बैगाओं को नहीं मालूम कैसे मिलेगी रोजगार गारंटी

Submitted by HindiWater on Mon, 08/11/2014 - 18:08

वनोपज एवं मजदूरी पर आश्रित इन बैगाओं को रोजगार के लिए आसपास के शहरों में पलायन भी करना पड़ता है। उमरिया जिले के विभिन्न गांवों में निवासरत बैगाओं को रोजगार गारंटी कानून के तहत काम तो मिल रहा है, पर वह कभी-कभार ही संभव होता है। पंचायत में काम की मांग नहीं होती, पर काम को दर्शाने के लिए रोजगार सहायक या सचिव के माध्यम से न्यूनतम काम कुछ मजदूरों को मिल पाता है।

मध्य प्रदेश में निवासरत विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समुदाय के लोगों में रोजगार गारंटी कानूने को लेकर जागरूकता का अभाव है। अधिकार आधारित इस कानून का लाभ उन दूर-दराज के इलाकों में सही तरीके से नहीं पहुंच रहा है, जहां बहिष्कृत समुदाय के लोग रहते हैं। वनोपज एवं मजदूरी पर आश्रित इन बैगाओं को रोजगार के लिए आसपास के शहरों में पलायन भी करना पड़ता है।

उमरिया जिले के विभिन्न गांवों में निवासरत बैगाओं को रोजगार गारंटी कानून के तहत काम तो मिल रहा है, पर वह कभी-कभार ही संभव होता है। पंचायत में काम की मांग नहीं होती, पर काम को दर्शाने के लिए रोजगार सहायक या सचिव के माध्यम से न्यूनतम काम कुछ मजदूरों को मिल पाता है।

योजना के तहत ग्रामीणों को रोजगार देने के साथ-साथ गांव में स्थाई परिसंपत्तियों का विकास भी किया जा सकता है, जो कि इन बैगाओं के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में कारगर हो सकता है, पर यह जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं देता। मानपुर जनपद पंचायत के चेचपुर गांव के पप्पू बैगा कहते हैं, ,‘‘गांव में रोजगार गारंटी के तहत कुछ काम हुआ है, पर हमें यह नहीं पता कि काम कैसे मांगते हैं? कोई काम आता है, तो सरपंच और सचिव कहते हैं कि काम आया है और हमें काम करना है।’’

गांव में अभी तक सिर्फ 6 कपिलधारा कुएं का निर्माण रोजगार गारंटी योजना के तहत हुआ है। ग्रामीणों को काम के अभाव में मानपुर या उमरिया में रोजगार के लिए जाना पड़ता है।

मानपुर के ही रायपुर ग्राम पंचायत के कुदरी टोला में बैगा समुदाय के लगभग सौ परिवार निवासरत हैं। इनमें से तीन परिवारों के पास-पास 2-2 एकड़ का पट्टा है और दो के पास 15-15 डिसमिल जमीन है। अन्य सभी बैगा भूमिहीन हैं एवं वन अधिकार कानून के तहत वन भूमि का अधिकार पाने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

इस गांव में भी रोजगार गारंटी कानून के तहत लोग काम मांगने के तरीके को नहीं जानते। गांव के ददन बैगा कहते हैं, ‘‘गांव में रोजगार गारंटी का काम बहुत ही कम हुआ है। सरपंच और सचिव से पूछने पर बोलते हैं कि काम आने पर काम मिलेगा। हम लोगों को नहीं पता कि काम कैसे मांगा जाता है?’’

इस गांव में भी कई काम हुए हैं, पर बैगाओं को रोजगार गारंटी के इन कामों में मजदूरी मांगने पर नहीं मिली है, बल्कि सचिव एवं रोजगार सहायक ने कुछ बैगाओं को कहा कि मजदूरी करने के लिए रोजगार गारंटी के काम में आ जाओ।

करकेली जनपद के पाली ग्राम पंचायत में 130 बैगा परिवार हैं। इनमें से किसी को नहीं मालूम कि रोजगार गारंटी के तहत काम मांगा जा सकता है। गांव की कुसुमी बाई कहती हैं, ‘‘मैं कई बार महिला सरपंच के पति के पास गई। पंचायत का काम वे ही देखते हैं। उनसे काम मांगती हूं, तो वे कहते हैं कि अभी काम नहीं है।’’

इस गांव में भी रोजगार गारंटी का काम होता है, पर बैगाओं को काम मांगने का तरीका नहीं मालूम और मजदूरों को जब काम की जरूरत होती है, तब उन्हें काम नहीं मिलता, जिससे वे इस योजना से दूर हो जाते हैं। वास्तविक मजदूरों के बजाय छद्म मजदूरों की संख्या भी बढ़ रही है और बिना मजदूरी के मेहनताना पा रहे हैं। काम की मांग मजदूरों द्वारा किए जाने के बजाय रोजगार सहायक एवं सरपंच द्वारा मजदूरों के नाम लिखकर ई-मस्टर रोल बनवाया जा रहा है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून से देश के करोड़ों ग्रामीणों ने रोजगार पाया है। कानून ग्रामीणों को अधिकार देता है कि वे रोजगार की मांग करें, जिसके बाद ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी होगी कि वे उन्हें रोजगार उपलब्ध कराएं। रोजगार को कानून के दायरे में लाने वाला यह एक महत्वपूर्ण कदम है।

यदि काम मांगे जाने के बाद रोजगार नहीं मिलता, तो ग्रामीणों को बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार है। रोजगार के अभाव एवं जीविकोपार्जन की समस्या से जूझ रहे बैगाओं के लिए रोजगार गारंटी का सही क्रियान्वयन लाभकारी हो सकता था। यहां तक कि काम नहीं मांगने पर बेरोजगारी भत्ता की पात्रता से उनकी आर्थिक तंगी दूर हो सकती थी, पर इसके उलट उन्हें काम की जरूरत होने के बावजूद काम नहीं मिल रहा है।

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