ग्राम पंचायतों में आपदा प्रबन्धन
कभी-कभी गाँवों में कई प्रकार की दुर्घटनाएँ या प्राकृतिक प्रकोप होते रहते हैं। इन आपदाओं के कारण प्रतिवर्ष हजारों लोग अकाल मृत्यु के शिकार होते हैं। मरने वालों से कहीं ज्यादा लोग घायल और बीमार भी हो जाते हैं। इन पर काबू पाने के लिए प्रशासनिक तंत्र एवं पुलिस के पहुँचने से पहले ही काफी जन-धन की हानि हो जाती है।

स्थानीय संगठन एवं संस्थाओं की भूमिका


आपदाओं से निपटने एवं त्वरित सहायता उपलब्ध कराने के लिए पंचायतें सक्षम होनी चाहिए। पंचायतों को ऐसी तैयारियां रखनी चाहिए कि कोई दुर्घटना घटे ही नहीं। यदि कोई प्राकृतिक प्रकोप हो भी जाए तो उन पर शीघ्र काबू पाया जा सके। पंचायतों को अपने कार्यालय में सभी विभागों के पते, टेलीफोन नम्बर आदि रखने चाहिए जिससे आपदा के समय उनका उपयोग किया जा सके।आपदा के समय तत्काल सहायता के लिए स्थानीय समुदाय, उसके संगठन एवं सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं का महत्वपूर्ण दायित्व बनता है। यदि सहायता पहुँच भी जाए तो कहाँ किस प्रकार की मदद जरूरी है, वह भी स्थानीय समुदाय ठीक तरह से तय कर सकता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि स्थानीय समुदाय को आपदाओें के प्रति जागरूक करना चाहिए।

हमारे देश में ग्रामीण स्तर पर पंचायतें गठित की गई हैं। अनेक सामाजिक संगठन सहायता एवं सहयोग के लिए कार्य करते हैं। यदि ये सभी आपदा के समय मिलकर उनका सामना करें तो ऐसे संकटों का प्रभाव घटाया जाना सम्भव है।

जोखिम कहाँ है?


स्थानीय समुदाय को अनेक बार यह जानकारियां रहती हैं कि जोखिम कहाँ है, इससे प्रभावित कौन होगा और जोखिम का समाधान क्या है? जहाँ कुछ प्रकार के जोखिम अवश्यम्भावी है और वे अचानक होते हैं उनका निवारण सम्भव नहीं है परन्तु स्थानीय समुदाय जोखिम के प्रभाव और संभावना को कम करने की क्षमता रखता है। दृढ़ संकल्प एवं योजना बनाकर समुदाय की सक्षमता बढ़ाई जा सकती है जिससे कि समुदाय जोखिम का मुकाबला कर सके।

पंचों, सरपंचों का यह दायित्व है कि वे अपने क्षेत्र में आने वाली आपदाओं के समय लोगों की सहायता के लिए जल्दी आगे आएं। पंचायत, ब्लॉक एवं जिला स्तर पर उपलब्ध साधनों को भी गाँव तक लाकर उससे लोगों की मदद करें। गाँव में आने वाली आपदाएं अनेक प्रकार की हो सकती हैं। वे दुर्घटनाएँ, प्राकृतिक आपदाएं, मानव-कृत आपदाएं हो सकती हैं। आपदाओं के कारण जन-धन की हानि होती है। इन्हें रोकने अथवा सहायता पहुँचाने का प्रबन्ध किया जाना चाहिए।

दुर्घटनाएँ


1. सड़क दुर्घटनाएँ : राजमार्गों एवं गाँव की सड़कों पर आए दिन दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। इससे कई लोगों की असामयिक मृत्यु हो जाती है। गलत दिशा में चलने, ओवर-टेक करने, नशे व लापरवाही से तेज वाहन चलाने, खराब सड़कों, रोड संकेतकों एवं गति अवरोधों के नहीं होने, वाहन में तकनीकी खराबी होने आदि से सड़क दुर्घटनाएँ हो जाती हैं। पंचायतों को चाहिए कि वे अपने पंचायत क्षेत्र से गुजरने वाले मार्गों की मरम्मत कराए एवं सुरक्षा की दृष्टि से देखरेख रखें।

