आर्थिक विकास में जल संसाधन प्रबंधन

Submitted by Hindi on Tue, 07/19/2016 - 16:44
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योजना, जुलाई, 2016

ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट 2016 में विश्व आर्थिक मंच (2016) ने प्रभावकारिता के स्तर पर जल संकट को सबसे बड़े वैश्विक खतरे के रूप में सूचीबद्ध किया है। जल संकट के विविध आयाम हैं, जिनमें भौतिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय (जल की गुणवत्ता से सम्बन्धित) आदि प्रमुख हैं। आबादी का बढ़ता दबाव, बड़े पैमाने पर शहरीकरण, बढ़ती आर्थिक गतिविधियाँ, उपभोग की बदलती प्रवृत्तियाँ, रहन-सहन के स्तर में सुधार, जलवायु विविधता, सिंचित कृषि का विस्तार एवं जल की अधिकांश माँग करने वाली फसलों की पैदावार आदि से जल की माँग का दायरा बढ़ा है

.सन 2002-03 से ही भारत में वार्षिक आर्थिक वृद्धि की रफ्तार 7.28 के उच्च औसत की देखी जा रही है। इस वृद्धि को आधार न सिर्फ नित पूँजी उपभोग (मानव निर्मित पूँजी) दे रहा है, बल्कि इसमें प्राकृतिक संसाधनों का भी योगदान है। वस्तु और सेवाओं के अलावा उत्पादन और उपभोग की प्रक्रिया भी प्रदूषण और कचरा पैदा करती है, जिन्हें पर्यावरण में (हवा, पानी और स्थल) छोड़ दिया जाता है। एक अंतर्ग्राही वस्तु के रूप में सीधे उपयोग के अलावा पर्यावरणीय कचरा सिंक की तरह भी व्यवहार करता है, जिससे प्रदूषण का भार और भी अधिक बढ़ जाता है, इससे पर्यावरणीय अपक्षरण (हवा और पानी का प्रदूषण, मृदा का क्षरण) भी होता है।

पर्यावरण की ऐसी पारिस्थितिकी (जैसे प्रदूषण का जमा होते जाना), जिसमें कुछ प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण और अपघटन (जैसे हवा, पानी और मृदा का प्रदूषण) आदि को राष्ट्रीय लेखा की वर्तमान प्रणाली में शामिल नहीं किया जाता, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में पर्यावरणीय ऋण का अंदाजा ही नहीं लग पाता। दूसरे शब्दों में, प्राकृतिक संसाधनों जैसे पानी (क्षरित और अपघटित) के योगदान को सकल घरेलू उत्पाद में जोड़ा नहीं जाता और इस प्रकार दीर्घकालीन अवधि में उच्च आर्थिक वृद्धि दर हासिल करने की क्षमताएँ (जल की उपलब्धता और पारिस्थितिक सेवाओं के संकुचन के लिहाज से) और/या आर्थिक विकास की संभावनाएँ (जैसे जल प्रदूषण की वजह से समाज पर खर्च बढ़ने (लोक स्वास्थ्य) सीमित हो जाती हैं।

यदि प्रदूषण की कटौती को उत्पादन एवं/या उपभोग गतिविधियों के समतुल्य स्तर पर नहीं लाया गया, तो इसका परिणाम व्यापक स्तर पर जल प्रदूषण के रूप में सामने आएगा। जल प्रदूषण से जुड़े दुष्परिणामों की कीमत समाज को चुकानी पड़ती है। लोक स्वास्थ्य की कीमत (जल प्रदूषण से हुई मृत्यु और सेहत की समस्या) एवं पर्यावरणी अपघटन के फलस्वरूप रहवास का नुकसान (जल प्रदूषण एवं भूमि का क्षरण) इस संदर्भ में उदाहरणस्वरूप देखे जा सकते हैं। लोक स्वास्थ्य के मामलों के अलावा पर्यावरणी अपघटन के फलस्वरूप हो रहे रहवास का नुकसान भारत जैसे विकसित देशों के लिये बड़ी चिन्ता की वजह है, जहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी जीने के लिये प्राथमिक गतिविधियों जैसे कृषि, पशुपालन एवं मत्स्य पालन पर निर्भर है।

