जलवायु परिवर्तन से सम्बन्धित समझौते एवं सम्मेलन
8 Mar 2018
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climate change

जलवायु परिवर्तन के नियंत्रण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन 7-18 दिसम्बर, 2009 में कोपेनहेगन में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य बाली कार्य योजना का क्रियान्वयन तथा क्योटो प्रोटोकॉल की दूसरी प्रतिबद्धता अवधि के सम्बन्ध में निर्णय लेना था। यद्यपि सम्मेलन में बाली कार्य योजना तथा क्योटो प्रोटोकॉल की दूसरी प्रतिबद्धता के सम्बन्ध में कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय नहीं हो सका, तथापि इन विषयों पर चर्चा जारी रखने तथा कानकुन, मैक्सिको में दिसम्बर 2010 में आयोजित होने वाले सम्मेलन में ठोस निर्णय लेने की सम्भावना व्यक्त की गई।

जलवायु परिवर्तन वस्तुतः इस पृथ्वी पर मानव ही नहीं वरन समस्त जीवधारियों के लिये बहुत बड़ा खतरा है। धरती की धारक क्षमता में ह्रास के लिये यह उत्तरदायी है। प्राकृतिक सम्पदा विरल होती जा रही है। यहाँ तक कि पेयजल की आपूर्ति में भी कमी आ रही है। वस्तुतः जलवायु परिवर्तन का प्रभाव वातावरण के साथ-साथ अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। गर्मी एवं वायु प्रदूषण का प्रभाव हमारे जनजीवन पर पड़ा है।

जलवायु परिवर्तन से इस धरती को बचाने की पहल बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से प्रारम्भ हुई जब विश्व के अनेक जागरुक राष्ट्र एकजुट होकर इस दिशा में प्रयास करने को सहमत हुए। वर्ष 1972 में स्वीडन के शहर स्टाकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व का पहला अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें 119 देशों ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यू.एन.ई.पी.) का प्रारम्भ ‘एक धरती’ के सिद्धान्त को लेकर किया और एक ‘पर्यावरण संरक्षण का मताधिकार पत्र’ विकसित किया जो ‘स्टाकहोम घोषणा’ के नाम से जाना जाता है। इस समय सम्पूर्ण विश्व में 5 जून को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के रूप में मनाने की भी स्वीकृति हुई।

इसके पश्चात 5 दिसम्बर, 1980 को ‘संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा’ ने ‘पर्यावरण क्रियान्वयन परिषद’ का विशेष सम्मेलन केन्या की राजधानी नैरोबी में मई (10-18) 1982 में आयोजित किये जाने का निर्णय लिया। तदुपरान्त जून (3-14) 1992 में ब्राजील के शहर रियो डि जेनेरो में ‘पृथ्वी सम्मेलन’ का आयोजन हुआ जो एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इस पृथ्वी सम्मेलन में 172 राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने पृथ्वी के तापमान में वृद्धि एवं जैव-विविधता के संरक्षण आदि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषयों पर विचार किया, जिसके फलस्वरूप ‘जलवायु परिवर्तन सहमति’ सम्भव हो पाई।

एजेंडा- 21, जैवमंडल के संरक्षण था आर्थिक समानता लाने के लिये सारे संसार के लिये विकास कार्य योजनाओं को प्रदर्शित करता है। जलवायु परिवर्तन सहमति में पृथ्वी का ताप बढ़ाने वाले गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से जलवायु परितर्वन एवं समुद्रों के जलस्तर में वृद्धि के खतरों की ओर भी ध्यानाकर्षण किया गया तथा यह आग्रह किया गया कि विकसित देश इन गैसों के उत्सर्जन को वर्ष 2000 तक वर्ष 1990 के स्तर पर लाने का प्रयास करेंगे।

वर्ष 1997 में 5 जून को ‘द्वितीय पृथ्वी सम्मेलन’ का आयोजन डेनेवर में हुआ, जिसमें वर्ष 1992 में प्रथम ‘पृथ्वी सम्मेलन’ के दौरान लिये गए निर्णयों की समीक्षा की गई और यह पाया गया कि वांछित प्रगति नहीं हो पाई थी। इस सम्मेलन में विभिन्न राष्ट्रों में मतैक्य नहीं हो पाया। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के प्रस्ताव पर अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया आदि देशों ने अपनी सहमति नहीं दी। हाँ, अमेरिका ने यह आश्वासन दिया कि वर्ष 1997 में क्योटो सम्मेलन’ के पूर्व वह अपने प्रयासों एवं संकल्पों का प्रमाण अवश्य देगा।

