बुंदेलखंड: कछु नई बचो राम रे...!

Submitted by Hindi on Thu, 04/11/2013 - 10:26
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सर्वोदय प्रेस सर्विस, अप्रैल 2013
बुंदेलखंड आने वाले कल की भयावह तस्वीर आज हमारे सामने लाकर हमें चेताने का प्रयास कर रहा है, लेकिन हम यक्ष द्वारा युधिष्ठिर से पूछे गए प्रश्न कि दुनिया का सबसे बढ़ा आश्चर्य क्या है कि उत्तर को ही यथार्थ मान बैठे हैं कि सब कुछ नष्ट हो जाएगा तब भी हम बचे रहेंगे। इस दिवास्वप्न को झकझोरने की कोशिश लगातार जारी है, लेकिन शुतुरमुर्ग की मानसिकता हम सब में समा गई है।एक बड़ा सवाल है कि बुंदेलखंड में क्या वास्तव में जलवायु परिवर्तन ने दस्तक दे दी है? कुछ शोध और अध्ययन सामने आए हैं जो कहते हैं कि कहीं कुछ गर्म हो रहा है और जिसके चलते ज़मीन पर भी कुछ असर दिखने लगा है। युनाइटेड नेशंस इंस्टीट्यूट फॉर ट्रेनिंग एंड रिसर्च (संयुक्त राष्ट्र प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान) के अनुसार इस सदी के अंत तक बुंदेलखंड का तापमान 2 से 3.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। डेवलपमेंट आल्टरनेटिव की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2030 तक ही बुंदेलखंड में तापमान बढ़कर 1.5 डिग्री तक बढ़ जाएगा। वहीं पुणे स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मिटियॉरलजी (भारतीय उष्ण देशीय मौसम विज्ञान संस्थान) के मुताबिक बुंदेलखंड अंचल में शीतकालीन वाष्पीकरण घटकर 50 फीसदी से भी कम रह जाएगा। ऐसी स्थिति में खरीफ की फसल को नुकसान होगा और ज़मीन पैदावार भी कम देगी। शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसा ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से हो रहा है। इसके चलते अरब सागर के ऊपर का तापमान बढ़ रहा है। तापमान में इस बढ़ोतरी के चलते ज़मीन और समुद्र के बीच तापमान का अंतर कम हो रहा है। इससे वर्षा भी अनियंत्रित होती है और प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है।

बुंदेलखंड के सूखे की स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2008 में नेशनल रेनफेड एरियाज अथॉरिटी के जेएस सामरा के नेतृत्व में एक केंद्रीय टीम गठित की थी। इस दल की अंतरमंत्रालयीन रिपोर्ट (अप्रकाशित) में यह साफ कहा गया है कि इन चार सालों में बुंदेलखंड में औसत बारिश 60 फीसदी कम हुई है। वहीं इसी अंचल के पन्ना और दमोह जिलों में बारिश ज्यादा कम नहीं हुई है इसका कारण यहाँ पर वनों की सघनता का बरकरार रहना है। वैसे तो सूखा यहां की नियति है। रिपोर्ट के अनुसार 19वीं और 20वीं शताब्दी के 200 वर्षों में इस इलाके में केवल 12 बार सूखा पड़ा था। यानी इस अवधि में सूखा पड़ने का औसत हर 16 वर्ष में एक बार का था। लेकिन 1968 से लेकर पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में औसतन पांच साल में एक बार सूखा पड़ने लगा। वहीं पिछले सात सालों में पांच बार सूखा पड़ा है। इससे खरीफ की फसल में 25 से 50 फीसदी की गिरावट देखी गई है। वर्ष 2003-04 में जहां बुंदेलखंड 2.45 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ जो घटकर 1.13 मिलियन टन रह गया है। रबी में भी उत्पादन घटा है।

बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी में पर्यावरण विज्ञान विभाग के सह प्राध्यापक डॉक्टर अमित पाल जलवायु परिवर्तन की एक दूसरी त्रासदी की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि जब गर्मी से वाष्पीकरण की दर बढ़ेगी तो मिट्टी में जो नमी होगी, वह खत्म हो जाएगी। मिट्टी में अभी भी डीडीटी के छिड़काव होने और जलवायु बदलने से यह तो होगा ही। सन् 1965 में ही डब्ल्यू. एच. ओ. ने डीडीटी प्रतिबंधित कर दिया था, तो अभी तक भारत में यह कैसे चल रहा है। इससे फसल की पैदावार भी घट गई है और खतरनाक कीट बढ़ रहे हैं। वे आगे कहते हैं कि ‘‘बेतहाशा खनन से वनों का क्षेत्र धीरे-धीरे कम हो रहा है और जिससे वातावरण बदल रहा है। इससे बीहड़ भी बढ़ रहे हैं। अपनी तेज गति के चलते इससे सन् 2050 तक बहुत बड़ा क्षेत्र तबाह हो जाएगा। वर्ष 1979 में आई मध्य प्रदेश के मुख्य वन संरक्षक जे.डी.शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 6.83 लाख हेक्टेयर भूमि बीहड़ बन चुकी थी जिसका 21 फीसदी बुन्देलखंड में ही था। नए अनुमानों के अनुसार अब सिर्फ बुंदेलखंड में बीहड़ों का क्षेत्रफल 1.43 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है और इसका क्षेत्र बढ़कर 35 फीसदी हो गया है। कृषि वैज्ञानिक देविंदर शर्मा कहते हैं कि बढ़ते रेगिस्तान पर अंकुश लगाने के बजाय वन विभाग ने कुछ वर्ष पूर्व विलायती बबूल के बीजों का हवाई छिड़काव किया था। बुंदेलखंड की भौगोलिक परिस्थितियों के लिए प्रतिकूल यह विदेशी प्रजाति अब इस क्षेत्र के लिए खतरा बन चुकी है। पर्यावरण पर छाए इस संकट से कोई सबक सीखने के बजाय इस क्षेत्र में मेंथा (पीपरमेंट) की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। एक किलोग्राम मेंथा तेल के उत्पादन में सवा लाख लीटर पानी का इस्तेमाल होता है। इसकी खेती को बढ़ावा देना आत्मघाती साबित हो रहा है।