(मुखर्जी एंड चक्रवर्ती, 2012) भारत में बढ़ती आबादी और बढ़ती माँग आगे भी प्राकृतिक संसाधनों एवं कचरे के सिंक दोनों के रूप में पर्यावरण पर निर्भरता बढ़ाएगी। स्थानी पर्यावरणी प्रभाव के अलावा जलवायु परिवर्तन मिलियन तटीय आबादी को प्रभावित करेगी, साथ ही मानसून की कालावधि विविधता, ग्लेशियरों का पिघलना आदि भी हमारे सामाजिक-आर्थिक विकास पर अहितकारी प्रभाव डालेंगे।

सिर्फ ऐसा नहीं है कि जल सुरक्षा आर्थिक वृद्धि एवं मानव विकास की उपलब्धियों को प्रभावित करती है, बल्कि यह विभिन्न क्षेत्रों में पानी के उपयोग के स्तर को भी प्रभावित करती है, जिसमें जल पर्यावरण की स्थितियाँ एवं जल क्षेत्र की तकनीकी एवं सांस्थिक क्षमताएँ (कुमार व अन्य - 2008) भी शामिल हैं। कुमार-2008 यह स्पष्ट करता है कि जल के उपयोग की बेहतर स्थितियाँ, जल क्षेत्र की संस्थागत क्षमताएँ एवं बेहतर जल पर्यावरण, जल ढाँचे में निवेश, संस्थाओं का निर्माण एवं नीतिगत सुधार आदि से राष्ट्र के आर्थिक विकास में मदद मिलती है।

हालाँकि अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि आर्थिक वृद्धि जल सम्बन्धी समस्याओं के समाधान की कोई पूर्व निर्धारित शर्त नहीं है। इसके इतर मानव विकास एवं आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिये देशों को जल के आधारभूत ढाँचे में निवेश करने संस्थागत एवं नीतिगत सुधार करने की आवश्यकता है। आगे विश्लेषण से यह तथ्य सामने आता है कि गर्म एवं शुष्क उष्ण कटिबंधीय देशों में व्यापक पैमाने पर जल संग्रह के उपयोग ने आर्थिक विकास में मदद की है। इन सबके साथ कुपोषण एवं बाल मृत्यु दर में कमी लाया जाना भी समीचीन कदम होगा।

पिछले कुछ दशक में स्वच्छ पेयजल की बढ़ती माँग एवं इसकी कालिक एवं स्थानिक उपलब्धता जल संकट के प्रमुख कारकों में से है। जल संकट का उद्गम एक तरह से स्वच्छ पेयजल की माँग एवं उपलब्धता के भौगोलिक एवं स्थानिक असमानता के रूप में भी देखा जा रहा है। जल संकट का प्रभाव सामाजिक, पर्यावरणीय एवं आर्थिक प्रभाव के रूप में सामने आ रहा है।

ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट 2016 में विश्व आर्थिक मंच (2016) ने प्रभावकारिता के स्तर पर जल संकट को सबसे बड़े वैश्विक खतरे के रूप में सूचीबद्ध किया है। जल संकट के विविध आयाम हैं, जिनमें भौतिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय (जल की गुणवत्ता से सम्बन्धित) आदि प्रमुख हैं। आबादी का बढ़ता दबाव, बड़े पैमाने पर शहरीकरण, बढ़ती आर्थिक गतिविधियाँ, उपभोग की बदलती प्रवृत्तियाँ, रहन-सहन के स्तर में सुधार, जलवायु विविधता, सिंचित कृषि का विस्तार एवं जल की अधिकांश माँग करने वाली फसलों की पैदावार आदि से जल की माँग का दायरा बढ़ा है। पिछले कुछ दशक में स्वच्छ पेयजल की बढ़ती माँग इसकी कालिक एवं स्थानिक उपलब्धता जल संकट के प्रमुख कारकों में से है। जल संकट का उद्गम एक तरह से स्वच्छ पेयजल की माँग एवं उपलब्धता के भौगोलिक एवं स्थानिक असमानता के रूप में भी देखा जा रहा है। जल संकट का प्रभाव सामाजिक, पर्यावरणीय एवं आर्थिक प्रभाव के रूप में सामने आ रहा है।

