जल मंथन (Water Churning in Hindi)

भावी पीढ़ी के लिये बन रहे बड़े संकट का कारक क्या है सबको पता है। जल का, विशेषकर पेयजल की सीमित मात्रा, उसका दुरुपयोग और उसे बुरी तरह प्रभावित करता जल-प्रदूषण, उसके समाधान के लिये भावी पीढ़ी के जीवन को सुखद और मंगलमय बनाने क लिये हम सबको एकमत होना होगा। गहन-से-गहन मंथन भी करना होगा और दृढ़ कर्म भी। दृढ़ संकल्पित होना ही होगा और भावी पीढ़ी के सुंदर जीवन के लिये हम सबको फिर एक बार भगीरथ बनाना पड़ेगा। अन्यथा भावी पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।

आज संपूर्ण विश्व जल, उसके गिरते स्तर और शुद्धता के स्तर पर घट रहे मानकों को लेकर चिंतित है। ‘जल ही जीवन है’ यह पूरी तरह सत्य है और इस अटल सत्य को नकारा नहीं जा सकता। परंतु जब जल ही प्रदूषित होगा, सोचिए कि तब क्या होगा? यह आज के परिवेश में विचारणीय ही नहीं अपितु गहन विचारणा का विषय है। कवि रहीमदास जी ने गलत नहीं लिखा है:-

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुस चून।।


जब पश्चिम, जल प्रदूषण के खतरे के प्रति सचेत हुआ है तो हम भी जाग रहे हैं और इस बाबत उसी से टैकनॉलॉजी और विशेषज्ञता उधार मांग रहे हैं। विदेशी विशेषज्ञों की टोलियां आमंत्रित की जा रही हैं। परंतु प्रदूषण मुक्त करने की इस समस्त चर्चा में औद्योगिक एवं शहरीकरण की सभ्यता का हल अथवा विकल्प खोजने की चर्चा कहीं नहीं सुनाई दे रही। मूलतः यदि देखा जाए तो यह मानव सभ्यता के प्रदूषण की समस्या है। यदि संपूर्ण पर्यावरण प्रदूषित हो और उस प्रदूषण को जन्म देने वाली सभ्यता का फैलाव होता जाए, विस्तार होता जाए तो कृत्रिम उपायों के बूते पर, हम तताम नदियों और उनके जल को अथवा किसी भी प्रकार के जल को जो एन-केन-प्रकारेण किसी भी रूप में मनुष्य के प्रयोग में लाया जा रहा है कब तक और कैसे प्रदूषण मुक्त रख सकेंगे। सच तो यह भी है कि पश्चिम के औद्योगिक देशों और उनकी सभ्यता के अनुकरण की भावना ही इस संदर्भ में काम कर रही है।

इतना ही नहीं स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी महात्मा गांधी जी की चेतावनी को सतही स्तर पर लिया गया और औद्योगीकरण तथा शहरीकरण के क्षेत्र में पश्चिमी देशों का अंधानुकरण किया गया। खेती के परंपरागत तरीकों को त्यागकर रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों एवं मशीनों के अधिकाधिक प्रयोग को भी स्वतंत्र भारत में ही प्रोत्साहन मिला और यह भी सच है कि औद्योगिक सभ्यता के विस्तार तथा महानगरों की कृत्रिम जल वितरण एवं शौचालय व्यवस्था के कारण जल प्रदूषण का स्वरूप आज बहुत बदला है। उसकी मात्रा में काफी वृद्धि हुई है। जल संचयन के परंपरागत साधन भी आज प्रचलन में नहीं रहे। इस बात से अथवा इन परिवर्तनों से ग्रामीण क्षेत्र भी अब अछूता नहीं रहा। फिर भी जल प्रदूषण-मुक्ति संबंधी परंपरागत ज्ञान का विस्तार होना चाहिए। उसका प्रचार-प्रसार फिर से होना चाहिए और जल को, चाहे वह नदियों का जल हो, पीने या सिंचाई हेतु जल हो अथवा जीवन के किसी उपयोग में आने वाला जल हो, उसे प्रदूषण मुक्त रखने के लिये प्रयासरत होना ही पड़ेगा। इसके लिये गहन विचार और मंथन भी हो। साथ ही जल-प्रदूषण संबंधी परंपरागत ज्ञान का आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के साथ तुलनात्मक अध्ययन काफी उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

