बाढ़ से तबाही

पूर्वांचल की इस बाढ़ ने शहरों और गाँवों तक में जीवन जीना मुहाल कर दिया है। लोग किसी तरह जी रहे हैं। रात में आई बाढ़ की वजह से जान-माल के नुकसान का आकलन भी असम्भव है। बाढ़ में फँसे 12 लाख लोगों तक राहत सामग्री पहुँचाई जा रही है, लेकिन यह राहत सामग्री बाढ़ में फँसे लोगों के लिये ऊँट के मुँह में जीरा के समान है।

कोसी के बाढ़ से बचते लोग‘बाढ़ तो हमारी जिन्दगी का अभिन्न हिस्सा है। हम तो गंगा मइया की गोद में ही रहते हैं, लेकिन इस बार की बाढ़ का अलग रूप है। एक महीना हो गया, बाढ़ का पानी अब तक रुका हुआ है।’ हसनपुरा गाँव के निवासी प्रमोद राय ने यह बात कही। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले का यह गाँव फिलहाल बाढ़ के पानी से घिरा है। राय बताते हैं, ‘दैनिक जरूरतों की चीजों को प्राप्त करना भी हमारे लिये कठिन हो गया है।’ सामने की सड़क की ओर संकेत करते हुए वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ के तहत बनी सड़क पर 15 फीट पानी है। सुबह-सबेरे एक बार नाव आती है, उसी नाव से हमलोग नजदीक के बाजार जाते हैं। उसी नाव से शाम होते-होते वापस लौट आते हैं।

हसनपुरा गाँव के ही राजेश यादव बताते हैं, ‘अब तो बाढ़ के साथ हमने रहना सीख लिया है।’ तभी जोर-जोर से आवाज आने लगती है। सभी उस ओर भागते हैं। वहाँ पहुँचने पर पता चलता है कि एक साँप निकल आया है। वहाँ खड़े एक व्यक्ति ने कहा, ‘‘यह कोबरा प्रजाति का साँप है। पानी में तैरते-तैरते काफी थका दिख रहा है। वह भाग भी नहीं पा रहा है, इसलिये चिढ़ा हुआ है। उसके पास जाना खतरनाक है।’’ आगे उस व्यक्ति ने कहा कि बलिया जिले के दोआब में लोगों का जीवन फिलहाल कुछ ऐसा ही है। वे इस बाढ़ से थक हार गए हैं।

दरअसल, पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में अगस्त महीने में आई बाढ़ ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि प्रकृति पर किसी का नियंत्रण नहीं है। आँकड़ों के हिसाब से 2013 की बाढ़ 1978 में आई बाढ़ के बाद सबसे भयानक बाढ़ है। इसमें पूर्वांचल की लगभग सभी नदियाँ खतरे के निशान से करीब पाँच-छह फीट ऊपर बह रही थी। इलाहाबाद से लेकर बलिया तक सभी जिले पानी में डूबे रहे। गाजीपुर जिले के 60 फीसदी गाँव बाढ़ की चपेट में रहे। जिले का सेमरा गाँव अपना अस्तित्व ही गँवा बैठा है। वहीं जिले का पुरैना गाँव कटान से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। गाँव के लोग बेघर हो गए हैं। बलिया जिले के दोआब में लोगों का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। गंगा के किनारे परवल की खेती करने वाले रामकृपाल कुशवाहा बताते हैं कि इस बार फसल अच्छी थी, लेकिन अचानक आई बाढ़ ने सब बर्बाद कर दिया। हैण्डपम्प से निकलने वाले पानी को दिखाते हुए वे कहते हैं कि पानी इतना गन्दा है कि पीते ही लोग बीमार हो जाएँगे। इसलिये उन्हें उबाल कर पीना पड़ता है। वे बताते हैं कि फसल बर्बाद हो गई। पीने के पानी का संकट है। पशुओं के लिये चारे की समस्या है। खैर, इन सभी समस्याओं में हम जीना सीख गए हैं, लेकिन बाढ़ के बाद फैलने वाली बीमारी बड़ी समस्या है। वाराणसी के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. प्रदीप कुमार राय बताते हैं कि बाढ़ के बाद होने वाली ज्यादातर बीमारियाँ गन्दे पानी के कारण होती हैं। ऐसी स्थिति में वे लोगों को उबाल कर पानी पीने की सलाह दे रहे हैं।