2. मकान गिरने से : प्रायः तकनीकी दृष्टि से मकान ठीक से नहीं बनवाए जाते हैं तथा मरम्मत भी समय पर नहीं करवाते हैं। इससे मकान की छतें, दीवारें, बरामदे कमजोर होकर गिर जाते हैं। पंचायत को चाहिए कि वर्षा से पूर्व ही ऐसे जर्जर मकानों, स्कूलों, सामुदायिक वनों की सूची बना लें। सम्बन्धित व्यक्ति को उन्हें दुरुस्त करने हेतु नोटिस दे दें। ध्यान न देने पर पंचायत ऐसे वन को गिरवा कर सम्बन्धित से खर्च वसूल करें।

3. आग लगने से : कभी-कभी जलती हुई बीड़ी-सिगरेट के ठूंठ हर कहीं डालने, पटाखे छोड़ने, गैस सिलेण्डर या स्टोव फटने तथा अंगीठी या चूल्हे को पूरी तरह नहीं बुझाने से आग लग जाती है। इससे खेत, घर तथा इकट्ठी की गई घास के ढेर जलकर स्वाहा हो जाते हैं। जल्दी से आग नहीं बुझा पाने के कारण यह आग बस्ती तथा जंगलों में फैल जाती है। इससे पशु, पक्षी तथा जन-धन की काफी हानि होती है।

4. उद्योगों में : आटा चक्की, आरा मशीन, तेल घाणी, कृषि यंत्रों आदि से दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। इन दुर्घटनाओं में उंगलियां, हाथ, पैर या शरीर के भाग क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।

5. कीटनाशक दवाओं के दुष्प्रभाव से : सब्जियों तथा फसलों पर कीटनाशी दवाओं के दुष्प्रभाव से भी कई लोग बीमार हो जाते हैं।

ग्राम पंचायतों में आपदा प्रबन्धन 2

प्राकृतिक आपदाएं


1. महामारियां : कभी-कभी मलेरिया, प्लेग, हैजा, स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियां फैल जाती हैं। आवागमन के साधनों की सुविधा बढ़ने से ये बीमारियां तेज गति से फैलती हैं। यदि अपने क्षेत्र में कई लोग एक साथ बीमार हो तो शीघ्रता से निकट के अस्पताल तथा जिला मुख्यालय के चिकित्सा अधिकारियों को सूचित करना चाहिए। बचाव के उपाय भी करने चाहिए। रोग अधिक न फैले इस हेतु ब्लीचिंग पाउडर, दवा का वितरण करना चाहिए। पानी उबालकर पीना तथा सार्वजनिक स्थानों की सफाई आदि के बारे में ध्यान रखना चाहिए।

2. जानवरों की बीमारी : कभी-कभी जानवरों में कई प्रकार की बीमारियां फैल जाती हैं- जैसे खुरपका, मुंहपका आदि। इन बीमारियों के सम्बन्ध में सम्बन्धित जिला पशु चिकित्सालय में सूचना भिजवा देनी चाहिए। रोगग्रस्त मृत पशुओं से बीमारी फैलने का डर हो तो उन्हें जला डालना चाहिए अथवा जमीन में गाड़ देना चाहिए।

3. फसल की बीमारियां : फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों के प्रकोप से बीमारियाँ फैल जाती हैं। इन पर शीघ्र ही कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करवाना चाहिए एवं टिड्डी दल के आने पर धुआँ करना, ढोल बजाना आदि उपाय करने चाहिए।

4. भूकम्प : भूकम्प अचानक आते हैं। लोगों की मदद के लिए सेवादल, डॉक्टर आदि को तत्काल घटनास्थल की ओर भेजने का प्रबन्ध करे। फंसे हुए लोगों के लिए राहत, भोजन, पानी, चिकित्सा का प्रबन्ध करना चाहिए।

