अम्बर से जब अमृत बरसे बूँद-बूँद सब क्यों तरसे

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 14:11
Source
दैनिक जागरण, 13 मई, 2018


मानसून आने वाला है और कायदे से आने वाला है। मौसम विभाग की मानें तो इस बार झमाझम बारिस होगी। बहुत करामाती होती है अम्बर से गिरने वाली ये बूँदें। अमृत की इन बूँदों को अगर सहेज लिया जाय या धरती की कोख में पहुँचा दिया जाय तो साल भर बूँद-बूँद पानी के लिये मारामारी नहीं करनी होगी। मगर चार महीने मानसून के दौरान जब चहुँ ओर हमें पानी ही पानी नजर आता है तो हम बाकी आठ महीने की किल्लत भूल जाते हैं। उस पानी को जमा करने का हम कोई प्रयास नहीं करते, लिहाजा वह पोखरों, तालाबों, नालों और नदियों से होता हुआ महासागर में समाधिस्थ हो जाता है। जैसे हम अपनी जरूरत के हर सामान का भण्डारण करते हैं, उसी तरह अपने और परिवार की जरूरत भर के पानी का भण्डारण क्यों नहीं करते। इसके लिये हम क्यों नियमों और कानूनों पर आश्रित हो जाते हैं। मानसून सीजन शुरू हो रहा है, ऐसे में अगर आप नया मकान बनवा रहे हैं तो उसमें या पुराने मकान मेें भी रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाकर प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं और अपनी जरूरत के इस अनमोल संसाधन को जमा कर सकते हैं।


वर्षाजल संचयवर्षाजल संचय (फोटो साभार - दैनिक जागरण)कैग की 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली मेें रोजाना 20.7 करोड़ गैलन पानी की किल्लत होती है। विडम्बना देखिए कि दिल्ली देश के उन चुनिन्दा शहरों में शामिल है जिन्होंने 2001 में वर्षा जल भण्डारण को अपनी नीतियों मेें शामिल करने के लिये नियमों में बदलाव किया था।

औसतन शहर में सालाना 755.4 मिमी बारिश होती है। दिल्ली के कुुल क्षेत्रफल और सालाना बारिश का हिसाब लगाया जाये तो दिल्ली अपना भूजल सालाना 56 करोड़ घन मीटर से रीचार्ज कर सकती है। यह दिल्ली की पानी की जरूरत का तकरीबन दोगुना है।

16 वर्ष पहले दिल्ली ने भले ही वर्षा जल भण्डारण को अनिवार्य बना दिया था, इसे बावजूद यह व्यवस्था व्यवहार में नही आ पाई। इसके पीछे तीन कारण रहे- स्वीकृति लेने की जटिल प्रणाली, अनुभवहीन अधिकारी और उदासीन नागरिक।

2001 में अदालत के आदेश के बाद दिल्ली में छतों के ऊपर वर्षा जल भण्डारण को अनिवार्य बनाया गया। इसी साल शहरी विकास मंत्रालय और गरीबी उन्मूलन मंत्रालय के दिल्ली डिवीजन ने शहर के 1983 के निर्माण उप नियम में संशोधन करके हाइकोर्ट के निर्देशों को शामिल करनेे का नोटिस जारी किया।

इस संशोधन के बाद 100 वर्ग मीटर और इससे अधिक क्षेत्रफल की छत वाली नई इमारतों में वर्षा जल भण्डारण की तकनीक को लगाना अनिवार्य हो गया। जिन इमारतों से रोजाना दस हजार लीटर से अधिक गन्दा पानी निकलता है, वहाँ पानी को रिसाइकिल करने के संयंत्र लगाना भी जरूरी हो गया।

देश के तकरीबन सभी राज्यों ने कानूनी तौर पर शहरों में वर्षा जल भण्डारण को अनिवार्य बना दिया है। यह कानून ज्यादातर नई इमारतों पर लागू होता है। कुछ शहरों की नगर पालिकाओं ने आगे बढ़कर जुर्माने का प्रावधान किया। यहाँ तक कि लोगों को वर्षाजल भण्डारण के प्रति जागरूक करने के लिये प्रोत्साहन राशि देने की व्यवस्था की।

