भगीरथ कार्य करने की तैयारी
प्रस्तावः जलाधिक्य वाले क्षेत्रों से सूखे इलाकों को पानी पहुंचाने के लिए 9,600 किलोमीटर में 30 संपर्क चैनलों के जरिए 37 नदियों को जोड़ना, इसमें 5.6 करोड़ टन सीमेंट और 20 लाख टन इस्पात लगेगा व 32 बांध जुड़ेंगे।

उद्देश्य: 12,500 किलोमीटर लंबी नहरों के जाल के जरिए 3.4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई तथा 101 जिलों व पांच महानगरों की प्यास बुझाने को 173 अरब घनमीटर (बीसीएम) पानी पहुंचाना।

लाभ: संग्रह क्षेत्रों और नहरों से आगे बढ़ता पानी का यह प्रवाह -जैसे घाघरा को नेपाल के चीसापानी से 431 किलोमीटर दूर बहती यमुना से जोड़ना या ओडीसा की महानदी को 932 किलोमीटर दूर बहती आंध्र प्रदेश की गोदावरी से जोड़ना - प्रति वर्ष 34,000 मेगावाट बिजली और 3.7 करोड़ मानव-वर्ष का रोजगार सृजित करेगा।

लागत: 5,60,000 करोड़ रुपया। यह रकम इस साल (2003) सरकार के कुल राजस्व की दोगुनी और पिछले 52 सालों में सिंचाई पर खर्च 58,000 करोड़ रुपए की 10 गुनी है। इसका मतलब होगा देश के मौजूदा सकल घरेलू उत्पाद का 2 फीसदी 10 साल तक लगातार इसी पर खर्च करना।

यह सब कुछ एक तरह से भगीरथ - जिन्होंने गंगा का मार्ग बदल दिया - के मिथक को चुनौती देने जैसा है। नदियों को जोड़ने की बात अगर कल्पनातीत लग रही है तो देश का जल संकट भी आज कल्पना के सारे आयाम पार कर चुका है। देश के 598 में से औसतन 19 जिले हर साल सूखे की चपेट में आते हैं जबकि 83 जिलों की 4 करोड़ हेक्टेयर जमीन बाढ़ में जलमग्न हो जाती है। पिछले साल अगस्त में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पार्टी में शामिल राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लेकर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिलीं। विषय था - सूखे से निबटने में मदद। कुछेक दिन बाद बिहार की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने भी वाजपेयी से भेंट की। उनकी शिकायत उत्तर बिहार में बाढ़ और दक्षिण बिहार में सूखे को लेकर थी। इससे भी बदतर, देश के 150 जिले और दिल्ली तथा चेन्नै जैसे महानगर पीने के पानी की समस्या झेल रहे हैं - कोई कम तो कोई ज्यादा। और समस्या बिगड़ ही रही है। सन् 2050 तक देश की संभावित 1.65 अरब आबादी के लिए भारत को अनाज की दोगुनी उपज यानी 45 करोड़ टन की जरूरत होगी। और पानी तो 634 बीसीएम के मुकाबले 1,447 बीसीएम चाहिए होगा।

परियोजना कितनी भी जटिल हो पर उसकी अवधारणा बड़ी साफ है। दुनिया के पूरे भू-भाग का 2.45 फीसदी और मीठे पानी के संसाधनों का 4 फीसदी भारत के पास है। ऐसे में यहां सैद्धांतिक तौर पर जल संकट के हालात नहीं बनने चाहिए थे, लेकिन विषम भौगोलिक रचना और दूरी इसके समान वितरण में आड़े आकर खड़ी हो जाती है। भारत में वर्षा और हिमपात के रूप में सालाना 4,000 बीसीएम पानी धरती पर गिरता है। इसमें से 1,869 बीसीएम बहकर नदियों तक पहुंचता है और इसके भी एक तिहाई हिस्से का ही हम उपयोग कर पाते हैं। इस तरह, पानी की बड़ी मात्रा बहकर समुद्र में चली जाती है। जल संकट कोई एकाएक नहीं आया है। यह वर्षों की लापरवाही का नतीजा है। सिंचाई पर निवेश 1950 के दशक में 22.4 फीसदी के मुकाबले घटकर 2000 में 6 फीसदी आ गया है। इतना ही नहीं, पिछले 10 साल में कोई नई सिंचाई परियोजना भी नहीं आई है। मौजूदा समाधान के रूप् में सामने आया नदियों को जोड़ने का विचार भी एकदम नया कतई नहीं है।

