कोयला से दूर कैप्रियो

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जलवायु परिवर्तन व स्वच्छ ऊर्जा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वालों को हॉलीवुड स्टार लियोनार्डो डी कैर्पियो से प्रेरणा लेनी चाहिए। कैप्रियो धन की बजाय इंसानियत को ज्यादा महत्त्व देते हैं। वे असली पर्यावरण हीरो हैं। कैप्रियो जब आॅस्कर अवॉर्ड ले रहे थे तब उन्होंने जलवायु परिवर्तन की बात की, फिर तुरन्त उन्होंने कोयला आधारित बिजली कम्पनियों में निवेश की गई अपनी सारी राशि निकाल ली। इससे कैप्रियो को लाखों डॉलर का नुकसान हुआ। पर कोई गम नहीं। यह जीवाश्म र्इंधन मुक्त दुनिया को प्राप्त करने का एक कदम था, एक फर्ज था जो कि उन्होंने किया। इस तरह का कदम अब दुनिया में बड़े पैमाने पर रखा जा रहा है। क्योंकि लोग अब पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं। वे दुनिया को साफ-सुथरा रखना चाहते हैं, इसलिये ट्रस्ट, पेंशन फंड, संगठन, परिवार, धनवान अब कोयला कम्पनियों के शेयर धड़ाधड़ बेच रहे हैं। उनके लिये ‘कोयला’ गन्दा है क्योंकि यह पर्यावरण दूषित करता है, पर इससे हिन्दुस्तानी कम्पनियों के हाथ ‘स्वर्ण’ अवसर लग गया है। वे कोयला आधारित ऊर्जा कम्पनियों में हिस्सेदारी खरीद रही हैं।

फ्रांस की एंजी ग्रुप ने आन्ध्र प्रदेश के नेल्लोर स्थित 1000 मेगावाट की क्षमता के मीनाक्षी एनर्जी प्लांट में अपनी 89 फीसदी हिस्सेदारी इसीलिये बेच दी। इसे एसआरईआई के कानोडिया की कम्पनी इण्डिया पॉवर कार्पोरेशन ने तत्काल खरीद लिया। अब इस कम्पनी के पास 462 मेगावाट की कोयला आधारित ऊर्जा परिसम्पत्ति है। एंजी ग्रुप ने इंडोनेशिया के 2000 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट की अपनी 40.5 फीसदी हिस्सेदारी भी बेच दी है। दुनिया भर में इस तरह के रुझान में तेजी आई है। एराबेला एडवाइजर्स के एक अध्ययन के मुताबिक सितम्बर 2015 तक 43 देशों के 436 संस्थानों, कम्पनियों व 2040 लोगों ने जीवाश्म र्इंधन कम्पनियों में से 2.6 ट्रिलियन डॉलर की राशि निकाली है।

इस तरह के कदम बदलते वक्त की माँग है। कोयले को अमेरिका में गन्दातम ऊर्जा स्रोत माना जाता है तथा यह ग्लोबल वार्मिंग प्रदूषण का अग्रणी स्रोत भी है। नासा के अग्रणी जलवायु वैज्ञानिक जेंस राबर्ट का कहना है कि कोयला नागरिकीकरण के प्रति तथा धरती पर सभी प्राणियों के लिये सबसे बड़ा खतरा है। कोयला जलाने से बिजली उत्पन्न करने की प्रक्रिया से हवा तेजी से प्रदूषित हुई है जिससे बालपन अस्थमा, जन्मजात विकृति, साँस की बीमारी आदि बीमारियाँ हो जाती हैं। सिर्फ अकेले अमेरिका में इससे हर साल 25,000 से ज्यादा की मृत्यु होती है।

इसलिये कैप्रियो समेत कई नामचीन आगे आये। टाइटैनिक, द एविएटर, ब्लड डायमंड, द वोल्फ आॅफ वाल स्ट्रीट व द डिपार्टेड सरीखी फिल्मों के नायक कैप्रियो 2007 ने 2007 में पर्यावरण डाक्यूमेंट्री ‘11वाँ घंटा’ भी लिखी और क्लाइमेट चेंज के लिये प्रयास शुरू कर दिया। आज उसका परिणाम दिखने लगा है। एक साल पहले दुनिया के सबसे बड़े वेल्थ फंड नार्वे पेंशन फंड ने हिन्दुस्तान की कोल इण्डिया, अडानी, जीवीके, एनटीपीसी, सीईएससी समेत कोयला व ऊर्जा कम्पनियों में अपनी हिस्सेदारी बेच दी। सिर्फ नार्वे पेंशन फंड ही नहीं कैलीफोर्निया पब्लिक एम्प्लाईज रिटायरमेंट सिस्टम, स्वीडन पेंशन फंड, आॅस्ट्रेलिया पेंशन फंड व डेनमार्क पेंशन फंड ने कई कोयला व ऊर्जा कम्पनियों की हिस्सेदारी से बाहर होकर जीवाश्म र्इंधन मुक्त दुनिया की ओर अपना योगदान दिया है। हिन्दुस्तान में 3, अमेरिका में 1723 तथा यूके की 63 ऐसी कम्पनियों से बड़े पैमाने पर शेयरों की एकमुश्त बिक्री की गई है। ऐसा दुनिया को स्वच्छ करने के लिये किया गया है। कोयला कम्पनियों के बहिष्कार के पीछे कार्बन उत्सर्जन को कम करना प्रमुख ध्येय है। पर इन सबसे हिन्दुस्तान की कम्पनियों को मौका मिल रहा है। गन्दे कोयले ने उनके लिये स्वर्ण अवसर मुहैया करा दिया है। लेकिन भारतीय निवेश कम्पनियों को भी सोचना चाहिए कि उनकी मुनाफाखोरी की होड़ में कहीं पर्यावरण को तो नुकसान नहीं पहुँच रहा है।

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