ऐसे तो नहीं सुधरेगी नदियों की सेहत

Submitted by RuralWater on Thu, 01/14/2016 - 10:41


.आजकल देश में सबसे ज्यादा राष्ट्रीय नदी गंगा और उसके बाद यमुना की सफाई को लेकर चर्चा है। अभी तक इन दोनों नदियों की सफाई को लेकर बीते दशकों में हजारों करोड़ की राशि स्वाहा हो चुकी है लेकिन उनके हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। हकीक़त यह है कि यह दोनों नदियाँ पहले से और ज्यादा मैली हो गई हैं।

केन्द्र सरकार ने भले ही गंगा नदी की सफाई को लेकर अभियान चलाया हुआ है, पर देश की बहुतेरी नदियाँ ऐसी हैं जो गंगा से भी बदतर हालात में हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नमामि गंगे मिशन का परिणाम जब आएगा, तब आएगा। वह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन ताज़ा अध्ययन बताता है कि देश की तमाम नदियाँ प्रदूषण की चपेट में हैं।

देश में एक भी ऐसी नदी नहीं है जो पूरी तरह साफ-सुथरी हो। सीपीसीबी की जाँच में देश की 35 नदियाँ बुरी तरह प्रदूषण की चपेट में पाई गई हैं।

इनमें गंगा, सतलुज, मार्कण्डा, घग्घर, यमुना, चंबल, ढेला, किच्छा, कोसी, बहेला, पिलाखर, सरसा, रावी, माही, रामगंगा, बेतवा, सोन, स्वान, वर्धा, साबरमती, मंजीरा, ताप्ती, नर्मदा, बाणगंगा, भीमा, दमनगंगा, इंद्रावती, महानदी, चुरनी, दामोदर, सुवर्णरेखा, तुंगभद्रा, हिंडन, कृष्णा और काली आदि प्रमुख हैं। बिहार की हरदा, गंडगोला समाप्ति की ओर हैं।

मसैहा अतिक्रमण की शिकार है। वरुणा गन्दे नाले में तब्दील हो चुकी है। पश्चिम बंगाल की ढौंक, रमजान, डेकन और डागरा नदियाँ अतिक्रमण और अवैध निर्माण के चलते आकार में छोटी हो रही हैं।

यमुना देश की सबसे मैली नदी है जबकि हिंडन प्रदूषण के मामले में तीसरे पायदान पर है। दिल्ली से आगरा के बीच यमुना देश की सबसे मैली नदी है। वहीं सहारनपुर से लेकर गाज़ियाबाद के बीच हिंडन नदी प्रदूषण के मामले में तीसरे नम्बर पर है।

देश की सबसे दूषित नदियों की सूची में पवई से धारावी, मुम्बई तक मीठी नदी दूसरे पायदान पर, सोमेश्वर से रहद तक गोदावरी चौथे पायदान पर, अहमदाबाद गुजरात में साबरमती पाँचवे पायदान पर और अकोला से ताकालिजलम तक मोरना छठे पायदान पर है।

आज देश में सात राज्यों की 27 नदियों का दम घुट रहा है। हालत इतनी खराब है कि इन्हें नदी के मानक में भी नहीं रखा जा सकता।

सीपीसीबी की मानें तो देश भर की कुल 445 नदियों में से 290 नदियों में पानी की गुणवत्ता की जाँच में पाया गया कि इनका कुल 12363 किलोमीटर नदी क्षेत्र में से तकरीब 8500 किलोमीटर क्षेत्र इतना दूषित है कि वहाँ जलीय पौधों और जन्तुओं का जीना दूभर है।

इससे भी बुरी बात यह है कि वर्ष 1991 के मुकाबले देश की इन 290 नदियों का प्रदूषण स्तर अब दोगुना से भी अधिक हो गया है। इन नदियों के किनारे बसे 370 बड़े शहरों में प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। इन शहरों से आने वाला कचरा ही इन नदियों में गन्दगी का सबसे बड़ा कारण है।

देश की दूसरी प्रमुख नदी यमुना की हालत इतनी खराब है कि उसे और खराब होने से रोकने के लिये बीते दिनों राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण, यानी एनजीटी ने सरकार से तत्काल कदम उठाने का आदेश दिया। एनजीटी ने सरकार से कहा कि वह यमुना को प्रदूषित करने वाली चीजों पर तुरन्त अंकुश लगाए।

जल प्रदूषणएनजीटी ने सरकार को यह आदेश तब दिया जबकि याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि मवेशियों के वध की वजह से उनका खून सीधे यमुना में गिराया जा रहा है और उससे यमुना प्रदूषित हो रही है। एनजीटी का कहना था कि कोई भी चीज जो यमुना को प्रदूषित करती है, उसे रोका जाना चाहिए। ऐसी तमाम चीजों पर तुरन्त अंकुश लगाना चाहिए।

प्राधिकरण का कहना था कि यमुना में प्रदूषण नियंत्रण के लिये किन-किन कदमों की आवश्यकता है, उनका तत्काल परीक्षण किया जाये, उन्हें अमल में लाया जाये ताकि प्रदूषण का खात्मा किया जा सके। ग़ौरतलब है कि यमुना के पानी में बीओडी की मात्रा मात्र तीन होनी चाहिए जबकि यह दस गुणा यानी 30 से भी ज्यादा है।

