थार मरुभूमि (Thar Desert)

थार क्षेत्र की खेती और जमीन का अन्य उपयोग बरसात पर ही टिका है। बरसात अच्छी हुई तो अधिक जमीन पर फसल लगती है। चारे की भरमार हो जाती है। भविष्य के लिये भी चारा भूसा सम्भालकर रख लिया जाता है। बरसात का पानी जमीन के अन्दर बनी कुंडियों में सहेज लिया जाता है। चूँकि बरसात की मर्जी का बहुत भरोसा नहीं होता, इसलिये यहाँ मिश्रित खेती विकसित हुई है। यहाँ लोग और पशु एक-दूसरे के काम आते हैं।थार मरुभूमि 4.46 करोड़ हेक्टेयर में पसरी है, जिसका 2.78 करोड़ हेक्टेयर इलाका भारत में है और बाकी पाकिस्तान में। यह मरुभूमि पूरब में अरावली पर्वतमाला, पश्चिम में सिंधु के उर्वर इलाके, पाकिस्तान की नारा घाटी और कच्छ के रण के क्षारीय इलाके, तथा उत्तर में हरियाणा और पंजाब के जलोढ़ मैदानी भाग से घिरी है।

भारत में थार मरुभूमि का अधिकांश हिस्सा राजस्थान के पश्चिमी भाग में है। गुजरात के पूरे कच्छ और कई अन्य जिलों का कुछ-कुछ हिस्सा रेगिस्तानी है। पंजाब के भठिंडा और फिरोजपुर तथा हरियाणा के हिसार और महेंद्रगढ़ जिलों का कुछ-कुछ हिस्सा भी रेगिस्तानी है। थार के करीब 60 फीसदी हिस्से पर कम या ज्यादा खेती की जाती है, करीब 30 फीसदी हिस्से पर वनस्पतियाँ हैं, पर यह मुख्यतः चारागाह के रूप में ही काम आता है। इसके पूर्वी हिस्सों में सालाना औसत 500 मिमी. पानी बरसता है तो पश्चिम में 100 मिमी पर यह पानी भी बहुत व्यवस्थित ढंग का नहीं होता। किसी साल बहुत-ज्यादा पानी पड़ गया तो किसी साल एकदम नहीं। सो, खेती बहुत ही मुश्किल है और हर दस में से चार साल सूखा रहता है। मरु क्षेत्र के अधिकांश हिस्से में चार-पाँच महीने तेज हवाएँ चलती हैं। गर्मियों में रेतीले तूफान बहुत आम हैं।

पर इस इलाके में मौजूद हरियाली, भले ही वह कितनी भी कम क्यों न हो, विविधता भरी है। यहाँ करीब 700 किस्म के पेड़-पौधे पाये जाते हैं जिनमें से 107 किस्म की तो घास ही है। इनकी जड़ें बहुत अन्दर तक जाती हैं और ये प्रतिकूल जलवायु में भी जीवित रहने और अनुकूल मौसम होते ही ज्यादा-से-ज्यादा प्राण तत्व-पानी और अन्य पोषक तत्व-ले लेने में सक्षम हैं। स्थानीय घास की एक विशेषता असंख्य बीज पैदा करते जाना भी है। यहाँ की ज्यादातार पैदावार पौष्टिकता और लवणों से भरी है। इसके साथ ही थार क्षेत्र को सबसे उन्नत किस्म के कुछ पशुओं का ‘वरदान’ भी मिला हुआ है। देश के ऊन का 50 फीसदी हिस्सा यहीं होता है और उत्तर भारत में श्रेष्ठ किस्म के बैल यहीं से जाते हैं।

पर थार क्षेत्र की खेती और जमीन का अन्य उपयोग बरसात पर ही टिका है। बरसात अच्छी हुई तो अधिक जमीन पर फसल लगती है। चारे की भरमार हो जाती है। भविष्य के लिये भी चारा भूसा सम्भालकर रख लिया जाता है। बरसात का पानी जमीन के अन्दर बनी कुंडियों में सहेज लिया जाता है। चूँकि बरसात की मर्जी का बहुत भरोसा नहीं होता, इसलिये यहाँ मिश्रित खेती विकसित हुई है। यहाँ लोग और पशु एक-दूसरे के काम आते हैं।

1. राजस्थान


भारत के पश्चिम-उत्तरी क्षेत्र में स्थित राजस्थान रजवाड़ों का प्रदेश है। अरावली पर्वत शृंखला इसे भौगोलिक और जलवायु की दृष्टि से दो भागों में बाँटती है। इसका उत्तर-पश्चिमी भाग थार मरुभूमि का रेतीला मैदान है और पूर्वी हिस्सा मालवा पठार का भाग है। पूर्वोत्तर के भरतपुर और बूँदी जलोढ़ मिट्टी से बने हैं तथा चम्बल और बाणगंगा नदियों के इलाके हैं।

