विस्थापन, अभाव और विकास की प्रक्रिया
कुछ भी हो, यह याद रखा जा सकता है कि कुछ लोग विस्थापन के मुद्दे पर यह नजरिया रखते हैं कि यह तो इतिहास से चला आ रहा है। इस नजरिए से वे विस्थापितों के मसले पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का विरोध दरकिनार करने की कोशिश करते हैं। लेकिन तथ्य यह है कि समस्या को इसलिए नहीं टाला जा सकता क्योंकि यह अब पुरानी हो चुकी है। हमें याद रखना चाहिए कि कई अन्य क्षेत्रों जैसे लिंग समानता, लोकतंत्र आदि में भी जागरूकता हाल ही के वर्षों में बढ़ी है। विस्थापन और अभाव को पैदा करने वाला विकास इन दिनों मानवाधिकार का मुद्दा माना जा रहा है। न केवल अध्ययन बल्कि जमीनी अनुभव से भी यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि देश के विकास के नाम पर लोगों को उनकी आजीविका से वंचित किया जा रहा है, वे हाशिए पर धकेले जा रहे हैं और उनकी विपन्नता बढ़ती ही जा रही है। यह मुद्दा पश्चिम बंगाल के सिंगूर व नंदीग्राम, ओड़ीशा के नियामगिरि और काशीपुर, उत्तरप्रदेश व हरियाणा में हाइवे के खिलाफ जनांदोलन, मैंगलोर व नवी मुंबई में सेज के खिलाफ आंदोलन व ऐसे ही अन्य जन संघर्षों के चलते राष्ट्रीय स्तर पर उभरा है। ऐसे आंदोलनों ने कानूनों, निर्णय प्रक्रिया व ऐसी ही अन्य गलत प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े किए हैं जिनकी वजह से लोगों को विस्थापित होना पड़ा या बेहद लचर पुनर्वास झेलना पड़ा।

ऐसे तमाम उपाय उन लोगों के अधिकारों के खिलाफ जाते हैं जो ऐसी परियोजनाओं की वजह से विस्थापित होते हैं या अभाव झेलते हैं, अथवा अपनी आजीविका से वंचित कर दिए जाते हैं। इस विफलता का सबसे प्रमुख कारण विकास का निर्धारित करने वाली विचारधारा है। इसके चलते मानवीय विकास की जगह आर्थिक विकास को ज्यादा तवज्जो दी जाती है। अध्ययन बताते हैं कि विस्थापन तथा आजीविका से बेदखली व विकास की वर्तमान सोच का ही नतीजा है कि ताकतवर और भी ज्यादा ताकतवर बनते जाते हैं तथा कमजोर पहले से कहीं ज्यादा अभावग्रस्त होकर और भी हाशिए पर चले जाते हैं। यही वजह है कि विस्थापन के अध्ययन में विकास के प्रतिमान केंद्र में आ जाते हैं। विकास प्रतिमानों से संबद्ध पूर्वानुमानों का परीक्षण जरूर होना चाहिए और अगर ये सही साबित हो जो समस्याओं के निदान के उपाय ढूंढे जाने चाहिए।

इस नतीजे तक पहुंचने के लिए हमें भारत में विस्थापन की प्रक्रिया को उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखकर समझना चाहिए। इस पेपर में स्वतंत्रता से पहले विस्थापन की स्थिति तथा 1947 के बाद राष्ट्रीय विकास के संदर्भ में लोगों को उनकी आजीविका से वंचित करने के संदर्भ में ध्यान दिया गया है। साथ ही इस पेपर में यह चर्चा भी होगी कि भू-उपयोग कितने तरह के तथा किस हद तक किए गए हैं तथा विस्थापित व परियोजना प्रभावित व्यक्तियों पर इसका कितना असर पड़ा है।

1. विस्थापन तथा अभाव


इस पेपर की शुरुआत संविधान के अनुच्छेद 11 में उल्लिखित जीने के अधिकार के बिंदु से होती है। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस अधिकार की व्याख्या करते हुए इसे हर व्यक्ति के लिए सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार करार दिया है। इसमें आर्थिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक व्यवस्थाएं तथा हित (वासवानी 1992-158) शामिल हैं। अध्ययन से पता चलता है कि लोगों को विस्थापित करने वाली अधिकांश परियोजनाओं में इस कर्तव्य को पूरी तरह भुला दिया गया है जिसका नतीजा परियोजना प्रभावित लोगों की बदहाली के तौर पर सामने आता है। विस्थापन और अभाव को पैदा करने वाला विकास को मानवाधिकार का मुद्दा बनाने के विषय पर बोले जाते समय हमें यह बात जोड़नी चाहिए कि हम विकास का औद्योगीकरण की जरूरत पर सवाल नहीं खड़े कर रहे। आजाद भारत को इन दोनों की ही जरूरत है क्योंकि उपनिवेश-काल में देश के उद्योग-धंधे चौपट हो चुके हैं और समूचा उप-महाद्वीप बदहाली की ओर धकेला जा चुका है। इसलिए अगर आजादी बाद की सरकारों ने विकास के लिए निवेश नहीं किया होता तो वे देश को असफलता की गर्त में झोंक देतीं। सवाल तो यह है कि विकास का पैमाना किस पर आधारित हो। ऐसे में सवाल भूमि, जल, ऊर्जा, खनिज और वित्तीय संसाधनों के अत्यधिक इस्तेमाल पर किया ही जाना चाहिए। पश्चिमी देशों में यह संभव हो सकता है क्योंकि इसके लिए उन्हें अपने उपनिवेश वाले देशों की लूट-खसोट पर निर्भर रहना है। उनके विकास में श्रमिकों का शोषण अंतर्निहित है। यूरोप ने भी अपनी अतिशेष आबादी को अमेरिका, आस्ट्रेलिया, भारत सरीखे देशों में भेजा था। आबादी की अधिकता में जमीन का अत्यधिक दोहन संभव नहीं हो सकता, खासकर ग्रामीण इलाकों में जमीन का अधिग्रहण मुश्किल हो जाता है। कुल मिलाकर ज्यादा ध्यान आर्थिक विकास पर ही रहा है। इसकी तुलना में सामाजिक क्षेत्रों मसलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण व साफ-सफाई पर निवेश बेहद कम रहा है। इसी का नतीजा रहा है कि विकास के सर्वाधिक फायदे शहरी मध्यमवर्ग व ग्रामीण उच्चवर्गीय तबके को मिले जिन्होंने इन सुविधाओं तक अपनी पहुंच सुनिश्चित की। (कुरियन 1997: 136-37)

