बच्चों का बड़ा काम : हर साल बचा रहे एक लाख लीटर पानी

Submitted by Hindi on Thu, 03/31/2016 - 10:10
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दोपहर का सामना, 31 मार्च, 2016

जल बचाने वाले मासूमों की यह कोशिश बहुत जल्द ही वैश्विक हो जायेगी। क्योंकि जल की समस्या से सिर्फ आप और हम परेशान नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया त्रस्त है। आज पुणे के स्कूलों में प्रतिवर्ष बच्चों के इस काम से एक लाख लीटर पानी जमा हो रहा है। कल वैश्विक स्तर पर यही कोशिश शुरू हो गई तो कितना लीटर पानी जमा होगा इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल हो जायेगा। जल यानी पानी जो एक आम रासायनिक पदार्थ है। जिसका अणु दो हाइड्रोजन परमाणु, एक ऑक्सीजन परमाणु और एक ऑक्सीजन परमाणु से बना है अर्थात H2O । यह सृष्टि के समस्त प्राणी के जीवन का आधार है। जीवन का आधार माने जानेवाले जल की कमी के चलते आज प्राणी जगत में न केवल तनाव व संघर्ष फैला हुआ है बल्कि जल विवाद राष्ट्रीय व विश्व राजनीति का प्रमुख मुद्दा बन गया है। किसी भी जल तंत्र में पानी का प्राकृतिक स्रोत सिर्फ व सिर्फ वर्षा ही है। वर्षा की मात्रा उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति तथा आकार पर निर्भर है। जीवनदायी जल सिर्फ हमारी प्यास ही नहीं बुझाता है बल्कि किसी भी फसल के लिये यह अत्यावश्यक है। पृथ्वी पर कुल जल का करीब 68 प्रतिशत जल सिंचाई के लिये उपयोग होता है। विश्व भर में 29 प्रतिशत जल का उपयोग औद्योगिक है।

वैश्विक स्तर पर कुल जल का 25 प्रतिशत जल घरेलू उद्देश्य के लिये होता है। हर घर की बुनियादी जरूरत के लिये प्रतिदिन प्रति व्यक्ति करीब 50 लीटर जल की खपत होती है। इसमें बाग-बगीचे में डाला जानेवाला जल शामिल नहीं है। समृद्धि का मतलब ही है अधिक पानी की खपत। हर कोई विकास की ओर बढ़ना जानता है लेकिन जल संरक्षण या जल बचाने के प्रति वह उदासीन होता है। सिर्फ वर्षा के जरिये मिलनेवाले पानी की जरूरत हर किसी को है लेकिन वर्षा से प्राप्त होनेवाले पानी को सहेजकर, सम्भालकर रखने के प्रति वैश्विक स्तर निष्क्रियता ही अधिक नजर आती है। यही वजह है कि आज जल बचाने की जद्दोजहद करनी पड़ रही है। पिछले तीन साल में महाराष्ट्र में पड़े सूखे के बाद आज जल को सहेजने के प्रति सतर्कता का अभियान चलाया जा रहा है।

हर कोई अपने-अपने तरीके से अपने स्तर पर पानी की बूँद को सम्भालने में जुट गया है। सिर्फ समझदार बड़े बुजुर्ग लोग ही पानी का जतन नहीं कर रहे हैं, बल्कि बच्चे भी पानी को भविष्य के लिये बचाने में जुट गये हैं। पुणे के एक स्कूल में बच्चे पानी को बचाने के लिये बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। यह बच्चे कहीं दूर से एक घड़ा पानी भरकर नहीं ला रहे हैं बल्कि अपने घर से दिये जानेवाले पानी का जिस तरह जतन कर रहे हैं उससे पेड़-पौधों को संजीवनी मिल रही है। पुणे पिंपरी-चिंचवड में प्राधिकरण निगडी के पास संत तुकाराम गार्डेन करीब ‘सिटी प्राइड स्कूल’ है।

