रेगिस्तान

प्रस्तावना


”मैंने अनेक बार इस रेतीली धरती को पार किया है। लेकिन रेगिस्तान बहुत विशाल हैं, वहां क्षितिज कहीं दूर है जो किसी को बहुत छोटे होने का अहसास कराता है और यहां संभवतः खामोशी ही एकमात्र विकल्प है।“ - सहारा रेगिस्तान पर एक ऊंट चालक की टिप्पणी ‘द एल्केमिस्ट’ पाउलो कोहेलो

महासागरों के बाद रेगिस्तान पृथ्वी के विशाल भाग को घेरे हुए हैं। जब हम पृथ्वी ग्रह अथवा इसके समूचे स्थाई तंत्र की चर्चा करते हैं तो हम रेगिस्तान की उपेक्षा हरगिज नहीं कर सकते हैं। महासागर के पश्चात रेगिस्तान ही संसार के सबसे बड़े पर्यावरण तंत्र की रचना करते हैं। टोनी एलन तथा एंड्र वारेन के अनुसार संसार की कुल धरती के 40 प्रतिशत भाग में ठंडे व गर्म रेगिस्तान फैले हुए हैं। यह आंकड़े बहुत सही न भी हों तो भी यह सत्य है कि भूमि का एक तिहाई भाग रेगिस्तान से ढका हुआ है।

सामान्यतः अधिकतर मरुभूमि भूमध्य रेखा के दोनों ओर 300 अक्षांश पर स्थित, कर्क रेखा व मकर रेखा के निकट ही स्थित है। इन दोनों रेखाओं के मध्य के क्षेत्र को उष्ण कटिबंध कहते हैं। लगभग समस्त महाद्वीपों में रेगिस्तान स्थित हैं।

विश्व के रेगिस्तानी क्षेत्रविश्व के रेगिस्तानी क्षेत्रअफ्रीका व आस्ट्रेलिया की भूमि का विशाल भू-भाग रेगिस्तानी है। दक्षिण-पश्चिमी एशिया, मध्य एशिया तथा अमेरीका के समस्त दक्षिण-पश्चिमी राज्यों और साथ ही उत्तरी मैक्सिको का अधिकांश भू-भाग मरुभूमि है। दक्षिणी अमेरीका का भी कुछ भू-भाग मरुभूमि है।

रेगिस्तान के बारे में सोचने पर हमारे सामने रेगिस्तान की तस्वीर वर्षा विहीन गर्म व शुष्क क्षेत्र के रूप में उभरती है, जहां विशाल रेतीले मैदान फैले हुए हैं, जिनकी मिट्टी लाल-कत्थई रंग की है। जहां पेड़-पौधों का अभाव है या उनकी संख्या बहुत कम है। यहां उपस्थित अधिकतर वनस्पतियां कांटेदार हैं। ऊंट रेगिस्तान का मुख्य पशु है। समूचे रेतीले प्रदेश को सुंदर नीला आकाश ढके हुए है। रेगिस्तान में सदैव रेत ही पायी जाती हो, ऐसा पूरी तरह सही नहीं है। रेगिस्तानों की सतह अधिकतर छोटी चट्टानों, छोटे गोल पत्थरों और बजरी से ढके रहती हैं। संसार में केवल 15-20 प्रतिशत रेगिस्तानी भूमि ही पूर्णतः रेत से ढकी है। रेगिस्तानी स्थालाकृति लाखों वर्षों के दौरान घटित होने वाली हवा और पानी की क्रियाओं का परिणाम है। रेगिस्तान के कुछ इलाकों में अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता देखी जा सकती है।

अधिकतर लोगों की धारणा है कि सभी रेगिस्तान गर्म होते हैं, लेकिन यह धारणा पूरी तरह सत्य नहीं है। उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुवों के कुछ रेगिस्तान अत्यधिक ठंडे हैं, जहां वातावरण में उपस्थित अधिकतर नमी बर्फ रूप में जम जाती है, किन्तु गर्म या ठंडे दोनों प्रकार के रेगिस्तानों में भूमि शुष्क ही होती है जो बहुत ही कम संख्या में जीवों और वनस्पितियों को उनका अस्तित्व बनाए रखने में सहायक होती है।

