बुन्देलखण्ड का विकट संकट

Submitted by RuralWater on Mon, 05/04/2015 - 10:18
Source
सर्वोदय प्रेम सर्विस, अप्रैल 2015

हाल के वर्षों में बुन्देलखण्ड क्षेत्र बार-बार सूखे की विकट स्थिति, प्रतिकूल मौसम, भूख व गरीबी की भीषण मार के कारण चर्चित हुआ है। कभी भूख से होने वाली मौतों के समाचार सुर्खियों में रहे तो कभी किसानों की आत्महत्याओं के। पलायन के साथ ही कर्ज का दबाव इतना है कि भविष्य अन्धकारमय नजर आता है। हाल के वर्षों में यहाँ के लगभग 70 गाँवों में जाकर वहाँ के लोगों की दर्द-भरी कहानी सुनने से यह सब समझ में आता है। स्थानीय स्तर पर वन विनाश, अन्धाधुन्ध खनन व कृषि क्षेत्र की प्रतिकूल नीतियों ने भी इस क्षति को बढ़ाया है।

बुन्देलखण्ड में विद्यमान कृषि व पर्यावरण का संकट इस वर्ष की बेमौसमी भारी वर्षा व ओलावृष्टि से और विकट हो गया है। अनेक गाँवों में फसल (गेहूँ, दलहन, तिलहन) की 50 से 100 प्रतिशत की क्षति हुई है। भूख एवं भीषण अभाव के चलते बड़ी संख्या में लोग गाँवों से पलायन करने को मजबूर हैं। आत्महत्या या फसलों की क्षति के सदमे से किसानों की मौत के समाचार निरन्तर मिल रहे हैं। बाँदा जिले में ही लगभग डेढ़ महीने के दौरान ऐसी लगभग 42 त्रासद वारदातें हुई हैं।

झाँसी की रानी, खजुराहो व जैवविविधता के लिये पहचाने जाने वाले बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आज की कड़वी सच्चाई है तरह-तरह के पर्यावरणीय विनाश, किसानों के बढ़ते कर्ज, अपराधीकरण व भ्रष्टाचार। लगभग डेढ़ करोड़ की आबादी वाले बुन्देलखण्ड क्षेत्र का विस्तार उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के 13 जिलों के लगभग 69000 वर्ग किमी. के विशाल क्षेत्र में है।

हाल के वर्षों में बुन्देलखण्ड क्षेत्र बार-बार सूखे की विकट स्थिति, प्रतिकूल मौसम, भूख व गरीबी की भीषण मार के कारण चर्चित हुआ है। कभी भूख से होने वाली मौतों के समाचार सुर्खियों में रहे तो कभी किसानों की आत्महत्याओं के। पलायन के साथ ही कर्ज का दबाव इतना है कि भविष्य अन्धकारमय नजर आता है।

हाल के वर्षों में यहाँ के लगभग 70 गाँवों में जाकर वहाँ के लोगों की दर्द-भरी कहानी सुनने से यह सब समझ में आता है। स्थानीय स्तर पर वन विनाश, अन्धाधुन्ध खनन व कृषि क्षेत्र की प्रतिकूल नीतियों ने भी इस क्षति को बढ़ाया है।

इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए हाल के ओलावृष्टि व अतिवृष्टि के असर को समझा जा सकता है। कर्जग्रस्त किसान की थोड़ी बहुत उम्मीद के भी डूब जाने से किसान के सामने घोर निराशा छा गई है। अभी तो उसे अस्थाई राहत का सहारा भी नहीं है।

विद्याधाम समिति के संस्थापक राजा भैया ने नरैनी प्रखण्ड (जिला बाँदा) के गाँवों के बारे में बताया, “इस वर्ष फरवरी मध्य से अप्रैल के प्रथम सप्ताह के बीच हमारे क्षेत्र में तीन बार भारी ओलावृष्टि हुई। ओलों का साइज भी प्रायः सामान्य से कुछ अधिक ही था। इस दौरान लगभग 20 दिन बेमौसमी वर्षा भी हुई। यह भारी वर्षा फसल व कर्जग्रस्त किसान दोनों के लिये बहुत हानिकारक थी।”

गहबरा जैसे गाँवों में जब हमने पूछा कि गाँव में कितने परिवार कर्जग्रस्त हैं तो लोगों ने कहा कि अधिकतर लोग कर्ज से त्रस्त हैं व बैंकों व साहूकारों को मिलाकर देखा जाए तो कर्ज की राशि भी 1 लाख रुपए से अधिक है। इस गाँव के पूर्व प्रधान राम बहादुर सिंह पर 14 लाख रुपए का कर्ज है। मूलधन काफी कम है पर चक्रवृद्धि दर से लगाया गया ब्याज अधिक है।

राम बहादुर ने एक बार फाँसी लगाने का प्रयास किया था, पर गाँववासियों ने बचा लिया। कर्जग्रस्त हो चुके मानपुर गाँव के पूर्व प्रधान राजाराम यादव ने कुछ दिन पहले फसल नष्ट होने पर अपने खेत में ही फन्दा डालकर आत्महत्या कर ली।

जब पूर्व प्रधानों की यह स्थिति है तो अधिकांश किसानों की स्थिति कितनी चिन्ताजनक होगी? ग्रामीण ऋण व्यवस्था में बैंक भी निजी साहूकारों की तरह शोषक की भूमिका में अधिक नजर आ रहे हैं। सामान्य प्रक्रिया में सीधे किसान को कर्ज नहीं दिया जाता है। चक्रवृद्धि ब्याज लगाया जाता है।

