सूखा : वर्षा संग्रहण का प्रयास (Rainwater Harvesting)

यदि सरकार इस ओर ध्यान दे तो सूखे को पूरी तरह दूर करना संभव है - और अधिकतम दस वर्षों में।
.देश के कई इलाके भीषण सूखे का सामना कर रहे हैं। आज गुजरात, राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, उड़ीसा व आंध्र प्रदेश में भीषण जल संकट बना हुआ है। समाचार पत्रों में छपी खबरों के मुताबिक सौराष्ट्र के कई कस्बों में जलापूर्ति अत्यंत अनियमित हो गई है। इलाके में अधिकांश बाँध व जलाशय सूख गए हैं। सरकार टैंकरों से पानी मुहैया कराकर और नलकूपों को गहरा कर इस समस्या से निपटने की कोशिश कर रही है। केन्द्र सरकार ने ‘वाटर स्पेशल’ रेलगाड़ियाँ चलाने का वादा किया है। लेकिन क्या जब भी सामान्य से कम बारिश होगी तब हर बार यह पूरी कवायद जरूरी है?

नहीं, हम ऐसा नहीं सोचते और इस समस्या के स्थायी हल के लिये उठाए जा सकने वाले कदमों के बारे में आपको संक्षेप में बताना चाहेंगे। हाँ, अगर लगातार कई साल तक सूखा पड़ता रहे तो बात दीगर है। जिस बदलाव की पैरवी हम कर रहे हैं, वह तभी संभव है जब हमारे नेता देश में जल प्रबंधन को एक नये नजरिये से देखें।

हेग में विश्व जल आयोग ने हाल ही में कई देशों के जल संसाधन मंत्रियों को अपनी रिपोर्ट सौंपी। आयोग की एक बैठक में एक सदस्य ने जल के महत्व के बारे में राजनीतिज्ञों को शिक्षित किए जाने की जरूरत पर जोर दिया। लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूँ, क्योंकि शायद ही मैं किसी ऐसे नेता, से मिला जो जल के महत्व पर जोर न देता हो खासकर भारत में। इसके बावजूद मैंने पाया कि इनमें से शायद ही किसी को जल संकट से निपटने के तरीकों की जानकारी है। इसके अलावा नेताओं को इस बारे में शिक्षित करना कहीं ज्यादा मुश्किल है।

लेकिन कुछ सरकारी कोशिशों के बावजूद कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया और मौजूदा अप्रत्याशित सूखे ने भयंकर तबाही फैलाई। इस सूखे का अंदेशा तो सितम्बर में ही हो चुका था, जब आम चुनाव के दौरान सौराष्ट्र में ‘पहले पानी फिर आडवाणी’ जैसे नारे गूँजने लगे थे और सितम्बर माह में तो उत्तरी गुजरात के कई गाँवों से लोग पलायन करने लगे थे।

शुरुआती दौर में ही पता लगने के बावजूद सरकार टैंकरों के जरिए जलापूर्ति और नलकूपों को और गहरा करने जैसे रस्मी उपायों के अलावा जल संकट से निपटने के लिये कुछ नहीं कर सकी। जल संकट के प्रति भारतीय नेताओं की उदासीनता अत्यन्त आश्चर्यजनक है।

गुजरात और राजस्थान में छाए मौजूदा संकट को बहुत से लोग ‘प्राकृतिक आपदा’ कह सकते हैं लेकिन ये सच्चाई से कोसों दूर है।

तालिका- 1: अप्रैल 2000 तक गुजरात के शहरों में उपलब्ध पेयजल

स्थान

उपलब्ध पेयजल

राजकोट (1)

हर दूसरे दिन 30 मिनट

जामनगर, जसदान और अमरेली (1)

तीन दिन पर केवल एक बार 20 मिनट के लिये

जोडिया शहर, जिला-जामनगर (2)

12 दिन पर 20 मिनट

ध्रोल शहर, जिला-जामनगर (2)