रेगिस्तान में दिन तथा रात के तापमान में काफी अंतर होता है। रेगिस्तान में जहां दिन का तापमान अधिक होता है वहीं रात्रि आते-आते यह क्षेत्र ठंडा होने लगता है। इस प्रकार रेगिस्तान के क्रमबद्ध रूप से गर्म और ठंडा होने के कारण यहां की चट्टानें भी निरंतर सिकुड़ती व फैलती रहती हैं। इस प्रकार रेगिस्तान के ठंडा व गर्म होने और सिकुड़ने व फैलने की निरंतर क्रिया के परिणामस्वरूप वहां की चट्टानों की सतह छोटे-छोटे कणों में टूटती रहती है। हवा के द्वारा ये कण टूट कर अन्य चट्टानों से टकरा कर उन्हें भी तोड़ते हैं। इस प्रक्रिया की निरंतरता से चट्टानों के कण रेत के आकार में रेगिस्तानी सतह पर फैल जाते हैं।

रेगिस्तान की रेत समुद्र तट की रेत से भिन्न होती है। मरुभूमि की रेत के कण बड़े व गोल होते हैं। विभिन्न मरुभूमि की रेत का रंग अलग-अलग होता है। कभी-कभी तो हवा का तेज झोंका रेत को उड़ा कर चट्टानी या पथरीली सतह को निरावृत कर देता है। अधिकतर रेगिस्तान रेत की पट्टियों अथवा रेत की अथाह मात्रा से ढके रहते हैं।

रेगिस्तान की उत्पत्ति हाल ही में नहीं हुई है। इनकी उपस्थिति पृथ्वी के इतिहास के साथ ही जुड़ी हुई है और संभवतः इनकी संरचना लाखों वर्ष पुरानी है। माना जाता है कि हिमयुग के समय पृथ्वी के अधिकांश भागों में ग्लेशियर होते थे लेकिन रेगिस्तानों का अस्तित्व उस समय भी था। वैज्ञानिकों के मतानुसार निःसंदेह कुछ रेगिस्तानों का क्षेत्रफल हाल के रेगिस्तानों की तुलना में बहुत कम था। किसी विशेष रेगिस्तान की जलवायु, उस रेगिस्तान का अस्तित्व समाप्त करने में सक्षम हो सकती है। इस प्रकार हरी-भरी धरती भी रेगिस्तान में बदल सकती है। किंतु यह बदलाव अचानक नहीं होता है, इसके लिए समय का एक लंबा अंतराल आवश्यक है। इस प्रक्रिया की प्रमाण सहित पुष्टि की गई है कि रेगिस्तान स्थिर नहीं होते अपितु उनके सिकुड़ने व फैलने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।

विभिन्न वर्षों के दौरान विभिन्न रेगिस्तानों में वर्षा की मात्रा में अंतर होता है। अति शुष्क रेगिस्तान में अनेक वर्षों तक वर्षा नहीं होती है। विश्व में सबसे लंबा अकाल आटाकामा रेगिस्तान में पड़ा था। यहां चार सौ वर्षों (1571 से 1971) तक बारिश नहीं हुई थी। दूसरी तरफ पृथ्वी पर कहीं एक ही वर्ष में भारी मात्रा में (लगभग 430 मि.मी.) बारिश हो जाती है। अतः रेगिस्तान में घोर अनिश्चित्ताएं होती हैं। यहां हो सकता है कि सालभर में होने वाली औसत वर्षा की मात्रा एक ही दिन में बरस जाए अथवा पूरे वर्ष बारिश होती रहे। उदाहरण के रूप में संसार के सबसे शुष्क ‘अटाकामा’ रेगिस्तान में सूखे के 4 वर्षों पश्चात् एकाएक एक ही दिन में ही 12.5 मि.मी. वर्षा हो गईं यहां यह बताना उचित होगा कि अटाकामा रेगिस्तान विश्व का सबसे शुष्क रेगिस्तान माना जाता है। रेगिस्तान में भारी वर्षा के कारण अचानक बाढ़ आ सकती है जिससे पानी के साथ भारी मात्रा में मिट्टी, रेत, पत्थर आदि बह कर दर्रों अथवा सूखी नदी (जिन्हें कि वादी भी कहते हैं) में निकल जाते हैं। इस जल का जल्द ही वाष्पीकरण हो जाता है अथवा धरती में सोख लिया जाता है।

