आस्था और गंगा स्वच्छता के बीच नए रास्ते की खोज

Submitted by Hindi on Tue, 05/26/2015 - 12:36
Source
य़थावत, 16-31 मार्च 2015
.गंगा में प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा अन्तिम संस्कार भी है। उत्तर प्रदेश और बिहार के वे गाँव जो गंगा के किनारे या आस-पास बसे हैं उनके द्वारा किये जाने वाले प्रदूषण का बड़ा हिस्सा अन्तिम संस्कार से होता है। हिन्दू धर्म में अन्तिम संस्कार की अपनी रीति और नीति है। उसमें उन लोगों के साथ मिलजुल कर कुछ बदलाव ज़रूर किया जा सकता है। सिर्फ यह कह देने से कि गंगा में अन्तिम संस्कार नहीं होगा या गंगा में प्रदूषित करने वाली चीजें डालने पर जुर्माना लगेगा, इसका कभी निदान नहीं हो सकता और यह पूरी योजना हवा-हवाई बनकर रह जाएगी।

गंगा को सिर्फ एक नदी के रूप में नहीं देखा जा सकता। गंगा जिन क्षेत्रों से होकर गुजरी हैं वहाँ वह सिर्फ नदी नहीं हैं, बल्कि वहाँ के लोगों के संस्कार, सरोकार, आस्था और विश्वास की नदी हैं। गंगा से आम जनमानस के सद्भाव बहुत ही गहरे जुड़े हैं। ऐसे में गंगा को निर्मल करना उतना आसान नहीं है जितना राजनीतिक भाषणों में लगता है। गंगा के किनारे रहने वाले लोगों के जन्म से लेकर मरण तक अनेक ऐसे अवसर हैं जो गंगा के बिना पूरे नहीं हो सकते। इसलिए उन लोगों को जागरूक किए बिना शायद ही यह सम्भव हो।

गंगा प्रदूषण को रोकने के लिए सबसे जरूरी है प्रदूषण की बुनियाद पर विचार करना और उसके लिए वैकल्पिक उपाय खोजना और उसकी समुचित व्यवस्था करना। गंगा में प्रदूषण दो तरह से होता है। एक तो औद्योगिक इकाइयों के अपशिष्ट पदार्थों को बहाने से और दूसरा आम जनमानस के जीवन से जुड़ी हुई आवश्यकताओं की पूर्ति में। और इसी में आम लोगों की नदियों के प्रति असंवेदनशीलता भी है। जहाँ तक औद्योगिक प्रदूषण का सवाल है तो उसके लिए अनेक तरह के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए हैं। उसमें से कितने काम कर रहे हैं इसका पता नहीं है। उसमें सरकार नीतियों के स्तर पर सीधे-सीधे सुधार कर सकती है और जितनी जल्दी करेगी उतना ही अच्छा होगा।

आम लोगों के बीच से गंगा को प्रदूषण मुक्त करना थोड़ा कठिन है। जहाँ तक अन्तिम संस्कार की बात है उसके भी दो तरीके हैं। पहला जिसमें मनुष्य के शरीर को जलाकर उसकी राख को गंगा में प्रवाहित किया जाता है। दूसरा जिसमें अधजले या बिलकुल नहीं जले शरीर को ही प्रवाहित कर दिया जाता है। प्रदूषण दोनों से होता है लेकिन बिना जला हुआ शरीर न जाने कितने हजार लीटर पानी को प्रदूषित करता है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। पहले स्थिति ऐसी नहीं थी क्योंकि गंगा में अनेक तरह के जीव-जन्तु होते थे जिनका मृतक शरीर ही भोजन होता था और वह एक दिन में ही खत्म हो जाता था। पहले गंगा में पानी का बहाव अधिक होता था इसलिए खराब चीजों के किनारे लगाने की सम्भावना कम होती थी। अब स्थिति वैसी नहीं है जबसे गंगा में केमिकल युक्त पानी आने लगा है तबसे गंगा में जीने वाले जीवों में भारी कमी आई है। गंगा में प्रवाहित किया गया शरीर कुछ किलोमीटर तक तो बहता है फिर कहीं न कहीं किनारे लग जाता है और कई दिनों तक सड़ता रहता है। आस-पास रहने वाले लोगों का जीना हराम हो जाता है और पानी में जो प्रदूषण होता है वह अलग।

अब सवाल उठता है कि इसका उपाय क्या है? इसे कैसे रोका जाए? इसे रोकने के लिए दिल्ली में बैठकर नियम बना देने और कुछ किताबी विद्वानों की समिति बना देने से कतई नहीं होगा। इसके लिए व्यावहारिक और जनोन्मुख सुविधाओं की जरूरत है। पुराने समय में गाँवों के आस-पास जंगल होते थे, बाग-बगीचे होते थे जिससे जलाने की लकड़ी आसानी से मिल जाती थी तो कुछ लोग जलाते थे। अब लकड़ी का मिलना कठिन भी है और पेड़ों की कटाई से एक पर्यावरण से जुड़ी हुई दूसरी बड़ी परेशानी को निमन्त्रण भी है। इसका सीधा उपाय यह है कि गाँवों के करीब जो भी श्मशान हैं कुछ जगहों को चिन्हित करके वहाँ विद्युत शवदाह संयन्त्र लगाए जाए। फिर आम लोगों के बीच भी एक जागरूकता फैलाई जाए जिससे कम से कम प्रदूषण हो। दूसरा यह कि जली हुई राख या अस्थियों को गंगा के किनारे बने किसी जगह पर गड्ढे में डाल दिया जाए जो बाढ़ के दिनों में अपने-आप बह जाएगी। बाकी मोक्ष प्राप्ति के लिए उसका न्यूनतम अंश प्रवाहित कर दिया जाए।

अभी तक सरकार ने जिन क्षेत्रों से प्रदूषण को खत्म करने की योजना बनाई है उसमें ये नहीं हैं। प्रदूषण रोकने के लिए सभाएँ बहुत हुई हैं, योजनाएँ बहुत बनी है, पैसा भी ठीक-ठाक खर्च हुआ है, चाहे वह उनके खाने-पीने पर खर्च हुआ हो या विद्वानों की बेमतलब बहसों को आयोजित करके। पिछली सरकारों ने भी गंगा प्रदूषण को रोकने के लिए हजारों करोड़ रुपए खर्च किए हैं लेकिन यह समझ में नहीं आता कि वह पैसा प्रदूषण कम करने के लिए खर्च किया गया है या और अधिक बढ़ाने के लिए। इस सरकार की अभी तक की योजनाओं का कोई ऐसा व्यावहारिक पक्ष मुझे दिखाई नहीं देता जिससे बहुत संतोष मिले। आगे आने वाले समय में अगर ये योजनाएँ आम जनजीवन के अनुकूल बनती हैं तो अच्छा है, अन्यथा दिल्ली से ही गंगा-गंगा चिल्लाने से कुछ नहीं होगा।

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