अनियोजित विकास की मार प्राकृतिक आपदा

Submitted by RuralWater on Sat, 06/11/2016 - 16:18


.उत्तराखण्ड में इस साल मौसम ने फिर से करवट ली है। बेतरतीब बरसात और तूफान ने जहाँ लोगों के आवासीय भवनों की छतें उड़ाकर लील ली वहीं अत्यधिक वर्षा के कारण बादल फटने और बाढ़ के प्रकोप से लोगों की जानें खतरे में पड़ गई है। मौसम इतना डरावना है कि प्रातः ठीक-ठाक दिखेगा और सायं ढलते ही मौसम का विद्रुप चेहरा बनने लगता है।

ज्ञात हो कि साल 2013 के बाद लोग इतने डरे-सहमें हैं कि थोड़ी सी बारिश और बादल के गरजने पर लोग अपने आशियाने को छोड़ने के लिये तैयार दिखते हैं। लोग अब यहाँ तक कहने को मजबूर हो रहे हैं कि पहाड़ में रहना ही जिन्दगी के साथ सबसे बड़ा चैंलेंज है।

इधर मौसम विभाग के अनुसार 1991 से लेकर 2014 तक टिहरी-उत्तरकाशी में छोटे-बड़े तीस बार भूकम्प के झटके आ चुके हैं। इसके अलावा स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जबसे टिहरी झील बनी तबसे इन जनपदों में अनियमित बरसात होनी आरम्भ हुई है। इस क्षेत्र में भूस्खलन, बादल फटना आम बात हो गई है।

जिस कारण लोग हर समय घरों को छोड़ने के लिये तैयार रहते हैं। वैसे भी मौसम परिवर्तन ने अपना रुख 1977 से आरम्भ कर दिया था, परन्तु 1991 से यह गति और अधिक हुई और 2010 के बाद तो उत्तराखण्ड राज्य पूर्ण रूप से आपदा के चपेट में आ चुका है।

भूगर्भशास्त्री बार-बार सरकारों को अगाह कर चुके हैं कि उत्तरकाशी से लेकर पिथौरागढ़ की पहाड़ियाँ जोन चार और पाँच में आते हैं। जो भूकम्प और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के लिये अतिसंवेदनशील है। फिर भी सरकारें वैज्ञानिकों के सुझाव एक किनारे रखकर पहाड़ में बड़े-बड़े निर्माण कार्य आरम्भ कर दिये हैं। परिणामस्वरूप इसके प्राकृतिक संसाधनों का इतने बेतरतीब तरीके से दोहन हो रहा है कि प्राकृतिक जलस्रोत सूख रहे हैं तो भूस्खलन आपदा जैसी समस्या लोगों के सामने मुँहबाए खड़ी रहती है।

पर्यावरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा कहते हैं कि पहाड़ पर विकास की पहली कसौटी वहाँ के पर्यावरण के अनुसार हो। वे कहते हैं कि ऊँचाई पर चाल-खाल और ढालदार पहाड़ी पर पेड़ों का रोपण, इसके बाद छोटी-छोटी गाड़-गदेरो पर विद्युत उत्पादन होगा तो इस तरह से ही पर्यावरण पर सन्तुलन बनेगा।

मसलन ऐसा नहीं हो रहा है और लोग प्राकृतिक आपदाओं के शिकार हो रहे हैं। रक्षासूत्र आन्दोलन के प्रणेता सुरेश भाई मानते है कि उत्तरकाशी से पिथौरागढ़ की पहाड़ियाँ बेहद संवेदनशील हैं लिहाजा पहाड़ पर विकास के कार्य इनके अनुरूप नहीं हो रहे हैं। कहते हैं कि जिस निमार्ण कार्य पर पहाड़ में 40 लोगों की जगह हो सकती है वहाँ मौजूदा समय में 400 लोग एक बार में पहुँच जाते हैं। यही नहीं बड़े-बड़े निमार्ण कार्य में जो विशालकाय मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है वे इन संवेदनशील पहाड़ियों को झकझोर रहे हैं, जिस कारण पहाड़ में 1977 के बाद प्राकृतिक आपदाओं का घर बनता ही जा रहा है।