उत्तर-पश्चिमी राजस्थानी इलाका सुदूर पश्चिम में एकदम शुष्क है तो उत्तर-पश्चिम की तरफ बढ़ते जाने पर अपेक्षाकृत अधिक आबाद और उर्वर इलाके मिलते जाते हैं। कुछ पट्टियों की ज्यादा उर्वर और उपजाऊ जमीन को छोड़ दें तो रेगिस्तान के इलाके में खेती बहुत मुश्किल और बहुत कम है। फिर भी इस इलाके के जोधपुर और जैसलमेर जैसे शहर बहुत ही व्यवस्थित और सुन्दर ढंग से बसाए गए हैं। अरावली पर्वत माला से निकलने वाली लूणी नदी अजमेर से शुरू होकर कच्छ के रण तक जाती है, और इस शुष्क इलाके के काफी बड़े हिस्से की जीवन रेखा-सी है। इसके दोनों किनारों पर काफी गाँव बसे हैं।

राजस्थान का शुष्क इलाका करीब-करीब अनावृष्टि वाला मरु प्रदेश है। कुछ इलाकों में बरसात शायद ही करीब औसत 120 मिमी से ऊपर जाती है। समुद्र तल से पानी लेकर चले बादल गुजरात के काठियावाड़ और ज्यादा-से-ज्यादा अरावली पर्वतमाला की ढलान तक आते-आते अपना पूरा पानी रीता कर चुके होते हैं। इस पूरे इलाके में असाधारण ऊँचाई (करीब 1220 मीटर) पर स्थित माउंट आबू में सालाना औसत 1525-1780 मिमी बरसात होती है। मरु प्रदेश के पश्चिमी इलाके में पानी की इतनी कमी है कि सिंचाई की बहुत विस्तृत व्यवस्था हो ही नहीं सकती और पारम्परिक रूप से यहाँ के लोग कुंडियों और बरसाती जल संचय की अन्य विधियों पर आश्रित रहे हैं।1

पश्चिमी राजस्थान, जो मुख्यतः मरुभूमि है, पुराने बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर रियासतों को मिलाकर बना है। जैसलमेर शहर को चारों ओर से चट्टानी पर्वतमाला ने घेर रखा है। शुरुआती ब्रिटिश गजेटियरों से पता चलता है कि इस इलाके में बहुत कम गाँव बसे थे और जो गाँव थे वे एक कुएँ के इर्द-गिर्द बसे कुछ झोपड़ियाँ भर थे। कुओं की गहराई अक्सर 76-122 मीटर होती थी, जबकि एक कुआँ 150 मीटर गहरा भी मिला है। जोधपुर में कुएँ ही पानी का मुख्य स्रोत थे-पीने के लिये भी और खेत सींचने के लिये भी। कुओं से सींची गई जमीन को चाही कहा जाता था।2 जोधपुर जिले के पूर्वी हिस्से में कुओं की भरमार थी और वह इलाका ज्यादा उर्वर भी था। यहाँ रबी और खरीफ, दोनों फसलें होती थीं। कुओं से पानी निकालने के लिये कई विधियों का चलन था।

जोधपुर के लिये लूणी एक महत्त्वपूर्ण नदी है। इसके पाट में स्थित रेत पर तरबूज लगाए जाते हैं। पहले जब कभी-कभार बाढ़ आती थी और नदी का पानी बाहर निकलता था तो उसके साथ आई मिट्टी-रेत पर गेहूँ और जौ की खेती की जाती थी। इस सदी के शुरू में अंग्रेज अधिकारियों ने जोधपुर जिले में मौजूद 35 तालाबों की गिनती की थी, जिनमें से 24 खालसा गाँवों में स्थित थे। लूणी और कुहिया नदियों पर बाँध डालकर दो कृत्रिम झीलों-जसवंतसागर और सरदार समंद को भर लिया जाता था। पहले ताल से 8,100 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई हो सकती थी, जबकि सरदार समंद 7,290 हेक्टेयर जमीन सींचने में सक्षम था। अधिकांश छोटे ताल-तलैयों की तलहटी में ही गेहूँ की खेती की जाती थी। सरोवरों से निकली नालियों से सींची जमीन नाहरी कहलाती थी। किसान मिलजुल कर अपने खेतों के चारों ओर मिट्टी की बाड़ खड़ी करते थे जिससे पशु अन्दर आकर फसल को बर्बाद न करें। इन मिट्टी के बाड़ों से बरसाती पानी भी रुकता था। तीन महीने तक पानी ठहर जाने से जमीन तर हो जाती थी और वहाँ लगी फसल बाद में बहुत सींचे बगैर भी अच्छी पैदावार देती थी।3

1897 के पूर्व बीकानेर में व्यवस्थित सिंचाई वाली कोई बड़ी प्रणाली नहीं थी। तब इस राज के शासकों ने घग्गर सिंचाई नहर और बड़े-बड़े तालाबों का निर्माण कराया। गाँव के लोग पहले से ही कुंडियों और सरों में बरसात का पानी जमा करते हैं जिनका निर्माण खास तरह की मिट्टी में होता था। कुंड-कुंडियाँ ढकी रहती थीं।3,4

