कमजोर होती उर्वरा शक्ति, बढ़ने लगे मरीज
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खेतों में पराली जलाना गम्भीर समस्या है। किसानों को जागरुक करने के लिये विशेष अभियान छेड़ा है। फसल अवशेष जलाने से किसानों को खुद ही नुकसान उठाना पड़ता है। उन्हें पराली के बेहतर इस्तेमाल के लिये प्रेरित किया जाएगा। विभिन्न स्तरों पर नजर रखी जा रही है। - ओमप्रकाश धनखड़, कृषि मंत्री, हरियाणा

हरियाणा की आबोहवा जहरीली होती जा रही है। धुएँ के कारण आसमान में बादल छाए रहते हैं। असल में यह जहरीली गैसों का गुब्बार है जो पराली जलाने का परिणाम है।

वैसे तो वर्ष 2007 में ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पराली जलाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, लेकिन इस पर जरा भी अमल नहीं किया जा रहा। धुएँ के चलते सड़क हादसे भी बढ़े हैं। पराली जलाने से 15 प्रतिशत तक प्रदूषण बढ़ा है।

हरियाणा में हर साल करीब 90 लाख टन गेहूँ और धान की फसल के अवशेष जलाए जाते हैं। पर्यावरणविदों के अनुसार यदि किसान नहीं जागे तो अगले 20 से 30 साल में भूमि की उत्पादन क्षमता बहुत कम हो जाएगी। तापमान बढ़ने से पानी की माँग 20 फीसद तक बढ़ेगी, जबकि इसकी उपलब्धता 15 फीसद तक घट जाएगी।

पराली में जहरीली गैसेंः एक टन पराली जलाने से हवा में तीन किलो कार्बन कण, 1513 किग्रा कार्बन डाइऑक्साइड, 92 किलोग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 3.83 किग्रा नाइट्रस ऑक्साइड, 0.4 किलोग्राम सल्फर डाइऑक्साइड, 2.7 किग्रा मीथेन और 200 किलो राख घुल जाती है।

खेती पर मारः किसानों के पराली जलाने से भूमि की ऊपजाऊ क्षमता लगातार घट रही है। इस कारण भूमि में 80 फीसद तक नाइट्रोजन, सल्फर और 20 फीसद अन्य पोषक तत्वों में कमी आई है। मित्र कीट नष्ट होने से शत्रु कीटों का प्रकोप बढ़ा है जिससे फसलों में तरह-तरह की बीमारियाँ हो रही हैं। मिट्टी की ऊपरी परत कड़ी होने से जलधारण क्षमता में कमी आई है।

बढ़ने लगे मरीजः प्रदूषित कण शरीर के अन्दर जाकर खाँसी को बढ़ाते हैं। अस्थमा, डायबिटीज के मरीजों को साँस लेना दूभर हो जाता है। फेफड़ों में सूजन सहित टॉन्सिल्स, इन्फेक्शन, निमोनिया और हार्ट की बीमारियाँ जन्म लेने लगती हैं। खासकर बच्चों और बुजुर्गों को ज्यादा परेशानी होती है।

गम्भीरता दिखाए सरकारः सिर्फ कानून बनाकर ही समस्या से पार पाना संभव नहीं है। सरकारी स्तर पर हैप्पी सीडर, जीरो टिलेज मशीन, रोटावेटर जैसे कृषि यन्त्रों पर अनुदान बढ़ाया जाए। किसानों को अनुदान पर बीज मिलें। पंजाब की तरह प्रोत्साहन राशि शुरू की जा सकती है। बॉयोमास पावर प्लांट लगाए जाएँ तो करीब 44 लाख टन कृषि वेस्ट की खपत हो सकती है।

 

 

 

ऐसे तो रुकने से रहा पराली से होने वाला प्रदूषण


धान की फसल तैयार है। दीपावली के बाद कटाई शुरू हो जाएगी। आशंका इस बात की है कि बीते वर्षों की तरह ही फसल कटाई के बाद यदि किसानों ने कृषि अवशेष को खेतों में जलाना शुरू किया तो फिर जबर्दस्त वायु प्रदूषण की समस्या से दो-चार होना पड़ेगा।

वजह यह है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेशों के बावजूद पराली यानी ठूठ को जलाने के होने वाले नुकसानों के प्रति न तो किसानों को जागरूक किया गया है और ना ही इसे रोकने के लिये कोई तैयारी ही दिखाई पड़ रही है। हालाँकि राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड ने चंद रोज पहले जिलाधिकारियों व जिला कृषि अधिकारियों को पत्र भेजकर इस बात के निर्देश अवश्य दे दिए हैं कि इस बात को सुनिश्चित किया जाए कि किसान खेतों में ठूठ न जलाएँ।

गौरतलब है कि धान, गेहूँ व गन्ने की ठूठ को किसान कटाई के बाद खेत में ही जला देते हैं। इससे बड़े पैमाने पर धुआँ होता है, जिससे वातावरण में धुन्ध सी छा जाती है। इससे कुछ नजर नहीं आता है। साथ ही प्रदूषण का स्तर भी काफी बढ़ जाता है, जिससे खासतौर पर साँस के मरीजों को बहुत समस्या होती है। बीते कई वर्षों से यह समस्या पेश आ रही थी, जिसके बाद बीते वर्ष 28 अक्टूबर को राज्य सरकार ने शासनादेश जारी कर जिलाधिकारियों, पुलिस व नगर निकायों को आदेश दिए थे कि वह इस तरह की कार्रवाई पर अंकुश लगाएँ। इसी कड़ी में जिला कृषि अधिकारियों को यह निर्देश दिए गए थे कि वह जागरूकता कार्यक्रम चलाएँ। यही नहीं एनजीटी ने एनसीआर में कई दिनों तक धुन्ध छाई रहने के बाद मामले का संज्ञान लेते हुए दस अक्टूबर 2015 को आदेश दिये थे कि कृषि अपशिष्ट जलाने से पर्यावरण को जो क्षति पहुँचती है उसका हर्जाना वसूला जाए। इसके तहत दो एकड़ खेत से ढाई हजार, दो से पाँच एकड़ क्षेत्रफल से पाँच हजार और पाँच एकड़ से अधिक क्षेत्रफल के खेत मालिक से 15 हजार रुपए हर्जाना लिये जाने के आदेश दिए थे। बहरहाल नियम-कानून तो काफी बन गए हैं, लेकिन जहाँ तक किसानों को अवशेष जलाने के होने वाले नुकसान के बाबत जानकारी देने की बात है उस पर कुछ काम नहीं हुआ है। ऐसे में आशंका है कि नवम्बर में जब धान की कटाई होगी तो एक बार फिर धुआँ दम घोंटेगा।

 

 

 

 

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