आधी आबादी को 8 दिन में एक बार पानी उपलब्ध

स्रोत: (1) जनयाला श्रीनिवास 2000, फॉरगेट द सेंसेक्स फॉर ए सेकेंड, लूक ह्वाट एल्स इज गोइंग डाउन, द इंडियन एक्सप्रेस, नई दिल्ली, अप्रैल 19, पे-1
(2) जनयाला श्रीनिवास 2000, वन्स ए फोर्टनाइट, दे गेट ए फ्यू ड्राप्स एंड दैट टू फॉर ट्वेन्टी मिनट्स, द इंडियन एक्सप्रेस, नई दिल्ली, अप्रैल 21, पेज-1


दरअसल ये मानवजनित या सरकार-जनित आपदा है। पिछले सौ साल के इतिहास पर गौर करें तो दुनिया और भारत ने जल प्रबंधन के क्षेत्र में दो बड़े बदलाव देखे। पहला तो यह कि लोगों ने धीरे-धीरे अपनी जवाबदेही सरकार पर डाल दी, हालाँकि डेढ़ सौ साल पहले दुनिया में किसी भी सरकार की जिम्मेदारी पानी मुहैया कराने की नहीं थी। दूसरा बदलाव यह आया कि बारिश के पानी का उपयोग करने की साधारण तकनीक लुप्त होने लगी और इसकी जगह बाँध और ट्यूबवेल के जरिए नदियों व भूजल का जमकर दोहन होने लगा। नदियों व जलाशयों में बारिश के कुल जल का मात्र एक छोटा हिस्सा ही जमा हो पाता है। इससे जल स्रोतों पर अधिक दबाव पड़ना स्वाभाविक है।

सरकार पर निर्भरता का सीधा मतलब है जलापूर्ति की लागत में बढ़ोतरी होना। लागत वसूली की स्थिति बदहाल होने से जल योजनाओं की वित्तीय स्थिति प्रभावित हुई है और मरम्मत व रख-रखाव न के बराबर हुए हैं। पानी के इस्तेमाल में सावधानी बरतने में लोगों की दिलचस्पी न होने से जलस्रोतों के बने रहने पर ही प्रश्न चिन्ह लग गया है, जिसका सामना आज हम कर रहे हैं। नतीजतन, सरकारी पेयजल आपूर्ति योजनाएं गंभीर संकट में हैं (गुजरात के शहरों में उपलब्ध पेयजल के लिये देखें तालिका-1)। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद पेयजल संकट से ग्रस्त गाँवों की संख्या में कोई कमी नहीं आयी है। पूर्व ग्रामीण विकास सचिव एन सी सक्सेना के इस बयान पर जरा गौर करें, “सरकारी गणित के मुताबिक दो लाख संकटग्रस्त गाँवों में से दो लाख संकटग्रस्त गाँव घटाने के बाद भी दो लाख संकटग्रस्त गाँव बचे रहते हैं।”

यह एक वास्तविकता है कि औसत सालाना वर्षा के संदर्भ में भारत दुनिया के सर्वाधिक समृद्ध देशों में से एक है। इसे देखते हुए कोई वजह नहीं कि हमें सूखे का सामना करना पड़े।

आज जरूरी है कि हमारे नीति निर्माता मौजूदा संकट से सबक लें कि आने वाले वर्षों में देश को कैसे सूखे से मुक्त बनाया जाए। यह काम ऐसा है कि देश अगर इस पर ध्यान दे, तो इसे एक दशक से भी कम समय में आसानी से पूरा किया जा सकता है।

इसमें कोई शक नहीं कि सरकार ने जल संसाधन विकास पर काफी खर्च किए हैं, लेकिन इन कार्यक्रमों का मुख्य लक्ष्य:

(क) हरित क्रांति के लिये सिंचाई के साधनों का विकास और
(ख) पेयजल आपूर्ति कार्यक्रमों पर रहा।