बात अब आती है जल प्रबंधन और उसके उचित प्रयोग की। जल के गिरते स्तर और अंधाधुंध दुरुपयोग के चलते आने वाले समय में पानी की बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो सकती है। विशेषकर पीने के पानी की तो और किल्लत हो सकती है। थोड़ा इतिहास में झाँकें तो पाएँगे कि पहले जल प्रबंधन हेतु कई उपाय किए जाते रहे जो आज नहीं हैं और यदि हैं भी तो बरसात कम होने के कारण या सामान्य बरसात भी नहीं होने के कारण जल का प्रबंधन होना या कर पाना कठिन हो गया है। इसके लिये कि बरसात अच्छी हो मनमाना ढंग से वनों और वृक्षों की कटाई पर प्रतिबंध लगे और पेड़ लगाने के लिये अधिकाधिक लोगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। बात जब जल की चली है तो बिना नदियों के बात पूरी भी नहीं होगी। वह भी गंगा के बिना, जिसे संपूर्ण भारत ‘मां गंगा’ का बड़ी श्रद्धा से नाम लेता है। गंगा के किनारे बसे शहरों-नगरों में पीने के पानी की आपूर्ति गंगा से ही की जाती है। यह बात और है कि आज गंगा का पानी पहले की अपेक्षा उतना शुद्ध नहीं रहा। नहरें निकाल कर कृषि कार्य भी संपन्न होता है। थोड़ी दूर दृष्टि डालें तो देखेंगे कि नदियाँ हमारे जीवन से पूरी तरह से जुड़ी हुई हैं। यह भी देखा गया है, सच भी है कि जब बरसात अच्छी होती है, नदियों में बाढ़ आती है तब पृथ्वी के भीतर का जलीय स्तर भी बढ़ता है। तब हैंडपंपों और पंपसेटों आदि की भी जलग्रहण क्षमता बढ़ जाती है। फिलहाल जल प्रबंधन की बात चली है तो कुछ देर के लिये इतिहास में लौटते हैं।

पहले के शासक, बादशाह या राजे-रजवाड़े चाहे वे किसी भी समुदाय, कौम या जाति-धर्म के रहे हों वे, सभी गंगा को और उसके जल का बहुत आदर करते थे और उसका प्रयोग भी करते रहे थे। जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी वे सब बेहद सक्रिय, सजग एवं कर्मनिष्ठ थे। भले चाहे वह कार्य धर्म या सामाजिक उत्थान सामाजिक सेवा से जुड़ा रहा हो तालाब, कुओं, बावड़ी आदि का निर्माण जगह-जगह कराते थे। उस जमाने के पूँजीपति, उद्योगपति, साहू-महाजन और धनी वर्ग के लोग भी तालाब, कुओं एवं छोटे-मोटे झील की तरह जलाशयों का निर्माण बड़े शौक से करवाते थे, वे इसे अपना धर्म समझते थे। यही नहीं, आज भी टूटे-फूटे, भग्न, जर्जर स्थिति में तब के बने तालाब, पोखर, बावड़ियाँ और कुएँ देखने को मिलते हैं। उन्हें देखने से पता चलना कोई कठिन नहीं लगता कि तब कितना रख-रखाव और व्यवस्था होती रही होगी। आज भले, लोग उसे किसी और भाव से देखते समझते हों, परंतु तब वह अपने धर्म से जोड़कर देखते थे।

सामाजिक धर्म, सामाजिक कार्य और पुण्य का कार्य समझ कर करते थे। अब इसी की कमी है और हमलोग परेशान हैं, हैरान हैं और एक दूसरे से टूटते जा रहे हैं। अलग होते जा रहे हैं और उपेक्षित भी होते जा रहे हैं। हाँ तो बात हो रही है, उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों की, तो पूर्व के लोग पूरी तरह देख-रेख करते थे। अपने कारिंदों के माध्यम से उन जलाशयों का रखरखाव और संरक्षण पर भी खूब ध्यान देते रहे थे। हम अपने बूढ़ों से, बड़ों से सुनते रहे हैं कि गाहे-ब-गाहे सैर सपाटे पर जब बादशाह, राजे-रजवाड़े या धनाढ्य लोग निकलते थे तो वहाँ पर कोई-न-कोई आयोजन अवश्य करते थे। फलदार और छायादार वृक्ष भी खूब लगवाते थे। वृक्षारोपण तब एक संकल्प था। एक पूजा थी, परम पावन कर्तव्य था। हमसब आज इसी को भूल चुके हैं या फिर भूलते जा रहे हैं। जिसका परिणाम सामने है।

हम भारत के लोग तो गंगा और उससे मिलने वाले जल को चाहे जिस रूप में मिलता हो पवित्र मानते हैं इस संदर्भ में अगर मुसलमान शासकों की ओर देखें तो बात कुछ और सामने आती है। मन-प्राण, श्रद्धा और आनंद से भर जाता है। चौदहवीं सदी में प्रसिद्ध विदेशी यात्री इब्नेबतूता एशिया के अन्य देशों का भ्रमण करते हुए भारत आए थे। उन्होंने लिखा, सुल्तान मुहम्मद तुगलक दक्षिण में दौलताबाद में रहता था फिर भी गंगा का ही पानी पीता था। इसी प्रकार आइने अकबरी में अबुल फजल ने लिखा कि बादशाह अकबर गंगाजल को आबेहयात (अमृत तुल्य) समझते थे। जहाँगीर के समय में तीर्थयात्रा के लिये शासन की ओर से पर्याप्त सुविधाएँ विद्यमान थीं। अकेले हरिद्वार में पाँच लाख यात्री प्रतिवर्ष जाते थे, अन्य भागों में तीर्थयात्रा करने विशाल संख्या में लोग जाते रहे।