उदाहरण के तौर पर भोपाल व इंदौर में जिस वर्ष इमारत के निर्माण में वर्षाजल भण्डारण की प्रणाली का मिर्माण किया जाता है, उस वर्ष प्रॉपर्टी टैक्स पर छह फीसद की छूट मिलती है। भोपाल के शहरी विकास प्राधिकरण ने 27 अक्टूबर, 2009 में 140 वर्ग मीटर के आकार वाली सभी नई इमारतों के लिये यह नोटिस जारी किया था कि बिल्डर को छत के ऊपर वर्षा जल भण्डारण करने के लिये फंड जमा कराना होगा। इमारत और उसके ऊपर वर्षाजल भण्डारण प्रणाली का निर्माण पूरा होेने पर यह फंड लौटा दिया जाएगा।

कई प्रमुख शहरों की नगर पालिकाओं ने तकनीकी सलाह देने के लिये वर्षाजल भण्डारण सेल बनाये हैं। सभी बड़े शहरों में गैर-सरकारी संगठन, स्कूल व अन्य संस्थान बड़े स्तर पर वर्षाजल भण्डारण कर रहे हैं। केन्द्र सरकार भी वर्षाजल भण्डारण के प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता प्रदान कर रहे हैं। जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण अभियान के तहत शहरी संस्थाओं के लिये यह फंड उपलब्ध है।

दिल्ली और कई अन्य बड़े शहर वर्षाजल भण्डारण को अपनाने में सफल नही हो पाये हैं और रास्ते ढूंढ रहे हैं, वे चेन्नई से सीख ले सकते हैं।

1999-2000 में तमिलनाडु में भयावह सूखा पड़ा था। इसके चलते राज्य ने 2003 में हर इमारत में वर्षाजल भण्डारण की प्रणाली लगाना अनिवार्य कर दिया। यहाँ तक कि पहले से मौजूद इमारतों में भी यह व्यवस्था जरूरी बनाई गई। इसके लिये समय सीमा तय की गई। राजनीतिक इच्छाशक्ति और कुशल प्रशासन ने इसमें बहुत मदद की। दिल्ली की तरह चेन्नई मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी को निर्देश दिये गये कि किसी इमारत का नक्शा तभी पास करना है जब उसमें वर्षाजल भण्डारण प्रणाली शामिल हो। राज्य ने नागरिकों के लिये भी यह अनिवार्य कर दिया कि वे वर्षाजल भण्डारण के ढाँचे की रख-रखाव करेंगे।

शहरी नगर पालिकाओं ने लीक से हटकर कदम उठाये हैं तो नागरिकों और सरकार को इस बात के लिये प्रेरित किया जाना चाहिए कि वे वर्षाजल भण्डारण प्रक्रिया को सम्भालने का जिम्मा लें। कानून बना देने से जमीनी स्तर पर काम नही हो जाता है। इसके साथ प्रोत्साहन राशि दी जानी भी जरूरी है।

फिलहाल वर्षाजल भण्डारण प्रणाली को अपनाने के लिये मिलने वाली प्रोत्साहन राशि बेहद कम है और लाल फीताशाही में बंधी हुई है। इसके चलते आम नागरिक इस प्रणाली को अपनाने में रुचि नहीं दिखाते हैं। नगर पालिका बेहद कम दामों पर नागरिकों को पीने का पानी उपलब्ध कराती है। इस कारण नागरिक वर्षाजल भण्डारण या दूषित जल को शोधित करके दोबारा इस्तेमाल करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते। वे पानी बर्बाद करते रहते हैं। किसी भी शहर के पास एक भी ऐसा नियम नहीं है जो पानी के दुरुपयोग पर लगाम लगा सके।

जल भण्डारण (Water storage)

मौजूदा परिदृश्य में जल का प्रबन्धन और वितरण सबसे अहम हो गया है। लोगों के सरकारी तंत्र पर आश्रित होने के चलते जल प्रबन्धन में सामुदायिक हिस्सेदारी का पतन हो गया। नतीजतन सदियों से देश में चली आ रही रेनवाटर हार्वेस्टिंंग (वर्षाजल भण्डारण) परम्परा का खात्मा हो गया। पंच तत्वों में शामिल पानी सबसे अनमोल प्राकृतिक संसाधन है। कोई भी बिना पानी के जीवित नहीं रह सकता है।