देश के एक बड़े हिस्से में अब भी सूखे की संभावना बनी हुई है। और निश्चित तौर पर ये स्थिति इन इलाकों की लगातार उपेक्षा की वजह से पैदा हुई है। इसके अलावा सरकार ने जल संतुलन के क्षेत्र में व्यापक हस्तक्षेप को बढ़ावा दिया है। भूजल दोहन के रूप में आज हम जो कुछ कर रहे हैं वो जल संतुलन क्षेत्र में छेड़छाड़ का जीता जागता उदाहरण है। देश में भूजल के दोहन को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है लेकिन भूजल स्तर बढ़ाने के लिये कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं। नतीजतन पूरे देश में भूजल स्तर गिर रहा है। पेयजल जरूरतों के लिये नब्बे फीसदी ग्रामीणों की निर्भरता भूजल पर होने के मद्देनजर, भूजल स्तर में गिरावट से गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाएगा। खासतौर से उन वर्षों में, जब वर्षा कम होगी जैसा कि इस साल हुआ। इस स्थिति में ट्यूबवेल या बोरवेल के मुकाबले खोदे गए कुँओं पर निर्भर रहने वाले गरीब ही सूखे के पहले शिकार होंगे।

1. समाज और वर्षा


सामाजिक तौर पर बारिश का पानी जमा करने की परंपरा आज भी प्रासंगिक है। सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरमेंट ने पिछले साल दिसम्बर में गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश के कई सूखा प्रभावित गाँवों में एक सर्वेक्षण किया था। इन गाँवों में झाबुआ जिले का धलेर छोटी गाँव, दाहोद जिले का थुंथी-कनकासिया गाँव, राजकोट जिले के राज-समाधियाला व मांडलिकपुर गाँव और कच्छ जिले का गाँधी ग्राम गाँव शामिल है। सर्वेक्षण से पता चला कि जिन गाँवों में बारिश के पानी को संचित करने के तरीके अपनाए गए थे, उन गाँवों में पीने का पानी तो उपलब्ध था ही, सिंचाई के लिये भी थोड़ा-बहुत पानी था। दूसरी तरफ पड़ोस के गाँवों में पानी की कमी थी और गर्मी आने पर वहाँ के लोग पलायन की तैयारी कर रहे थे। इस सर्वेक्षण से यह भी पता चलता है कि बारिश के पानी का संचयन गंभीर सूखे की स्थिति में भी आपकी जरूरतें पूरी कर सकता है।

ग्राफ-1: अंतहीन प्रक्रियाः सरकार की ग्रामीण पेयजल आपूर्ति योजनाओं का रिकॉर्ड
तालिका के मुताबिक सर्वेक्षण के बाद पता चला कि काफी संख्या में गाँवों में पेयजल उपलब्ध कराया गया, लेकिन समस्याग्रस्त गाँवों की संख्या बढ़ती रही। उदाहरण के लिये 1980 में केवल 56 हजार गाँवों में ही पेयजल की समस्या होनी चाहिए थी, लेकिन ये बढ़कर 2 लाख 31 हजार तक जा पहुँची। निश्चित तौर से इस पर काफी पैसे खर्च हुए और समस्या को दूर करने के लिये जिस पद्धति का इस्तेमाल किया गया, वह अस्थायी था। पूर्व ग्रामीण विकास सचिव एन सी सक्सेना की ये बात यहाँ सही साबित होती है कि दो लाख समस्याग्रस्त गाँवों में से दो लाख समस्याग्रस्त गाँवों को घटाने के बाद भी दो लाख समस्याग्रस्त गाँव बचे रह जाते हैं।

ग्राफमार्च के आखिर में हमारे निष्कर्ष की एकबार और पुष्टि हुई। भांवता-कोल्याला गाँव को डाउन टू अर्थ जोसफ सी जॉन पुरस्कार देने के लिये मार्च के आखिर में राष्ट्रपति के आर नारायणन के साथ हेलिकॉप्टर से अरवारी वॉटर शेड जाने के दौरान दिल्ली से अलवर के बीच पूरे रास्ते सिर्फ सूखे खेत ही नजर आ रहे थे। यह इलाका लगातार दूसरे साल सूखे का सामना कर रहा था। लेकिन अचानक हमें हरे-भरे खेत नजर आए, और हमने पाया कि हम रेगिस्तानी इलाके के बीच अरवारी वॉटर शेड की हरित पट्टी में पहुँच चुके हैं, जहाँ पिछले 5-10 साल में ग्रामीणों ने बारिश का पानी जमा करने के सैकड़ों केंद्र बनाए हैं। यहाँ अब किसी को बारिश का पानी जमा करने का महत्व समझाने की जरूरत नहीं है। राष्ट्रपति ने तकरीबन मृत अरवारी नदी को देखा, जो लगातार दो साल तक सूखे का सामना करने में असहाय थी, लेकिन यहाँ के कुओं में पानी लबालब भरा था, खेतों में हरियाली थी और किसान अपेक्षाकृत खुश थे।