जल की उपलब्धता का वार्षिक आंकलन वर्ष भर में इसकी उपलब्धता की विविधता के साथ नहीं जोड़ा जाता, इस प्रकार जल संकट एवं इससे जुड़े सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव का आंकलन नहीं हो पाता। (मैकोनेन व अन्य 2016)। उच्च जल सुरक्षा, उच्च आबादी घनत्व वाले क्षेत्रों में होती है, फिर अधिकांश सिंचित कृषि वाले क्षेत्रों में या फिर दोनों ही क्षेत्रों में। भारत के गंगा बेसिन में जल का उपभोग एवं जल की उपलब्धता चक्र भी है, जहाँ जल का उपभोग तब सर्वाधिक पाया जाता है, जब जल की उपलब्धता सबसे कम होती है। (मैकोनेन व अन्य 2016)। सन 1996 से 2005 के बीच मासिक जल उपलब्धता पर आधारित एक हालिया आकलन के अनुसार चार अरब लोग साल में एक महीने के लिये भीषण जल संकट से गुजरते हैं। इन चार अरब लोगों में से एक चौथाई (एक अरब लोग) भारत में निवास करते हैं, जहाँ लगभग आधा अरब लोग पूरे साल भर भीषण जल संकट का सामना करते हैं।

इन आधा अरब लोगों में से 180 मिलियन लोग भारत में निवास करते हैं। भारतीय संदर्भ में तथ्य समस्या की गम्भीरता को उजागर करते हैं। जल के सर्वाधिक उपयोग के संदर्भ में सिंचित कृषि पर जल संकट का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। संकट की गम्भीरता के अनुसार कृषि पर पड़ने वाला प्रभाव विविधतापूर्ण होता है। गंभीर स्थितियों में कृषि उत्पादकता में ह्रास या अनाज न होने की स्थिति में किसानों की आजीविका बुरी तरह प्रभावित होती है। हालाँकि सभी तरह के किसानों पर जल संकट के परिणाम एक तरह नहीं होते। यह संकट के प्रकार, किसानों की अनुकूलन क्षमता, जल की उपलब्धता की स्थितियाँ एवं किसानों के सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में कौन सी फसल किसानों ने चुनी है, उसका असर जल संकट की कमी के रूप में सामने आता देखा गया है।

जल की उपलब्धता के सम्बन्ध में किसानों तक सूचना की पहुँच एवं फसल बोने से पूर्व अकाल की जानकारी हो जाना भी जल संकट से जूझने में किसानों को मदद करता है। इस संदर्भ में जीने के प्रकारों में विविधता का अनुकूलन श्रेष्ठ विकल्प हो सकता है। जो किसान अपनी आजीविका के लिये सिर्फ खेती पर निर्भर नहीं है, वे जल संकट का अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से सामना कर सकते हैं। कृषि में आय की कमी का असर अग्रिम और पृष्ठ सम्बन्धों के माध्यम से अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों पर पड़ता है। अगर अकाल का असर बहुत गम्भीर है, तो इससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी के जरिये मुद्रास्फीति को बढ़ावा मिलेगा। जल संकट आय में असंगति पैदा करता है, जिससे निर्मित वस्तु एवं सेवाओं की माँग में कमी आती है और दीर्घकालीन अवधि में यह सामांतर स्तर पर आर्थिक मंदी के रूप में सामने आता है।

निर्माण एवं सेवा प्रक्षेत्र में जल संकट का असर उन क्षेत्रों में जल उपयोग की तीव्रता पर निर्भर करता है। अनुमान लगाया जाता है कि निर्माण क्षेत्र में जल की तीव्र माँग वाली औद्योगिक गतिविधियाँ जैसे टेक्सटाइल ब्लीचिंग, डाईंग, लेदर प्रोसेसिंग, फूड प्रोसेसिंग और बेवरेजेज, पल्प एवं पेपर उद्योग को जल संकट का सर्वाधिक सामना करना पड़ेगा।