मरु प्रदेश के अधिकांश गाँवों में छोटे-छोटे तालाब थे और बरसात ठीक हो तो इनमें पूरे गाँव के पीने लायक सात-आठ महीनों का पानी जमा हो जाता था। अगर कम बरसात हो तो पानी आधे साल से पहले ही खत्म होने लगता था और दूरदराज के गाँवों से लाना पड़ता था। कई बार 20-30 किमी दूर से भी पीने का पानी लाया जाता था। गरीब लोग आमतौर पर इतनी दूर से पानी नहीं ला पाते थे और अक्सर खारे पानी में ही दही डालकर पी लेते थे। पूरब की तरफ हर गाँव में टांके खोदे जाते थे, जिनमें बरसात का पानी जमा होता था और बारिश बीतने के बाद ही इसका प्रयोग किया जाता था।5

इतनी मुश्किल जलवायु के बीच भी मध्यकाल में पश्चिमी राजस्थान की समृद्धि, सम्पदा और इतने लोगों की हर प्रकार की जरूरतों की पूर्ति यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों के बहुत ही कुशलतापूर्ण प्रयोग पर आधारित थीं। 1200-1300 वर्षों का यहाँ का इतिहास तो जगजाहिर ही है। यहाँ के शहरी लोगों ने मुश्किल स्थिति और उपलब्ध क्षीण प्राकृतिक संसाधनों के अनुसार ही अपना जीवन ढाल लिया था। और चाहे मरुभूमि के ग्रामीण हों या शहरी, सभी का जीवन पारिस्थितिकी से मेल खाने वाला था; और तभी यहाँ सभ्यता-संस्कृति फली-फूली। इतने कम पानी वाले इलाकों में दुनिया में कहीं भी न तो आबादी का घनत्व इतना रहा है, न ऐसी समृद्धि।

सांस्कृतिक मान्यताएँ


थार के समाज ने जल की हर बूँद का बहुत ही व्यवस्थित उपयोग करने वाली आस्थाएँ विकसित कीं और लोक जीवन की इन्हीं मान्यताओं ने इस मुश्किल प्रदेश में जीवन को चलाया, समृद्ध किया और प्रकृति पर भी जरूरत से ज्यादा दबाव नहीं पड़ा। पश्चिमी राजस्थान में पानी के महत्त्व से जुड़ी अनगिनत लोक कथाएँ हैं और ये इसके उपयोग की पवित्रता के प्रति आस्था बढ़ाती हैं। एक कहावत है कि अगर बहू घड़ा भर घी गिरा दे, तब भी सास कुछ नहीं बोलती जबकि पानी गिरा दे तो डाँट जरूर पड़ती है। इसी प्रकार कहावत है कि साधारण मेहमान है तो मलाईदार दूध दो, विशेष मेहमान हो तो पानी-वह भी एक गिलास पानी दो। इससे ज्यादा माँगे तो दूसरा गिलास दूध का दो। राजस्थान में अभी भी पानी गिलास में नहीं, लोटे में दिया जाता है। इसे मुँह से लगाकर पानी नहीं पीते। बचा पानी फिर किसी और के काम आता है।

पानी की हर बूँद उपयोग में आ जाये, इसके लिये दूसरे लोक व्यवहार भी हैं। जैसलमेर के कुछ घरों में आज भी लोग लकड़ी की छोटी चौकी पर बैठकर नहाते हैं जिसके नीचे एक बरतन रहता है। नहाने से गिरा पानी इसमें जमा होता है, जो जानवरों के काम आ जाता है। इसी प्रकार जैसलमेर, पोखरण और फलोदी में लोग घर के बाहर एक ऊँचे पत्थर पर नहाते हैं। यहाँ से पानी बहकर उस बड़े हौज में चला जाता है जिसका पानी जानवरों के प्रयोग में आता है। जिन गाँवों में मीठा जल कम है, वहाँ इसका प्रयोग सिर्फ पीने के लिये किया जाता है। कपड़े धोने वगैरह का काम खारे पानी से ही किया जाता है।

बरसात और पानी का आना राजस्थानी लोक जीवन में मंगल, उत्सव और खुशियों का अवसर है। बादलों को लेकर जितने लोकगीत राजस्थान में हैं उतने शायद कहीं न होंगे। यहाँ उस गंडेरी को लेकर भी गाने हैं जिसे सिर पर रखकर औरतें उसके ऊपर घड़ा लेकर चलती हैं। अधिकांश तालाबों के पास मन्दिर हैं। अनेक अवसरों पर जलते दीप पानी में तैरा दिये जाते हैं। माना जाता है कि पानी हर आदमी के जीवन को खुशियों और प्रकाश से भर देता है।

जल संचय, वितरण और उपयोग, सभी काम स्थानीय समुदाय द्वारा साझे तौर पर किये जाते थे। मानसून के पहले सारा गाँव मिलकर तालाब के आगोर या पायतान को पूरी तरह साफ कर देता था। इसी तरह तालाबों से गाद निकालने में पूरा समाज श्रमदान करता था।

