कृषि क्षेत्र पर सिंचाई की मार और भारत में भुखमरी
गन्ना

पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ ही खाद्यान्न उत्पादन में विश्व में दूसरे पायदान पर आने वाले भारत के लिये अपनी जनसंख्या का पेट भरना आज भी एक बड़ी चुनौती है। हाल ही में 119 देशों के लिये जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2018 (Global Hunger Index) में भारत 103 नम्बर पर रहा। इस मामले में भारत अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश से भी पीछे है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स का निर्धारण किसी देश में कुपोषण की स्थिति के साथ ही पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में लम्बाई की तुलना में वजन कम होने, लम्बाई कम होने तथा शिशु मृत्यु दर के आधार पर किया जाता है। वास्तव में ये सभी मानक कुपोषण के सूचक हैं। इन मानकों के आधार पर भारत मात्र 31.1 अंक ही अर्जित कर पाया।

फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (Food and Agriculture Organisation, FAO) द्वारा इसी वर्ष जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 195.9 मिलियन लोग कुपोषित हैं। यह संख्या देश की कुल जनसंख्या का 14.8 प्रतिशत है। यह तथ्य विचलित करने वाला है क्योंकि भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की है। वर्ष 2017 में कुल 281.7 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ जो देश की जनसंख्या के पोषण के लिये पर्याप्त था।

फिर सवाल उठता है कि देश में इतनी बड़ी संख्या में लोग दो जून की रोटी के लिये क्यों तरस रहे हैं? इस सवाल का कोई एक माकूल जवाब नहीं है। इस सवाल पर गम्भीरता से विचार करने पर जनसंख्या का बढ़ता दबाव, सिंचाई के प्रचलित साधनों में गिरावट के कारण कृषि योग्य परती भूमि में वृद्धि, जलवायु परिवर्तन, गेहूँ और चावल जैसे अनाजों के उत्पादन में गिरावट, छोटी जोत वाले किसानों की आर्थिक स्थिति में गिरावट, कृषि विकास की दर में कमी, अनाजों की आसमान छूती कीमतें, प्रति व्यक्ति कम होती अनाज की उपलब्धता आदि जैसे कारण सामने आते हैं।

भारत में खाद्य सुरक्षा का मूल आधार अनाजों का उत्पादन है। लेकिन जनसंख्या वृद्धि की तुलना में इनके उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 2000 के दशक में प्रतिवर्ष जनसंख्या वृद्धि की दर 1.7 प्रतिशत थी जबकि इसी दौरान मुख्य अनाजों के उत्पादन में औसतन 1.4 की दर से कमी दर्ज की जा रही थी। इससे साफ है कि बढ़ती हुई जनसंख्या के लिये मुख्य अनाजों के उत्पादन की दर बढ़ानी होगी जो वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए एक मुश्किल टास्क है। इसकी एक बड़ी वजह है देश में सिंचाई के लिये घटती पानी की उपलब्धता।

केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के आँकड़े के अनुसार वर्ष 2017 में भूजल द्वारा सिंचाई पर आश्रित इलाकों के 40 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को परती छोड़ दिया गया। वजह थी सिंचाई के भूजल का उपलब्ध न होना। भूमि के परती छोड़े जाने का सीधा असर धान, दलहन, तिलहन सहित अन्य अनाजों के उत्पादन पर आया। वित्तीय वर्ष 2017-18 के आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में भी इस रुझान को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट में यह साफ तौर पर कहा गया है कि पानी की कमी के कारण तमिलनाडु में रबी की फसल के लिये प्रयोग में लाये जाने वाले कुल कृषि क्षेत्र के 7 लाख हेक्टेयर जबकि खरीफ के 2.5 लाख हेक्टेयर में खेती नहीं हो सकी। इसके अलावा केरल में भी धान की खेती के अन्तर्गत आने वाले कुल क्षेत्र में काफी कमी आई है। राज्य में जहाँ 1970-71 में धान की खेती 8.75 लाख हेक्टेयर में होती थी वह 2015-16 में घटकर 1.7 लाख हेक्टेयर रह गई। देश के अन्य राज्यों में भी कमोबेश यही स्थिति है। नीति आयोग ने भी यह स्पष्ट तौर पर कहा है कि कृषि क्षेत्र में पानी की कमी का समाधान यदि समय रहते नहीं निकाला गया तो इसके गम्भीर परिणाम होंगे।

भारत में सिंचाई के प्रचलित साधनों पर यदि गौर किया जाये तो यहाँ की कुल कृषि भूमि (160 मिलियन हेक्टेयर) के दो तिहाई हिस्से की सिंचाई मानसून आधारित है। वहीं, 39 मिलियन हेक्टेयर पर भूजल और 22 मिलियन हेक्टेयर पर नहरों द्वारा सिंचाई की जाती है। मानसून की अनिश्चितता का प्रभाव फसलों के उत्पादन पर बहुत गहरा पड़ता है। इसी अनिश्चितता का प्रभाव है कि हरित क्रान्ति की शुरुआत के बाद देश में भूजल आधारित सिंचाई व्यवस्था का तेजी से विकास हुआ। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में खूब बोरिंग खोदे गए। इतना ही नहीं हरित क्रान्ति के दौरान खाद्यान्न की जरूरतों को पूरा करने के लिये धान, गन्ना आदि जैसे पानी पोषित फसलों के उत्पादन को भी काफी बढ़ावा दिया गया। यही वजह है कि भारत के कई इलाकों के भूजल स्तर में तेजी से गिरावट दर्ज हुई।