निर्माण एवं सेवा प्रक्षेत्र में जल संकट का असर उन क्षेत्रों में जल उपयोग की तीव्रता पर निर्भर करता है। अनुमान लगाया जाता है कि निर्माण क्षेत्र में जल की तीव्र माँग वाली औद्योगिक गतिविधियाँ जैसे टेक्सटाइल ब्लीचिंग, डाईंग लेदर प्रोसेसिंग, फूड प्रोसेसिंग और बेवरेजेज, पल्प एवं पेपर उद्योग को जल संकट का सर्वाधिक सामना करना पड़ेगा सेवा क्षेत्र में सर्वाधिक प्रभाव आतिथ्य क्षेत्र (होटल एवं रेस्टोरेंट), चिकित्सा सेवा (अस्पताल) एवं निर्माण/रियल एस्टेट क्षेत्र पर पड़ेगा। दक्षिण भारत के टेक्सटाइल ब्लीचिंग एवं डाईंग प्रक्षेत्रों को पास के गाँवों से टैंकर में पानी खरीदना पड़ता है। हालाँकि कृषि की तुलना में औद्योगिक क्षेत्र में जल का उपयोग कम है, फिर भी इसके जो औद्योगिक घटक भूमि या सतही जल से मिलते हैं, वे जल स्रोतों को अन्य उपयोग के लिये बेकार कर देते हैं। ऐसी निर्माण इकाइयाँ प्रदूषण रोकने हेतु अपने व्यक्तिगत खर्च में कटौती कर एवं मानकों का पालन न करने की वजह से प्रदूषण का सारा भार अंततः समाज पर डाल देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि भूजल एवं सतह जल का प्रदूषण व्यापक स्तर पर होता है। (मुखर्जी एवं नेलित, 2007)।

सुरक्षित पेयजल तक पहुँच मानव जीवन एवं स्वास्थ्य के लिये बेहद जरूरी है (यूएनडीपी 2006)। बेहतर जलापूर्ति एवं स्वच्छता सुविधाओं को सन 2030 तक वैश्विक स्तर तक पहुँचाना विकास के प्रमुख लक्ष्यों में से एक है (गोल 6), जो सभी के लिये जल एवं स्वच्छता की उपलब्धता एवं प्रबंधन की कामना पर आधारित है (संयुक्त राष्ट्र)। किसी खास बिंदु एवं अन्य कारणों से प्रदूषण जल संसाधन को पेयजल उपल्बधता से वंचित करता है। इस तरह भावी पीढ़ी के लिये पेयजल के सुरक्षित स्रोत को कायम रखने के प्रयास आज दाँव पर हैं।

प्रदूषित पेयजल का उपयोग करने वाली आबादी विविध प्रकार के जल जनित रोगों का शिकार बनती है। इस कारण जल जनित बीमारियों से मृत्यु दर एवं बीमारियाँ उच्च स्तर पर हैं। प्रदूषित जल के उपयोग से भावी स्वास्थ्य खतरे (रोगग्रस्तता एवं मृत्यु) को रोकने के लिये सरकारें एवं आम लोग विभिन्न प्रदूषण-मुक्त गतिविधियों में पैसे खर्च करते हैं, जिनमें जल का शोधन, स्रोत की सफाई या फिर बोतलबंद पानी की खरीद आदि शामिल हैं। इनमें ज्यादातर गरीब हाशिये के लोग ही शिकार होते हैं, क्योंकि वे प्रदूषण के प्रभाव से खुद को बचा पाने में असमर्थ होते हैं, फिर आपूर्ति किये जा रहे जल तक उनकी पहुँच नहीं है या फिर वे जल शोधन में खुद ही खर्च नहीं कर सकते।