पलायन, आपदा तथा संघर्ष के नतीजे में आंतरिक विस्थापन


यह पेपर विकास परियोजनाओं से विस्थापित लोगों व परियोजना प्रभावित व्यक्तियों पर ही सारा ध्यान केंद्रित करेगा, जबकि अन्य स्वैच्छिक पलायन की वजह से होने वाले स्वैच्छिक विस्थापन को इसमें शामिल नहीं करेगा जो बेहतर आर्थिक हालत की उम्मीद में किए जाते हैं। इसके अलावा जबरन विस्थापन के अन्य प्रकार भी हैं जिन्हें आंतरिक विस्थापित व्यक्ति (आईडीपी) कहा जाता है, यानी ऐसे लोग जो किसी तरह की आपदा, संघर्ष या विकास परियोजना की वजह से विस्थापित होते हैं लेकिन देश की सरहद में ही रहते हैं। वहीं देश की सीमा को लांघने वाले रिफ्यूजी कहलाते हैं। उदाहरण के तौर पर ऐसे लोग जो 2002 के मुसलमान विरोधी गुजरात दंगों के दौरान राज्य से विस्थापन कर देश के दूसरे हिस्सों में चले गए। ऐसे लोग आंतरिक विस्थापित व्यक्तियों की ही श्रेणी में आएंगे, भले ही इन्हें नेपाल जाने वाले भूटानी शरणार्थियों या भारत आने वाले बांग्लादेशी शरणार्थियों की तुलना में ज्यादा यात्रा करनी पड़ी हो। हमारे देश का आकार ही इसे समझाने के लिए काफी है।

भूटानी लोगों के दो सौ किलोमीटर से भी कम दूरी तय करनी पड़ी शरणार्थियों का दर्जा पाने के लिए, वहीं गुजरात से 1200 किलोमीटर का यात्रा कर उत्तरप्रदेश पहुंचे मुसलमानों को जिन्हें आंतरिक विस्थापित व्यक्ति ही माना गया।

आईडीपी की पहली श्रेणी संघर्ष से संबद्ध व्यक्तियों की होती है। एक अनुमान के मुताबिक धार्मिक व सांप्रदायिक संघर्षों के चलते दुनिया भर में 50 लाख आईडीपी शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं। इसमें हर साल बीस लाख और आईडीपी जुड़ जाते हैं (कदीम, 2005)। वहीं भारत में धार्मिक व सांप्रदायिक संघर्ष की वजह से आईडीपी होने वाले लोगों की सटीक संख्या का पता लगाना बेहद मुश्किल है क्योंकि इनमें से अधिकांश लोग अपने नाते-रिश्तेदारों के यहां शरण ले लेते हैं। केवल उन्हीं लोगों की गिनती हो पाती है जो राहत शिविरों में जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुतबिक 1999 में भारत में 507,000 लोग संघर्ष की वजह से आईडीपी की श्रेणी में थे (मजूमदार 2002:102)। भारत में बीते तीन दशकों में धार्मिक व सांप्रदायिक संघर्षों की वजह से 30 लाख से भी ज्यादा लोग आईडीपी की श्रेणी में आ गए। इनमें 1985 के जातीय दंगों में 50,000 आईडीपी, गुजरात में 2002 के सांप्रदायिक दंगों में 100,000 आईडीपी, 1980 के दशक में कश्मीर के सीमावर्ती गांवों से 500,000 आईडीपी, कश्मीर घाटी से 350,000 कश्मीरी पंडित, 1984 के सिख दंगों के दौरान दिल्ली-कानपुर के बीच तथा 1989 के हिंदू-मुस्लिम दंगों व 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद की घटनाओं में 200,000 आईडीपी शामिल हैं (दास 2005: 122-134)।

देश का उत्तर-पूर्वी हिस्सा बीते दो दशकों से जातीय संघर्ष झेल रहा है। असम में बाहरियों के खिलाफ जारी आंदोलन में 1979 से 85 के बीच 137,000 लोग विस्थापित किए जा चुके हैं। पश्चिमी असम में 1993 में हुए बोडो स्वायत्तशासी परिषद (बीएसी) के समझौते में सीमाओं का निर्धारण साफ तौर पर नहीं हो पाया था। असम सरकार ने कई सौ गांवों को बीएसी में शामिल करने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि उनमें बोडो बहुमत नहीं है। इसके चलते ‘बहुमत बनाने’ की कोशिश में 1993 में बंगाली मुस्लिमों पर, 1995 में बंगाली हिंदुओं पर तथा 1996 में संथालों पर हमले शुरू हो गए। इसका नतीजा हुआ 350,000 और आईडीपी। 1980 में मेघालय के शिलांग में हुए आदिवासी-बंगाली संघर्ष के नतीजे में 25-30,000 लोग आईडीपी की श्रेणी में आ गए। इसी तरह त्रिपुरा में 1980 में हुए संघर्ष में 1400 बंगाली व 280 आदिवासी मारे गए जबकि 190,000 लोग विस्थापित कर दिए गए। मणिपुर में कुकी-पैतेई तथा नागा-कुकी संघर्ष के नतीजे में 1990 में 10,000 घर जला डाले गए, 2,000 लोग मारे गए व 50,000 से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए। मिजोरम में 30,000 से भी ज्यादा रियांग (ब्रू) आदिवासी बेदखल कर दिए गए है (भौमिक 2005: 150-165)। असम के करबी आंगलोंग जिलों तथा एनसी पहाड़ियों में हुए सांप्रदायिक झड़पों में 2003 से 100,000 लोग विस्थापित हो चुके हैं (मैंगात्तूथाझे 2008: 60-61)।