पहली बार 1972 में गंगा और कावेरी को जोड़ने का सुझाव पूर्व केन्द्रीय मंत्री केएल राव ने दिया था और 1977 में एक पायलट कैप्टन दस्तूर ने प्रमुख नदियों को जोड़ने के लिए नहरों की माला बनाने का सुझाव रखा। दोनों ही सुझाव अव्यावहारिक पाए गए। उसके बाद 1980 में राष्ट्रीय परिदृश्य योजना ने उन सुझावों पर दोबारा गौर किया। राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (एनडब्ल्यूडीए) जुलाई, 1982 में ही बनने के बावजूद सर्वानुमति के अभाव में वह व्यावहारिकता अध्ययन के 30 में से 6 कार्यों को ही अंजाम दे पाई है। और पिछले साल, स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर अपने उद्बोधन में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उल्लेख न किया होता तो नदियों को जोड़ने का विचार भी एक तरह से ‘अनुपयोगी सुझावों’ में ही शुमार हो चुका था। इसी उल्लेख के दिशा-निर्देश के लिए तमिल संगठन द्रविड़ पेरावै ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगा दी। इस पर कोर्ट ने राज्यों से हलफनामा मांगते हुए केन्द्र को परियोजना 10 साल में पूरी करने के लिए टास्क फोर्स बनाने के निर्देश दिए, जबकि 1982 के प्रस्ताव में इसे 45 साल में पूरा करने का सुझाव था।

इस न्यायिक सक्रियता ने सियासी हलकों में भी हलचल मचा दी। वाजपेयी ने इस परियोजना के पक्ष में प्रतिबद्धता जताते हुए इस पर राष्ट्रीय सहमति बनाने की मांग करके नई पहल की। सोनिया ने उस पर सहमति जता दी, जिसका मतलब था कांग्रेस शासित 16 राज्यों का समर्थन। इतनी हलचल ने परियोजना को प्राथमिकता सूची में काफी ऊपर पहुंचा दिया। सरकार ने दिसंबर, 2002 में पूर्व ऊर्जा मंत्री सुरेश प्रभु के नेतृत्व में तीन सदस्यीय टास्क फोर्स भी बना दी। लेकिन सपनों की यह परियोजना क्या वाकई साकार हो सकती है? पूर्व जल संसाधन सचिव और टास्क फोर्स के सदस्य सी डी थत्ते का मानना है कि ‘यह तकनीकी तौर पर पूरी तरह संभाव्य है।’

परियोजना कितनी भी जटिल हो पर उसकी अवधारणा बड़ी साफ है। दुनिया के पूरे भू-भाग का 2.45 फीसदी और मीठे पानी के संसाधनों का 4 फीसदी भारत के पास है। ऐसे में यहां सैद्धांतिक तौर पर जल संकट के हालात नहीं बनने चाहिए थे, लेकिन विषम भौगोलिक रचना और दूरी इसके समान वितरण में आड़े आकर खड़ी हो जाती है। भारत में वर्षा और हिमपात के रूप में सालाना 4,000 बीसीएम पानी धरती पर गिरता है। इसमें से 1,869 बीसीएम बहकर नदियों तक पहुंचता है और इसके भी एक तिहाई हिस्से का ही हम उपयोग कर पाते हैं। इस तरह, पानी की बड़ी मात्रा बहकर समुद्र में चली जाती है।