मरु प्रदेश के अधिकांश गाँवों में छोटे-छोटे तालाब थे और बरसात ठीक हो तो इनमें पूरे गाँव के पीने लायक सात-आठ महीनों का पानी जमा हो जाता था। अगर कम बरसात हो तो पानी आधे साल से पहले ही खत्म होने लगता था और दूरदराज के गाँवों से लाना पड़ता था। कई बार 20-30 किमी दूर से भी पीने का पानी लाया जाता था। गरीब लोग आमतौर पर इतनी दूर से पानी नहीं ला पाते थे और अक्सर खारे पानी में ही दही डालकर पी लेते थे।अंग व्यवस्था पानी के व्यवस्थित और समान वितरण वाली थी। हर घर के सदस्यों और उसके पशुओं के हिसाब से पानी की जरूरत तय की जाती थी। एक आदमी एक इकाई होता था, पर जानवरों का हिसाब अलग था। वहाँ बड़े पशु तो एक इकाई माने जाते थे, पर 10 बकरियों को मिलाकर एक इकाई पूरी होती थी। जब हर घर की जरूरत का निर्धारण हो जाता था तब हर घर पानी के स्रोत से पानी निकालने के लिये एक दिन का श्रमदान करता था। कई कारणों से कुछ परिवारों को इसमें छूट भी दी जाती थी। जानवरों को पानी खींचने या ढोने के काम में नहीं लगाया जाता था। ऐसा होने पर वे जानवर ज्यादा पानी पी सकते थे। जानवरों के लिये घर पर पानी नहीं ले जाया जाता था। जानवर पानी के स्रोत पर आकर ही पानी पीते थे और वह भी सिर्फ रात में, क्योंकि यह आम धारणा थी कि वे रात में कम पानी पीते हैं, दिन में ज्यादा।

शहरी व्यवस्थाएँ


शहर कहाँ बसे, यह तय करने में पानी से नजदीकी एक बड़ा कारण रहा है, पर मरुभूमि के लिये यह और भी बड़ा कारण रहा है। लूणी की सहायक बांदी नदी के दाहिने तट पर बसे पाली को इसी नदी के रिसाव के समृद्ध भूजल के चलते भरपूर और अच्छा पानी मिलता रहा है।

जैसलमेर को अपना नाम अपने संस्थापक राव जैसल और पर्वत प्रदेश मेर या मेरु को जोड़ने से मिला। लेकिन पर्वत शृंखला के बीच स्थित होने के बाद भी इसे पर्वतीय नखलिस्तान का दर्जा प्राप्त है। और इसी के चलते असीमित शुष्क प्रदेश में स्थित होकर भी जैसलमेर युगों से अपराजेय बना रहा। जैसलमेर का किला राजस्थान के किलों में दूसरा सबसे पुराना है। यह आस-पास के भूतल से 75 मीटर ऊँची पहाड़ी के ऊपर बना है। जैसलमेर शहर को 1965 के पहले तक मुख्यतः घड़ीसर के विशाल सरोवर से ही पानी की आपूर्ति की जाती थी।

जैसलमेर : घड़ीसर का निर्माण जैसलमेर के राजा घड़सी रावल ने सन 1367 में कराया था। यहाँ गुलाब सागर, मलका, मूलताला और सुधारार जैसे अनेक दूसरे तालाब भी हैं। बरसात कम हो तो इनका पानी कुछ महीनों में ही चट हो जाता, सिर्फ घड़ीसर का पानी कभी नहीं चूकता। पहले रोज शाम को औरतें यहाँ पानी लेने जुटती थीं। किले के अन्दर मीठे पानी के तीन कुएँ हैं और नीचे बसे शहर में भी ऐसे छह कुएँ हैं। किंवदंती है कि सबसे बड़े जैसालू कुएँ का निर्माण खुद भगवान श्री कृष्ण ने किया था। जब प्यासे अर्जुन ने उनसे पानी माँगा तो अपने सुदर्शन चक्र से उन्होंने यह कुआँ खोद डाला। इसका नाम शहर को बसाने वाले महाराज जैसल के नाम पर जैसालू रखा गया। आज किले के अन्दर के तीनों कुएँ बन्द कर दिये गए हैं, क्योंकि किले तक भी टोंटी वाले पानी की आपूर्ति शुरू हो गई है।

घड़ीसर का आगोर विशाल था और सिर्फ एक तरफ ही इसका विस्तार 20 किमी का था। इसका रख-रखाव राजा की देखरेख में होता था और हर बरसात के पहले इसके पूरे आगोर को साफ किया जाता था। जिन नहरों से तालाब में पानी आता था उनको भी साफ किया जाता था। इस आगोर क्षेत्र में जानवरों को ले जाने की मनाही थी। तालाब में नहाना अक्षम्य अपराध माना जाता था। अगर कोई तालाब को गन्दा करता हुआ या इसके आगोर में पशु ले जाता हुआ पकड़ा जाता था तब खुद राजा उसे दंड देते थे, जो छह महीनों की कैद तक जा सकता था। आगोर से पानी सीधे घड़ीसर में नहीं आता था। एक कम ऊँचाई का बाँध बना था जो रेत कणों और मिट्टी के मोटे कणों को रोक लेता था जिससे सिर्फ साफ पानी ही तालाब में जाता था।