आईडीपी की अगली श्रेणी उन लोगों की है जो प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं का शिकार होते हैं। इनमें भूकंप, बाढ़, सूखा, भू-स्खलन व औद्योगिक हादसे शामिल हैं। ऐसे नियमित हादसों के अलावा भारत व दक्षिण एशिया मरुस्थलीकरण व पर्यावरण विनाश की प्रक्रिया से भी गुजर रहे हैं। इनका असर तत्काल महसूस नहीं किया जा सकता या फिर भूकंप सरीखी एक ही घटना से पता नहीं चल सकता, लेकिन यह होता जरूर है (दासगुप्ता 2007: 30-33)। कई ऐसे हादसे जो प्राकृतिक कहे जाते हैं, वस्तुतः मानवनिर्मित होते हैं। यानी ऐसे हादसे जो मानवीय दखल की वजह से होने वाले पर्यावरणीय क्षति के नतीजे में होते हों। ऐसे हादसों में हम जुलाई 2005 में मुंबई में आई बाढ़ व कोयना भूकंप जैसी घटनाओं को शामिल कर सकते हैं। बाढ़ की बढ़ती त्रासदी, सूखा और लगातार विकराल हो रहे भू-स्खलन, मरुस्थलीकरण व पर्यावरणीय विनाश की वजह से आईडीपी की संख्या बेतहाशा बढ़ती ही जा रही है (बंदोपाध्याय 2007:5)। उदाहरण के तौर पर सरकारी आंकड़ों में यह अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 1953 की बाढ़ में कुल 524 लोगों की जान गई थी, जबकि इस दौरा 244.8 लाख हैक्टेयर जमीन प्रभावित हुई थी। इसी तरह 1960 के दशक के मध्य में बाढ़ से मौतों की संख्या 1,000 का आंकड़ा पार कर गई थी। वर्ष 1985 में बाढ़ की वजह से देश की 590.9 लाख हैक्टेयर जमीन प्रभावित हुई थी, जबकि मौतों का आंकड़ा बढ़ कर 40,593 तक पहुंच गया था। 1998 में यह आंकड़ा 58,459 था जिसमें 687.2 लाख हैक्टेयर जमीन प्रभावित हुई, वहीं 2002 में 224.4 लाख हैक्टेयर जमीन डूबने के साथ मौत का आंकड़ा 26,247 का था (प्रसाद 2005)।

विस्थापन के खिलाफ ऐसा ही एक सर्वाधिक जाना-माना आंदोलन है पुणे में मुलशी-पेटा के 1920 में टाटा कंपनी और ब्रिटिशों के सहयोग से पनबिजली परियोजना के लिए बनाए जा रहे बांध के खिलाफ छोड़ा गया आंदोलन। जिन किसानों की जमीन इस बांध की वजह से डूब में आने वाली थी उन्होंने अपने विस्थापन के खिलाफ बगावत कर दी, लेकिन वे उन औपनिवेशिक ताकतों के हाथों खदेड़ दिए गए जो उद्योगपतियों की मदद कर रहे थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने इस संघर्ष को आजादी के लिए जारी लड़ाई के एक हिस्से के तौर पर मान्यता दी और इसे ब्रिटिश शासकों के खिलाफ लोगों की बहादुरी माना आपदा से जुड़े दस्तावेजों के मुताबिक दुनिया भर में इसकी वजह से होने वाले आईडीपी की संख्या 500,000 है। कुछ वर्षों में यह इससे भी ज्यादा होती है। उदाहरण के तौर पर 2001 में गुजरात के भूकंप और 2005 में कश्मीर में आए भूकंप में 20-30,000 लोगों की जानें गईं और हर राज्य में 200,000 लोग विस्थापित हुए। इसी 4 तरह 2004 की सुनामी में 300,000 लोग मारे गए और 500,000 लोग अपने घरों से बेघर हो गए। बीते कुछ वर्षों में 500,000 लोगों के प्रति वर्ष विस्थापन की संख्या काफी नियमित सी रही है (दास 2005:112-113)। इन सबके अलावा हर साल बाढ़ की वजह से 10 लाख लोग अस्थायी तौर पर विस्थापित होते हैं। सूखे, भू-स्खलन तथा मरुस्थलीकरण के प्रभावितों की संख्या इससे भी कहीं ज्यादा होती है। आम तौर पर आपदा प्रभावित आईडीपी की पूछ-परख तुलनात्मक तौर पर बेहतर होती है। आपदा की नियमितता को देखते हुए कई संस्थानों ने इसके विस्थापितों की देखभाल संबंधी दक्षता सीख ली है, मसलन, ट्राम सेंटर में देखभाल, सामुदायिक सहयोग, निवास व अन्य मदद। साथ ही आर्थिक मदद का बहाव भी अन्य की तुलना में बेहतर है। संघर्ष व आपदा प्रभावित आईडीपी को तत्काल मदद मिल जाती है। कई संगठन उनके लिए राहत की व्यवस्था कर देते हैं या इसके लिए उनके नेतृत्व से चर्चा करते हैं। और इनमें से अधिकांश बाद में उन्हें भूल भी जाते हैं।