प्रख्यात ‘क्योटो सम्मेलन’ का आयोजन जापान के क्योटो शहर में दिसम्बर, 1997 ‘भूमंडलीय तापन’ के सम्बन्ध में हुआ। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य वातावरण में हानिकारक गैसों की सान्द्रता की सीमा को नियंत्रित कर जलवायु परिवर्तन के खतरों को टालना था। 178 देशों ने जून, 2008 तक इस लक्ष्य के प्रथम चरण का आकलन 2010 में किया जाना सुनिश्चित किया। परन्तु मात्र 60 प्रतिशत विकसित देशों ने ही इस संधि के प्रति अपनी सहमति दी।

वर्ष 2007 में इंडोनेशिया के बाली द्वीप में जलवायु परिवर्तन एवं वैश्विक तापन के सम्बन्ध में एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें 180 से अधिक देशों ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने तथा क्योटो प्रोटोकॉल की समय रेखा समाप्ति के पहले एक नई सहमति (जिससे इन गैसों के उत्सर्जन पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाकर, पृथ्वी को विनाश से बचाया जा सके) तथा अन्य अनेक विषयों पर चर्चा की।

जुलाई, 2009 में इटली में आयोजित औद्योगिक देशों के समूह ‘जी-8’ के शिखर सम्मेलन में जी-8 एवं विकासशील देशों के समूह जी-5 जलवायु परिवर्तन पर सर्वसम्मति से दस्तावेज जारी करने पर सहमत हो गए परन्तु ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 2050 तक घटाकर आधा करने के लक्ष्यों को तय नहीं किया जा सका।

‘कार्बन उत्सर्जन’ कम करने हेतु जिन तकनीकों को प्रयोग किया जाता है, उन्हें ‘हरित तकनीक’ की संज्ञा दी गई है। इस प्रकार यदि देखा जाये तो अर्थव्यवस्था को हरा करने में भारी लागत आती है जो निश्चित रूप से विकासशील देशों पर अतिरिक्त बोझ होगा।

जलवायु परिवर्तन के नियंत्रण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन 7-18 दिसम्बर, 2009 में कोपेनहेगन में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य बाली कार्य योजना का क्रियान्वयन तथा क्योटो प्रोटोकॉल की दूसरी प्रतिबद्धता अवधि के सम्बन्ध में निर्णय लेना था। यद्यपि सम्मेलन में बाली कार्य योजना तथा क्योटो प्रोटोकॉल की दूसरी प्रतिबद्धता के सम्बन्ध में कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय नहीं हो सका, तथापि इन विषयों पर चर्चा जारी रखने तथा कानकुन, मैक्सिको में दिसम्बर 2010 में आयोजित होने वाले सम्मेलन में ठोस निर्णय लेने की सम्भावना व्यक्त की गई।

इस सम्मेलन में कई प्रत्यक्षदर्शियों को यह आभास हुआ कि विकसित देश 2012 के बाद की अवधि में क्योटो प्रोटोकॉल की प्रतिबद्धता से भागना चाहते हैं। परन्तु विकासशील देशों के दबाव में वह ऐसा नहीं कर सके। अन्ततः इस विषय पर चर्चा जारी रखने का निर्णय लिया गया और यह उम्मीद बनी की कानकुन में आयोजित होने वाले सम्मेलन में कुछ महत्त्वपूर्ण परिणाम अवश्य निकलेंगे

यद्यपि कोपेनहेगन सम्मेलन अपने लक्ष्यों तक पहुँचने में सफल नहीं रहा, परन्तु ‘वैश्विक और राष्ट्रीय उत्सर्जन लक्ष्य यथाशीघ्र प्राप्त करने में सहयोग’ करने के सम्बन्ध में समझौता अवश्य हुआ। इस समझौते में विकासशील देशों की महत्त्वपूर्ण प्राथमिकताओं को अवश्य ध्यान में रखा गया है, जो सामाजिक और आर्थिक विकास तथा गरीबी उन्मूलन से जुड़ी हैं। विकासशील देशों के लिये यह महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

सारिणी-10.1


जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में कुछ अन्तरराष्ट्रीय प्रयास

1972

स्टॉकहोम सम्मेलन (यूनेप का गठन)