5. बिजली गिरना : प्रभावित लोगों एवं भवनों की मदद का प्रबन्ध करना चाहिए।

6. बाढ़, सूखा एवं अकाल : कभी-कभी इतनी तेज वर्षा होती है कि तालाब टूट जाते हैं, नदियों-नालों में उफान आ जाता है, फसलें खराब हो जाती हैं, आवागमन के रास्ते टूट जाते हैं। इनकी समय पर मरम्मत कराते रहें। कभी-कभी लगातार तीन-चार वर्ष तक वर्षा नहीं होती तथा अकाल पड़ते रहते हैं। लोग भूखे रहने को मजबूर हो जाते हैं। लोग मजदूरी को तरसते हैं। पशु पलायन कर जाते हैं। भोजन, चारा, पानी एवं रोजगार की व्यवस्था करना पंचायत की जिम्मेदारी है।

7. हिंसक जानवरों का उत्पात : गाँव में हिंसक जानवर घुस आते हैं तथा मवेशियों व बच्चों को उठा ले जाते हैं। वन विभाग को सूचित कर इन्हें पकड़वाया जाना चाहिए।

अन्य आपदाएं


1. दंगा-फसाद या झगड़ा : अफवाहें फैलने, गलतफहमी होने या राजनैतिक विद्वेष से, धार्मिक या उन्माद पर लोगों के अड़ियल रूख के कारण दंगे हो जाते हैं। इन्हें राजनैतिक रंग दे दिया जाता है। कभी-कभी पारिवारिक झगड़े हो जाते हैं। ये झगड़े कभी-कभी वीभत्स रूप धारण कर लेते हैं। पत्थरबाजी, लूटपाट, आग लगाना एवं छुरेबाजी से कई जानें चली जाती हैं। कभी-कभी झूठी अफवाहें फैलाई जाती हैं। इनकी जानकारियां देकर सच्ची बात से लोगों को अवगत करवाना चाहिए। अफवाह फैलाने वाले को दण्डित कराएं। दंगे की आशंका होते ही पंचायत को चाहिए कि दोनों पक्षों में समझौता कराने का प्रयत्न करें। यदि बात अधिक बिगड़ती हो तो प्रशासन व पुलिस को तुरन्त सूचित करना चाहिए।

2. अन्धविश्वास : कई प्रकार के अन्धविश्वास फैलाए जाते हैं। महिलाओं को भूत, प्रेत, डायन समझकर मार दिया जाता है, बालकों की बलि चढ़ाई जाती है, जंगल जला दिए जाते हैं। पंचायतों का कर्तव्य है कि लोगों में फैले ऐसे अन्धविश्वासों को दूर करें।

3. ठगों, चोर व डाकुओं का आतंक : नकली डॉक्टरों, नकली वस्तुएं व दवा बेचने वालों, जादूगरों, साधु-सन्यासियों के वेष में ठग-उचक्के आते हैं तथा भोले-भाले ग्रामीणों को ठग कर चले जाते हैं। कभी-कभी चोर, लुटेरे व जेबकतरों के दल आते हैं तथा अप्रिय वारदातें करके भाग जाते हैं। लोगों को ऐसे व्यक्तियों से सावधान रहने की हिदायत दी जाए तथा पकड़ में आने पर पुलिस के हवाले कर देना चाहिए।

4. अन्य : पेड़ों अथवा मकानों से नीचे गिरने, कुओं अथवा गड्ढों में गिरने, करण्ट लगने, जहरीले व हिंसक जानवरों के काटने से लोग घायल हो जाते हैं। उनकी तत्काल सहायता की जानी चाहिए।