औरंगजेब जैसा बादशाह भी गंगाजल के कीटाणुनाशक और शक्तिवर्धक गुणों को मंजूर करता था और इसी का प्रयोग करता था, और तो और पुणे के पेशवाओं को तो गंगाजल में इतनी श्रद्धा थी कि उनके लिये बीस रुपये के खर्च पर एक बहंगी गंगाजल काशी से पुणे तक पहुँचाया जाता था। बाजीराव पेशवा अपने अगाध विश्वास के अनुसार स्वयं को ऋणमुक्त करने के लिये गंगाजल का सेवन करते थे। कहने का आशय यह कि मात्र गंगाजल के ही बारे में नहीं अपितु हर उस जल के बाबत हमें, हम सबको सोचना होगा और उसे पीने के योग्य, सिंचाई योग्य कैसे रखें इस पर भी विचार करना होगा। आज इसकी आवश्यकता है।

आइए कुछ अवलोकन करें, निरीक्षण, चिंतन, मनन और मंथन करें। साथ बैठकर, मिलकर विचार विमर्श करें कि हम कब, कैसे कितना और कहाँ, क्या करें कि हम सब को पीने के लिये प्रदूषण रहित पानी मिल सके। सिंचाई हेतु पानी उपलब्ध हो सके। यद्यपि कि देश में पेयजल एवं सिंचाई हेतु पानी सीमित मात्रा में है। हमें इसके दुरुपयोग को रोकना पड़ेगा, अन्यथा भविष्य में कोई बड़ा संकट पैदा हो सकता है। लोगों को मितव्ययिता के प्रति आगाह और जागरुक भी करना होगा। संपूर्ण भारतवर्ष में नदियों का जल काफी हद तक प्रदूषित हो चुका है और इसके लिये केवल मनुष्य जिम्मेदार है। औद्योगिक नगरों में हजारों-हजार लीटर अपशिष्ट नदियों में बहाया जा रहा है। कूड़ा, मल, शव और नालों का गंदा पानी बहाया तथा डाला जा रहा है और न जाने किस-किस तरह जल को प्रदूषित किया जा रहा है। पशुओं को नहलवाना, उनका मल-मूत्र करना, कपड़े धोना, धार्मिक आयोजन के अवसर पर हजारों लाखों टन मूर्तियों व फूल मालाओं तथा पत्तियों को उसमें डालना आदि। इसके लिये मेरी धारणा है कि विशेषकर ऐसा वाराणसी, कानपुर, कोलकाता और मुंबई जैसे शहरों में अधिक होता है। वैसे तो कोई भी नगर या महानगर प्रदूषित होने से वंचित नहीं रह गया है। अतः यदि अब भी लोग नहीं चेते तो परिणाम कतई सुखद नहीं होगा।

जहाँ तक जल प्रबंधन, पेयजल/सिंचाई की समस्या, जल दुरुपयोग एवं जल संसाधन की बात है, इस बाबत जन जागरण बहुत आवश्यक है। जल दुरुपयोग की बात करें तो यह बड़े-बड़े शहरों में औद्योगिक नगरों एवं महानगरों में बहुतायत होता है। इतना ही नहीं सरकारी नलों को खुला छोड़ देना, टूटी हुई टोंटी की तत्संबंधित विभाग को सूचना नहीं देना, उससे बागवानी सींचना आदि कई बातें हैं। वनों की कटाई अंधाधुंध हो रही है, उस हिसाब से वृक्षारोपण नहीं हो रहा।

खैर, भावी पीढ़ी के लिये बन रहे बड़े संकट का कारक क्या है सबको पता है। जल का, विशेषकर पेयजल की सीमित मात्रा, उसका दुरुपयोग और उसे बुरी तरह प्रभावित करता जल-प्रदूषण, उसके समाधान के लिये भावी पीढ़ी के जीवन को सुखद और मंगलमय बनाने क लिये हम सबको एकमत होना होगा। गहन-से-गहन मंथन भी करना होगा और दृढ़ कर्म भी। दृढ़ संकल्पित होना ही होगा और भावी पीढ़ी के सुंदर जीवन के लिये हम सबको फिर एक बार भगीरथ बनाना पड़ेगा। अन्यथा भावी पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। इस बाबत दुष्यंत की ये पंक्तियां- सटीक लगती हैं-

कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं हो सकता,
पहले, तबीयत से एक पत्थर तो उछालो।


लेखक परिचय


डॉ. दयानाथ सिंह ‘‘शरद’’
अभयना, मंगारी, वाराणसी-221202 (उ.प्र.)

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