मानव के अस्तित्व के लिये जरूरी जल को वही नहीं सुरक्षित रख सका। शायद इसका एक कारण यह रहा हो कि पानी धरती पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। लिहाजा पानी के प्रति मानव के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार ने जलस्रोतों के खात्मे का रास्ता बना दिया।

पानी की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में गिरावट शुरू हो गई। अब वह स्थिति आ गई है जब एक बूँद पानी भी खास हो गया है। खैर ‘देर आये दुरुस्त आये’ कहावत पर अमल करते हुये अभी भी समय है। एक-एक बूँद बचाने के लिये बारिश के रूप में प्रकृति द्वारा दिये जाने वाले जल का संचय शुरू कर दें।

पुरानी रीति( Traditional methods of water conservation)

परम्परागत रूप से देश में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के तहत बावड़ी, स्टेप वेल, झिरी, लेक, टैंक आदि का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ऐसे जलस्रोतों का रख-रखाव खुद लोगों द्वारा किया जाता था जिससे पानी के सर्वाधिक उपयोग द्वारा जरूरतों को पूरा किया जाता था।

रेनवाटर हार्वेस्टिंग (Rainwater harvesting)

सतह के रिसाव से भूजल का स्तर प्राकृतिक रूप से रिचार्ज होता रहता है। आधुनिक दौर में धरती का ज्यादातर हिस्सा पक्का (कंक्रीट) हो गया है। इसके चलते बारिश का जल स्वतः रिसकर धरती की कोख तक नहीं पहुँच पाता। रेनवाटर हार्वेस्टिंग के तहत हम कृत्रिम तरीके से बारिश के पानी को धरती के अन्दर पहुँचाते है जिससे हमारा भूजल भण्डार ऊपर उठता है। गाँवों ओर शहरों में बारिश के पानी को बहकर बेकार होने से रोककर उसे घरेलू इस्तेमाल करना रेनवाटर हार्वेस्टिंग कहलाता है।

मदर डेयरी (दिल्ली) (Mother Dairy - Delhi)

1. 1,57,700 वर्ग मीटर कैचमेंट एरिया
2. 577.8 मिमी औसत बारिश
3. 2,32,500 घन मी (23,25,00,000 लीटर) बारिश से उपलब्ध होने वाला कुल जल

रेनवाटर हार्वेस्टिंग तंत्र (Rainwater Harvesting System)- वर्षाजल को पुनर्भरण कुओं और गड्ढों मे संग्रह किया जाता है। 10.52 हेक्टेयर कैचमेंट एरिया के भूजल के लिये सात पुनर्भरण गड्ढों और 36 मीटर गहरे एवं 150 मिमी व्यास वाले गर्तों की जरूरत होती है। छत के जल के पुनर्भरण के लिये तीन कुएँ हैं। ये 25 मीटर गहरे बोरवेल से सम्बद्ध है। बालू, बजरी और पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़ों की परत वाले इस बोरवेल में छत से आने वाले पानी को पहले छाना जाता है।

प्रभाव- (Impact ) जलस्तर और भूजल स्तर की गुणवत्ता में सुधार

जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी (दिल्ली) (jamia Humdard University)

1. 3,15,280 वर्ग मीटर कैचमेंट एरिया
2. 611.8 मिमी औसत बारिश
3. 6,74,44,000 लीटर बारिश से उपलब्ध जल

प्रणाली (System) - 12 रिचार्ज चैम्बर और ट्यूबवेल हैं। सतह के जल को पृथक टैंक द्वारा छानकर 30 मीटर गहरे पुनर्भरण कुएँ में भेजा जाता है।

प्रभाव (Impcat)- 2003 में जलस्तर आठ मीटर बढ़ा

राष्ट्रपति भवन (President House India)

नवम्बर 1998 में तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) को आमंत्रित कर राष्ट्रपति भवन में वाटर हार्वेस्टिंग को लकेर सुझाव माँगे। सीएसई ने एक सलाहकार समिति का गठन किया जिसने राष्ट्रपति भवन में वाटर हार्वेस्टिंग को लेकर एक योजना बनाई। इस योजना को सीपीडब्ल्यूडी और सीजीडब्ल्यूबी ने अमलीजामा पहनाया।