हाल के वर्षों में नहर की पूरी जलापूर्ति व्यवस्था एकदम बदल ही गई है। आज घड़ीसर एकदम उपेक्षित हो गया है। लोगों को इसमें नहाते और जानवरों को आगोर में घूमते देखा जा सकता है। आगोर के जल निकासी वाले रास्ते भी टूट-फूट गए हैं।

1989-90 में जैसलमेर की आबादी करीब 30,000 थी। यहाँ के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के इंजीनियर जी. गहलौत के अनुसार, अभी जैसलमेर शहर को रोज 7.5 लाख गैलन पानी की जरूरत है और यह भूजल निकालकर ही किया जा रहा है। पानी बाड़मेर रोड पर शहर से 12 किमी दूर स्थित डबला गाँव से आता है। वहाँ गड़े आठ नलकूपों से पानी लाकर जैसलमेर शहर को दिया जाता है। ये सभी लाठी शृंखला में गाड़े गए हैं, इसलिये पर्याप्त मीठा पानी देते हैं। भूजल 80 मीटर नीचे है। यहाँ से पानी शहर में लाकर 300 हार्स पावर के पम्प से किले के ऊपर पहुँचाया जाता है, जहाँ पानी जमा करने की एक बड़ी टंकी बनाई गई है। यहाँ से छोड़ा गया पानी पूरे शहर में अपने आप पहुँच जाता है, क्योंकि किला काफी ऊँचाई पर है।

नलकूपों को गाड़ने और नलकों से पानी देने की व्यवस्था ने जैसलमेर शहर में नई परेशानियाँ पैदा की हैं। गन्दे पानी की निकासी की पुरानी व्यवस्था अब एकदम कम पड़ने लगी है। पूरे शहर में घरों से निकलने वाली नालियों का पानी जहाँ-तहाँ बिखरकर मच्छरों का अभयारण्य बना हुआ है। जैसलमेर के निर्माताओं ने पहले जल निकासी की कोई बड़ी व्यवस्था करनी जरूरी नहीं समझी थी। घर एकदम पास-पास बने हैं और सड़कें-नालियाँ तंग हैं। सो, अब नालियाँ बिछाना बहुत मुश्किल काम है।

गन्दे पानी से किले की दीवारों पर सीलन आ रही है और इसके ऊपर घास-फूस और पौधे की जड़ें जमाने लगे हैं। चूँकि इस शहर का आर्थिक जीवन मुख्यतः पर्यटन से चलता है, इस ऐतिहासिक किले को हुआ नुकसान शहर की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुँचाएगा।

बीकानेर : राजा राव बीका ने इस शहर की स्थापना सन 1489 में कराई थी। ऐसा लगता है कि बीकानेर शहर को बसाने के फैसले के पीछे यहाँ मुडिया कांकर की पट्टी मिलने का बहुत बड़ा हाथ था। मिट्टी की यह किस्म जल संचय के हिसाब से बहुत उपयोगी है। इसी के आधार पर यहाँ बरसात के पानी को संचित करने के लिये तालाबों की एक शृंखला बनाई गई। इन तालाबों के आगोर को पवित्र जगह माना जाता था और यहाँ शौच वगैरह की सख्त मनाही थी। अक्सर इन इलाकों को, जिनमें कुछ तो विशाल थे, हरियाली से भरा रखा जाता था। बीकानेर के आस-पास के शहरों में भी तालाबों की भरमार है। इनमें सबसे नामी कोलायत तालाब का आगोर 14,900 हेक्टेयर, गजनेर का 12,950 हेक्टेयर और गंगा सरोवर का 7,950 हेक्टेयर का है।

शहर की पानी की जरूरतें इन तालाबों के साथ ही घर के कुओं और टांकों से पूरी होती थीं, जो अपने घर और परिसर में पड़ी बारिश के पानी को संचित कर लेने के लिये बनाए जाते थे। टांका का पानी सिर्फ पीने के काम आता था। अगर किसी साल कम बरसात हुई और टांका नहीं भरा तो सबसे पहले पास के कुओं और तालाबों से पानी लाकर उसे भर लिया जाता था। इस प्रकार शहर के लोगों की पानी की जरूरतें पूरी होती थीं।

इस सदी के शुरू में बीकानेर में 40 तालाब थे। आज हर्षतालाब के अलावा बाकी सभी तालाबों के आगोर नष्ट हो गए हैं। जस्सोलाई, बाघीनाडा और रंगोलाई जैसे नामी पुराने तालाब आज बीकानेर शहर में बिला गए हैं। पहले जो नहर सुरसागर सरोवर को पानी पहुँचाती थी आज शहर का गन्दा नाला बन गई है और सुरसागर शहर भर की नालियों के लिये एक बड़ा कुंड। चूँकि नहर की ढलान तालाब की तरफ है, इसलिये तालाब से गन्दा पानी निकालने वाले पम्प कोई लाभ नहीं दे पाते। सुरसागर के चारों तरफ बने मकानों ने भी वहाँ का खुलापन खत्म किया है। परिणाम हुआ है कि बीकानेर को अब एक नई मुश्किल-बाढ़-का सामना करना पड़ रहा है। जब कभी भी ज्यादा पानी बरसता है, गन्दे तालाबों का पानी उफनकर आस-पास के इलाकों में भर जाता है। और कभी वह समय भी था जब राजे-महाराजे खुद चलकर सुरसागर की सीढ़ियों पर बैठकर प्रसन्न होते थे।

