अपने गांव वापस लौटना

Submitted by Hindi on Sat, 05/14/2011 - 11:31
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

मैं अपने अनुभव को वास्तविक रूप से प्रदर्शित कर दूं तो दुनिया को उसकी सच्चाई का पता चल जाएगा। अपने दर्शन के बारे में लोगों को हजार कैफियतें देने से क्या यह बेहतर नहीं होगा कि मैं उसे खुद अपने आचरण में उतार लूं।

इस अनुभव के अगले दिन यानी 16 मई को मैंने काम पर वापस लौटकर वहीं-के-वहीं अपना इस्तीफा थमा दिया। मेरे वरिष्ठ अधिकारी और मित्र आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि इसका क्या मतलब निकाला जाए? उन लोगों ने कगार पर स्थित रेस्ट्रां में मेरे लिए एक विदाई पार्टी भी आयोजित की, लेकिन उसमें भी वातावरण कुछ अजीब सा रहा। मेरे साथी सोच रहे थे, यह युवक जो अभी कल तक सब लोगों के साथ हिल-मिलकर रह रहा था, जिसे अपने काम से भी कोई खास शिकायत नहीं थी, बल्कि जिसने अपनी पूरी लगन के साथ खुद को अपने अनुसंधान कार्य के प्रति समर्पित कर दिया था, उसने अचानक अपनी नौकरी छोड़ने की घोषणा क्यों की? और मैं, बड़े मजे से हंस रहा था।

उस समय मैंने उपस्थित मित्रों से कुछ यों कहा थाः ‘इस तरफ जहाज-घाट है और उस पार घाट का चौथा खंभा। यदि आप सोचते हैं कि इस तरफ जिंदगी है तो मौत उस तरफ है। यदि आप मौत से छुटकारा पाना चाहते हो तो आपको पहले इस धारणा को त्यागना होगा कि इस पार जिंदगी है। जीवन और मृत्यु एक ही चीज है।’

जब मैंने उपरोक्त शब्द कहे तो सभी लोग मेरे बारे में और भी चिंतित हो गए। ‘आखिर यह क्या कह रहा है? जरूर इसका दिमाग चल गया है!’ उन लोगों ने सोचा होगा। उन लोगों ने उतरे हुए चेहरों से मुझे विदा किया। अकेला मैं ही था जो उत्साहित मन से तेज-तेज चल रहा था।

कमरे में रहने वाला मेरा साथी भी उन दिनों मेरे बारे में बहुत ही चिंतित था। उसने मुझे सलाह दी कि मैं कुछ दिन आराम करूं, हो सके तो दूर बोसो प्रायद्वीप पर। अतः मैं वहां से चल दिया। उस वक्त मुझसे कोई जहां भी चलने को कहता, मैं वहीं चल देता था। मैं बस में सवार होकर राजमार्ग पर मीलों, खिड़की में से खेतों पर बने चौखाने और छोटे-छोटे गांवों को देखते हुए चला गया। एक जगह जहां बस रुकी, मैंने वही तख्ती लगी देखी ‘यूटोपिया’ (काल्पनिक आदर्श लोग)। मैं वहीं उतर गया और उसकी तलाश में निकल पड़ा।

समुद्र तट पर एक छोटी सी सराय थी और कगार चढ़ने पर मुझे वाकई एक खूबसूरत जगह नजर आई। मैं सराय में ठहर गया और समंदर की तरफ देखती लंबी-लंबी घासों के बीच ऊंघते मैंने कई दिन बिता दिए। पता नहीं वहां मैं हफ्ता रहा या महीना, लेकिन इतना तय है कि मैं वहां काफी समय तक रहा। बीतते दिनों के साथ मेरी सुखानभूति भी मध्यम होने लगी, और जो कुछ अभी हाल में घटा था उस पर मैंने विचार करना शुरू किया। आप कह सकते हैं कि मैं फिर से होश में आने लगा।

वहां से मैं टोकियो जाकर कुछ दिन रहा। मैं रोज पार्क में घूमते-फिरते लोगों को रोककर उनसे बतियाते हुए अपना समय गुजारता और कहीं भी सो जाता। मेरा दोस्त मेरे बारे में चिंतित था। मेरा हाल देखने वह वहां आया। ‘क्या तुम किसी स्वप्नदेश में, एक अवास्तविक दुनिया में नहीं जी रहे हो।’ हम दोनों एक ही बात सोच रहे थे।’ मैं सही हूं और तुम सपनों की दुनिया में जी रहे हो।’ जब मेरा दोस्त मुझसे विदाई लेने आया तो मैंने उससे कुछ यूं कहा: ‘गुडबॉय मत कहो। विदा होना बस विदा होना है।’ लगता है इसके बाद मेरे दोस्त ने मेरे बारे में उम्मीद छोड़ दी।

मैंने टोक्यो भी छोड़ दिया और कान्साई क्षेत्र (ओसाका, कोबे, क्योतो) से गुजरता हुआ ठेठ दक्षिण में क्यूशू तक आ गया। हवा में तिनके की तरह भटकना मुझे अच्छा लग रहा था। इस दौरान कई लोगों को मैंने अपना यह विचार बतलाया कि हर चीज निरर्थक और मूल्यहीन है। घूम-फिर कर हर चीज बेमानी हो जाती है।

प्राकृतिक कृषि के बीच परस्पर संबंध् के बारे में ही सोचता रहा। रासायनिक कृषि, जो मानव बुद्धि से उपजी चीजों का उपयोग करती है, को श्रेष्ठ माना जाता है। जो सवाल मेरे दिमाग में हमेशा मौजूद रहा। वह यह था कि प्राकृतिक कृषि, आधुनिक विज्ञान के सामने टिक सकती है या नहीं।