केन्द्रीय भूजल बोर्ड (Central Groundwater Board) की रिपोर्ट के अनुसार देश के 16.2 प्रतिशत हिस्से ऐसे हैं जहाँ भूजल का अतिदोहन हुआ है। इन इलाकों में कर्नाटक के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों के सूदूरवर्ती इलाके, आन्ध्र प्रदेश का रायलसीमा क्षेत्र, महाराष्ट्र का विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र, पश्चिमी राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड के इलाके शामिल हैं। देश के 14 प्रतिशत इलाकों में भूजल की स्थिति काफी नाजुक स्तर तक पहुँच गई है। इसमें उत्तर-पश्चिमी राज्य जैसे पंजाब, हरियाणा और दिल्ली आदि शामिल हैं। वहीं, देश के पूर्वी क्षेत्र में स्थिति थोड़ी बेहतर है।

इसी रिपोर्ट के अनुसार भारत की प्रतिवर्ष भूजल पुनर्भरण क्षमता 433 बिलियन क्यूबिक मीटर (Billion Cubic Meter, BCM) है जिसमें से 398 बीसीएम इस्तेमाल के लिये उपलब्ध होता है। देश में भूजल के दोहन की स्थिति इतनी बुरी है कि कुल इस्तेमाल के लिये उपलब्ध हिस्से के 65 प्रतिशत का उपयोग हर वर्ष कर लिया जाता है। कृषि क्षेत्र में भूजल के बढ़ते इस्तेमाल का पता नहर आधारित सिंचाई के गिरते प्रतिशत से भी लगाया जा सकता है। सरकारी आँकड़े के अनुसार 2011-12 तक इसका प्रतिशत 23.6 रह गया जो 1950-51 के दौरान लगभग 40 प्रतिशत था। वहीं, इसी काल में भूजल आधारित सिंचाई का प्रतिशत 28.7 प्रतिशत से बढ़कर 62.4 प्रतिशत हो गया।

सिंचाई के लिये भूजल के बढ़ते इस्तेमाल की एक मुख्य वजह हरित क्रान्ति के दौरान फसलों के उत्पादन के लिये गलत इलाकों का चयन भी था। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में गन्ना उत्पादन को बढ़ावा दिया गया जबकि वहाँ की मिट्टी इस फसल के उत्पादन के लिये उपयुक्त नहीं थी। इसका खामियाजा यह हुआ कि प्रदेश के मात्र 4 प्रतिशत कृषि क्षेत्र पर गन्ना उत्पादन के लिये उपलब्ध 70 प्रतिशत से ज्यादा पानी का इस्तेमाल कर लिया जाता है। वहीं, राज्य के लगभग 17 प्रतिशत कृषि क्षेत्र पर उत्पादित होने वाले दलहन की सिंचाई के लिये उपलब्ध पानी के मात्र 3.4 प्रतिशत हिस्से का ही इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकार की अविवेकपूर्ण कृषि को बढ़ावा देने का ही परिणाम है कि फसल के उत्पादन की दिनों-दिन बढ़ती लागत के कारण किसान कर्ज की जाल में फँस गए और भूजल दोहन को भी बढ़ावा मिला।

अर्ध शुष्क क्षेत्र पंजाब में धान की खेती को प्रमुखता दिया जाना भी भूजल के दोहन का मुख्य कारण है। हरित क्रान्ति की शुरुआत यानि 1960 के दशक में राज्य में धान की खेती के अन्तर्गत केवल 2,27000 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र था जो वर्ष 2000 तक बढ़कर 26,12000 हेक्टेयर हो गया। इस दौरान राज्य में धान की खेती में 1050 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस वृद्धि का आधार भूजल का दोहन था। आँकड़े बताते हैं कि पंजाब की मौसमी दशाओं के अनुरूप वहाँ एक किलोग्राम चावल के उत्पादन पर 5,337 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है जबकि पश्चिम बंगाल में केवल 2605 लीटर। इसका मतलब है कि पश्चिम बंगाल की मौसमी दशाएँ चावल की खेती के लिये पंजाब की तुलना में ज्यादा उपयुक्त हैं। इतना ही नहीं यूनेस्को के इंस्टीट्यूट ऑफ वाटर एजुकेशन द्वारा वर्ष 2011 में जारी किये गए एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति टन धान के उत्पादन के लिये औसतन चीन और अमेरिका की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है। इसी रिपोर्ट के अनुसार देश में कपास के उत्पादन के लिये चीन की तुलना में लगभग चार गुना पानी की आवश्यकता होती है।

यूनेस्को के इंस्टीट्यूट ऑफ वाटर एजुकेशन द्वारा जारी डाटा

फसल

भारत

चीन

अमरीका

धान

2800

1321

1275

गन्ना

159

117

103

गेहूँ

1654

690

849

कपास

8264

1419

2535

नोट:- प्रति टन पानी की खपत क्यूबिक मीटर में

राज्यों में कृषि भूमि के सिंचित क्षेत्र का प्रतिशत

राज्य

सिंचित भूमि प्रतिशत में

पंजाब

98.70

हरियाणा

88.90

उत्तर प्रदेश

76.10

बिहार

67.40

तमिलनाडु

63.50

आन्ध्र प्रदेश

62.50

मध्य प्रदेश

50.50

पश्चिम बंगाल

49.30

गुजरात

46.00

उत्तराखण्ड

44.00

छत्तीसगढ़

29.70

ओड़िशा

29.00

कर्नाटक

28.20

राजस्थान

27.70

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