ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव से असम में जबरदस्त भूक्षरण

Submitted by bipincc on Fri, 02/05/2010 - 16:07
Source
ptinews.com, deccanherald.com, hinduonnet.com

ब्रह्मपुत्र नदी में भूक्षरण ब्रह्मपुत्र नदी में भूक्षरण
असम में ब्रह्मपुत्र नदी के तट के इलाके जबरदस्त कटाव से प्रभावित हो रहे हैं। लगातार हो रहे कटाव से राज्य की करीब चार हजार वर्ग किलो मीटर भूमि का क्षरण हो चुका है और इससे करीब 2,500 गांवो में बसे 50 लाख से ज्यादा लोग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं। एक अनुमान के मुताबिक राज्य में होने वाला यह भूक्षरण करीब 80 वर्ग किलो मीटर प्रतिवर्ष के हिसाब से बढ़ रहा है। इस मामले में राज्य के जल संसाधन विभाग ने 25 संवेदनशील और अति क्षरणीय स्थलों की पहचान की है। विभाग ने अनुमान लगाया है कि असम से लगने वाली ब्रह्मपुत्र नदी पर जारी कटाव से अभी तक लगभग 7.4 फीसद भूमि का नुकसान हो चुका है। उपरी असम एवं डिब्रूगढ़ जिले के चाय बागान वाले क्षेत्र इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। नदी के तट से लगा हुआ डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान का भी काफी क्षेत्र इससे प्रभावित है।

ब्रह्मपुत्र नदी का उदगम तिब्बत मे मानसरोवर के पास कोंग्यू-शू नामक झील में 5150 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह नदी तिब्बत में त्सांग्पो कहलाती है, जबकि चीनी मानचित्र में इसे यारलुंग नदी कहा गया है। उद्गम स्थल से यह नदी पूर्व की ओर 1,700 किमी तक हिमालयी श्रृंखला के समानांतर बहती है। इसके बाद यह पे नामक स्थान से उत्तर की ओर मुड़कर गयाला पारो तथा नामचा बरूआ के पर्वतों को घेर एकदम दक्षिण पश्चिम की ओर मुड़ती हुई भारत की सीमा में अरूणाचल के फुटहिल्स में प्रकट होती है। इस क्षेत्र में पहले यह सियांग तथा बाद में दिहांग कहलाती है। इसके बाद दक्षिण पश्चिम की ओर बहती हुई सदिया नगर से असम में प्रवेश करती है। यहां पर दो सहायिकाएं दिबांग और लोहित मिलती हैं। यहां से इसका नाम ब्रह्मपुत्र हो जाता है। प्रचीन मान्यता के अनुसार भारत में ब्रह्मपुत्र को नद कहा जाता है। यह विशाल नद करीब 720 किमी पूरब से पश्चिम की ओर बहता हुआ असम घाटी का निर्माण करता है। इस दौरान कई प्रमुख सहायिकाओं को खुद में समेटते हुए गारो पहाड़ियों से मुड़कर गोलपाड़ा के पास बांग्लादेश में प्रवेश करता है। यहां से उत्तर बंगाल से आने वाली कई सहायिकाओं को अपने साथ मिलाते हुए दक्षिण की ओर बहते हुए 250 किमी आगे जाकर गोलांदो के पास गंगा के साथ मिलता है। ब्रह्मपुत्र और गंगा की जलधाराओं का सम्मिलित नाम पदमा है। करीब 105 किमी प्रवाहित होने के बाद इसकी एक महत्वपूर्ण सहायिका मेघना बांयी ओर से आकर मिलती है, जिसका उदगम हिमालय में है। इस संगम से आगे मेघना-ब्रह्मपुत्र कई धाराओं में बंटकर विशाल मुहाना बनाती हुई बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

कुल 2,850 किमी लम्बी इस नदी का करीब 950 किमी लम्बे तट जबरदस्त भूक्षरण से प्रभावित हैं। ये इलाके मुख्य रूप से भारत के असम राज्य एवं बांग्लादेश में स्थित हैं। भारत और बांग्लादेश के अंतर्गत अपने प्रवाह पथ में ब्रह्मपुत्र कई धाराओं में विभक्त होकर बहता है और इस दौरान बीच में कई द्वीपों का निर्माण करता है। नदी के असम में प्रवेश के बाद केवल ऊंची पहाड़ी कंदरा के पास इसकी घाटी गहरी है, शेष इलाके काफी छिछले हैं। इसी वजह से यह क्षेत्र हर साल मानसून में बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित होता है और लगातार भूक्षरण का शिकार होता रहा है। हर साल आने वाले बाढ़ से होने वाले नुकसान से निपटने के लिए गत वर्ष एक उच्च स्तरीय संयुक्त समिति का गठन भी किया गया था। असम और अमेरिका के विशेषज्ञों की ‘दि कमेटी फॉर डेवलपिंग मिटीगेशन स्ट्रेटजीज फॉर ब्रह्मपुत्र रीवर बेशिन फ्लड एंड इरोजन प्रॉब्लम’ नामक एक संयुक्त समिति ने इस समस्या से निपटने के लिए कुछ उपाय सुझाए हैं। विशेषज्ञों ने उन सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला है, जिनकी वजह से ब्रह्मपुत्र नदी यह कहर ढा रही है। उन्होंने कहा कि जितने भी उपाय इस समस्या से निपटने के लिए हैं, उन सभी को आपात स्थिति में मुहैया कराई गई धनराशि के हिसाब से अलग अलग करके इस्तेमाल किया जा सकता है। इस समिति में अलास्का के सिविल इंजिनियरिंग के पूर्व प्रोफेसर डा. अरविंद फूकन, अमेरिकन सोसाइटी ऑफ सिविल इंजिनियर्स के सरफेस वाटर हाइड्रोलॉजी समिति के अध्यक्ष अनंत नाथ, असम जल संसाधन विभाग के अभियंता राजीव गोस्वामी और आईआईटी, गुवाहाटी के सिविल इंजिनियरिंग विभाग के प्रोफेसर चंदन मेहता शामिल हैं।

विशेषज्ञों के इस दल ने कटाव रोकने संबंधी इन सुझावों को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का सुझाव दिया है। इन सुझावों में नदी का सुनियोजित तलमार्जन, क्षरण योग्य नदी तटों का संरक्षण, टाई बैक शीट लगाना, नदी तट पर पुश्ता बनाना प्रमुख है। विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया है कि इस क्षेत्र में वर्षा, पानी का प्रवाह एवं तलछट की निगरानी करते हुए आंकड़ों की गुणवत्ता व मात्रा में सुधार किया जाए और इसके आधार पर अध्ययन हेतु वाह्य मॉडलिंग तैयार किया जाए। इसके अलावा अत्याधुनिक उपकरणों के द्वारा किनारों की सफाई और व्यावहारिक अध्ययन पर नियंत्रण रखने का प्रयास किया जाना चाहिए। विशेषज्ञों ने इस पूरे अभियान में उपग्रह इमेज आधारित अध्ययन सहित आधुनिक उपकरणों के प्रयोग का भी सुझाव दिया है। दल का कहना है कि इसके आधार पर स्थानीय पेड़ पौधों का अध्ययन, दुनिया भर के नदियों में भूक्षरण रोकने के सफल उपायों का अध्ययन किया जाए और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों से सलाह ली जाए और नदी का क्षरण रोकने के जल्द से जल्द उपाय किए जाएं। दल ने यह भी सुझाव दिया है कि मजुली द्वीप में भूक्षरण रोकने के जो उपाय जारी हैं उनकी निगरानी की जाए व उन्हें सशक्त बनाया जाए।

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