लेकिन सामान्य लोगों के लिए इस विचार को ग्रहण करना या तो बहुत बड़ी बात थी या बहुत छोटी। लोगों के साथ किसी भी तरह का संवाद स्थापित नहीं हो पाया। मैं सिर्फ यही सोचकर तसल्ली पर रहा था कि उपयोगहीनता ही इस असाधारण दुनिया के लिए बड़े काम की चीज है। खासतौर पर उस दुनिया के लिए जो बड़ी तेजी से इसके विपरीत दिशा में भाग रही थी। मैंने एक बार इस विचार को सारे देश में फैलाने के बारे में भी गंभीरता से सोचा। नतीजा यह हुआ कि मैं जहां-जहां भी गया, लोगों ने सनकी समझकर मेरी उपेक्षा की। अंततः मैं गांव में अपने पिता के खेतों को लौट गया।

उन दिनों मेरे पिता संतरों की खेती कर रहे थे, और मैं पहाड़ी पर एक कुटिया बनाकर आदिम तरीके की सादी जिंदगी जीने लगा। मैंने सोचा कि यहां एक किसान के रूप में नारंगियों और अनाज उगाते हुए यदि मैं अपने अनुभव को वास्तविक रूप से प्रदर्शित कर दूं तो दुनिया को उसकी सच्चाई का पता चल जाएगा। अपने दर्शन के बारे में लोगों को हजार कैफियतें देने से क्या यह बेहतर नहीं होगा कि मैं उसे खुद अपने आचरण में उतार लूं। खेती की ‘कुछ-न-करो’ की विधि की शुरुआत इसी विचार के साथ हुई। यह काम 1938 यानी तात्कालीन सम्राट के राज्यकाल के तेरहवें बरस में शुरू हुआ।

मैं पहाड़ पर बस गया और तब तक सब कुछ ठीक-ठाक चला। जब मेरे पिता ने बाग के खूब फल देने वाले पेड़ मुझे सौंपे उस समय तक वे इन पेड़ों को काट-छांटकर ‘साके’ मदिरा के प्यालों का आकार दे चुके थे, ताकि ऊपर लगे फलों को आसानी से तोड़ा जा सके। जब मैंने उनको इसी हालत में छोड़ दिया तो, हुआ यह कि उनकी शाखाएं आपस में मिल गयीं। कीड़ों ने पेड़ों पर हमला बोल दिया और पूरा बाग कुछ ही दिनों में मुरझा गया।

मेरा विश्वास यह था कि फसलें अपने आप पनपती हैं और उन्हें उगाने की जरूरत नहीं होती। मैं यह मानकर चल रहा था कि हर चीज को अपना स्वाभाविक रास्ता अपनाने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए। लेकिन बाद में मुझे पता चला कि यदि आप इस तरह के विचार को एकदम लागू कर दें, तो कुछ दिनों बाद आपके नतीजे बहुत अच्छे नहीं होते। यह तो परित्याग होगा, प्राकृतिक कृषि नहीं।

मेरे पिता को एक धक्का लगा। उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे अपने आपको फिर से अनुशासित करना होगा। हो सके तो मैं कहीं कुछ और काम तलाश कर लूं। और जब मेरी दिमागी हालत कुछ ठीक हो तभी वापस लौटूं। उन दिनों मेरे पिता गांव के मुखिया थे और बिरादरी के लोगों के लिए, उनके उस सनकी बेटे के साथ निभाना बड़ा कठिन हो रहा था, जो खुद ही दुनिया के साथ अपनी पटरी नहीं बिठा पा रहा था। वर्ना वो अकेले पहाड़ी पर क्यों रहता? इतना ही नहीं, सैनिक सेवा में जाने का विचार भी मुझे नापसंद था, और चूंकि लड़ाई दिनों-दिन और ज्यादा हिंसक होती जा रही थी, इसलिए मैंने विनम्रतापूर्वक पिता की सलाह को मानते हुए कोई नौकरी खोज लेने का फैसला कर लिया।

उन दिनों तकनीकी योग्यता रखने वाले लोगों की कमी थी। कोची शासकीय परीक्षण केंद्र ने मेरे बारे में सुना और हुआ ऐसा कि मुझे वहां प्रमुख व्याधि तथा कीट नियंत्रण शोधकर्ता का पद देने की पेशकश की गई। कोची शासन की मेहरबानी से मैंने इस पद पर तकरीबन आठ वर्ष तक काम किया। परीक्षण केंद्र के वैज्ञानिक कृषि प्रभाग में मैं सुपरवाईजर बन गया तथा अनुसंधान में मैंने अपना सारा ध्यान युद्धकाल में उत्पादन वृद्धि पर केंद्रित कर दिया। लेकिन वास्तव में उन आठ बरसों के दौरान मैं लगातार वैज्ञानिक और प्राकृतिक कृषि के बीच परस्पर संबंध् के बारे में ही सोचता रहा। रासायनिक कृषि, जो मानव बुद्धि से उपजी चीजों का उपयोग करती है, को श्रेष्ठ माना जाता है। जो सवाल मेरे दिमाग में हमेशा मौजूद रहा। वह यह था कि प्राकृतिक कृषि, आधुनिक विज्ञान के सामने टिक सकती है या नहीं।

जैसे ही लड़ाई खत्म हुई मैंने स्वतंत्रता की ताजी हवा को बहते महसूस किया और चैन की सांस लेते हुए नये सिरे से खेती करने के लिए मैं अपने गांव लौट गया।

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