बाढ़ - प्राकृतिक आपदा में आदमी
flood

जलवायु में आ रहे बदलाव के चलते यह तो तय है कि प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। इस लिहाज से जरूरी है कि शहरों के पानी का ऐसा प्रबन्ध किया जाये कि उसका जल भराव नदियों और बाँधों में हो, जिससे आफत की बरसात के पानी का उपयोग जल की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में किया जा सके। साथ ही शहरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिये कृषि आधारित देशज ग्रामीण विकास पर ध्यान दिया जाये। क्योंकि ये आपदाएँ स्पष्ट संकेत दे रही है कि अनियंत्रित शहरीकरण और कामचलाऊ तौर-तरीकों से समस्याएँ घटने की बजाय बढ़ेंगी ही? देश के ज्यादातर क्षेत्र में मानसून ने जोरदार दस्तक दे दी है। लेकिन ज्यादातर इलाके बाढ़ में डूबने की त्रासदी झेल रहे हैं। इस कारण ऊँचे इलाकों में तो हरियाली दिख रही है, किन्तु फसलें बौने के साथ ही चौपट हो गई हैं। असम के करीमगंज जिले में सुप्राकांधी गाँव ने जल समाधि ले ली है। कजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में 7 गैंडे समेत 90 वन्य प्राणी और 80 लोग अब तक मारे जा चुके हैं। बाढ़ का संकट झेल रहे असम का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी दौरा करना पड़ा है।

राजस्थान और गुजरात का भी बुरा हाल है। जयपुर एवं उदयपुर समेत 23 जिले बाढ़ग्रस्त घोषित किये गए हैं। 64 लोगों को अमर्यादित लहरों ने लील लिये हैं। लोगों को बचाने के लिये सेना को बुलाना पड़ा है। जालोर जिले की पथमेड़ा गोशाला में पानी भर जाने से 536 गायों की मौत हो गई है। करीब 14 हजार कमजोर वृद्ध व बीमार नर गोवंश बाढ़ की चपेट में हैं। यह केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया ने नौका से बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का जायजा लिया। प्रधानमंत्री के गृह प्रदेश गुजरात में और भी बुरा हाल है। यहाँ अब तक 218 लोग मारे जा चुके हैं। बनासकांठा जिले का बहुत बुरा हाल है। यहाँ एक परिवार के मकान में पानी भर जाने से 17 लोग काल के गाल में समा गए हैं।

बाढ़ की कमोबेश यही तस्वीर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िशा, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में है। बद्रीनाथ में भू-स्खलन जारी है। नदी-नाले उफान पर हैं। कई बड़े बाँधों के भर जाने के बाद दरवाजे खोल देने से त्रासदी और भयावह हो गई है। घरों, सड़कों, बाजारों, खेतों और रेल पटरियों के डूब जाने से अरबों रुपए की सम्पत्ति नष्ट हो गई है।

बाढ़ की त्रासदी अब देश में नियमित हो गई है। जो जल जीवन के लिये जीवनदायी वरदान है, वही अभिशाप साबित हो रहा है। इन आपदाओं के बाद केन्द्र और राज्य सरकारें आपदा प्रबन्धन पर अरबों रुपए खर्च करती हैं। करोड़ों रुपए बतौर मुआवजा देती हैं, बावजूद आदमी है कि आपदा का संकट झेलते रहने को मजबूर बना हुआ है। बारिश का 90 प्रतिशत पानी तबाही मचाता हुआ समुद्र में समा जाता है। यह सम्पत्ति की बर्बादी तो करता ही है, खेतों की उपजाऊ मिट्टी भी बहाकर समुद्र में ले जाता है। देश हर तरह की तकनीक में पारंगत होने का दावा करता है, लेकिन जब हम बाढ़ की त्रासदी झेलते हैं तो ज्यादातर लोग अपने बूते ही पानी में जान व सामान बचाते नजर आते हैं।

आफत की बारिश के चलते डूब में आने वाले अहमदाबाद, जयपुर, उदयपुर, बनासकांठा इत्यादि शहरों ने संकेत दिया है कि तकनीकी रूप से स्मार्ट सिटी बनाने से पहले शहरों में वर्षाजल के निकासी का समुचित ढाँचा खड़ा करने की जरूरत है, लेकिन हमारे नीति नियन्ता हैं कि कुदरत के कठोर संकेतों से आँखें चुराने का काम कर रहे हैं। जबकि उत्तराखण्ड में देवभूमि और कश्मीर में हम तबाही देख चुके हैं। इस स्थिति से गुरूग्राम, चेन्नई बंगलुरु और भोपाल भी गुजर चुके हैं, बावजूद प्रलंयकारी बाढ़ की आशंकाओं को नजरअन्दाज कर रहे हैं। बाढ़ की यह स्थिति शहरों में ही नहीं है, असम व बिहार जैसे वे राज्य भी झेल रहे हैं, जहाँ बाढ़ दशकों से आफत का पानी लाकर हजारों ग्रामों को डूबो देती है।

इस लिहाज से शहरों और ग्रामों को कथित रूप से स्मार्ट व आदर्श बनाने से पहले इनमें ढाँचागत सुधार के साथ ऐसे उपायों को मूर्त रूप की जरूरत है, जिससे ग्रामों से पलायन रुके और शहरों पर आबादी का दबाव न बढ़े?