बूढ़ाकेदारनाथ के जयशंकर का कहना है कि बादल फटना उनके क्षेत्र में आम बात हो गई है। मगर जब से टिहरी झील बनी और फलेण्डा बाँध बना तब से भिलंगना क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं का घर बन गया है। बादल फटने से प्रभावित हुए भटवाड़ा गाँव के प्रेम दास और एलम दास का कहना है कि आपदा के दौरान आपदा प्रबन्धन विभाग की नींद खुलती है। जब कोई प्राकृतिक आपदा घटित होती है तभी ही आपदा प्रबन्धन विभाग ट्रेनिंग और बचाव के नुस्खे ढूँढते हैं। उन्होंने कहा कि यदि सरकार आपदा प्रभावित क्षेत्रों में पूर्व से ही बचाव के कार्य आरम्भ करते तो बहुत कुछ बचाया जा सकता था। उनका आरोप है कि स्थानीय प्रशासन आपदा प्रभावित लोगों की आवश्यक मदद करने में कोताही ही बरत रहा है।

घनसाली में सामाजिक कार्यकर्ता अनिता शर्मा का कहना है कि आपदा से प्रभावित भटवाड़ा, केमर और सिल्यारा के 200 परिवार खुद ही एक दूसरे के लिये राहत जुटाने में लगे हैं। प्रशासन की तरफ से प्रभावित क्षेत्रों में सिर्फ पटवारी ही घूम रहा है, जो सर्वेक्षण करके आपदा प्रभवितों की रिपोर्ट सरकार को भेजेगा। उनका आरोप है कि आपदा प्रभवितों के लिये राहत के जो मानक सरकार ने बनाए हैं वे स्थायी नहीं हैं और ना ही आपदा राहत को पूरा करने में सक्षम है।

भिलंगना घाटी में एक बार फिर तबाही से डरे सहमे लोगज्ञात हो कि टिहरी जनपद के अर्न्तगत चार जून की सायं को भिलंगना क्षेत्र के लिये आँधी, तूफान और बरसात आफत बनकर आई। भिलंगना ब्लॉक के बालगंगा घाटी में अलग-अलग करीब आधा दर्जन स्थानों पर बादल फटने से भारी तबाही मची। कोठियाड़ा, केमर, सिल्यारा और गनगर में लगभग दो सौ से अधिक आवासीय मकान मलबे में दबकर जमींदोज हो गए। यह घटना दिन में हुई तो ग्रामीणों ने भागकर किसी तरह जान बचाई है।

इस दौरान गिर गाँव के पास 20 मीटर सड़क पूरी तरह से टूट गई। घनसाली के पास सड़क बन्द होने से तहसील प्रशासन घाटी में प्रभावित गाँवों तक नहीं पहुँच पाया है। प्रभारी डीएम अहमद इकबाल ने बताया कि शनिवार को बालगंगा घाटी में कुदरत ने भारी तबाही मचा दी। घाटी के कोठियाड़ा गाँव के ऊपर तोकदा गदेरे में बादल फटने से आधा गाँव तबाह हो गया। वहाँ 50 से अधिक आवासीय भवनों में मलबा घुस गया जिससे घरों में रखा सामान भी मलबे में दब गया।

भारी मात्रा में आये मलबे में 100 से अधिक पशु भी दफन हो गए। इस बीच केमर और सिल्यारा गाँव के ऊपर भी बादल फट गया। जिससे सिल्यारा के 50 आवासीय मकान मलबे में दब गए। वहाँ मोटर पुल बह जाने से लम्बगाँव-कोटालगाँव-घनसाली-केदारनाथ (एलकेसी) मोटरमार्ग पर आवागमन पूरी तरह से ठप हो गया था। केमर में गुलाब लाल का मकान भी ध्वस्त हो गया जिससे घर के अन्दर बँधी चार गाय भी दब गई। गाँव में सड़क पर खड़े कई दुपहिया वाहन और कार मलबे में दब गई।

केमर में ही अम्बेडकर छात्रावास के दो मंजिले भवन में मलबा भर गया। बालगंगा इंटर कालेज केमर का भवन भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया है। जिससे कमरे में रखे कम्प्यूटर और फर्नीचर दब गए। गाँव में 20 से अधिक मकान पूरी तरह से मलबे से दब गए। श्रीकोट गदेरे में भी मलबा आने से सड़क बह गई, जिससे आस-पास के आवासीय भवनों को खतरा पैदा हो गया है।

घनसाली तहसील के पास गिरगाँव गदेरे में बादल फटने से आई बाढ़ से ब्राइटलैंड पब्लिक स्कूल का भवन जमींजोद हो गया। युद्धवीर चौहान, राजपाल चौहान के मकान भी खतरे की जद में आ गए। गाँव के पास सड़क टूटने से चमियाला क्षेत्र का विकासखण्ड मुख्यालय घनसाली से सम्पर्क टूट गया है। गनगर गाँव में भी प्रधान प्यारे लाल और प्रशान्त जोशी सहित 50 से अधिक परिवारों के घर मलबे में दब गए। जिससे ग्रामीणों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं।