जरूरत (Need)- राष्ट्रपति भवन का क्षेत्रफल 133 हेक्टेयर (1.33 वर्ग किमी) है। यहाँ रहने वाले करीब 7000 लोगों के लिये बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। इस इमारत को देखने रोजाना 3000 लोग पहुँचते है। यहाँ के मुगल गार्डेन को काफी पानी की जरूरत पड़ती है। राष्ट्रपति भवन को रोजाना 20 लाख लीटर (73 करोड़ लीटर सालाना) पानी की जरूरत होती है। चूँकि यहाँ कि कुल पानी माँग की 35 फीसद आपूर्ति भूजल द्वारा की जाती है। लिहाजा यहाँ पिछले एक दशक के दौरान भूजल स्तर 2-7 मीटर नीचे चला गया।

उपाय (Remedy)- सालभर में राष्ट्रपति भवन के पूरे क्षेत्र में 81 करोड़ लीटर पानी बरसता है। रेनवाटर हार्वेस्टिंग तरीके के तहत यहाँ एक लाख लीटर क्षमता वाला भूमिगत टैंक बनाया गया। इससे ओवर फ्लो होने वाले पानी को दो खुदाई किये गये कुओं में रिचार्जिंग के लिये भेजा गया। स्टाफ क्वार्टर की छतों के पानी को भी सूखे कुओं में डायवर्ट किया गया। 15 मीटर गहरे रिचार्ज शाफ्ट बनाये गये। मुगल गार्डेन के पास एक जोहड़ (तालाब) भी बनाया गया।

नतीजा (Result)- इससे न केवल राष्ट्रपति भवन में पानी की आपूर्ति सुनिश्चित हुई बल्कि अब यहाँ का भूजल स्तर करीब एक मीटर ऊपर भी उठ चुका है।

डिफेंस कॉलोनी (दिल्ली) (Defence Colony - Delhi)

1. 26,087 वर्ग मीटर कैचमेंट एरिया
2. 611.8 मिमी औसत बारिश
3. 95,63,000 लीटर बारिश उपलब्ध जल

प्रणाली- 15 पुनर्भरण कुओं और छानने वाले चैम्बरों की मदद से संग्रहण किया जाता है। बालू, बजरी की परत से छानकर मृदा तक पहुँचाया जाता है।

प्रभाव- भूजल के स्तर में सुधार हुआ है।

तकनीक का तिलिस्म (Rainwater Harvesting, Result of Technique)

वर्षाजल भण्डारण के तहत कोई भी बरसात के पानी को प्लास्टिक या सीमेंट से बने कृत्रिम टैंक में संग्रह कर सकता है। भूजल रिचार्ज के लिये इस वर्षाजल को धरती की सतह के नीचे प्राकृतिक टैंक के रूप में विद्यमान जलाभृतों (एक्वीफर्स) तक सीधे पहुँचाया जा सकता है।

प्रभावकारी- सौ वर्ग मीटर की किसी छत से छह सौ मिमी बारिश वाले क्षेत्र में पचास हजार लीटर जल का भण्डारण किया जा सकता है। चार लोगों वाले किसी परिवार की सौ दिनों की जल आपूर्ति इस संग्रह से पूरी की जा सकती है।

भण्डारण

जमीन के अन्दर या ऊपर सामान्य सी भण्डारण संरचना बनानी होती है। इस संरचना में छत से आये पानी को एकत्र किया जाता है। वैसे अपेक्षाकृत यह जल स्वच्छ होता है लिहाजा सीधे इसे पीने के साथ अन्य जरूरतों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस्तेमाल की प्रकृति के आधार पर इसमें सामान्य फिल्टरों का उपयोग किया जा सकता है।

रिचार्ज

इसमें घर की छतों से एकत्र पानी को बोरिग पाइपों के माध्यम से धरती के पेट तक पहुँचाया जाता है। कैंचमेंट एरिया (जिस क्षेत्र के वर्षाजल को एकत्र किया जाता है) की प्रकृति और आकार के आधार पर इस प्रणाली में फिल्टरों और डीसिल्टिंग चैम्बर्स का इस्तेमाल किया जाता है। कुएँ, गड्ढे और नालियों के रूप में रिचार्ज ढाँचे बनाये जाते हैं।