अब जरा एक किसान के नजरिए से भी देखें । टीकमगढ़ जिले के पृथ्वीपुर ब्लाक के राजावर गाँव के काशीराम कुशवाहा कहते हैं सन् 1980 में जब सूखा पड़ा था तो हमारे खेत का कुआं भी सूख गया था, तब यह इक्कीस हाथ खुदा था, इसे छह-सात हाथ और खोदा। फिर 8-10 साल पहले छह-सात हाथ खोदना पड़ा। पांच साल पहले फिर छह-सात हाथ खोदा यानी जो पानी उन्हें 1980 में इक्कीस हाथ पर मिल रहा था वह आज बयालिस हाथ पर यानी दुगुने पर मिल रहा है। वे कहते हैं कि इसके लिए मौसम और हम दोनों जिम्मेदार हैं। जंगल हमने काटे, पहाड़ हमने खत्म कर दिए। जंगल ही तो मानसूनी हवाएँ पकड़ते थे, लेकिन अब तो वे हैं नहीं, तो अब बरसात कहां से होगी। और जब बरसात नहीं होगी तो क्या खाएंगे और क्या कमाएंगे? बरसात में अभी ज्यादा कमी नहीं हुई है बस बिगड़ गई है। पहले पानी जेठ में गिर जाता था अब यह पानी आषाढ़ के अंत तक नहीं आता है। ऐसे में क्या बोएं और किसके भरोसे बोएं। पैदावार भी आधी हो गई है।

सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहते हैं कि जैविक कृषि की तुलना में हरित क्रांति वाली रासायनिक खेती में दस गुना ज्यादा पानी का इस्तेमाल होता है। रासायनिक उर्वरक नाइट्रस ऑक्साइड नामक ग्रीनहाउस गैस का उत्पादन करते हैं, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में तीन सौ गुना खतरनाक है। लेकिन बुन्देलखंड में धड़ल्ले से ऐसी खेती जारी है। यह जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को दुगुना कर देती है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर ने एक बार कहा था कि यह आश्चर्यजनक है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन का पहला शिकार बुन्देलखंड हो रहा है जो कि देश का हृदय स्थल है। आज उसके स्पष्ट प्रमाण हमारे सामने हैं। मौसम परिवर्तन ने दस साल पहले तक तकरीबन तीस करोड़ रुपए सालाना के पान व्यवसाय को महज तीन करोड़ रुपए सालाना पर ला दिया है। यहां लगभग पचास हजार हेक्टेयर में पान की खेती होती थी, परंतु पिछले कई वर्षों में हुए लगातार नुकसान के कारण पान की खेती का क्षेत्र घटकर आधा रह गया है। पान की फसल मौसम के प्रति अतिसंवेदनशील होती है। वैसे इसके बुआई क्षेत्र में कमी के पीछे केवल जलवायु परिवर्तन ही एकमात्र कारण नहीं है।

टीकमगढ़ के मशहूर सिन्दूर सागर तालाब में से सात देशज प्रजातियों की मछलियाँ खत्म हो गई हैं। ये प्रजातियां हैं- बाम, पडेंन, कुरसा, कुठिया, सौंर, पतौला और कटियाव। यह तालाब भी निरंतर सूखे के दौरान ऐसा सूखा कि फिर न उबर सका, ना उबार सका। अब यह क्रिकेट का मैदान बन गया है। उसका प्रसिद्ध सिंघाड़ा भी चलते बना। इस विपरीत दौर ने तिल, मूंगफली, अरबी जैसी फ़सलों को सबसे ज्यादा चोट पहुँचाई है। अब आम आदमी के सामने सबसे बड़ा संकट खड़ा है पलायन का। यहां के लोग अब दिल्ली जैसे शहरों की खाक छान रहे हैं । लोकगीतों में भी जलवायु परिवर्तन की कसक दिखने लगी है। जहाँ पहले टीकमगढ़ के मछुआरे गाते थे:
किते लगा दें ढूल्ला, पिल्ला, किता लगा दें जाल रे।
(यानी चारों और मछली है, हम अपना जाल कहाँ लगा दें।)

लेकिन अब वे गाने लगे हैं:
किते लगा दें जाल रे, जब कछु नईं बचो राम रे।

सीएसई मीडिया फेलोशिप के तहत प्रकाशित

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