कोलायत के जलग्रहण क्षेत्र में असंख्य ईंट भट्ठे लग गए हैं। ईंट के लिये मिट्टी निकालने से जगह-जगह बड़े-बड़े खंदक बन गए हैं। अब पानी तालाब में जाने की जगह इनमें भरता जाता है। भट्ठों की आँच के लिये आगोर के पेड़ों को भी बड़ी संख्या में काटा गया है। कोलायत के पूरे आगोर को नष्ट किया जा रहा है और इसके साथ ही पिछले कुछ वर्षों में तालाब के पानी के स्तर में भी गिरावट आती जा रही है।

बीकानेर के हर घर में पीने के पानी के लिये टांका है। ये घर के आँगन या मकान के परिसर में बने हैं। असंख्य कुओं और तालाबों के साथ वे शहर की पानी की जरूरतें पूरी करते थे। पर राजस्थान नहर के चलते अब शहर को भरपूर पानी उपलब्ध हो रहा है। परिणाम हो रहा है टांकों की उपेक्षा। अब बचे टांकों का उपयोग नलके के पानी को ही रखने के लिये किया जा रहा है। अब तो यह काम प्लास्टिक की टंकियाँ करने लगी हैं। आज बीकानेर में सिर्फ पक्के वैष्णव लोग ही टांकों का प्रयोग करते हैं, क्योंकि वे दूसरों का छुआ पानी नहीं पीते।

1989-90 में बीकानेर शहर की आबादी 3.5 लाख के करीब थी और शहर को रोज 1.1 से 1.3 करोड़ गैलन पानी की जरूरत थी। 1958 में शहर में जब जलापूर्ति शुरू हुई थी तब उसे रोज 30 लाख गैलन पानी की जरूरत थी। 1978 में यहाँ नई प्रणाली की अनुमति दी गई, जिसमें राजस्थान नहर से लूणकरणसर लिफ्ट नहर द्वारा यहाँ तक पानी ले आने की योजना थी। बीकानेर-लूणकरणसर लिफ्ट नहर योजना की क्षमता रोज 65 लाख गैलन पानी लाने की है। इस योजना से अभी 25 से 35 लाख गैलन पानी ही रोज लिया जा रहा है। कुछ स्थानीय स्रोतों के साथ अभी शहर की पानी की जरूरतें आराम से पूरी हो जा रही हैं। समस्या सिर्फ तभी होती है जब बिजली न हो।

पर आज भी शहर के पानी की मुख्य जरूरतें यहाँ के असंख्य पुराने कुओं और नए नलकूपों से पूरी हो रही हैं। 1.1 से 1.3 करोड़ गैलन की रोजाना की जरूरत में इन स्थानीय स्रोतों से ही 85 से 95 लाख गैलन पानी मिल जाता है। इस प्रकार बीकानेर शहर की जलापूर्ति मुख्यतः भूजल पर ही आश्रित है। जलापूर्ति विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जब तक राजस्थान नहर में पानी है, डरने की कोई बात नहीं है। लेकिन वे इस तथ्य की उपेक्षा कर देते हैं कि आज भी शहर मुख्यतः जिस पानी पर चल रहा है उसका स्रोत सूख सकता है।

फलोदी, बाड़मेर और बलोतरा : अपने घर की छत पर गिरे बरसाती पानी को संचित करना पूरे थार मरुभूमि प्रदेश के गाँवों और शहरों में बहुत आम है। ढलवा छत पर पड़ने वाले बरसाती पानी को एक पाइप के सहारे आँगन या पिछवाड़े जमीन के अन्दर बनाए गए टांके में ले जाया जाता है। पश्चिमी राजस्थान में बरसाती पानी को संग्रहित करने की यह तकनीक काफी हद तक कलाकारी जैसी लगती है। पहली बरसात के पानी को जमा नहीं करते, क्योंकि इससे छत और पाइप में बैठी धूल-मिट्टी और अन्य प्रकार की गन्दगी की सफाई हो जाती है। इसके बाद का पानी जमा किया जाता है। टाँकों का आकार अक्सर एक बड़े कमरे जितना होता है। एक घर का टांका तो 6.1 मीटर गहरा, 4.27 मीटर लम्बा और 2.44 मीटर चौड़ा मिला। दुर्भाग्य से नलके का पानी आने के साथ ही थार क्षेत्र में छतों से पानी बटोरने का चलन धीरे-धीरे उठता जा रहा है।

पारम्परिक रूप से टांके ही जल संचय का सबसे विश्वस्त तरीका रहे हैं। इससे पानी खर्च करने में भी सावधानी रखी जाती थी जिससे गर्मियों में कमी न हो जाये। कम बरसात होने पर कुओं, नाडियों और तालाबों से पानी लाकर घर के टांकों को भर लिया जाता था। घर के बुजुर्गों को ही टांकों के रख-रखाव का सबसे ज्यादा ख्याल रहता था, क्योंकि उन्होंने अपने पूरे जीवन भर इसी का पानी पिया था। शुरुआती वर्षों में लोगों को नलके के पानी का स्वाद अच्छा नहीं लगा। टांकों का पानी बीमारों को भी दिया जाता था।

