बाढ़ के बाद रोज़गार की तलाश

Submitted by HindiWater on Tue, 11/11/2014 - 16:09
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चरखा फीचर्स, नवंबर 2014
बाढ़ के बाद पैदा हुए हालात से निपटने के लिए ज़रूरी है कि प्रभावित लोगों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए सरकार ज़रूरी कदम उठाए। टैंट बांटने और चंद माह के लिए राशन मुहैया कराने से काम नहीं चलेगा बल्कि सरकार को बाढ़ के बाद लोगों के लिए आजीविका के ऐसे साधन जुटाए जिससे बाढ़ प्रभावित लोगों को सतत् रोजगार मिल सके। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि बाढ़ प्रभावितों तक सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाई जाए जिससे वह आजीविका के साधन जुटा सकें और आने वाली जिंदगी को बेहतर बना सकें। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हमेशा से ही नुकसान का कारण बनी है। लेकिन विकास के नाम पर कुदरत के साथ छेड़छाड़ होती रही है और यह आज भी जारी है। जम्मू एवं कश्मीर में सितंबर माह में आई बाढ़ की वजह भी प्रकृति के साथ छेड़छाड़ ही है।

इस बारे में विषेशज्ञों ने कई साल पहले इसकी ओर इशारा किया था। लेकिन इसको संजीदगी से लेने के बजाय कुछ लोग ने चंद मुनाफे के लिए पेड़ों की कटाई को लगातार जारी रखा जिसकी वजह से न सिर्फ मौसम का मिजाज बदला बल्कि इन पेड़ों से मिलने वाली हवा की भरपाई आइंदा दस सालों में भी नहीं की जा सकती।

प्रकृति के साथ भविष्य में होने वाली छेड़छाड़ को रोकना होगा वरना इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं हमारे सामने किसी-न-किसी रूप में आती रहेंगी। इस सृष्टि का निर्माण करने वाला एक ही है, जिसने कुछ चीजों को अपने वश में रखा है, जो इंसान के काबू में नहीं हैं जैसे जन्म और मृत्यु, दिन और रात, गर्मी, सर्दी और बरसात आदि।

यह प्रकृति का ही कमाल है कि कहीं पर पानी की कमी से सूखे जैसे स्थिति पैदा हो जाती है तो कहीं पर इसकी ज्यादती बाढ़ के रूप में लोगों पर कहर बरपाती है। जब बाढ़ का पानी बस्तियों, शहरों, मैदानों, खेतों और वादियों में घुसता है तो सब चीजें खत्म होती चली जाती हैं।

इस बार मानसून ने जाते-जाते सितंबर माह के पहले सप्ताह में जम्मू-कश्मीर राज्य में ऐसी तबाही मचाई जिसकी दहशत कई दशकों तक लोगों के दिलो-दिमाग पर छाई रहेगी। बाढ़ के समय धरती के स्वर्ग पर कयामत का सा मंजर था। जो घर से निकला वह वापस न लौटा, जो घर में कैद हो गया वह घर ही न रहा, मां को बेटे की खबर नहीं, बेटे को मां की खबर नहीं। सैकड़ों लोग मौत का शिकार हुए और हजारों लोग बेघर।

कुछ बच्चों से उनके स्कूल छीन गए तो कुछ की किताबें और यूनिफार्म बाढ़ के पानी में बह गईं। ऐसे में कौन किसकी मदद कर सकता था। सरकार खुद बेबस और अपाहिज होकर रह गई थी। मगर यह आपदा कोई ऐसी चीज नहीं जो आई और चली गई, पानी के शुष्क होने से समस्या खत्म नहीं हुई बल्कि सबसे बड़ी चुनौती तो अब है कि बाढ़ प्रभावित लोगों की जिंदगी को दोबारा पटरी पर किस तरह लाया लाए और उनकी आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाएं?