असामाजिक तत्त्वों से वसूली करवाकर किसानों को अपमानित किया जाता है। साहूकारों और बैंकों ने मिलकर किसानों को कर्ज के जाल में फँसा दिया है। सरकार व प्रशासन का मुख्य प्रयास किसानों को मुआवजा देने का है। तीन गाँवों में पूछने पर पता चला कि खरीफ व उससे पहले की रबी में जो क्षति हुई उसका मुआवजा भी अभी नहीं मिला है।

इस बार मुआवजा मिल तो जाएगा पर किसानों ने शंका जताई कि कहीं लेखापाल मुआवजे की राशि तय करने में हेरफेर न कर दें। वैसे भी घोषित मुआवजे की राशि किसान की लागत से भी कम होगी।

बटाईदारों को व एकमुश्त राशि देकर दूसरे से ज़मीन लेकर खेती करने वालों को यह मिलने की भी अभी कोई सम्भावना नहीं है, जबकि उन्होंने खर्च किया है, कर्ज लिया है, और मेहनत की है। उधर किसानों को बीमा कम्पनियों से भी न के बराबर राहत मिली है। अतः मुआवजे भर से किसानों को कोई बड़ी राहत नहीं मिलने वाली है।

जरूरत इस बात की है कि गाँववासियों को राहत देने वाली महत्त्वपूर्ण योजनाओं को बढ़ाया जाए व बेहतर ढंग से कार्यान्वित किया जाए। मनरेगा भी इस समय ठप्प है। यह अधिक लोगों तक विधिसम्मत ढंग से पहुँचे तो बड़ी राहत मिलेगी तथा प्रवास की मजबूरी भी कम होगी। साथ में जल-संरक्षण, मेंढ़बन्दी आदि के जरूरी कार्य हो सकेंगे।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली व आँगनबाड़ी को बेहतर करना चाहिए। मिड डे मील में सुधार होना चाहिए व यह गर्मी की छुट्टियों में भी मिलना चाहिए। इसके साथ असहाय वृद्धों को भी एक समय का मुफ्त भोजन मिलना चाहिए। बैंकिंग व्यवस्था व ऋण व्यवस्था में जरूरी सुधार कर किसानों को तुरन्त राहत देनी चाहिए। बीजों व खाद की गुणवत्ता व उपलब्धता भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

सरकारी प्रयासों के साथ स्वैच्छिक संस्थाओं, नागरिक संगठनों, व्यापारी संघों, अध्यापक संघों आदि द्वारा भी राहत प्रयास तेज करने चाहिए। एक व्यावहारिक उपाय यह है कि सभी जरूरतमन्द गाँवों में अनाज बैंक स्थापित किए जाएँ। इसके लिये स्थानीय समिति का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें महिलाओं की उपस्थिति जरूरी है।

सरकार ने आत्महत्या व सदमे की मौत से प्रभावित किसान या मज़दूर परिवार के लिये जो सहायता की घोषणा की है, वह शीघ्र गरिमापूर्ण स्थितियों में दी जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त इन परिवारों में विधवाओं व उनके बच्चों को सम्भावित कठिनाइयों से बचाने के लिये प्रशासन को सचेत रहना चाहिए।

कबरई प्रखण्ड (जिला महोबा) के बिल्खी गाँव में फसल क्षति के सदमे से किसान राजबहादुर की मृत्यु हुई। कुछ समय बाद उसकी पत्नी उमा देवी को उसके जेठ ने दो बच्चों सहित घर से मार पीटकर निकाल दिया। अब विकलांग उमा अपने पिता के साथ रह रही है और अपनी भूमि व आवास की रक्षा का प्रयास कर रही है।

पिरपा गाँव (जिला छतरपुर म.प्र.) के चंचल रैगवाड़ की मृत्यु फसल की क्षति सहन न कर सकने के कारण हुई। अतिवृष्टि से घर भी ढह गया। ज़मीन का बड़ा हिस्सा कर्जदाताओं ने ले लिया। उनकी पत्नी सुमन अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिये संघर्षरत है। सुमन व उमा दोनों को अभी कोई सहायता नहीं मिली है। अन्य अनेक विधवाओं व एकल महिलाओं को भी तात्कालिक राहत की बहुत जरूरत है।

दीर्घकालीन स्तर पर जैविक खेती व मिश्रित खेतों को बढ़ाने, खेती के खर्च कम करने, स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करने की जरूरत है। जल व नमी संरक्षण, हरियाली बढ़ाने के प्रयास, खेती व पशुधन का आधार मजबूत करने के लिये महत्त्वपूर्ण प्रयास चाहिए। विभिन्न परम्परागत व आधुनिक कुटीर व लघु उद्योग से ग्रामीण अर्थव्यवस्था विविधतापूर्ण व मजबूत होगी।

कुछ सामाजिक संस्थाओं ने इस तरह की टिकाऊ कृषि के अच्छे उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं जैसे विद्याधाम समिति ने बाँदा जिले में, अरुणोदय ने महोबा जिले में व समाज सेवा संस्थान ने चित्रकूट व टीकमगढ़ जिले में। वैज्ञानिक भारतेन्दु प्रकाश ने भी जैविक खेती के अनेक प्रयोग आगे बढ़ाए हैं। अपनी समस्याओं को हल करने में गाँववासियों के अपने उद्यम को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

गरबहा गाँव के देवी सिंह ने जब अपने उद्यम से ऐसी लिफ्ट सिंचाई आरम्भ की जिससे गाँव के अनेक जरूरतमन्द किसानों के खेत लहलहाने लगे, लेकिन सरकार ने कुछ समय बाद न केवल इस लिफ्ट सिंचाई को रोक दिया अपितु जुर्माना भी ठोक दिया। बुन्देलखण्ड एवं देश के अन्य हिस्सो में कृषि और कृषक को बचाने के लिये विकास की सही प्राथमिकताएँ व सही नीतियाँ तय करना जरूरी है।

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