आफत की यह बारिश इस बात की चेतावनी है कि हमारे नीति-नियन्ता, देश और समाज के जागरूक प्रतिनिधि के रूप में दूरदृष्टि से काम नहीं ले रहे हैं। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मसलों के परिप्रेक्ष्य में चिन्तित नहीं हैं। 2008 में जलवायु परिवर्तन के अन्तरसरकारी समूह ने रिपोर्ट दी थी कि धरती पर बढ़ रहे तापमान के चलते भारत ही नहीं दुनिया में वर्षाचक्र में बदलाव लाने वाले हैं। इसका सबसे ज्यादा असर महानगरों पर पड़ेगा। इस लिहाज से शहरों में जल-प्रबन्धन व निकासी के असरकारी उपायों की जरूरत है।

इस रिपोर्ट के मिलने के तत्काल बाद केन्द्र की तत्कालीन संप्रग सरकार ने राज्य स्तर पर पर्यावरण सरंक्षण परियोजनाएँ तैयार करने की हिदायत दी थी। लेकिन देश के किसी भी राज्य ने इस अहम सलाह पर गौर नहीं किया। इसी का नतीजा है कि हम निरन्तर जल त्रासदियाँ भुगतने को विवश हो रहे हैं। यही नहीं शहरीकरण पर अंकुश लगाने की बजाय, ऐसे उपायों को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे उत्तरोत्तर शहरों की आबादी बढ़ती रहे। यदि यह सिलसिला इन त्रासदियों को भुगतने के बावजूद जारी रहता है तो ध्यान रहे, 2031 तक भारत की शहरी आबादी 20 करोड़ से बढ़कर 60 करोड़ हो जाएगी। जो देश की कुल आबादी की 40 प्रतिशत होगी। ऐसे में शहरों की क्या नारकीय स्थिति बनेगी, इसकी कल्पना भी असम्भव है?

वैसे, धरती के गर्म और ठंडी होते रहने का क्रम उसकी प्रकृति का हिस्सा है। इसका प्रभाव पूरे जैवमण्डल पर पड़ता है, जिससे जैविक विविधता का आस्तित्व बना रहता है। लेकिन कुछ वर्षों से पृथ्वी के तापमान में वृद्धि की रफ्तार बहुत तेज हुई है। इससे वायुमण्डल का सन्तुलन बिगड़ रहा है। यह स्थिति प्रकृति में अतिरिक्त मानवीय दखल से पैदा हो रही है। इसलिये इस पर नियंत्रण सम्भव है।

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन समिति के वैज्ञानिकों ने तो यहाँ तक कहा था कि तापमान में वृद्धि न केवल मौसम का मिजाज बदल रही है, बल्कि कीटनाशक दवाओं से निष्प्रभावी रहने वाले बीषाणुओं-जीवाणुओं, गम्भीर बीमारियों, सामाजिक संघर्षों और व्यक्तियों में मानसिक तनाव बढ़ाने का काम भी कर रही है। साफ है, जो लोग एक सप्ताह से ज्यादा दिनों तक बाढ़ का संकट झेलने को अभिशप्त हैं, वह जरूर सम्भावित तनाव की त्रासदी को भोग रहे होंगे?

दरअसल, पर्यावरण के असन्तुलन के कारण गर्मी, बारिश और ठंड का सन्तुलन भी बिगड़ता है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य और कृषि की पैदावार व फसल की पौष्टिकता पर पड़ता है। यदि मौसम में आ रहे बदलाव से पाँच साल के भीतर घटी प्राकृतिक आपदाओं और संक्रामक रोगों की पड़ताल की जाये तो वे हैरानी में डालने वाले हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव से ‘हिट स्ट्रेस हाइपरथर्मिया’ जैसी समस्याएँ दिल व साँस सम्बन्धी रोगों से मृत्यु दर में इजाफा हो सकता है। पश्चिमी यूरोप में 2003 में दर्ज रिकॉर्ड उच्च तापमान से 70 हजार से अधिक मौतों का सम्बन्ध था। बढ़ते तापमान के कारण प्रदूषण में वृद्धि दमा का कारण है।

दुनिया में करीब 30 करोड़ लोग इसी वजह से दमा के शिकार हैं। पूरे भारत में 5 करोड़ और अकेली दिल्ली में 9 लाख लोग दमा के मरीज हैं। अब बाढ़ प्रभावित समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दमा के मरीजों की और संख्या बढ़ना तय है। बाढ़ के दूषित जल से डायरिया व आँख के संक्रमण का खतरा बढ़ता है। भारत में डायरिया से हर साल करीब 18 लाख लोगों की मौत हो रही है। बाढ़ के समय रुके दूषित जल से डेंगू और मलेरिया के मच्छर पनपकर कहर ढाते हैं। तय है, बाढ़ थमने के बाद, बाढ़ प्रभावित शहरों को बहुआयामी संकटों का सामना करना होगा।

बहरहाल जलवायु में आ रहे बदलाव के चलते यह तो तय है कि प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। इस लिहाज से जरूरी है कि शहरों के पानी का ऐसा प्रबन्ध किया जाये कि उसका जल भराव नदियों और बाँधों में हो, जिससे आफत की बरसात के पानी का उपयोग जल की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में किया जा सके। साथ ही शहरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिये कृषि आधारित देशज ग्रामीण विकास पर ध्यान दिया जाये। क्योंकि ये आपदाएँ स्पष्ट संकेत दे रही है कि अनियंत्रित शहरीकरण और कामचलाऊ तौर-तरीकों से समस्याएँ घटने की बजाय बढ़ेंगी ही?

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