मरुभूमि की गर्मी से बचने के लिये टांकों से लगा एक कमरा भी बनाया जाता था। चूँकि यह कमरा जमीन के नीचे होता था और इसकी तथा टांके की एक दीवार साझी होती थी इसलिये इसमें काफी ठंडक रहती थी और दोपहर में पूरा परिवार इसी कमरे में आराम करने चला जाता था।

जोधपुर जिले का फलोदी शहर बीकानेर-जैसलमेर रोड पर स्थित है और 1980 के दशक में इसकी आबादी करीब 36,000 थी। राजस्थान नहर का पानी आने के पहले यहाँ के हर घर में एक टांका होता था। इसके साथ ही बस्ती में सात सार्वजनिक तालाब-रानीसर, रामसर, हिवासर, सिवसर, न्यातालाह, खत्री और चिकलिण-थे। तीन बड़े कुएँ भी थे। बरसात के बाद तालाबों का पानी ही प्रयोग किया जाता था और टांकों के पानी को गर्मियों के लिये सुरक्षित रखा जाता था। लेकिन अन्य जगहों की तरह ही जब फलोदी में राजस्थान नहर का पानी पहुँचने लगा, टांकों की स्थिति खराब होने लगी। वैसे अभी भी काफी सारे लोग टांकों का पानी पीते हैं, पर यह संख्या 2000 परिवार के आस-पास रह गई होगी। अभी भी फलोदी के लोग टांके बनवाते हैं, पर अब इसे बरसाती पानी की जगह नलके वाले पानी से ही भरने का चलन जोर पकड़ता जा रहा है।

फलोदी के तालाबों और सरोवरों की हालत भी टांकों जैसी होती जा रही है। इनसे जुड़ी लम्बी नहरें शहर तक पानी ले आती थीं। पर अब उन्हें बर्बाद कर दिया गया है। जिस रानीसर तालाब का पानी वर्षों में कभी ही चट हो पाता था, आज सूखा पड़ा है।

बाड़मेर शहर में बाहर से पानी लाने की अभी तक कोई व्यवस्था नहीं है। राजस्थान नहर का पानी यहाँ तक नहीं पहुँच पाता और नर्मदा बाँध का पानी कब तक पहुँचेगा, कहना मुश्किल है। इस जिले के अधिकांश भागों का भूजल खारा है। बहुत ज्यादा गहराई में मीठा पानी मिलता है। परिणाम यह है कि बाड़मेर के प्रायः सभी घरों में आज भी छत से पानी जमा करने का चलन है। बाड़मेर पश्चिमी राजस्थान का एकमात्र ऐसा बड़ा शहर है जहाँ छत से पानी जमा करने की ‘कला’ मरी नहीं है। लोग अभी भी अपने टांकों को दुरुस्त रखे हुए हैं, क्योंकि मीठा पानी लेने का सबसे भरोसेमन्द स्रोत यही है।

लेकिन बलोतरा में स्थिति बड़ी तेजी से बदल रही है। रंगसाजी के लिये प्रसिद्ध यह औद्योगिक नगर लूणी नदी के किनारे बसा है। यहाँ पानी की भारी कमी है। टैंकरों से पानी की आपूर्ति होती है। चूँकि अधिकांश कारोबार रंगों और रसायनों का है, इसलिये फैक्टरियों से निकला गन्दा पानी तथा कचरे ने कुओं और यहाँ तक कि पानी की पाइपों के अन्दर भी घुसपैठ कर ली है। पारम्परिक रूप से यहाँ भी मुख्यतः टांकों के पानी पर ही जीवन चलता था। कुछ पुराने मकानों में अभी टांके हैं। पर अब सिर्फ आठ या दस घर ही ऐसे होंगे जो बरसाती पानी को संग्रहित करते होंगे। अधिकांश लोग खारा या प्रदूषित पानी ही पीते हैं।

बलोतरा के निवासी नंद किशोर, जिनके यहाँ टांका है और जो अभी भी बरसात का पानी इकट्ठा करते हैं, का कहना है कि उनके यहाँ किसी को भी नलके का पानी अच्छा नहीं लगता-न बुजुर्ग माँ-बाप को और न ही उनके बच्चों को। उनका टांका इतना बड़ा है कि 12 लोगों के उनके परिवार की दो वर्ष की जरूरतें पूरी कर सकता है। पास-पड़ोस के लोग भी कभी-कभार उनके टांके का पानी ले जाते हैं।