रेगिस्तान बहुत ठंडे अथवा बहुत गर्म हो सकते हैं। सहारा रेगिस्तान में दिन का तापमान 580 सेल्सियस तक पहुंच जाता है और यहां की मिट्टी का तापमान 800 सेल्सियस तक पहुंच सकता है। मंगोलियन रेगिस्तान में वर्ष के आधे भाग में सामान्य तापमान जमाव बिन्दु यानी शून्य डिग्री सेल्सियस से भी नीचे हो जाता है। इसी प्रकार अंटार्कटिका में शीत ऋतु में आवश्यक तापमान शून्य से तीस डिग्री सेल्सियस कम होता है। किसी एक ही रेगिस्तान में भी दिन और रात के तापमानों में काफी अंतर हो सकता है। अधिकतर रेगिस्तानों में रात के समय तापमान कम हो जाता है क्योंकि रेगिस्तान की हवा में नमी की मात्रा नहीं के बराबर होने से यह अधिक समय तक गर्म नहीं रह पाती जिससे शाम होते ही रेगिस्तान के तापमान में भारी गिरावट आ जाती है।

विश्व का सबसे शुष्क रेगिस्तान ‘अटाकामा’विश्व का सबसे शुष्क रेगिस्तान ‘अटाकामा’यह आम धारणा है कि रेगिस्तान में बहुत कम जीवन पनपता है, या ये क्षेत्र जीवन के लिए अनुकूल नहीं होते हैं। किसी भी नमीयुक्त क्षेत्र की तुलना में रेगिस्तान में जीवन सीमित ही होता है लेकिन फिर भी रेगिस्तान निर्जीव नहीं होते हैं। उच्च तापमान के बावजूद भी रेगिस्तान पेड़-पौधे व जीव-जंतुओं की उपस्थिति को उत्साहित करते हैं। रेगिस्तान में जीवन की विविधता निश्चय ही अदभुत है।

रेगिस्तान एक ऐसी प्राकृतिक प्रयोगशाला है जहां हम ग्रहीय शुष्क सतह पर जल तथा वायु के प्रभाव को, भली-भांति समझ सकते हैं। रेगिस्तान के अंदर बहुमूल्य खनिज पदार्थ भी मिलते हैं जो शुष्क वातावरण में क्षरण के कारण या विशेष रूप से निर्मित हुए हैं। मरुभूमि मानव द्वारा निर्मित कृत्रिम संरचनाओं एवं जीवाश्मों के प्राकृतिक संरक्षण के लिए उचित प्राकृतिक स्थान है। रेगिस्तानी भूमि का अनुचित उपयोग समूचे संसार के अनेक हिस्सों में जटिल समस्या बनती जा रही है।

