लेकिन किसानों ने एक खास बात पकड़ ली। यहाँ पर काली मिट्टी है।

काली मिट्टी की ख़ासियत होती है कि इस पर पानी टिकने की क्षमता अधिक होती है। गाँव वालों को इसका लाभ मिलने की उम्मीद जगी जब सूखा राहत के नाम पर पहले अंग्रेजी हुक़ूमत और बाद में आज़ाद हिन्दुस्तान की सरकार ने मज़दूरों को रोजी-रोटी देने के लिये तालाब खुदाई का कार्य प्रारम्भ करवाया।

सन् 1900 से 1970-71 तक तालाब बनाने का कार्य पूरा हुआ। राहत कार्य के नाम पर ही सही लेकिन एक-एक कर 90 से अधिक तालाब बनकर तैयार हो गए। इस तरह से भइयाँ गाँव को जल संरक्षण के लिये तालाब के रूप में नायाब तोहफ़ा मिला, जो आज किसानों के लिये वरदान के समान हैं। गाँव के दक्षिण भुंजवा तारा पर किसान रमेश्वर पटेल से मुलाकात हुई।

चेहरे पर कोई खास खुशी नहीं, कारण खरीफ सीजन में इस साल धान सिंचाई के अभाव में नष्ट हो चुकी है। रमेश्वर कहने लगे कि उस समय तालाब के पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिये इस उम्मीद में नहीं किया गया कि शायद नहर में पानी आ ही जाय।

बाद में जब पता चला कि मेजा जलाशय का पानी समाप्त हो गया है, इसलिये बेलन नहर से सिंचाई की उम्मीद करना ही बेकार है।

आखिर में रबी के सीजन में किसानों ने सोचा कि यदि पलेवा के लिये इन तालाबों से पानी नहीं लेंगे तो घर में खाने के लिये एक दाना भी पैदा नहीं होगा। आज किसानों ने तालाब से पानी निकालकर गेहूँ की बुआई की है। सूखे के संकट के समय तालाब का पानी वरदान बन गया है।

यह बात सुनने में असम्भव सी लगती है, लेकिन किसानों की मानें तो इस गाँव में एक दर्जन ऐसे तालाब हैं, जिनका पानी पिछले 30-40 वर्षों से कभी सूखा ही नहीं। कई तालाब 80 से 100 बीघे ज़मीन पर बने हैं। गहराई भी पर्याप्त है इनकी। कुछ तालाब ऐसे हैं कि मई-जून के मौसम में भी उनमें एक पोरसा पानी (8-9 फिट गहरा) शेष बचा रहता है।

भइयाँ गाँव के प्रधान राजेश्वर तिवारी कहते हैं कि तालाबों की साफ-सफाई की जरूरत है। जो तालाब गर्मी में सूख जाते हैं, मनरेगा योजना के तहत उनकी खुदाई कराई जाती है। हालांकि किसानों का दर्द अलग है। तालाबों के कैचमेंट एरिया पर कब्ज़ा हो गया है। बारिश का पानी तालाब में एकत्र नहीं हो पा रहा है।

तमाम तालाबों के बाँध को काटकर उस पर सड़कें बना दी गई हैं। किसानों को नहर से पानी मिल जा रहा था, इसलिये वह तालाबों को तवज्जों नहीं दे रहे थे। इस बाबत बेलन नहर के इंजीनियर दया सागर किसानों के प्रति नाराज़गी जाहिर करते हुए कहते हैं कि यहाँ पर लोग पानी का अतिभोग करते हैं। पानी का इस्तेमाल करने में भी जोर-ज़बरदस्ती होती है।

बहुत सारे किसान अनावश्यक पानी बहाते हैं। नहर से तालाबों तक जो नालियाँ बनाकर पानी को तालाब में भरने की सरकारी व्यवस्था थी, लेकिन किसानों ने इन नालियों पर भी कब्ज़ा कर लिया।

इसके बावजूद गाँव वाले तालाबों का शुक्रिया अदा करना नहीं भूलते। यह भी कहते नहीं थक रहे हैं कि सूखे के समय आखिर पुराने तालाब ही काम आये। ज्यादातर किसानों को इस वर्ष यदि खाने को अनाज मिलेगा तो इन्हीं तालाबों की वजह से।

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