समन्वय समितियों का गठन


गाँव में स्थायी आपदा समन्वय समितियों का गठन किया जाना आवश्यक है। अक्सर छोटी या बड़ी आपदाओं में समन्वय की कमी के कारण राहत और मदद समय पर प्रभावित स्थान या व्यक्ति तक नहीं पहुँच पाती। राहत एजेंसियों के बीच समुचित तालमेल के अभाव की वजह से राहत कार्य ठीक से नहीं चल पाते और ज्यादातर राहत सामग्री भी बर्बाद हो जाती है। वास्तव में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं में समन्वय बेहद जरूरी है। यह निर्देश दिया जाना चाहिए कि प्रत्येक प्रखण्ड तथा जिलों के प्रमुख अपने क्षेत्र में स्वयंसेवी संस्थाओं व सरकारी कर्मचारियों को मिलाकर एक प्रभावी तंत्र पहले ही तैयार रखें। यह तंत्र हर आपदा की स्थिति में समन्वित व आपसी सहयोग से काम करें। समन्वय समिति में अवकाश प्राप्त सैनिक, अधिकारी, चिकित्सक, इंजीनियर, योजनाकार आदि जो भी हो, गाँवों में शामिल रहें जिससे उनके विशिष्ट ज्ञान एवं कौशल का उपयोग आपदा प्रबन्धन में किया जा सके। समिति के सदस्यों को समय-समय पर प्रशिक्षण की आवश्यकता रहेगी।

आपदा पुनर्वास केन्द्र


गाँव में आपदा पुनर्वास केंद्र स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। ये केन्द्र इतने चुस्त-दुरुस्त रहें कि सूचना मिलते ही राहत की व्यवस्था निर्धारित स्थान पर पहुँच जाए। हमारे देश में आपदा राहत केन्द्र एवं पुनर्वास केन्द्र आम दिनों में उपेक्षित ही रहते हैं। जहाँ जिस प्रकार की आपदाएं आने की सम्भावना ज्यादा रहती है, वहाँ उन केन्द्रों पर उसी के अनुरूप तैयारियां की जानी चाहिए। इन केन्द्रों पर दवाईयां, भोजन, पानी, टेण्ट, कपड़े, कम्बल आदि सामग्री के सुरक्षित भण्डार उपलब्ध रहे। आपदा प्रबन्धन के लिए स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित कर उनकी सेवाएं ली जा सकती हैं। पुनर्वास की व्यवस्था टिकाऊ, प्रभावी व पर्याप्त सूझबूझ एवं समुचित संयोजन पर आधारित होनी चाहिए।

आपदा प्रबन्धन का प्रवेश द्वार स्कूल


स्कूल किसी भी समुदाय के भरोसे का प्रतीक होते हैं। आपदा के समय अक्सर स्कूलों को शरणस्थली बनाया जाता है। यहीं पर स्वास्थ्य सेवाएं और खाने-पीने की चीजें भी एकत्रित कर उन्हें बाँटा जाता है। पुलिस, सेना अपना पड़ाव प्रायः वहीं डालती हैं। स्कूल शिक्षा का केन्द्र होने से नागरिक जागरूकता में भी मदद कर सकते हैं। स्कूल ‘जोखिम शिक्षा’ के लिए माकूल माहौल बनाते हैं। स्कूली बच्चों, शिक्षकों और अन्य लोगों को आपदा व उसके निवारण के बारे में शिक्षित किया जा सकता है।

जागरूकता बढ़ाना सफल आपदा प्रबन्धन की एक महत्वपूर्ण शर्त है। यह कार्य स्कूल के माध्यम से किया जा सकता है। गाँवों में स्कूल का पक्का, अच्छा एवं थोड़ी ऊँचाई पर बना वन आपदा के समय श्रेष्ठ शरणस्थल बन सकता है। अतः स्कूल एवं चिकित्सालय निर्माण के समय इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए कि आपदा के समय ये स्थान अच्छे शरणस्थल साबित हो सकते हैं। यदि सम्भव हो तो इन्हें आसपास बनवाएं।

वैकल्पिक संचार प्रणाली


एक प्रभावी सूचना प्रणाली के माध्यम से आपदा राहत समिति को सक्रिय किया जा सकता है। त्वरित सूचना और समन्वय का प्रभावी तंत्र कुशल आपदा प्रबन्धन की महत्वपूर्ण शर्त है। प्रायः आपदा के समय संचार तंत्र, विद्युत व्यवस्था अथवा आवागमन के साधनों में बाधाएं आ जाती है। इसके लिए वैकल्पिक संचार प्रणाली की भी व्यवस्था रहनी चाहिए। ध्यान रहे कि यह संचार प्रणाली आत्मनिर्भर हो जैसे बैटरी से चलने वाला रेडियो या इण्टरनेट आदि। सही एवं समय पर सूचना लोगों की जान बचाने के लिए आवश्यक है।