नदियों के जल के बड़े पैमाने पर ऊपर ही ऊपर दोहन से इस पर निर्भर लोगों के लिये स्वच्छ पेयजल की कमी हो गई है। कई सदानीरा नदियों में गर्मियों में पर्याप्त स्वच्छ पानी नहीं होता, ताकि वे वांछित पर्यावरणी बहाव एवं पारिस्थितिकी क्रियाओं जैसे भूजल रिचार्ज में अपना योगदान दे सकें। सतही जल एवं भूजल की एक-दूसरे पर निर्भरता वजह से किसी भी किस्म का अवरोध नदियों की पारिस्थितिकी को संवेदनशील स्तर पर पहुँचा देता है एवं इसके कारण बड़े पैमाने पर जल का क्षरण एवं अपघटन हो जाता है। भारत के कई हिस्सों में भूजल का गिरता स्तर चेतावनीपूर्ण स्थिति में पहुँच चुका है।

जलग्राही फसलों जैसे गन्ना, धान की वर्षभर पैदावार, सतह जल आधारित सिंचाई प्रणाली में अपर्याप्त निवेश, नहर के जल आपूर्ति की अनियमितता, नहर जल की आपूर्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप एवं जलस्रोतों पर कब्जे आदि ने सिंचाई के लिये भूजल पर निर्भरता बढ़ा दी है। वर्षाजल एवं जल छाजन संसाधनों से साल भर भूजल का पंप से दोहन की वजह से भूजल पर निर्भर लोगों के लिये जल की कमी हो गई है, भूजल काफी नीचे चला गया है। (श्रीनिवासन एवं लेले, 2016 एट एल, 2008)। सतह जल आधारित सिंचाई प्रणाली से लोग निवेश को विमुख करने, निःशुल्क बिजली मुहैया करा कर सिंचित कृषि एवं भूजल आधारित सिंचाई प्रणाली को बढ़ावा देकर जल प्रबंधन का अदूरदर्शी कदम वर्तमान जल संकट के प्राथमिक कारणों में से एक है। सिंचित कृषि एवं ज्यादा माँग वाले बदलते फसल क्रम की तरफ झुकाव ने जल संकट की स्थिति में अनुकूलित कृषि की संभावना को कम कर दिया है।

अब जो प्रमुख प्रश्न उभरते हैं, वे हैं (अ) कि हमें ज्यादा जल की माँग वाले अनाजों जैसे धान, गेहूँ, गन्ने आदि के उत्पादन की आवश्यकता है और क्या हम इन्हें खुले खेत में सड़ने दें या फिर गैरवाजिब कीमतों पर निर्यात करें एवं (ब) चूँकि भारत का एक बड़ा हिस्सा भीषण जल संकट से जूझ रहा है, तो हम वर्तमान जल की कीमतों पर ही टिके रहें? भारत में जल के उपयोग की क्षमताएँ काफी कम हैं और 2005 अमेरिकी डॉलर जीडीपी प्रति घर मीटर सकल जल निष्कासन के पैमाने पर सकल जल उत्पादकता विश्व औसत के मुकाबले काफी कम है। आँकड़ों में लैटिन अमेरिका, कैरिबियाई एवं सब सहारा अफ्रीकी देशों की तुलना में भी काफी कम है। जल के सकल मूल्य न होने (जैसे उत्पादन एवं वितरण की कीमत, संसाधन मूल्य, पर्यावरणी मूल्य एवं कमी की कीमत) से जल के उपयोग की क्षमताएँ बढ़ायी नहीं जा सकतीं और इस प्रकार भारत में जल उत्पादकता की कमी हमेशा ही रहेगी।