भारत में वर्षा का वार्षिक औसत 1,170 मिलीमीटर है पर पश्चिम में इसका औसत 100 मिलीमीटर तो पूर्व में 11,000 मिलीमीटर है। मसलन, ब्रह्मपुत्र-मेघना-बराक बेसिन में 677 बीसीएम वर्षा के बावजूद विषम भौगोलिक स्थितियों के चलते 24 बीसीएम का ही उपयोग हो पाता है। दूसरी ओर, साल-दर-साल सूखे के चलते 207 जिलों में भू-जल स्तर 6 मीटर नीचे तक खिसक गया है। दूसरे, 70 फीसदी जल मानसून के 100 दिनों के भीतर ही जमीन पर आ लगता है जबकि उसकी जरूरत पूरे 365 दिन होती है। परियोजना का मकसद इन्हीं विसंगतियों को दूर करने का है।

पहले भी ऐसा हो चुका है। 19वीं सदी में पेरियार परियोजना के तहत पेरियार बेसिन से पानी वैगाई में पहुंचाया गया, सिंधु के बेसिन में पानी रावी से व्यास और व्यास से सतलुज में ले जाया गया, या फिर नई तेलुगु गंगा परियोजना को ही लें, जिसके तहत कृष्णा का पानी पेन्नार और पलार नदी तक पहुंचाया जाना है। दूसरे देशों की भी नजीरें हैंः चीन की तीन घाटी परियोजना और टेक्सास का पानी न्यू मैक्सिको ले जाने की टेक्सास योजना के पीछे भी ऐसी ही समस्याएं थीं। इसकी सोच स्पष्ट है: जल प्रवण क्षेत्रों से पानी स्टोरेज बांधों और नहरों के जरिए सूखे क्षेत्रों तक पहुंचाना।

प्रकृति के साथ संभावित छेड़छाड़ की आलोचना शुरू होना भी अप्रत्याशित नहीं। पूर्व जल संसाधन सचिव रामास्वामी अय्यर जहां इसे अन्यायपूर्ण बताते हैं तो नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुआ मेधा पाटकर की नजर में यह नदियों की पारिस्थितिकी के साथ सियासी छेड़छाड़ है। समुद्र में जाने वाले पानी को दूसरे बेसिनों में भेजने से मुहानों के बंजर होने और पारिस्थितिकी के नष्ट होने की आशंका जताई जा रही है। कुछ लोग मध्य एशिया के अरल सागर की नजीर देते हैं, जो सोवियत काल में इसी तरह के जल मार्ग परिवर्तन से सूख गया। कुछ लोगों की चिंता हिमालयी क्षेत्र के भूकंपीय खतरे वाले इलाके में बड़े बांधों पर है। एनडब्ल्यूडीए की महानिदेशक राधा सिंह का कहना है कि ‘दूसरे लोगों की तरह हम भी इसके नतीजों से अवगत हैं। वे खुली बहस क्यों नहीं करते? बिना सोचे-समझे सुझावों को भला कैसे खारिज किया जा सकता है?’

जल संरक्षण के लिए मैग्सेसे पुरस्कार पाने वाले राजेन्द्र सिंह मानते हैं कि ‘तकनीकी तौर पर यह मुमकिन नहीं है। कुछ नदियां भले जोड़ ली जाएं पर यह कहना कि इससे जलाभाव दूर हो जाएगा, तर्कसंगत नहीं।’ योजना आयोग के सदस्य सोमपाल इसे ‘भव्य’ विचार की संज्ञा देते हैं। उनके शब्दों में, ‘उपयोगी विकल्पों को हमने हाथ तक नहीं लगाया है। धनाभाव में 150 परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं। 15 साल में 1,07,000 करोड़ रुपये खर्च करके तो 1.17 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती है।’