इस स्कूल में जल बचाने के लिये स्कूली छात्रों का जिस तरह उपयोग किया जा रहा है, उस तरह की कोशिश वैश्विक स्तर पा यदि सभी स्कूलों में शुरू हो जाय तो बढ़ती जल समस्या से बहुत बड़ी राहत हमें मिल सकती है। जल जमा करने की दिशा में जुटे मासूम स्कूली छात्र जब घर से स्कूल के लिये निकलते हैं तब वह अपने साथ पानी की बोतल भी रखते हैं। आमतौर पर घर से लिया गया बोतल का पानी बच्चे पूरा कभी पीते नहीं हैं। थोड़ा पीते हैं और ढेर सारा पानी घर जाने से पहले सड़क पर बहा देते हैं। पुणे के इस स्कूल ने बहुत ही अनोखी संकल्पना का आविष्कार किया है। स्कूल परिसर में पानी जमा करने के लिये एक बाल्टी या पीपा रखा गया है। स्कूल से घर लौटते समय बच्चे अपनी बोतल का बचा पानी अब कहीं सड़क पर व्यर्थ फेंकने की बजाय स्कूल परिसर में रखे गये बर्तन में डाल देते हैं।

कल तक बच्चों का जूठा पानी जो व्यर्थ जा रहा था, आज वही पानी स्कूल परिसर में लगाये गये पेड़-पौधों को संजीवनी दे रहा है। बच्चों का जूठा पानी जो व्यर्थ जा रहा था, आज वही पानी स्कूल परिसर में लगाये गये पेड़-पौधों को संजीवनी दे रहा है। बच्चों की बोतल के बचे हुये पानी को जमा कर स्कूल प्रबंधन उसका इस्तेमाल स्कूल के बगीचे के लिये कर रहा है, जिसके कारण स्कूल परिसर की हरियाली बनी हुई है। इस स्कूल में मासूम बच्चों के इस जल योगदान को देखकर आस-पास के स्कूलों ने भी अपने यहाँ इसी तरह का अनोखा जल संग्रह शुरू किया है। पुणे के स्कूलों की अनोखी जल जमा करने की इस योजना को अब नई मुंबई में स्थित एक स्कूल भी शुरू करने जा रहा है। खारघर स्थित शेवंताबाई एंड शंकरराव फाउंडेशन के विश्वज्योत हाईस्कूल में पानी जमा करने की यह अनोखी योजना शुरू होने जा रही है।

स्कूल के प्राचार्य दीपक पाटणकर बताते हैं कि हमारे स्कूल के पास करीब दो एकड़ के क्षेत्र में गार्डेन है। फिलहाल आईसीएसईवाले इस स्कूल में अवकाश है। अप्रैल की चार तारीख से स्कूल शुरू होनेवाले हैं। स्कूल में करीब 1100 बच्चे हैं। अप्रैल के दूसरे सप्ताह से पानी बचाने की यह अनोखी योजना शुरू हो जायेगी ऐसा पाटणकर ने स्पष्ट किया। कक्षा में स्थित श्यामपट पर ‘जल ही जीवन है’ यह सुविचार लिखने वाले मासूम हाथ अब सचमुच इस बात को भी समझने लगे हैं कि जल ही जीवन है। पुणे से शुरू हुई जल संरक्षण की अनोखी संकल्पना नई मुंबई तक आ पहुँची है।

कल यह मुंबई के स्कूलों में दिखाई देने लगे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये। जल बचाने वाले मासूमों की यह कोशिश बहुत जल्द ही वैश्विक हो जायेगी। क्योंकि जल की समस्या से सिर्फ आप और हम परेशान नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया त्रस्त है। आज पुणे के स्कूलों में प्रतिवर्ष बच्चों के इस काम से एक लाख लीटर पानी जमा हो रहा है। कल वैश्विक स्तर पर यही कोशिश शुरू हो गई तो कितना लीटर पानी जमा होगा इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल हो जायेगा।

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