जोधपुर : जोधपुर शहर इस बात का सबसे अच्छा प्रमाण है कि किस प्रकार आधुनिकीकरण और शहरीकरण ने इस मरुभूमि के शहर की अद्भुत जल प्रबन्ध प्रणाली को चौपट कर दिया है। इस शहर की स्थापना सन 1495 में हुई। शहर के लिये स्थान का चुनाव करते हुए इसके शासकों ने पहले पानी और सुरक्षा, दो बातों पर जरूर विचार किया होगा। चोंका-दाइजार पठार इस क्षेत्र के भूगोल का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यह 30 किमी लम्बा और अधिकतम 5 किमी चौड़ा है तथा जमीन से इसकी ऊँचाई 120-150 मीटर है। इसकी ढलान कम-ज्यादा है, पर कई जगहों पर बहुत तीखी है। यह पूरा पठार नाडी, तालाब, तलैया, सरोवरों जैसी भूतल वाली 50 व्यवस्थाओं और कुओं, बावड़ियों और झालराओं जैसी 150 भूजल प्रणालियों के लिये आगोर का काम करता है। भूतल वाली ज्यादातर व्यवस्थाएँ प्राकृतिक हैं, पर सदियों से लोगों के श्रम और कौशल ने इनमें काफी सुधार ला दिया है। पहले यही भूतल प्रणालियाँ नगर में पानी का मुख्य स्रोत थीं और इन्हीं से रिसा पानी कुओं, बावड़ियों और झालराओं में जमा होता था। इनमें से कुछ व्यवस्थाएँ तो 500 वर्षों से भी ज्यादा पुरानी हैं। पानी की माँग बढ़ने के अनुपात में इनकी संख्या भी बढ़ती गई है। इनका निर्माण राजा-महाराजाओं, यश की कामना रखने वाले सेठ-साहूकारों या आम लोगों ने भी कराया है। पर इनका निर्माण चाहे जिस किसी ने कराया हो ये समाज की सम्पत्ति बन गईं और स्थानीय निवासियों का इनसे अपनापन सम्पत्ति के सामान्य बोध से कहीं ज्यादा गहरा हो गया।

दुर्भाग्य से 1897-98 के आस-पास से पानी वाली व्यवस्थाओं का निर्माण और विकास अचानक ठप होने लगा। तभी पानी की सार्वजनिक आपूर्ति प्रणाली की शुरुआत हुई थी। फिर भी 1960 के दशक तक लोगों ने पारम्परिक प्रणालियों की पवित्रता बनाए रखी, उनको चलन में रखा। पर 1960 के बाद से इन प्रणालियों की गिरावट तेज हुई और लोगों के मन में भी इनके प्रति आदर भाव नहीं रहा। ये प्रणालियाँ आज इतनी बदहाल हो गई हैं कि इनको फिर से दुरुस्त कर पाना असम्भव-सा लगता है। अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो बची-खुची पारम्परिक व्यवस्थाएँ भी इसी गति को प्राप्त होंगी। यह उल्लेखनीय है कि आज भी जब पानी का संकट आता है तो जलापूर्ति विभाग भी नगर में मौजूद भूजल वाली 107 चालू व्यवस्थाओं में से 66 से पानी लेकर अपना काम चलाता है।

1989 में स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेज द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण में शहर में पारम्परिक जल प्रबन्ध वाली 229 व्यवस्थाएँ मिलीं। इनमें नाडियों, तालाबों और झीलों जैसी भूतल वाली 75 व्यवस्थाएँ थीं जबकि कुएँ, बावड़ी और झालराओं जैसी 154 भूजल व्यवस्थाएँ थीं।

भूतल वाली व्यवस्थाएँ


भूतल वाली प्राचीन व्यवस्थाएँ सदियों से स्थानीय लोगों और पालतू पशुओं के साथ ही वन्य जीवों की भी पानी की जरूरतें पूरा करती रही हैं। इनमें वास्तु और इंजीनियरिंग कौशल की उत्तम श्रेणी तो दिखती ही है, सामुदायिक भागीदारी का भी उदाहरण है। साथ ही इनसे ‘सबके लिये पानी’ वाले मूल दर्शन वाली सामाजिक, नैतिक और धार्मिक मान्यताएँ और मूल्य भी जुड़े हुए हैं। सदियों से इन्हीं मूल्यों और मान्यताओं ने बगैर किसी लिखित कायदे-कानून के एक विलक्षण जल प्रणाली को विकसित किया और चलाया। लेकिन सरकारी सार्वजनिक जलापूर्ति की शुरुआत के साथ ही लोग अपनी इस अमूल्य सम्पदा को उपेक्षित करते जा रहे हैं। अब और बहुत देर किये बगैर जोधपुर की पारम्परिक भूजल व्यवस्थाओं को जीवित रखने के लिये कदम उठाने की जरूरत है। इनका जीवन इनके आगोर-चोंका-दाइजार पठार के जीवित रहने पर निर्भर करता है। पानी वाली हर व्यवस्था से विस्तृत आगोर, जलमार्ग और नहरें जुड़ी थीं जिनसे इनमें बरसात का पानी जमा होता था।

सारिणी 2.7.1 : जोधपुर के पारम्परिक जल प्रबन्धों की स्थिति

कुल

काम न आने वाले

काम आने वाले

उपयोग छोड़ा गया

बर्बाद

पानी की गुणवत्ता

पानी का उपयोग

पीने लायक

न पीने लायक

पीने में

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