1987

मांट्रियल समझौता

1988

आईपीसीसी की स्थापना

1990

आईपीसीसी की पहली रिपोर्ट प्रकाशित हुई

1992

रियो-डि-जेनेरो में एजेंडा- 21 की घोषणा

1995

बर्लिन सम्मेलन

1996

जेनेवा सम्मेलन

1997

क्योटो समझौता

1998

क्योटो समझौता का पुनरावलोकन (ब्यूनस आयर्स में)

2002

जोहान्सबर्ग में पृथ्वी- 10 नामक सम्मेलन आयोजित किया गया। यूरोपीय संघ, जापान समेत कई देशों ने क्योटो समझौते की पुष्टि की, लेकिन अमेरिका एवं ऑस्ट्रेलिया इसमें शामिल नहीं हुए

2004

रूस भी क्योटो समझौते पर सहमत

2005

मांट्रियल वार्ता जारी

2006

नैरोबी सम्मेलन

2007

जलवायु परिवर्तन पर आईपीसीसी की चौथी रिपोर्ट जारी

2007

बाली सम्मेलन

2008

बैंकॉक सम्मेलन

2009

कोपेनहेगन सम्मेलन

2010

कानकुन सम्मेलन

2011

डरबन सम्मेलन

2012

दोहा सम्मलेन

कोपेनहेगन समझौता


जलवायु परिवर्तन से सम्बन्धित क्योटो समझौता के अन्तर्गत संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज की 15वीं बैठक डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में 7 से 18 दिसम्बर तक आयोजित की गई। यह समझौता, जलवायु परिवर्तन के सम्बन्ध में सफल रहा या विफल, यह इस बात पर निर्भर है कि इसे किस रूप में देखा जाता है।

कोपेनहेगन घोषणापत्र पहली बार चीन, भारत और दूसरे विकासशील देशों को अमेरिका के साथ एकजुट करने में सफल रहा। यह इस समझौते की सबसे बड़ी सफलता है क्योंकि क्योटो समझौते में यह नहीं हो पाया था और अमेरिका ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। कोपेनहेगन समझौते के अनुसार विकसित देश वर्ष 2020 तक प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर एकत्रित करने का प्रयास करेंगे जिससे विकासशील देशों को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती में मदद की जाएगी।

दिसम्बर, 2007 में बाली में कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज के अधिवेशन के दौरान यह निष्कर्ष निकला था कि वर्ष 2012 के बाद भी क्योटो समझौते को आगे बढ़ाया जाएगा, पर कोपेनहेगन में इस पर सहमति नहीं हो पाई। कोपेनहेगन समझौते के मुख्य बिन्दु इस प्रकार से हैं:

1. जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने और पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में वर्ष 2050 तक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से कम वृद्धि के लिये एक उद्देश्य पर अपनी क्षमता के अनुसार देशों की अलग-अलग जिम्मेदारी तय की गई।

2. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करना, जिससे विश्व के औसत तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि न हो।

3. विकसित देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कितनी कटौती करेंगे और विकासशील देशों की इस दिशा में क्या पहल या योजना है- संयुक्त राष्ट्र को 31 जनवरी, 2010 के पहले सूचित करना।

4. गरीब देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करने के लिये 2010 से 2012 के बीच 30 अरब डॉलर की धनराशि उपलब्ध कराई जाएगी, जबकि 2020 से यह राशि बढ़ाकर 100 अरब डॉलर सालाना की जाएगी।

5. संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में ‘कोपेनहेगन ग्रीन क्लाइमेट फंड’ बनाया जाएगा जो विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से सम्बन्धित परियोजना में मदद करेगा।

6. अन्तरराष्ट्रीय सहयोग से चलने वाले विकासशील देशों में ग्रीनहाउस गैसों की कटौती से सम्बन्धित परियोजनाओं की निगरानी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर की जाएगी।

7. विकासशील देशों में वनों के संरक्षण की योजनाओं को आर्थिक मदद के लिये कोष को त्वरित प्रभाव से स्थापित करने की योजना।

8. इस समझौते का आकलन 2015 में किया जाएगा और यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सिस तक रखा जाये या इससे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित किया जाये।

2008 में जलवायु परिवर्तन पर विकसित राष्ट्रों ने नेतृत्व प्रदान करते हुए 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में 50 प्रतिशत कमी करने का लक्ष्य निर्धारित किया था, लेकिन उसे भी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने एक तरह से अ

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