मानव समाज के लिए शुष्क भूमि का रेगिस्तानीकरण गंभीर समस्याओं में से एक है। धरती का अधिक से अधिक भाग रेगिस्तानी भूमि अथवा लगभग इसी प्रकार की भूमि में परिवर्तित होता जा रहा है। यह अनुमान लगाया गया है कि धरती के 35 प्रतिशत उर्वरक हिस्से के रेगिस्तानी भूमि में परिवर्तित होने की संभावना है। जिससे विश्व के लगभग 85 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते हैं। रेगिस्तानीकरण की घटना पर्यावरण संबंधी अनेक विपदाओं जैसे भूमंडलीय तापन (ग्लोबल वार्मिंग) एवं जैव विविधता में कमी को बढ़ाती है। अनुमानतः कुल धरती का एक तिहाई भाग शुष्क क्षेत्र है। संसार की शुष्क भूमि का 75 प्रतिशत रेगिस्तानीकरण से प्रभावित हो रहा है जिसके परिणामस्वरूप प्रतिवर्ष कृषि योग्य हजारों हेक्टेयर भूमि रेगिस्तानी भूमि में परिवर्तित हो जाती है।

प्रतिवर्ष सहारा रेगिस्तान दक्षिण-पश्चिम में 5 से 10 किलोमीटर प्रतिवर्ष की दर से फैल रहा है। सहारा रेगिस्तान की कुल चैड़ाई 5,150 कि.मी. है। लगभग 25 करोड़ लोग रेगिस्तानीकरण से प्रभावित हैं और करीब 1 अरब लोगों पर इसके संकट का साया मंडरा रहा है। विश्व की अधिकतर सतही भूमि रेगिस्तान में बदल रही है। नवनिर्मित रेगिस्तान आवश्यक नहीं कि गर्म और रेतीले स्थान ही हों, यह वह क्षेत्र भी हैं जिनका धरती पर मानव द्वारा दुरुपयोग किया गया तथा जो कृषि क लिए उपयुक्त नहीं रहे हैं। जिन क्षेत्रों में वर्षा ऋतु में स्थाई वर्षा नहीं होती वहां कि धरती विशेष रूप से कृषि हेतु उपयुक्त नहीं रहती है।

मानवीय गतिविधियां जैसे अत्यधिक कृषि, अधिक चराई, वनोन्मूलन और अकुशल सिंचाई प्रणालियों के साथ ही जलवायु परिवर्तन से भी उपजाऊ मिट्टी उत्पादकता को खोकर बंजर हो सकती है। विश्व में प्रति व्यक्ति उपलब्ध भूमि का क्षेत्रफल लगातार कम हो रहा है, जिससें अनेक क्षेत्रों विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े स्थानों में खाद्यान्न संकट की समस्या गहराने लगी है। यह परिस्थितियां मानवता के साथ आर्थिक क्षेत्र के लिए भी संकटकारी हैं। वह क्षेत्र जहां मौसमी वर्षा कम होती है आसानी से बंजर हो जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) (देखें: www.un.org/ecosocdev/geninfo/sustev/desert.htm) के अनुसार जो शुष्क भूमि है और जिन पर रेगिस्तानीकरण होने का संकट है उनमें से अधिकांश संसार के 5 मुख्य रेगिस्तान के निकट स्थित हैं।

1. उत्तर-पश्चिम मैक्सिको का सोनोरन रेगिस्तान व मैक्सिको के दक्षिण-पश्चिम में स्थित अमेरीकी क्षेत्र।

2. अटाकामा रेगिस्तान, दक्षिणी अमेरीका स्थित एक तटीय क्षेत्र जो एंडिज तथा प्रशांत महासागर के बीच में स्थित है।

3. अटलांटिक महासागर के पूर्व से चीन तक फैला हुआ रेगिस्तान का विशाल क्षेत्र जिसमें अनेक रेगिस्तान जैसे सहारा रेगिस्तान, इरान तथा पूर्वकालीन रूस का रेगिस्तान, राजस्थान का विशाल भारतीय रेगिस्तान (थार) तथा चीन एवं मंगोलिया में स्थित ताकला माकन और गोबी रेगिस्तान शामिल हैं।

4. दक्षिणी अमेरीका का कालाहारी रेगिस्तान।

5. आस्ट्रेलिया का अधिकांश क्षेत्र।

हमें रेगिस्तानीकरण की प्रक्रिया पर नियंत्रण रखना होगा, अन्यथा पृथ्वी पर मानव जीवन संकट में पड़ सकता है।



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