विकास की वजह से होने वाले आईडीपी


अगर हम विकास की वजह से आंतरिक विस्थापित लोगों (आईडीपी) की बात करें तो स्थिति और बदतर दिखाई देती है। ऐसे लोगों की तीन श्रेणियां हैं। पहली श्रेणी में प्रक्रिया की वजह से विस्थापित होने वाले लोग आते हैं। प्रमुख आर्थिक बदलाव तथा नई तकनीकी ने लोगों को उनके सहारे से दूर कर दिया। उदाहरण के तौर पर 1970 में तटीय उथले या कम पानी वाले इलाकों में गहरे पानी के ट्राॅलरों को लाने की मंजूरी से हजारों मछुआरों को उनकी आजीविका से दूर कर दिया गया (अलेक्जेंडर 1980)। गैरवनीकरण के चलते लाखों आदिवासियों को अपनी रोजी-रोटी से हाथ धोना पड़ा (पांडे 1998एः2-3)। रबड़ के जूतों और चप्पलों ने दलित जूता बनाने वालों का रोजगार छीन लिया (त्रिवेदी 1977) वैष्वीकरण के एक अहम अंग मशीनीकरण की वजह से खदान मजदूरों खासकर महिलाओं को बड़ी संख्या में बेरोजगार कर दिया (बानुमथी 2002-00)। इस प्रक्रिया से विस्थापित होने वाले किसी भी व्यक्ति को विकास का पीड़ित नहीं माना गया। इनमें से अधिकांश दलित, आदिवासी तथा अन्य कमजोर सामुदायिक तबकों से थे। दूसरी श्रेणी में ऐसे लोग आते हैं विकास परियोजनाओं ने जिनकी जमीन और संसाधनों पर कब्जा कर उन्हें उनकी आजीविका से दूर कर दिया। इनमें से कुछ विस्थापित लोग (डीपी) थे तथा अन्य परियोजना प्रभावित लोग (पीएपी) की श्रेणी में आते हैं। कुछ परियोजनाओं ने लोगों को उनकी निजी जमीन से दूर कर बेरोजगार कर दिया वहीं कुछ को उनकी सामूहिक जमीन साझा संसाधनों से विहीन कर बेरोजगार की श्रेणी में ला दिया। कई मामलों में तो दोनों ही तरह की जमीनों को छीना गया है। कई अन्य योजनाओं के चलते लोगों को उनकी आजीविका तक पहुंच बनाने से रोका गया है। उदाहरण के तौर पर बंदरगाह परियोजनाएं, जिनकी वजह से मछुआरों को समुद्र में जाने और मछली पकड़ने के अधिकार से वंचित रखा जाता है (फर्नांडीस तथा आसिफ 1997: 109-111)। इसी तरह अप्रत्यक्ष तौर पर विस्थापित व्यक्ति भी हैं जो पर्यावरणीय प्रभावों की वजह से अपनी रिहाई से बाहर निकलने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं। मसलन थर्मल पावर प्लांट, अल्युमिनियम प्लांट आदि जिनकी वजह से भारी मात्रा में कचरा या व्यर्थ सामग्री का निश्पादन होता है। इसके अलावा जमीन की उर्वरता, पानी, स्वास्थ्य आदि पर इस कचरे के प्रभाव से भी लोगों का विस्थापन होता है (गांगुली ठुुकराल 1999:11)। ऐसे लाखों लोगों की तलाश की जा सकती है अगर उन्हें उनकी पहचान के लिए लिए किसी सटीक तरीके का इस्तेमाल किया जाए। वास्तव में ऐसे लोगों में बहुत ही कम की पहचान हो सकी है (भराली 2008:00)। कुल मिलाकर यह लगभग 5 असंंभव है कि हम अप्रत्यक्ष तौर पर विस्थापित लोगों की पहचान और गिनती कर सकें। यही वजह है कि विस्थापन पर होने वाले ज्यादातर अध्ययनों से उन्हें बाहर ही रखा जाता है।

ऐसे में यहां हम केवल उन लोगों की बात करेंगे या उन्हीं के संदर्भ में बात करेंगे जो विकास परियोजनाओं के लिए भूमि व आजीविका के संसाधनों पर कब्जा कर लिए जाने की वजह से प्रभावित हुए हैं। इससे जबरन व स्वैच्छिक पलायन, युद्ध से प्रभावित विस्थापित व्यक्ति, प्राकृतिक या मानवनिर्मित हादसों से प्रभावित व्यक्ति, परियोजना प्रभावित व्यक्ति तथा अप्रत्यक्ष विस्थापित व्यक्ति बाहर होंगे। इस पाबंदी के जरिए यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि विकास की वजह से होने वाला विस्थापन लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाकर बसने का प्रमुख कारण ज़रुर है, लेकिन यही एकमात्र कारण नहीं है। इसकी खासियत यह है कि यह योजनाबद्ध होता है जबकि दूसरे जबरन पलायन या आपदा अथवा संघर्ष की वजह से पलायन आपातकालीन होते हैं। चूंकि विकास की वजह से होने वाले विस्थापन योजनाबद्ध होते हैं, ऐसे में यह निश्चित तौर पर संभव है कि परियोजना से जुड़े आला अधिकारी परियोजना प्रभावितों के पुनर्वास से इसके नकारात्मक प्रभावों को रोकने के उपाय करें। लेकिन बेहद कम मामलों में ही ऐसा हो पाता है। वास्तविकता तो यह है कि विकास परियोजनाओं की वजह से होने वाले आईडीपी की संख्या उनसे ज्यादा है जो दूसरे तरह के विस्थापितों की श्रेणी में आते हैं।

दूसरी बात, अधिकांश अध्ययन आजादी के बाद के दौर तक ही सीमित रहे हैं। जबकि इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि गुप्त काल में, तीसरी से 6वीं सदी तथा मध्य युग में बांधों तथा कई तत्कालीन परियोजनाओं से विस्थापन तथा पलायन की घटनाएं हुई थीं। हालांकि इनका नकारात्मक प्रभाव इसलिए ज्यादा नहीं हो पाया क्योंकि उस दौर में जमीन काफी ज्यादा थी और आबादी कम। यह कालोनियल युग में खतरे की श्रेणी में आया और वर्तमान योजनाबद्ध विकास के दौर में यह खतरा और भी बढ़ गया (मनकोडी 1989: 140-143)। कुछ भी हो, यह याद रखा जा सकता है कि कुछ लोग विस्थापन के मुद्दे पर यह नजरिया रखते हैं कि यह तो इतिहास से चला आ रहा है। इस नजरिए से वे विस्थापितों के मसले पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का विरोध दरकिनार करने की कोशिश करते हैं। लेकिन तथ्य यह है कि समस्या को इसलिए नहीं टाला जा सकता क्योंकि यह अब पुरानी हो चुकी है। हमें याद रखना चाहिए कि कई अन्य क्षेत्रों जैसे लिंग समानता, लोकतंत्र आदि में भी जागरूकता हाल ही के वर्षों में बढ़ी है। हम निश्चित ही महिलाओं के दमन, सामंतवाद या ऐसे ही अन्य अन्यायपूर्ण परंपराओं को इसलिए जारी नहीं रख सकते क्योंकि ये पुराने हैं।