इस आपदा के कारण ग्रामीणों के साथ ही रास्ते में फँसे दर्जनों यात्रियों ने भी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बेलेश्वर में शरण ली है। भटवाड़ा गाँव में प्रेमदास और एलम दास का घर भी पूरी तरह से ध्वस्त हो गया। सरणा-रौंसाल में बादल फटने से आये मलबे से सैकड़ों नाली कृषि भूमि तबाह हो गई।

 

बेतरतीब बरसात से लोगों की जान खतरे में


पहाड़ में बारिश का कहर थमने को नहीं है। दो जून की रात को भी रुद्रप्रयाग, चमोली और पौड़ी जिले के कुछ हिस्सों में अतिवृष्टि ने भारी तबाही मचाई।

रुद्रप्रयाग जिले में रानीगढ़ पट्टी के कोट तल्ला गाँव और भैरव गदेरे के ऊपर अतिवृष्टि से कोट तल्ला, ग्वाड़ कोदिमा और जसोली गाँव में कई नाली भूमि फसल सहित नष्ट हो गई। गाँव के पैदल रास्ते, पेयजल स्रोत और पेयजल लाइन क्षतिग्रस्त हो गई। गौशालाओं में पानी भर गया। भैरव गदेरे के उफान में कोट तल्ला का एक युवक बहने से बाल-बाल बचा।

आदिबदरी तहसील के बिसौंणा गाँव के ऊपर पहाड़ी पर हुए बज्रपात से पानी और मलबा गाँव में जा घुसा जिससे आठ गौशालाएँ और तीन मकान क्षतिग्रस्त हो गए। 28 से अधिक मवेशी जिन्दा दफन हो गए। गाँव की पेयजल और विद्युत लाइनें बारिश की भेंट चढ़ गईं। सड़क और सम्पर्क मार्ग भी जगह-जगह बन्द हो गए। प्राइमरी स्कूल की पेयजल लाइन क्षतिग्रस्त होने के साथ ही अन्य आठ प्राकृतिक पेयजल स्रोत भी तबाह हो गए।

गाँव के 85 परिवार चार घंटे तक पानी के लिये तरसते रहे। बाद में एक किमी दूर गदेरे में मलबा हटाकर किसी प्रकार पानी की व्यवस्था की गई। पौड़ी जिले में थलीसैंण ब्लाक में एक मकान पूर्ण रूप से और 17 मकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए। 30 मई को दोपहर बाद जिला मुख्यालय सहित केदारनाथ में जमकर बारिश हुई। जिस कारण काफी नुकसान भी हुआ है।

बादल फटने से क्षतिग्रस्त पुलबद्रीनाथ हाईवे पर एक होटल ढह गया। जबकि केदारनाथ हाईवे सोनप्रयाग-गौरीकुंड के बीच मुनकिटया में मलबा आने से क्षतिग्रस्त हो गया है। तिलवाड़ा-मयाली मोटरमार्ग पर जगह-जगह तेज आँधी चलने के कारण कई पेड़ गिर गए। इस कारण दो दिन तक हजारों तीर्थ यात्री और स्थानीय लोग फँसे रहे। इसके साथ ही राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पांडवथली के भवन के ऊपर पेड़ गिर जाने से दो कमरे क्षतिग्रस्त हो गए। रुद्रप्रयाग के विकासखण्ड जखोली के त्यूंखर गाँव में उत्तम सिंह, उम्मेद सिंह और सम्पूर्ण सिंह के घरों की छत तेज आँधी से उड़ गई है।

 

मुस्तैद है प्रशासन


टिहरी के प्रभारी जिलाधिकारी इकबाल ने कहा कि चूँकि बादल फटने की घटना दिन में हुई इसलिये लोग सुरक्षित भागने के लिये सचेत थे। घनसाली के एसडीएम विनोद कुमार का कहना है कि बादल फटने से भिलंगना में भारी तबाही मची है, घनसाली-चमियाला मोटर मार्ग कई जगह बन्द होने से प्रभावित गाँवों में त्वरित मदद नहीं पहुँचा पाये। बन्द सड़कों को खोलने के लिये जेसीबी मशीनें लगाई गई हैं। थाना प्रभारी पवन कुमार ने बताया कि 15 साल का विपुल बादल फटने के बाद आई बाढ़ में बह गया है जिसकी पुष्टी हो चुकी है।

 

 

 

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