दरअसल 1376 किलोमीटर लम्बी यमुना हिमालय के पहाड़ी इलाके में 157 किलोमीटर के दायरे में बहती है। इस इलाके में यमुना बिलकुल साफ है। यमुना की दुर्गति तो दिल्ली में आकर होती है। दिल्ली एनसीआर में यमुना का विस्तार पल्ला से ओखला बैराज तक है। इसमें अकेले दिल्ली में 22 किलोमीटर का विस्तार वजीराबाद से ओखला तक है।

यमुना को साफ करने का अभियान 1993 में जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कारपोरेशन की मदद से शुरू हुआ। इस यमुना एक्शन प्लान को सन 2000 में पूरा हो जाना था लेकिन शुरुआती विफलताओं के कारण इसकी समय सीमा 2003 तक बढ़ा दी गई लेकिन फिर भी कुछ हाथ नहीं लगा और दूसरे चरण में दिल्ली में पड़ने वाली नदी के हिस्से पर विशेष ध्यान दिये जाने की ख़ातिर जापान ने 17.7 अरब येन की फिर मदद की लेकिन अभी तक कोई सार्थक परिणाम नहीं हासिल हो सका है।

उस हालत में जबकि दिल्ली में 70 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं जो देश की कुल क्षमता का 70 फीसदी है। अब राज्य के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दावा कर रहे हैं कि अगले पाँच साल में यमुना साफ हो जाएगी।

उनके अनुसार आने वाले दो साल में यमुना में गिरने वाले तकरीब 25 बड़े नालों को गिरने से रोक दिया जाएगा। इसके लिये जल्द ही एक प्राधिकरण का गठन किया जाएगा जिसमें राज्य व केन्द्र की 50-50 फीसदी हिस्सेदारी होगी तभी यमुना साफ हो पाएगी।

इसके अलावा रामगंगा और उसकी सहायक नदियाँ खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हैं। इन नदियों में कैल्शियम, मैग्नीशियम व क्लोराइड जैसे तत्त्वों की मात्रा निर्धारित मानक से पचास गुणा से भी ज्यादा है।

एनजीटी ने रामगंगा के प्रदूषण पर भी उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड सरकारों की खिंचाई की है और कहा है कि वह इस पर तत्काल कार्यवाही करें और इसमें गिरने वाले नालों को रोकने की तत्काल व्यवस्था करें। सीपीसीबी की मानें तो उसने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण को सूचित किया है कि हिंडन, कृष्णा और काली नदी का पानी अपशिष्ट और औद्योगिक कचरे के कारण जहरीला हो गया है।

बोर्ड के अनुसार इन नदियों के पानी की जाँच में पाया गया कि इसमें रासायनिक तत्त्वों की मात्रा निर्धारित मानकों से कई हजार गुणा ज्यादा पाई गई है। नतीजन इस प्रदूषण का असर गाज़ियाबाद, मेरठ, मुज़फ़्फरनगर, सहारनपुर, बागपत और शामली के भूजल पर पड़ा है।

सूत्रों की मानें तो मेरठ में बह रही हिंडन नदी में मानव अपशिष्ट तत्त्वों के जीवाणु का स्तर 1 लाख 75 हजार एमपीएन प्रति 100 एमएल पहुँच गया है। जबकि सामान्य स्तर पर तत्त्वों का अधिकतम स्तर 2500 एमपीएन प्रति 100 एमएल होना चाहिए।

बोर्ड ने एनजीटी में दाखिल अपने हलफनामें में कहा है कि जाँच में नाइट्रेट 8.45 एमजी प्रति लीटर पाया गया है जबकि यह शून्य होना चाहिए। चौंकाने वाली बात यह है कि मेरठ में कई स्थानों पर कुल अपशिष्ट जीवाणु 4 करोड़ एमपीएन पाया गया है जबकि इसका सामान्य स्तर प्रति 100 एमएल 5000 एमपीएन होना चाहिए।

वहीं गाज़ियाबाद में अपशिष्ट के जीवाणु का स्तर 2 लाख 50 हजार एमपीएन प्रति 100 एमएल पाया गया है। जबकि सामान्य स्तर पर अधिकतम 2500 एमपीएन प्रति 100 एमएल होना चाहिए। सहारनपुर जिले में तो कृष्णा नदी वहाँ के लोगों के लिये काल बन चुकी है। क्षेत्र में स्थित चीनी मिलों के रासायनयुक्त अपशिष्ट ने नदी का पानी काला कर दिया है।

लोग अनचाहे मौत के मुँह में जा रहे हैं। कारण भूजल का प्रदूषित होना है। हैण्डपम्पों से निकलने वाले पानी को पीकर लोग कैंसर, टीबी, पेट, आँत और त्वचा के रोगी हो रहे हैं। विकट होते हालात के मद्देनज़र गाँवों के लोग पलायन को विवश हैं। दूषित जल ने पशुओं को भी बाँझ बना दिया है।