बाढ़ में लोगों के घर-बार और आजीविका के सारे साधन यानी माल-मवेशी और खेती-बाड़ी पूरी तरह से बर्बाद हो गए। ऐसे में जिनके माल-मवेशियों को नुकसान हुआ और घर-बार बाढ़ में बर्बाद हो गए, वह कब तक सरकार की ओर से दिए गए टैंटों में रहते रहेंगे। जम्मू एवं कश्मीर के सीमावर्ती जिले पुंछ में सीजफायर उल्लंघन की वजह से लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना होता है ऐसे में बाढ़ ने लोगों की परेशानियों को और ज्यादा बढ़ा दिया है।

जिले की तहसील मंडी का गांव गली पिंडी जो पहाड़ी की ऊंचाई पर स्थित है और अंतरराष्ट्रीय सीमा के बिल्कुल करीब है। यहां बाढ़ प्रभावित लोग अभी टैंटों में जिंदगी गुज़ारने को मजबूर हैं।

इस इलाके में एक बहुत बड़ी पस्सी (पहाड़ी पत्थरों को रोकने वाली दीवार) गिरने की वजह से सात घर पूरी तरह बर्बाद हो गए और माल-मवेशियों को नुकसान होने के अलावा दो इंसानी जानें भी गईं। बाढ़ की वजह से अपना घर बर्बाद होने के बाद टैंट में रह रहीं ताजिम अख्तर से जब पूछा गया कि वह स्कूल जाती हैं तो उन्होंने मायूस होते हुए जबाब दिया कि मेरी किताबें और यूनिफार्म घर के साथ बह गईं। एक टैंट में खाना पक रहा था।

खाना पकाने वाले नूर हसन ने बताया कि इसका इंतजाम एक कल्याणकारी संगठन की ओर से सिर्फ पांच दिनों के लिए किया गया है। हनीफा बी जोजा मोहम्मद हफीज से जब पूछा गया कि बाढ़ के बाद वह अपनी जिंदगी को कैसे जिएंगी तो उन्होंने बताया कि मेरी चार बेटियां हैं और बेटा कोई नहीं हैं। पहले तो हम खेती-बाड़ी करके अपना जीवनयापन कर लेते थे मगर अब तो हमारा न घर रहा है न खेतीबाड़ी के लिए जगह।

इनसे जब पूछा गया कि अगर आपको सरकार की ओर से कुछ कल्याणकारी योजनाओं से कुछ काम दिला दिया जाए जैसे कि मुर्गीपालन, पशुपालन, मधुमक्खी-पालन आदि तो क्या आप यह सब कर सकते हैं, तो उनका जबाब था- ‘‘हम तो कुछ भी करने को तैयार हैं और मुर्गीपालन और पशुपालन तो हमारा खानदानी पेशा है।

इस गांव के साथ दूसरा गांव जो आधा तार के उस पार और आधा इस पार यानी शाहपुर है। यहां के सरपंच मोहम्मद अय्यूब के मुताबिक इस गांव में 12 घर पूरी तरह जबकि 15 घर आंशिक रूप से बर्बाद हुए हैं। पंचायत के चेयरमैन मीर अहमद अपने घर तबाह होने की कहानी सुनाते हुए कहते हैं कि हम सारे लोग घर के अंदर ही थे और जब हमारा मकान गिरने लगा तो बड़ी कठिनाई के साथ आर्मी ने हमें निकाला।

उन्होंने आगे बताया कि शाहपुर का मोहल्ला बरोड़ जिसमें 2 सौ घर थे, सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ हैै। इसी गांव के एक और स्थानीय निवासी मोहम्मद शब्बीर से आने वाली जिंदगी को गुज़ारने के लिए सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के बारे में बात की गई तो इस पर उनका कहना था कि उनके नौजवानों के बाद कौशल की कोई कमी नहीं है, वह सब पढ़े-लिखे हैं, इसलिए अगर उन्हें सरकार की ऐसी योजनाओं से जोड़ा जाए तो यह उनके लिए बहुत अच्छा होगा।

बाढ़ के बाद पैदा हुए हालात से निपटने के लिए ज़रूरी है कि प्रभावित लोगों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए सरकार ज़रूरी कदम उठाए। टैंट बांटने और चंद माह के लिए राशन मुहैया कराने से काम नहीं चलेगा बल्कि सरकार को बाढ़ के बाद लोगों के लिए आजीविका के ऐसे साधन जुटाए जिससे बाढ़ प्रभावित लोगों को सतत् रोजगार मिल सके। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि बाढ़ प्रभावितों तक सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाई जाए जिससे वह आजीविका के साधन जुटा सकें और आने वाली जिंदगी को बेहतर बना सकें।

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