2. विस्थापन, अलगाव और विकास प्रतिमान


आजादी के बाद होने वाले विस्थापन की जड़ें दरअसल आजादी के पहले से जारी प्रक्रिया से जुड़ी हुई है, खासतौर पर भूमि अधिग्रहण कानून 1894 (एलएक्यू) से। यह राज्य को अधिकार देता है कि वह लोगों से बिना पूछे उन्हें उनकी जमीन से विस्थापित कर दे। लेकिन इस कानून के लागू होने के सौ साल बाद भी आज तक यह परिभाशित नहीं हो पाया है कि जिस जनहित के नाम पर लोगों को बेदखल किया जाता है वह जनहित आखिर है क्या। यही वजह है कि विस्थापन की प्रक्रिया आज भी उसी तरह बदस्तूर जारी है जिस तरह 1947 से पहले के दौर में होती थी, इसका कारण यह है कि आज भी विकास के प्रतिमानों में कोई बदलाव नहीं आया है। तथ्य तो यह है कि योजनाबद्ध विकास के साथ ही कमजोर तबके के लोगों का और भी गरीब होने व हाशिए पर जाने की प्रक्रिया ने जोर पकड़ लिया है। इसके बावजूद विस्थापित लोगों तथा परियोजना प्रभावित लोगों की वास्तविक संख्या संबंधी कोई भी आधिकारिक आंकड़ा आज तक उपलब्ध नहीं हो सका है। इस भाग में हम विकास प्रतिमान को नए नजरिए से देखने की कोशिश करेंगे।

उपनिवेश युग में विस्थापन व अभाव


आज विस्थापन का मुद्दा मानवाधिकार का एक बड़ा मसला बन चुका है। इसका कारण यह है कि उपनिवेशकाल में ही इसका अनुपात खतरनाक स्तर को छू चुका था और 1947 के बाद तो इसमें और भी तेजी आ गई। यही वजह है कि यह भाग उपनिवेश युग से शुरू किया जा रहा है। उपनिवेश युग का मुख्य लक्ष्य यह था कि भारतीय आर्थिक व्यवस्था को ब्रिटिश औद्योगिक जरूरतों के लिहाज से बदल दिया जाए। इसके लिए पहला कदम यह था कि अपने उपनिवेश (भारत) को उद्योगविहीन कर दे और ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति के अंतिम उत्पाद को बेचने के लिए इसे बाजार के तौर पर इस्तेमाल करें (फर्नांडीज तथा रायचौधरी 1998)। इसी तरह दूसरा कदम था कानूनी उपाय करना, जिसके तहत भूमि तथा वन कानून बनाए गए। इन कानूनों का मुख्य लक्ष्य जमीनों का ब्रिटिश आधिपत्य वाले वनीकरण तथा खनन, यातायात व अन्य परियोजनाओं के लिए जमीनों का ट्रांसफर था। इसकी शुरुआत स्थायी बंदोबस्त 1793 से हुई जो असम भूमि कानून 1838, कलकत्ता कानून, 1824 तथा ऐसे ही अन्य कानून बनाए गए जिनका अंत भूमि अधिग्रहण कानून 1894 (एलएक्यू) में हुआ जो आज तक लागू है (उपाध्याय तथा रमन 1998)।

ये सारे बदलाव निजी जमीन या संपत्ति को उचित मुआवजा देकर सरकार के आधिपत्य में लाने का अधिकार (एमिनेंट डोमेन) के सिद्धांत पर आधारित हैं। आस्ट्रेलिया ने भूमि संबंधों के इस नजरिए को इस तरह देखा जा सकता है कि ऐसी जमीन टेरा नलियस (किसी की जमीन नहीं) कहलाती है। यानी श्वेतों की औपनिवेशिक कालोनियों, आस्ट्रेलिया व अमेरिका में जमीन का यह सिद्धांत काम करता है कि जो जमीन किसी के निजी नाम पर नहीं है वह किसी की जमीन नहीं है और ऐसे में उसपर कोई भी कब्जा कर सकता है। 1992 में आस्ट्रेलिया के न्यायालय ने इस सिद्धांत के तहत जमीन पर आधिपत्य करने को गैरकानूनी घोषित कर दिया (ब्रेनन 1995:16)। लेकिन यह एमिनेंट डोमेने के ब्रिटिश नजरिए के साथ भारतीय भूमि कानूनों का आधार बदस्तूर बना रहा। इसका पहला पक्ष तो यही है कि ऐसी तमाम जमीन, जैवि विविधता सरकारी है जिसका कोई निजी पट्टा ना हो। दूसरा यह कि केवल सरकार को यह अधिकार है कि वह जनहित को परिभाषित करे। भूमि अधिग्रहण कानून तो इसी पर आधारित है लेकिन जनहित जिसके नाम पर सरकार लोगों को उसकी जमीन से बेदखल कर देती है, उसकी परिभाषा आज तक नहीं दी जा सकी है (रामनाथन 2008: 134-135)। इसके बावजूद इन कानूनों को लागू करते समय औपनिवेशिक युग में जैव विविधता तथा सामुदायिक संसाधनों पर राज्य के एकाधिकार के सिद्धांत का ही पालन किया गया।