2. प्राथमिकता ठीक से तय करनी होगी, तभी बारिश के पानी के संचय का महत्व समझ पाएंगे


बारिश के पानी के संचयन का महत्व क्यों है? इसका सीधा सा जवाब है कि इसके जरिए बेकार बह जाने वाले पानी को भी रोककर अपने लिये उपयोगी बनाया जा सकता है। मान लीजिए कि भारत के सबसे कम वर्षा वाले इलाके बाड़मेर में आपके पास एक हेक्टेयर जमीन है और यहाँ सालाना 100 मिमी. बारिश होती है यानी यहाँ आपको सालाना 10 लाख लीटर बारिश का पानी मिलता है जो 15 लीटर रोजाना के हिसाब से 182 लोगों की पीने और खाना बनाने की जरूरतें पूरी करने के लिये पर्याप्त है। अगर आप इस पूरे पानी को जमा नहीं भी कर पाते हैं तब भी आप सामान्य तरीके से सालाना कम से कम 5 लाख लीटर पानी जमा कर सकते हैं। आज ये एक सच्चाई है कि इस सामान्य तरीके को अपना कर ही लोग थार के रेगिस्तान में भी जीवन-यापन कर रहे हैं और यह इलाका आबादी की दृष्टि से दुनिया का सर्वाधिक घनत्व का रेगिस्तान बना हुआ है। अगर मान लें कि सालाना 2 हजार मिमी. बारिश का पानी उपलब्ध होता है जोकि पूर्वी भारत में आम बात है तो सालाना 10 लाख लीटर बारिश का पानी जमा करने के लिये 5 सौ वर्गमीटर जमीन की जरूरत पड़ेगी। एक दिलचस्प तथ्य ये है कि ग्रामीण आबादी का घनत्व सालाना बारिश पर निर्भर होता है। उदाहरण के लिये बाड़मेर में लोग कम है और प्रति व्यक्ति जमीन ज्यादा है जबकि पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना जिले में, जहाँ बारिश अधिक होती है, लोग ज्यादा हैं और प्रति व्यक्ति जमीन कम है।

ऐसा नहीं है कि जो गाँव इस साल भीषण सूखे की चपेट में हैं वहाँ बारिश नहीं हुई। आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और पश्चिमी मध्यप्रदेश के कई इलाकों में बारिश का स्तर अभी भी 500 मिमी. से ज्यादा है, हालाँकि यह सामान्य से कम है लेकिन यह बारिश भी काफी है। सूखे से सर्वाधिक प्रभावित सौराष्ट्र व कच्छ में सालाना औसत बारिश 578 मिमी. है। अखबारों में छपी रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल इन इलाकों में बहुत कम बारिश होने के बावजूद दो सौ मिमी. बारिश हुई। लेकिन इन इलाकों की जनता ने बारिश के इस पानी को बेकार बह जाने दिया।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितनी बारिश हुई, अगर आप इसे जमा नहीं करते तो बारिश होने के बावजूद जल संकट का सामना करना पड़ेगा। अविश्वसनीय होने पर भी यह सच है कि सालाना 11 हजार मिमी. बारिश वाला इलाका चेरापूँजी अब भी पेयजल के भीषण अभाव का सामना कर रहा है। हमने लगातार यह बात कही है कि भारत का कोई भी ऐसा गाँव नहीं है जो बारिश का पानी जमा करके पेयजल व खाना बनाने के लिये पानी की अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा न कर सके। आँकड़े गवाह हैं। भारत में औसतन सालाना 1,170 मिमी. बारिश होती है। यह औसत पश्चिम भारत के रेगिस्तानों में 100 मिमी. बारिश से लेकर पूर्वोत्तर की ऊँची पहाड़ियों पर होने वाली 15 हजार मिमी. बारिश के दायरे में है। देश के करीब 12 फीसदी इलाके में सालाना 610 मिमी. से कम की औसत बारिश होती है जबकि आठ फीसदी से अधिक बारिश करीब 15 दिन में और साल के कुल 8,760 घंटों में से 100 घंटे से कम अवधि में होती है। सालभर में बरसाती दिनों की कुल संख्या गुजरात और राजस्थान के रेगिस्तान इलाकों में 5 से कम दिनों से लेकर पूर्वोत्तर में 150 दिनों तक हो सकती है। इसलिए दिन के कुछ ही घंटों में अचानक होने वाली इस बारिश के पानी को जमा कर लेना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