इन इलाकों में पहली अगस्त को गंगा का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर आया। फिर दो तीन दिनों में ही पानी कम हो गया, परन्तु हफ्ते भर बाद एक बार फिर पानी बढ़ने लगा। जल्द ही नदी का पानी खतरे के निशान के ऊपर पहुँच गया। दरअसल, पहली बार हिमालय क्षेत्र में भारी बारिश के कारण नदी का जलस्तर बढ़ा। दूसरी बार बाढ़ के पीछे की वजह प्रदेश के मध्य भाग में हुई भारी बारिश और यमुना व उसकी सहायक नदियों के द्वारा लाया गया जल था। इससे जान माल को काफी क्षति पहुँची है। वाराणसी के भगवानपुर इलाके में रहने वाले डिग्री कॉलेज के प्रधानाचार्य हरिनिवास पाण्डे कहते हैं, ‘‘1978 के बाद गंगा में इतनी बाढ़ आई ही नहीं थी। लोगों ने मान लिया था कि गंगा और उसकी सहायक नदियों पर इतने बाँध बनाए जा चुके हैं कि अब बाढ़ आने की कोई सम्भावना नहीं बची है, लेकिन गंगा मइया ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनको किसी बाँध में नहीं बाँधा जा सकता है।’’ आगे वे कहते हैं कि जिन लोगों ने गंगा क्षेत्र में आकर घर बना लिया है, उनको इस बाढ़ ने सीख दे दी है।

राज्य सरकार की ओर से राहत और बचाव कार्य का निरीक्षण करने आये एल. वेंकटेश्वरलू बताते हैं कि बाढ़ की वजह से 56 करोड़ रुपए के नुकसान का त्वरित अनुमान है। इसमें 12 लाख से अधिक लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।बाढ़ से गाँव ही नहीं, शहर के लोग भी बेहाल हैं। वाराणसी के नितिन कुमार से बातचीत हुई तो उन्होंने साकेत नगर कॉलोनी और रोहित नगर की स्थिति बताते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हमारा पूरा परिवार पिछले एक महीने से छत पर रहने को मजबूर है। नाले का पानी पहले तल तक आ चुका है। सीवर की गन्दगी बीमारियाँ फैला रही हैं। बाढ़ का पानी घुस आने के कारण प्रशासन ने बिजली काट रखी है। पीने के पानी की घोर किल्लत है। गन्दगी जहाँ-तहाँ फैली हुई है।’’ संकट की इस घड़ी में प्रशासन भी सभी जिलों में मुस्तैदी में जुटा है। वहीं मल्लाहों का कहना है कि बाढ़ के समय और तो कोई कमाई होने से रही। इसलिये वे लोग भी प्रशासन के निर्देश पर दिन-रात बाढ़ में फँसे लोगों को राहत सामग्रियाँ पहुँचाने में व्यस्त हैं।

वाराणसी के जिलाधिकारी प्रांजल यादव से बात हुई तो उन्होंने इस बात को स्वीकार की गलतियाँ हुई हैं। माननीय उच्च न्यायालय ने दशक भर पहले आई बाढ़ के बाद ही यह निश्चित कर दिया था कि बाढ़ प्रभावित इलाके के 200 मीटर के अन्दर किसी प्रकार का कोई निर्माण कार्य नहीं होगा। इसके बावजूद यहाँ ढेरों मकान बने हैं। प्रांजल आगे कहते हैं, ‘‘संकट की घड़ी में लोगों तक राहत पहुँचाना हमारा पहला उद्देश्य है। दोषियों के खिलाफ बाद में कार्रवाई की जाएगी।’’ वाराणसी के ग्रामीण क्षेत्र टिकरी, तारापुर और सरापंडगरी में गंगा पर बने तटबन्ध 24 अगस्त को टूट गए। इस कारण आस-पास के गाँव रातों-रात बाढ़ की चपेट में आ गए। केन्द्रीय जल आयोग ने इस बात को स्वीकार किया है कि पहले बाढ़ का पानी इन गाँवों में पूरब की तरफ से प्रवेश करता था। पानी बढ़ने की रफ्तार भी 2.3 सेमी. हुआ करती थी, लेकिन इस बार पानी दक्षिण की तरफ से आया है और उसकी रफ्तार भी पहले की अपेक्षा काफी अधिक थी। गाँवों के साथ-साथ शहरी इलाके भी रातों-रात डूब गए। सबसे बुरी तरह से प्रभावित वाराणसी के सामने घाट का इलाका रहा। लोगों के घरों में 10 फीट की ऊँचाई तक पानी भर गया था।

नदियों के आसपास अवैध खनन ने भी बाढ़ की स्थिति को भयावह बना दिया है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग में शोधरत देवेश कुमार बताते हैं कि नदियों पर शोध के दौरान उन्होंने पाया है कि अवैध खनन और भूमि समतल करने के नाम पर मिट्टी की कटाई की जा रही है। इससे नदियों की चौड़ाई बढ़ गई है। गोमती नदी का उदाहरण देते हुए देवेश बताते हैं कि कैथी और भदहा गाँव के किनारे खनन माफिया भोले-भाले किसानों को मूर्ख बनाकर पीली मिट्टी का अवैध खनन वर्षों से कर रहे हैं। परिणामस्वरूप 40 फीट गहरी खाई यहाँ बन गई है। अब बाढ़ आने से कैथी गाँव द्वीप की तरह दिखाई दे रहा है। गाँव के लोगों को बाहर आने-जाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

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