रख-रखाव

मानसून से पहले और बाद में तंत्र की सफाई करनी होती है। कैंचमेंट, पाइपों और फिल्टरों की सफाई बहुत आसान और सस्ती प्रक्रिया है।

कहाँ हो भण्डारण

कहीं भी किया जा सकता है। इस तंत्र का डिजाइन तैयार करने के दौरान भण्डारण की जगह, औसत बारिश, बारिश की तीव्रता, मिट्टी भौगोलिक स्थिति और भूजल स्तर आदि का ध्यान रखना होता है।

केस स्टडी-1

पानी संचय के गुर सिखा रहा स्कूल

मुरादाबाद में साहू रमेश कुमार इण्टर कॉलेज उस समय से जल संचय कर रहा है जब पानी के लिये इतनी मारामारी नहीं थी। यहाँ 60 साल पहले सोक पिट लगाकर बारिश के पानी को संचय करने की व्यवस्था की गई थी। स्कूल के आँगन में 20 फीट गहरा पक्का गड्ढा बना है। इसमें सबसे पहले कच्ची ईटें, चूना, कोयला फिर सबसे नीचे रेत डाला गया है और फिर इस सोक पिट में 10 फीट जालीनुमा उल्टी बोरिंग जमीन के अन्दर है, जिसके जरिये पानी फिल्टर होकर 100 फीट गहराई में पहुँचाया जाता है।

सोक पिट के अलावा स्कूल प्रबन्धन ने वर्ष 2015 में रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी लगवाया है। इसमें छतों का पानी कई पाइप के जरिये एक गहरे टैंक में जमा होता है। टैंक में 60 फीट गहरी उल्टी पाइप डालकर जमीन में बारिश का पानी पहुँचाया जाता है। साहू रमेश कुमार कन्या इण्टर कॉलेज में वॉश बेसिन के पानी को भी रिवर्स बोरिंग करके धरती की कोख तक पहुँचाया जाता है। रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से छह हजार लीटर पानी प्रति घण्टे के हिसाब से भूगर्भ में पहुँचता है।

केस स्टडी-2

घर से की शुरुआत तब बनी बात

पटियाला में स्टेट इंस्टीट्यूट अॉफ रूरल डेवलपमेंट एंड पंचायत डिपार्टमेंट से रिटायर असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ नरिदर सिंह संदू ने वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की शुरुआत 2006-07 में अपने घर से की। इसी प्रोजेक्ट को लेकर वह विभिन्न जिलों और खासकर कंडी इलाके में पहुँचे और लोगों को बरसात के पानी को सहेजने की ट्रेनिंग दी।

परिमामस्वरूप पंजाब के अलग-अलग जिलों में करीब डेढ़ हजार लोग अपने घरों और संस्थानों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवा चुके हैं। साल 2016 में पटियाला में लगभग 460 मिमी और 2017 में 695 मिमी बारिश हुई। अगर इस पूरे पानी को सहेज लिया जाए तो साल भर शहर के पानी की जरूरत को आराम से पूरा किया जा सकता है।

आपकी आवाज

आम जनता जल संकट की भयावहता से वाकिफ नहीं है इसलिये वह भूजल का दुरुपयोग होने से नहीं बचा पा रही है तो बारिश के पानी को कैसे संरक्षित कर सकती है।

मुकेश मनुज

हमें आग लगने के बाद कुआँ खोदने की आदत है। सूखा पड़ने या बाढ़ आने के बाद बड़ी बातें की जाती हैं। लेकिन गर्मी का मौसम जाते ही सब लंबी चादर तान के सो जाते हैं। -राजेश चौहान

हम वाटर हार्वेस्टिंग जैसी तकनीक अपना रहे हैं। पानी का कम एवं सार्थक उपयोग करते हैं। हम जानते हैं कि आज पानी नहीं बचाया तो आने वाली पीढ़ी पानी के लिये तरसेगी। -यादव अवधेश

कोई भी कार्य प्रभाव से सफल होता है। पानी को संरक्षित करने के लिये जागरुकता की कमी के साथ ही सरकार के प्रयासों में भी कमी है। विशेषकर शहरी क्षेत्रों के आसपास। -आलोक कुमार तिवारी