अधिकांश बारिश कुछ ही घंटों में होने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे पूर्वजों ने पानी जमा करने के विभिन्न तरीके सीखे।

(अ) वे बारिश के पानी को सीधे जमा करते थे। घर के आंगन में होने वाली बारिश का पानी वे वहाँ बने टांके में जमा करते थे और सार्वजनिक जमीन पर होने वाली बारिश का पानी कुंडी नामक कृत्रिम कुँओं में जमा करते थे।

(ब) मॉनसून के वक्त हुई बारिश के बहते पानी को हमारे पूर्वज लद्दाख में जिंगों में, बिहार में अहारों में, राजस्थान में जोहड़ों में और तमिलनाडु में एरी में जमा करते थे।

(स) उत्तर बिहार और पश्चिम बंगाल में बाढ़ के वक्त नदियों से पानी जमा किया जाता था।

जल संचय आज भी प्रासंगिक है। वर्ष 1991 में भारत के कुल 5 लाख 87 हजार 226 रिहायशी गाँवों में कुल 62.9 करोड़ की आबादी रहती थी, यानी हर गाँव में 1,071 लोग रहते थे, जबकि 1981 में प्रति गाँव आबादी 942 थी। अब हम मान लेते हैं कि आज हर गाँव में 1,200 लोग रहते हैं। भारत में होने वाली बारिश का सालाना औसत करीब 1,170 मिमी. है। अगर इस पानी का मात्र आधा हिस्सा ही जमा किया जा सके तो भारत के गाँवों को पीने और खाना बनाने की अपनी सालाना जरूरत पूरी करने के लिये आवश्यक 65.7 लाख लीटर पानी जमा करने की खातिर हर गाँव में 1.12 हेक्टेयर जमीन की जरूरत होगी। अगर सूखा पड़ा हो और बारिश का स्तर सामान्य से आधा हो गया हो तो भी इतना पानी जमा करने के लिये महज 2.24 हेक्टेयर जमीन चाहिए।

एक औसत गाँव की पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिये 236 व्यक्तियों की औसत आबादी के गाँव वाले अरुणाचल प्रदेश में 0.10 हेक्टेयर जमीन की जरुरत होगी, जहाँ गाँव छोटे हैं और बारिश का स्तर बहुत ज्यादा है। दूसरी ओर इस उद्देश्य के लिये प्रति गाँव 4,679 व्यक्तियों की आबादी वाली दिल्ली में 8.46 हेक्टेयर जमीन की जरूरत होगी, जहाँ गाँव बड़े हैं, और बारिश कम होती है। राजस्थान के विभिन्न इलाकों में पेयजल संचय के लिये 1.08 से लेकर 3.64 हेक्टेयर जमीन की जरूरत पड़ेगी, जबकि गुजरात में 1.72 से लेकर 3.30 हेक्टेयर जमीन की जरूरत पड़ेगी (देखें-तालिका 2)। और अगर गाँव वाले इससे ज्यादा पानी जमा कर लेते हैं तो इसका इस्तेमाल सिंचाई में किया जा सकता है। क्या ये असम्भव कार्य लगता है और क्या किसी गाँव में इतनी जमीन उपलब्ध नहीं है? भारत में कुल 30 करोड़ हेक्टेयर भूक्षेत्र है। अब मान लेते हैं कि भारत के 5 लाख 87 हजार गाँव दुर्गम जंगली क्षेत्रों, ऊँची पहाड़ियों और अन्य निर्जन तराई क्षेत्रों को छोड़ कर 20 करोड़ हेक्टेयर जमीन का उपयोग कर सकते हैं, तो भी हर गाँव के हिस्से 340 हेक्टेयर जमीन आती है। यानी कुल 3.75 अरब लीटर पानी जमा किया जा सकता है। यह गणना बारिश का पानी जमा करने की क्षमता को संभव बताती है। साफ है कि भारत में किसी के प्यासे रहने का कोई कारण नहीं है।