सामुदायिक आपदा प्रबन्धन कोष : समुदाय आधारित आपदा प्रबन्धन के लिए संस्थानीकरण के अलावा अन्य महत्वपूर्ण आवश्यकता है व्यय हेतु कोष जुटाना। स्थानीय समुदाय के नियंत्रण में एक कोष का विकास किया जाना चाहिए। इसके लिए घर-घर से चन्दा जुटाकर सामुदायिक आपदा कोष बनाया जाए। सरकार भी आनुपातिक मदद करे। कोष में लोग अपनी आय का एक अंश अपनी सुरक्षा के लिए नियमित रूप में देते रहें। इन निधियों का इस्तेमाल आपदाओं का बुरा असर कम करने के लिए तत्काल किया जा सकता है।

आपदाओं पर नियंत्रण में पंचायतों की भूमिका


गाँवों में दुर्घटनाएँ रोकने, उन पर नियंत्रण करने एवं निपटाने में पंचायतों को सक्रिय भूमिका अदा करनी चाहिए। इस हेतु निम्नानुसार उपाय किए जा सकते हैं—

1. पंचायत घर में फोन की सुविधा हो एवं प्रशासनिक कार्यालयों, पुलिस नियंत्रण कक्ष, अस्पताल, अग्निशमन केन्द्रों के दूरभाष नम्बर की सूची लगी होनी चाहिए।
2. लोगों को सड़क पर चलने तथा वाहन चलाने के नियमों का ज्ञान कराना चाहिए। सड़क, मार्गों एवं मोड़ों पर आवश्यक संकेतक लगाने चाहिए।
3. सड़कें चौड़ी करवाना, समय-समय पर मरम्मत करवाना, बाईपास बनवाने, सड़कों पर रोशनी की व्यवस्था, रेलवे क्रॉसिंग, नदियों पर पुल आदि बनवाने चाहिए।
4. सरकारी कार्यालयों, बसों एवं सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट-बीड़ी पीने पर कानूनन रोक है। इसका सख्ती से पालन कराए।
5. कीटनाशक दवाओं के प्रति सावधानी रखने की जानकारी दी जानी चाहिए।
6. लोगों को आग से सुरक्षा के उपाय सिखाने चाहिए। अग्निशमन यंत्र एवं आग बुझाने की सामग्री, बाल्टियां, कुदाली, प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स आदि भी पंचायत में उपलब्ध होने चाहिए।
7. गाँव के उत्साही तथा सेवा-भावी नौजवानों का एक दल बनाना चाहिए। इन्हें दुर्घटनाओं एवं आपदाओं से निपटने के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इन युवकों को अग्निशमन, प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी दी जानी चाहिए।
8. मृत्यु एवं प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली हानि के पुनर्भरण हेतु सरकार तथा बीमा कम्पनियों की विभिन्न योजनाएं हैं जिनकी जानकारी देकर पीड़ितों को सहायता दिलानी चाहिए।
9. आपदा में फंसे लोगों के लिए भोजन, शुद्ध जल एवं आवास की व्यवस्था की जानी चाहिए।

आमतौर पर यह समझा जाता है कि आपदा प्रबन्धन सरकार का काम है इसलिए हम इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। विडम्बना यह है कि आपदाओं का मुख्य शिकार तो आम आदमी होता है। इसलिए जरूरी है कि हम नागरिक पहल करके आपदाओं पर काबू पाने का प्रयत्न करें। आपदा के समय एवं बाद में भी लोगों के पुनर्वास का उचित प्रबन्ध करें। आपदा प्रबन्धन में सही निगरानी और मूल्यांकन भी एक महत्वपूर्ण घटक है। यदि हम आपदा का सही मूल्यांकन कर सकें तो राहत भी सही तरीके से पहुँचा सकते हैं। आपदाओं में हमें धीरज, विवेक, सहनशीलता से निबटना चाहिए। आपदाओं से बचने के लिए मानव समाज का संवेदनशील होना बेहद जरूरी है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
ई-मेल : pmdevpura@gmail.com

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