बारिश के पानी की तों बात ही न करें। यहाँ तो घर के नल के पानी को भी बर्बाद करते हैं लोग। पानी की कीमत नहीं समझ रही है जनता। -अंशुमन पाठक

बहुसंख्यक लोग उन चुनिन्दा जागरूक लोगों को भी यह कहकर टोक देते हैं कि रहने दो कुछ नही होता और यह मुद्दा सिर्फ गर्मियों में याद आता है जब पानी की समस्या ज्यादा होती है। शुभम शर्मा

बिन जल भयावह कल

1. 4,000 घन किमी देश में सालाना होने वाली वर्षा
2. 1,123 घन किमी उपयोग करने लायक उपलब्ध वर्षाजल (690 घन किमी सतह का जल और 433 घन किमी भूगर्भ जल)
3. 1,869 घन किमी वर्षा जल नदियों में बह जाता है।
4. 17.1% विश्व की आबादी में भारत की हिस्सेदारी
5. 4%वैश्विक जल उपलब्धता में देश की हिस्सेदारी।

 

 

 

जल की माँग (अरब घन मी)

वर्ष

जल की माँग (अरब घन मीटर)

2010

710

2025

843

2050

1180

प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता

वर्ष

जल उपलब्धता

1951

5177

1955

4732(-8.59)

1991

2209 (-53.31)

2001

1816(-17.52)

2011

1545(-14.92)

2025

1341(-26.37)

2050

1140(-14.98)

उपलब्धता (घनमीटर प्रति साल), कोष्ठक में पिछले साल से कमी फीसद में

 

तरीका- मुख्यतया इसके दो तरीके हैं।

सरफेस रनअॉफ हार्वेस्टिंग- शहरी क्षेत्रों में सतह के माध्यम से पानी बहकर बेकार हो जाता है। इस बहते जल को एकत्र करके कई माध्यम से धरती के जलवाही स्तर को रिचार्ज किया जाता है।

रूफ टॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग- बारिस का पानी जहाँ गिरता है वहीं उसे एकत्र कर लिया जाता है। इस पानी को या तो टैंक में संग्रह किया जाता है या फिर इसे कृत्रिम रिचार्ज प्रणाली में भेजा जाता है।

ट्रांसपोर्टेशन- पानी को पाइपों के माध्यम से नीचे स्टोरेज तक पहुँचाया जाता है।

फर्स्ट फ्लश- पहली बारिश में वायुमंडल और छत के प्रदूषक तत्वों को बाहर निकालने के लिये इसका उपयोग होता है।

फिल्टर- भूजल को प्रदूषण से बचाने के लिये फिल्टर का इस्तेमाल किया जाता है। पहली बार होने वाली बारिश के पानी को बाहर निकालने के बाद होने वाली सभी बारिश के पानी को छानने के लिये फिल्टर का प्रयोग किया जाता है।

ऐसे करें हार्वेस्टिंग

छत के पानी को पाइपों के सहारे स्टोरेज टैंक में ले जाया जाता है। सभी पाइप के प्रवेश द्वार पर पतले तार की जाली लगी होती है। इसके बाद इसमें फ्लश डिवाइस और फिल्टर जुड़े होते हैं। टैंकों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे पानी अधिक होेने पर उसे रिचार्ज सिस्टम तक पहुँचाया जा सके। टैंक के पानी का इस्तेमाल कपड़े धोने या पौधों को पानी देने के लिये किया जा सकता है।

 

TAGS

monsoon, rainwater harvesting, recycling of water, water storage methods, water storage essay, water storage techniques, water storage: tanks, cisterns, aquifers and ponds, drinking water storage, what causes water storage, storage of water at home, water storage containers, traditional methods of water conservation in rajasthan, modern methods of water conservation in india, ancient methods of water conservation wikipedia, traditional methods of water harvesting, water conservation methods in india ppt, 5 methods of water conservation, water conservation methods pdf, modern methods of water storage, recycling of water wikipedia, water recycling process, benefits of recycling water, importance of water recycling, water recycling technology, water recycle project, recycled water facts, water recycling methods ppt.

 

 

 

Disqus Comment