उत्तर प्रदेश में बढ़ता प्रदूषणअसलियत यह है कि नदियों के विभिन्न स्थानों की जाँच में पाया गया कि पानी की गुणवत्ता इसमें मौजूद कोलिफॉर्म की अधिकता की वजह से खराब हुई है। सिर्फ ग्यारह जगहों पर कोलिफॉर्म बैक्टीरिया मानकों के अनुरूप मिले जबकि बाकी जगहों पर यह तय मानकों से काफी ज्यादा पाये गए।

नियमानुसार 100 मिलीलीटर पानी में इस बैक्टीरिया की तादाद 500 से किसी भी कीमत पर ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन यमुना में इस बैक्टीरिया की अधिकतम तादाद कई जगहों पर 17 करोड़ तक पाई गई है। 51 नमूनों में बीओडी की मात्रा ज्यादा पाई गई जबकि 57 जगहों पर डीओ की अधिकता के कारण पानी की गुणवत्ता खराब पाई गई।

इसी प्रकार 39 जगहों पर पानी की गुणवत्ता टीडीएस के कारण खराब मिली। होना यह चाहिए कि प्रति लीटर पानी में डीओ 5 मिलीग्राम और बीओडी 3 मिलीग्राम प्रति लीटर हो या इससे ज्यादा हो। जबकि टीडीएस की मात्रा 500 मिलीग्राम से ज्यादा होना चाहिए। दरअसल पानी में बैक्टीरिया की मात्रा ज्यादा होना सबसे खतरनाक है।

पानी में बैक्टीरिया जितने कम होते हैं, उतना ही उस पानी को प्रोसेस करके पीने योग्य बनाने में आसानी होती है। यदि बैक्टीरिया ज्यादा मात्रा में हैं तो शुद्धीकरण की तमाम प्रक्रियाओं के बाद भी पानी में बैक्टीरिया की मौजूदगी रह ही जाती है।

ऐसे में स्नान के दौरान कुछ पानी शरीर के अन्दर चला ही जाता है। इसी प्रकार ऐसे पानी से सिंचित फल और सब्जियों को यदि ठीक से बिना धोए खा लिया जाये तो बैक्टीरिया या कोलिफॉर्म हमारे शरीर में प्रवेश कर जाएँगे।

ज्ञात रहे हैजा का कोलिफॉर्म इकोलाई इसी तरीके से फैलता है। पानी में ऑक्सीजन की कमी और अन्य ठोस तत्त्वों की मौजूदगी भी उसकी गुणवत्ता को बिगाड़ती है।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह कि नदी की रक्षा के लिये सबसे जरूरी और अहम बात यही है कि उसके जल के प्राकृतिक प्रवाह को उस सीमा तक बनाए रखना चाहिए जो नदी के पर्यावरण और उसके आसपास के जनजीवन एवं जीव-जन्तुओं के लिये जरूरी है।

नदियों के प्राकृतिक प्रवाह की अविरलता के बाद ही प्रदूषण नियंत्रण के उपायों की कामयाबी सम्भव है जो सरकार पर निर्भर है। सरकारें तो इस बाबत दशकों से काफी कुछ प्रयास कर रही हैं। मौजूदा सरकार ने भी नदियों की सफाई का बीड़ा उठाया है।

जरूरी है सरकार प्रदूषण नियंत्रण की अपनी तकनीक में बदलाव लाये। अमुक नदी को टेम्स बनाना है, ऐसे नारों से कुछ नहीं होने वाला। इसके लिये कुछ करना होगा, तभी बात बनेगी। हमारा भी दायित्त्व है कि हम अपने पाखण्ड के तहत नदियों को गन्दा न करें।

हमें अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकारनी होगी क्योंकि नदियों को प्रदूषित करने के लिये दोषी और अपराधी कोई और नहीं हम ही हैं। नदियों को बचाने की शुरुआत हमें सबसे पहले अपने आप से करनी होगी। नदियाँ जीवनदायिनी हैं। हम उन्हें पूजते हैं तो उन्हें स्वच्छ रखना भी हमारा ही दायित्त्व है। यदि उन्हें हम सहेजेंगे तो वह हमें सहेजेंगी।

यदि नदियाँ नहीं रहीं तो मानव अस्तित्त्व ही खतरे में पड़ जाएगा। क्योंकि नदियों के बगैर मानव जीवन की कल्पना तक सम्भव नहीं है।

आज नदियों का अस्तित्त्व खतरे में है। इसलिये समय की माँग है कि पल्स पोलियो अभियान जिसे समाज के सभी तबकों ने भागीदारी कर सफल बनाया, ठीक उसी तरह संकल्प लें कि हम नदियों में गन्दगी, सीवेज, मल-मूत्र, रासायनिक व औद्योगिक कचरा नहीं डालेंगे तभी हम जिस देश में गंगा बहती है, उस देश के सच्चे वासी होने पर गर्व करेंगे।

यदि ऐसा कर पाने में हम समर्थ हुए तो नदियों के भविष्य के साथ-साथ हम सबका भविष्य भी सुधर जाएगा। इसमें दो राय नहीं।
 

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