इसके अलावा भारत के अधिकांश खेतों को हर साल कम पानी की जरुरत वाली फसलें उगाने के लिये बारिश के जरिए सिंचाई का पानी चाहिए। अगर हर गाँव यह सुनिश्चित करे कि गाँव की समस्त जमीन और उससे जुड़ी सरकारी जमीन पर होने वाली बारिश का पूरा पानी जमा कर लिया जाएगा, तो ज्वार और मक्का जैसी कम पानी की फसलें उगाने के लिये गाँव के कुओं में पर्याप्त पानी होगा।

लेकिन हालात ये हैं कि राष्ट्रीय जलग्रिड या नर्मदा पर बन रहे बाँध जैसे सभी प्रस्तावित बाँध मिलकर भी भारत के हर गाँव को सिंचाई के लिये नदी का पर्याप्त पानी मुहैया नहीं करा पाएंगे। भारत की कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा तब भी पानी के अभाव का सामना करेगा। आधिकारिक आँकड़ों से भी इसकी पुष्टि होती है। राष्ट्रीय एकीकृत जल संसाधन विकास योजना आयोग का अनुमान है कि 14.5 करोड़ हेक्टेयर की मौजूदा कृषि भूमि के मुकाबले कुल सिंचाई क्षमता ज्यादा से ज्यादा 14 करोड़ हेक्टेयर जमीन के लिये है। करीब 7.59 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई भूतल जल योजनाओं के जरिए होगी, जिसमें से 5.85 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई वृहत मझौली परियोजनाओं के जरिए 1.74 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई टैंकों जैसी लघु सिंचाई परियोजनाओं के जरिए और 6.41 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई भूजल परियोजनाओं के जरिए की जाएगी। (अध्याय-3, पेज 36) लेकिन अभी ये सपना है। वर्ष 1992-93 में करीब 14.5 करोड़ हेक्टेयर के कुल फसली क्षेत्र में से 11.934 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में पानी की कमी थी, जिसमें से 7.84 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में खाद्यान्न की खेती होती है।

लेकिन पानी के अभाव वाले इन क्षेत्रों के अधिकांश हिस्से की उत्पादकता बढ़ाने के लिये यहाँ की बारिश पर्याप्त है अगर बारिश के पानी का संचय और भूजल दोहन का संयोजन ठीक है। ये क्षेत्र आज देश के सर्वाधिक गरीब लोगों के लिये मददगार साबित हो रहे हैं। अगर हम बारिश का पानी जमा नहीं करें तो पानी के अभाव वाले क्षेत्रों के निवासियों की परेशानियाँ दूर नहीं होंगी।

तालिका-2: भारत का प्रत्येक गाँव अपने पेयजल का प्रबंध खुद कर सकता है: पेयजल और खाना बनाने में खपत होने वाले पानी की पूर्ति हेतु वर्षा के पानी को इकट्ठा करने के लिये देश के अलग-अलग राज्यों में प्रतिगाँव जमीन की जरूरत (हेक्टेयर में)

राज्य

मौसमवार क्षेत्र

औसत वार्षिक वर्षा (मिली मीटर)

2001 तक प्रति गाँव में ग्रामीणों की अनुमानित संख्या

पेयजल और खाना बनाने में पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिये प्रति गाँव, जमीन की आवश्यकता, जहाँ सामान्य वर्षा का आधा संचित हो सके (हेक्टेयर)

भयंकर सूखे की स्थिति में, जब सामान्य वर्षा % से कम हो, तब पेयजल और खाना बनाने की जरूरतों को पूरा करने के लिये वर्षा के पानी को संचित करने के मकसद से प्रति गाँव जमीन की आवश्यकता (हेक्टेयर)

भारत

-

1,170

1220

1.14

2.28

अंडमान और निकोबार द्वीप

अंडमान और निकोबार द्वीप

2,967

408

0.16

0.32

अरुणाचल प्रदेश

अरुणाचल प्रदेश

2782

236

0.10

0.20

असम

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