औपनिवेशिक दखल का नतीजा परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर लाखों लोगों के विस्थापन तथा अलगाव के तौर पर सामने आया। इसमें से अधिकांश प्रक्रिया आधारित थे। इनसे विस्थापित हुए लोगों की संख्या का कोई अता-पता नहीं है। दादाभाई नौरोजी (1998) ने यह संख्या साढ़े तीन करोड़ आंकी थी। यह जरूर पता है कि प्रक्रियागत विस्थापन के चलते बड़े पैमाने पर विस्थापित होने वालों में भूमिहीन दलित सर्वाधिक थे। सामुदायिक प्राकृतिक संसाधन आधारित आदिवासी तथा अन्य सेवारत समुदाय सस्ते मजदूरों में बदल गए। बदलावों से अभावग्रस्त और गरीब हुए अधिकांश लोगों ने हार मान ली और उनमें से कई भारतीय, अफ्रीकी, वेस्टइंडीज, प्रशांत व दक्षिण पूर्व एशिया की ब्रिटिश औपनिवेशिक कालोनियों में वनीकरण, खनन आदि परियोजनाओं में बंधुआ मजदूरों के तौर पर भेजे गए जहां उन्हें दासों की सी हालत में काम करने पर मजबूर होना पड़ा (सेन 1979: 8-12)। हालांकि कई समुदायों, समूहों ने उनके हाशिए पर जाने की प्रक्रिया का पुरजोर विरोध भी किया। इसीलिए इतिहास में आदिवासियों और दलितों के कई संघर्ष दर्ज हैं। विस्थापन के खिलाफ ऐसा ही एक सर्वाधिक जाना-माना आंदोलन है पुणे में मुलशी-पेटा के 1920 में टाटा कंपनी और ब्रिटिशों के सहयोग से पनबिजली परियोजना के लिए बनाए जा रहे बांध के खिलाफ छोड़ा गया आंदोलन। जिन किसानों की जमीन इस बांध की वजह से डूब में आने वाली थी उन्होंने अपने विस्थापन के खिलाफ बगावत कर दी, लेकिन वे उन औपनिवेशिक ताकतों के हाथों खदेड़ दिए गए जो उद्योगपतियों की मदद कर रहे थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने इस संघर्ष को आजादी के लिए जारी लड़ाई के एक हिस्से के तौर पर मान्यता दी और इसे ब्रिटिश शासकों के खिलाफ लोगों की बहादुरी माना (भुस्कुटे 1997: 170-172)

विस्थापन, अभाव और विकास की प्रक्रिया वाल्टर फर्नांडीस

विस्थापन और विकास प्रतिमान


जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, 1950 में, यानी आजादी बाद के पहले दशक में, योजनकारों ने सारे अहम निर्णय ‘राष्ट्र निर्माण’ के सिद्धांत के आधार पर लिए। इसमें यह माना गया कि कुछ लोगों को विकास की कीमत जरूर चुकानी होगी लेकिन यह इस मायने में लाभप्रद भी होगा कि विकास के फायदे सभी तक पहुंच जाएंगे। जब विकास के फायदे बहुसंख्यक तक पहुंचने में नाकाम रहे तो यह नजरिया बदलकर ‘राष्ट्रीय विकास’ का हो गया। इसमें आर्थिक तरक्की इस आशा के साथ प्राथमिकता की श्रेणी में रखा गया कि इसके जरिए सभी नागरिकों तक विकास के लाभ पहुंच जाएंगे। बाद में उदारीकरण के दौर में महज ‘विकास’ शब्द का ही इस्तेमाल किया गया। विस्थापन के खिलाफ हुए मुलशी-पेटा आंदोलन को समर्थन देने के बावजूद स्वतंत्रता सेनानियों ने औपनिवेशिक कानूनी व्यवस्था को बदस्तूर जारी रखा, हालांकि इस बार उनके इरादे भिन्न थे। अंग्रेजों के शासनकाल में भूमि घोषित तौर पर उनके फायदे के लिए अधिग्रहीत की जाती थी, जबकि 1947 में आजादी के बाद भारत ने खुद को एक कल्याणकारी राज्य घोषित किया हुआ था। इसमें लाभ या फायदा एक घोषित कारण नहीं था लेकिन लगभग सभी विकास परियोजनाओं आर्थिक क्षमता को ही प्राथमिकता दी गई। यह निश्चित तौर पर हैरतअंगेज़ कारण नहीं था, क्योंकि अधिकांश भारतीय नेता विदेशों में पढ़े-लिखे थे, उनका पूरा ध्यान विदेशी तकनीकी के विकास से प्रेरित था और इस बात से पूरी तरह प्रभावित थे कि भारत पश्चिमी देशों के मुकाबले बहुत पिछड़ा हुआ था। जवाहरलाल नेहरू सरीखे कुछ नेताओं को पश्चिमी देशों के विकास के पीछे मौजूद इस बुनियादी कारण का पता था कि वे अपने यहां तथा अपने उपनिवेशों में मजदूरों का जमकर शोषण करते हैं। लेकिन नेहरू तथा पीसी महलनोबिस सरीखे लोग जिन्हें देश की मिश्रित अर्थव्यवस्था के पीछे का मुख्य दिमाग माना जाता है, ने भारत की समस्याओं के निदान के लिए तकनीक को ही मुख्य समाधान के तौर पर लिया। ‘भारत एक खोज’ (1946 : 64-65) में नेहरू इस बात की जरूरत पर जोर दिया था कि औद्योगिकीकरण एक लोकतांत्रिक ढांचे के तहत ही किया जाए। इसमें साम्यवादी तानाशाही और पूंजीवादी शोषण के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। ऐसा करने के लिए भारत को उसके अंधविश्वासों और रूढ़िवादी से बाहर निकलना होगा, परंपराएं बदलनी होंगी और खुद को आधुनिक बनाना होगा। इसी विचारधारा ने उन्हें बड़े बांधों और उद्योगों को आधुनिक भारत के तीर्थ घोषित करने के लिए प्रेरित किया (फर्नांडीज 1993)।

आजाद भारत के नेताओं ने सामाजिक ताने-बाने की कभी भी उपेक्षा नहीं कि बल्कि उनकी सोच यह रही कि सार्वजनिक क्षेत्र के जरिए आर्थिक उन्नति को नई ऊंचाईयों पर लाकर वे सामाजिक बराबरी कर पाएंगे। वे इस बात से भी प्रभावित रहे कि राज्य द्वारा प्रेरित तकनीकी विकास के जरिए वे बेरोजगारी, गरीबी और अशिक्षा की समस्या से निजात पा जाएंगे तथा ऐसे विकास का फायदा हर भारतीय तक पहुंच जाएगा। उन्हें इस बात का अंदाजा तो था कि इस दौरान कई समस्याओं का सामना होगा वहीं वे इस बात का भरोसा भी था कि समस्याएं अस्थाई होंगी और अंततः इससे सभी का भला ही होगा (व्यासुलू 1998)। बहुत ही कम लोग, जैसे महात्मा गांधी (1948:26) ने महसूस किया था कि उपनिवेशवादी देश अपने उपनिवेशो का शोषण कर अमीर बनते जा रहे हैं। इसी वजह से महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत को पश्चिमी राह का अंधानुकरण करने से आगाह किया था। उन्होंने औद्योगिकीकरण का नहीं उद्योगवाद का विरोध किया था। वे ऐसे विकास के विरोधी थे जो उस तकनीक और उपभोग की राह पर चलता था जो बहुमत की पहुंच से बहुत दूर था। इंग्लैंड सरीखे छोटे से देश ने दुनिया के आधे देशों को महज इसलिए वंचित बना रखा था ताकि उसके नागरिक अमीरों की तरह जी सकें।