जल के अभाव की तरह बाढ़ भी पर्याप्त आर्थिक असर डालते हैं। बड़े पैमाने पर अनाज एवं सम्पत्ति के नुकसान, चारे एवं मानव जीवन नुकसान के साथ-साथ में जल जनित रोग भी पैदा करते हैं। भारत के नदी बेसिन में बाढ़ के पूर्वानुमान का शायद ही कोई प्रामाणिक अध्ययन हुआ है। बाढ़ के आर्थिक आधार पर प्रभावों का भी आकलन नहीं हुआ है। बाढ़ से होने वाले आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणी प्रभावों की कीमत इससे बचने हेतु बनाए जा रहे आधारभूत ढाँचे के निर्माण से भी कम नहीं होती। हमारे तालाबों एवं जलाशयों में सीमित जल ग्रहण क्षमता, जलवायु विविधता एवं मानसून के समय जल के उच्च प्रवाह से बहने की वजह से बाढ़ आती है। भारतीय शहरों में बाढ़ आना अब आम बात हो गई है। कई शहरों में घरेलू उत्सर्जित जल (सीवेज एवं बेकार) से अलग चक्रवाती जल के प्रबंधन की कोई प्रणाली नहीं है।

इसके अलावा हमारे शहरों के उत्सर्जित जल का ढाँचा भी भारी दबाव में है और यह जल संग्रहण, परिवहन, शोधन एवं निस्तारण करने में पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं है। प्राकृतिक बहाव प्रणाली के प्रबन्धन की उपेक्षा एवं पारम्परिक जल संग्रहण संरचनाओं जैसे वर्षाजल के टैंक, जल भराव की भूमि की उपेक्षा से यह समस्या और भी गहरी हो रही है। (शर्मा व अन्य 2015) चक्रवाती जल स्वच्छ जल का एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है और यदि इसका प्रबंधन ठीक तरीके से किया जाए, तो शहरों में सुदूर स्रोत से जल की निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है। (मुखर्जी व अन्य 2010) हरियाणा की मुनक नहर से हाल ही में पानी रोकने की घटना ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर जल संकट खड़ा कर दिया था और यह दिखाता है कि कैसे शहर दूर-दराज के स्रोतों पर अपनी दिनोंदिन जरूरतों के पानी के लिये निर्भर हैं।

.जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने और इसे सुरक्षित करने के सम्मिलित प्रयास न सिर्फ वर्तमान की चुनौती है, बल्कि यह एक उभरता हुआ मुद्दा भी है। कुछ चिन्ताएँ, जिनका आगामी दिनों में भारत को सामना करना पड़ेगा, उनमें अंतर-क्षेत्री जल बँटवारे की उभरती चुनौती, शहरों और उद्योगों के लिये दूरस्थ क्षेत्रों से जल के विस्तारित बहाव पर बढ़ता द्वन्द्व, नदियों के पारिस्थितिकी बहाव का संरक्षण एवं आधारभूत पारिस्थितिकी सेवाओं को पुनर्जीवित करना, जलस्रोतों की सुरक्षा एवं संरक्षण जैसे नदी घाटी प्रबंधन, जलापूर्ति सुनिश्चित करने हेतु शहरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जल के स्थानीय स्रोतों की सुरक्षा, बढ़ते शहरीकरण एवं जल प्रदूषण, विकास योजनाओं जैसे उद्योग, खनन, आधारभूत ढाँचा निर्माण एवं शहरी विकास आदि में पर्यावरणी नुकसान की कमी के लिये उठाए गये कदम, स्रोत बिंदु पर ही प्रदूषण का नियंत्रण एवं प्रदूषण के कारकों जैसे फार्मास्यूटिकल, पर्सनल केयर उत्पाद, परफ्लोरिनेटेड यौगिकों, एवं जलावयु परिवर्तन से प्राकृतिक संसाधनों एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव कुछ बड़ी चुनौतियाँ सामने होंगी।

संदर्भ- ब्रैंडन, कार्टर एवं होमैन, कसटेन (1995): द कॉस्ट ऑन इनैक्शनः वैल्यूईंग द इकोनॉमी-वाइड कॉस्ट ऑफ इनवायरन्मेंटल डीग्रेडेशन इन इंडिया, संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय, टोक्यो में अक्तूबर 1995 में मॉडलिंग ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी पर प्रस्तुत पेपर।

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लेखक परिचय


लेखक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी, नई दिल्ली प्राध्यापक में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। इससे पूर्व वह हैदराबाद स्थित अन्तरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के साथ कार्य कर चुके हैं। ईमेलः mailto:sachs.mse@gmail.com

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