जलवायु परिवर्तन

कश्मीर के सीढ़ीदार खेतों में धान के सूखते हुए गट्ठर हैं। पहाड़ों पर सूरज की छाया पड़ रही है, जबकि घाटी मौसम के अलग-अलग रंगों से गुलज़ार है।
हालात और जलवायु परिवर्तन की मार से कश्‍मीर में सिमटती जा रही है चावल की पारंपरिक खेती।
साझा संसाधन केवल स्थानीय समुदायों की जीवनरेखा ही नहीं हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ़ सुरक्षा कवच भी हैं।
जलवायु परिवर्तन, लगातार खेती और रसायनिक खादों के बहुत ज़्यादा इस्‍तेमाल के चलते हमारी धरती पर साल दर साल बंजर ज़मीनों का दायरा बढ़ता जा रहा है।
सीएमएफआरआई की रिपोर्ट के मुताबिक 2003 से 2013 के दौरान व्हेल के तटों पर फंसने की घटनाओं में दस गुनी बढ़ोतरी देखने को मिली है।
नदियों का प्रवाह बदलने से नदी के पानी पर निर्भर लोगों की ज़िन्दगी में कई तरह की परेशानियां आती हैं। कई बार रोज़ी-रोटी के संकट के चलते लोगों को पलायन भी करना पड़ता है।
जलवायु परिवर्तन के चलते मानसून के पैटर्न में आ रहे बदलाव के कारण पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में बारिश में कमी देखने को मिल रही है, जबकि सूखे राज्‍यों में बारिश में बढ़ोतरी हुई है।
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