इसीलिए उन्हें यह डर था कि अगर भारत जैसे बड़े देश भी उसी राह पर चल पड़े तो यह प्रक्रिया और भी ज्यादा दूर तक जाएगी, और ज्यादा देश वंचित हो जाएंगे। उनके अनुयायियों का यह मत था कि चूंकि भारत के उपनिवेश नहीं हैं इसलिए यहां मध्यम वर्ग अपनी आरामदेह सुविधाओं के लिए गरीबों को उनके हकों से वंचित कर देगा।

इसके उलट निजी क्षेत्र की यह राय था कि मिश्रित अर्थव्यवस्था लागू की जाएग, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र को केवल बड़ी परियोजनाओं में ही निवेश करना है, तथा मुनाफा कमाने वाले उपभोक्ता क्षेत्र को निजी उद्यमों के लिए छोड़ दिया जाता है। उनके विचार 1945 में टाटा और बिड़ला जैसे निजी औद्योगिक घरानों द्वारा तैयार किए गए बांबे प्लान के समय नजर आए। इसमें साफ कर दिया गया कि चूंकि भारतीय निजी क्षेत्र में बड़ी परियोजनाओं जैसे स्टील और ऊर्जा में निवेश करने की क्षमता नहीं है, इसलिए इन क्षेत्रों में सरकार करदाताओं के पैसे से निर्माण करे तथा मुनाफा कमाने वाले उपभोक्ता उद्योग को निजी क्षेत्रों के लिए छोड़ दिया जाए। उन्होंने विकास को महत आर्थिक वृद्धि और मुनाफ के तौर पर ही देखा। इसके सामाजिक घटक की ओर ध्यान नहीं के बराबर दिया गया जिसमें यह देखा जाना चाहिए कि कौन कीमत चुकाता है और किसका फायदा होता है (व्यासुलू 1998)। दूसरी पंच-वर्षीय योजना 1956-61 ने इसी नजरिए को अपनाया और कहा गया कि यह कवायद समानता लाने की है (योजना आयोग 1956:236)। तीसरी योजना (योजना आयोग 1961: अप्रोच पेपर नंबर 7) में कहा गया, भारत के पास एक परंपरावादी समाज है जिसकी जड़ें हजारों वर्ष पुराने इतिहास में गड़ी हैं। ऐसे में सामाजिक परंपराओं और संस्थाओं में दूरगामी बदलाव बेहद जरूरी हैं, जिनकी शुरुआत हो चुकी है, ताकि तकनीकी विकास पर आधारित ऐसा समाज बनाया जा सके जो समान अवसर प्रदान कर सके तथा सामाजिक न्याय की जगह आर्थिक तरक्की को प्राथमिकता मिल सके। इसी विचारधारा पर चलते हुए भारत के पश्चिम से पैसे तथा अत्याधुनिक तकनीकी उधार में ली। इस ‘विदेशी मदद’ के जरिए पूंजीवाद आधारित ढांचागत परियोजनाओं को लागू करने की कवायद की गई।

अधिकांश निर्णयकारी नेताओं की यही राय थी, क्योंकि उनमें से ज्यादातर ने खुद को अंतरराष्ट्रीय मान लिया था और उपनिवेशवादी मूल्यों को मान्यता दे चुके थे। औपनिवेशिक तथा आजादी के बाद के दौर में अगर संदर्भ का कोई केंद्र बिंदु था तो वह पश्चिम ही था। लेकिन औपनिवेशिक दौर की प्राथमिकता यह थी कि भारतीय औद्योगिक परिदृश्य को पश्चिमी औद्योगिक क्रांति की जरूरतों को पूरा करने के लिए बदल दिया जाए। 1947 के बाद भारत की पूरी कोशिश आधुनिकीकरण की थी ताकि वह पश्चिम की टक्कर कर सके। यहां इस तथ्य की पूरी तरह अवहेलना कर दी गई थी कि भारत जाति और लिंग आधारित असमानता वाला समाज है जिसमें विकास के फायदे देश के हर नागरिक तक तब तक नहीं पहुंच सकते जब तक समान समाज की रचना के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए जाते। जैसा कि डाॅ बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में संविधान को प्रस्तुत करते समय कहा था, यह देश को राजनीतिक लोकतंत्र जरूर दे देगा लेकिन आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र तो राष्ट्रीय विकास के जरिए ही लाया जा सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि आधुनिकीकरण को बिना असमान समाज बदले अमल में लाया गया। इस व्यवस्था में असमानताओं का बढ़ना अंतर्निहित है क्योंकि अधीनस्थ वर्ग तकनीकी के साथ चलने के लिए तैयार नहीं हुआ है, वहीं आधुनिक समाज के लिए बदलाव हेतु कई अन्य ज़रूरतें भी अपेक्षित हैं। इस विकास के फायदों तक पहुंच बनाने के लिए औपचारिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण के अलावा मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक तैयारी की भी जरूरत है। लेकिन इस बात को सुनिश्चित करने की बेहद कम कोशिश की गई कि अब तक उपेक्षित समुदायों, वर्ग की शिक्षा व अन्य सेवाओं तक पहुंच बन सके। स्कूल, अस्पताल व ऐसे ही अन्य संस्थान बना दिए गए तथा पिछड़े वर्गों को आरक्षण भी दे दिया गया। ऐसे संस्थानों में सुविधाएं तो मुहैया करा दी गईं लेकिन इन्हें हासिल करना तब तक संभव नहीं था जब तक सभी की इन तक पहुंच सुनिश्चित न की जाए। ऐसे जरूरी कदम उठाए बिना आधुनिक बनाने के लिए की गई कवायदों से गरीब और उपेक्षित वर्ग को और बदहाली की ओर धकेला जाएगा तथा असमानता को बढ़ावा मिलेगा (डिसूजा 1986: 26)।