राजनैतिक दलों व विशेषज्ञों की जमात में इस सुझाव के बहुत-से पैरोकार बन गए हैं। लेकिन चिंता उन्हें भी है। जल संविधान की समवर्ती सूची में है और संविधान मंे संशोधन कर इसे राष्ट्रीय संसाधन बनाए बिना केन्द्र राज्यों को इसे मानने पर मजबूर नहीं कर सकता। वाजपेयी और सोनिया की सहमति मददगार हो सकती है, पर कावेरी विवाद को देखते हुए पानी जैसी सियासी तौर पर उत्तेजित करने वाली प्राकृतिक देन पर राज्यों को एकमत होना संभव नहीं दिखता। जल संसाधन मंत्रालय के सलाहकार रहे बी एन नवलवाला सुझाते हैं कि पानी पर शुल्क लगाने के अलावा बिजली की तरह उसका राजस्व चुकाया जाना चाहिए।

साफ है कि जल प्रबंधन को सिर्फ आपूर्ति के बजाय समग्रता में रखकर देखा जाना चाहिए। जरूरत कृषि प्रणाली में बदलाव की, बाढ़ और सूखारोधी बीजों के विकास संबंधी शोध पर निवेश बढ़ाने की और छोटी सिंचाई योजनाओं, जैसे जलसंरक्षण उपायों के प्रोत्साहन की है। विशेषज्ञों का भी कहना है कि सरकार पानी पर शुल्क को उसके संरक्षण के औजार के रूप में उपयोग करे और शहरों तथा औद्योगिक इकाइयों को शोधन कर उसी जल का प्रयोग करने पर दबाव डाले। पर बड़ी आशंका यही है कि परियोजना को एकमेव हल न मान लिया जाए। सुधारक अन्ना हजारे को भी डर है कि जल-संग्रहण जैसे आजमाए हुए सस्ते निकल्पों की कीमत पर इसे आगे बढ़ाया जाएगा। लेकिन जल संसाधन मंत्री अर्जुन चरण सेठी आश्वस्त करते हैं कि ‘यह किसी की कीमत पर नहीं बल्कि सभी को समन्वित करके चलेगी।’

हालांकि सरकार ने परियोजना 2005 तक शुरू होने और 2015 तक पूरा कर लेने का सुप्रीम कोर्ट से वादा किया है, पर कुछ सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। जून 2003 तक रिपोर्ट पेश करने वाली टास्क फोर्स को दो मुद्दों से वरीयता के आधार पर निबटना होगा। परियोजना जल साझेदारी के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाली होने के कारण नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से इसके लिए अनुमति लेना (राजस्व हिस्सेदारी के आधार पर मुमकिन) तथा योजना के आर्थिक दृष्टि से लाभकारी होने की व्यवस्था करना। सरकारी व्यवस्थापन वाली योजना के कारण सरकार विभिन्न एजेंसियां से मदद और बांड निकालकर तथा बजटीय घाटे के बावजूद 560,000 करोड़ रुपये सालाना का इंतजाम कर सकती है। पर असल सवाल उसकी साज-संभाल पर आने वाली लागत का है। हालांकि 1987 की रिपोर्ट में एक शुल्क ढांचा सुझाया गया है, पर राज्य किसानों से साज-संभाल खर्च भी वसूलने को तैयार नहीं। केंद्रीय कृषि मंत्री अजित सिंह ‘किसानों की कमजोर माली हालत’ का हवाला देते हुए भाखड़ा व्यास माॅडल का उपाय सुझाते हैं, जिसमें संचालन व्यय राज्य ही वहन करते हैं।

साफ है, योजना के क्रियान्वयन के लिए कौशल, संवाद और वित्तीय व्यवस्थापन की जरूरत होगी। सेंटर फाॅर पाॅलिसी रिसर्च के बीजी वर्गीज कहते हैं, ‘हर चीज की कीमत है। अहम यह है कि इसे न करने की भी कीमत है।’ टास्क फोर्स को यह विंदु ध्यान में रखना होगा। यदि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को 8 फीसदी की दर से बढ़ाना चाहता है तो खेती में जान डालनी होगी और खेती की असल चाबी तो पानी ही है।

Posted by
Get the latest news on water, straight to your inbox
Subscribe Now
Continue reading