यह विरोधाभास भारतीय विकास के प्रतिमानों की पूर्वी एशियाई देशों मसलन, दक्षिण व उत्तर कोरिया, चीन, ताईवान तथा मलेशिया से तुलना करने पर समझाया जा सकता है। इन देशों ने भी भारी उद्योगों में काफी निवेश किया, लेकिन इसी के साथ सामाजिक क्षेत्र में भी अच्छा-खासा निवेश किया गया। उदाहरण के तौर पर भारत में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लिए मुफ्त शिक्षा तथा सार्वजनिक क्षेत्र में उन लोगों के लिए नौकरी की व्यवस्था है जो स्कूली शिक्षा पा चुके हों। जो स्कूलों तक पहुंच पाने में नाकाम रहे हों उन्हें नौकरी से भी वंचित ही रखा जाता है। वहीं 1970 से लागू मलेशियाई भूमिपुत्र (धरती के बेटे) नीति के तहत मलय लोगों का ध्यान रखा जाता है जो देश की 60 फीसदी आबादी है, लेकिन आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में पिछड़ी हुई है। इसमें नियम है कि निजी और सार्वजनिक हर क्षेत्र में मलय लोगों को नौकरी का एक निश्चित हिस्सा दिया जाएगा। जबकि भारत में केवल सार्वजनिक क्षेत्र में ही आरक्षण लागू है। इसके अलावा मलेशिया ने सभी निवासियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ-सफाई आदि के लिए भारी निवेश किया था, ना कि महज अल्पसंख्यकों के लिए जैसा कि भारत में होता है। मलेशिया में भूमिपुत्र नीति के जरिए यह कोशिश की जाती है कि देश की बहुसंख्यक आबादी को सुविधाएं दी जा सकें, लेकिन भारत में संस्थान और सेवाएं स्थापित जरूर की जाती हैं पर उन तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते। इसी तरह अन्य देशों मसलन, दोनो कोरिया, इंडोनेशिया तथा चीन ने भी शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ-सफाई तथा पोषण के क्षेत्र में भारी योगदान दिया। चीन में भी बहुसंख्यक आबादी को दयनीय स्थिति से उबरने में मदद दी गई। वहीं अन्य देशों में अधिकांश आबादी के लिए ऊर्जा की व्यवस्था की गई (कर्नल फेरर 1998)।

भारत में आजादी के समय साक्षरता की दर बेहद कम थी। अधिकांश आदिवासी व दलित निरक्षर थे। खासकर इनमें महिलाओं की संख्या ज्यादा थी, उन्हें छोड़कर प्रभावी वर्ग की थीं जहां जिन्हें शिक्षा पाने की सुविधा थी। यह बात का संकेत था कि सामाजिक बदलाव के अभाव में आधुनिकीकरण के तमाम फायदे मध्यम तथा उच्च वर्ग को ही मिलेंगे ना कि गरीब को। इसके चलते अमीर और गरीब के बीच की खाई और भी ज्यादा बढ़ेगी। इसके बावजूद आजतक राष्ट्रीय विकास की इस सोच में कोई भी बदलाव नहीं आया है। यहां तक कि उदारीकरण के दौर के बाद निजी क्षेत्र यह नहीं चाहता कि ढांचागत क्षेत्र के विकास का काम सार्वजनिक क्षेत्र के हाथों में रहे, क्योंकि अब यह क्षेत्र भी लाभ देने वाला बन चुका है। लाभ का लालच बढ़ता जा रहा है और सामाजिक घटक कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं। इसी का नतीजा यह है कि इस पर कोई सवाल नहीं पूछे जा रहे कि कौन कीमत चुका रहा है और कौन मुनाफा कमा रहा है (कुरियन 1997: 134-145)।

भरोसे मंद आंकड़ों का अभाव


विकास के वर्तमान प्रतिमान में आर्थिक विकास के लिए सामाजिक दायित्वों को दरकिनार करना साफ तौर पर देखा जा सकता है। यह आजादी के बाद विस्थापन तथा अभाव का एक मुख्य कारक भी रहा है। इसका पहला मुख्य घटक डीपी/पीएपी लोगों तथा उनके पुनर्वास संबंधी वास्तविक संख्या से संबंधित भरोसेमंद आंकड़ों का अभाव रहा है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, 1950 में, यानी आजादी बाद के पहले दशक में, योजनकारों ने सारे अहम निर्णय ‘राष्ट्र निर्माण’ के सिद्धांत के आधार पर लिए। इसमें यह माना गया कि कुछ लोगों को विकास की कीमत जरूर चुकानी होगी लेकिन यह इस मायने में लाभप्रद भी होगा कि विकास के फायदे सभी तक पहुंच जाएंगे। जब विकास के फायदे बहुसंख्यक तक पहुंचने में नाकाम रहे तो यह नजरिया बदलकर ‘राष्ट्रीय विकास’ का हो गया। इसमें आर्थिक तरक्की इस आशा के साथ प्राथमिकता की श्रेणी में रखा गया कि इसके जरिए सभी नागरिकों तक विकास के लाभ पहुंच जाएंगे। बाद में उदारीकरण के दौर में महज ‘विकास’ शब्द का ही इस्तेमाल किया गया।

सारणी 1 : निजी तथा सार्वजनिक भू-प्रयोग का विस्तार व अनुपात (हैक्टेयर में.)

राज्य

निजी

%

सार्वजनिक

%

वन

%

जानकारी नहीं

%

कुल

आंध्रप्रदेश

684725.10

67.99

255077.73

25.33

67362.75

06.69

00

00

1007165.59

असम

159205.14

28.06

316041.66*

55.71

92034.49

16.23

567281.29

गोवा

12649.74

Posted by
Get the latest news on water, straight to your inbox
Subscribe Now
Continue reading