भारत-चीन के मध्य गहराता जल विवाद

Submitted by admin on Mon, 09/28/2009 - 00:42
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ब्रह्मा चेलानी, 5-जुलाई-2009
हालांकि जो मुद्दा भारत और चीन को बांटता है, वह सीमा विवाद से आगे का है। चीन-भारत संबंधों में पानी मुख्य सुरक्षा मुद्दे के रूप में उभर रहा है। यह दोनों देशों के बीच आपसी विवाद का बड़ा कारण बना हुआ है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि गंगा को छोड़कर एशिया की तमाम बड़ी नदियों का उद्गम चीनी नियंत्रण वाला तिब्बत क्षेत्र है।जब से भारत और चीन आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं, उसी समय से उन पर दुनिया भर की निगाहें लगी हैं। ये दो जनसांख्यिकीय दिग्गज आर्थिक विकास के आकाश में एक साथ छलांग लगा रहे हैं। दोनों देश वैश्विक सत्ता परिवर्तन को रेखांकित करने में मददगार बन रहे हैं, लेकिन इन दोनों देशों में सामरिक विक्षोभ और शत्रुता की ओर अधिक ध्यान नहीं जाता। बहुत तेजी से शक्तिशाली होता जा रहा चीन एशिया में प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठने के लिए संकल्पबद्ध नजर आता है।

भारत के प्रति उसका रुख कड़ा होता जा रहा है। इनमें हिमालयी क्षेत्र में चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा नियमित रूप से आक्रामक गश्त लगाना, दोनों विशाल देशों को अलग करने वाली नियंत्रण रेखा का उल्लंघन करने की बढ़ती घटनाएं, भारत के पूर्वोत्तार राज्य अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जताना और सरकारी नियंत्रण वाले चीनी मीडिया में भारत के खिलाफ हमलावर रुख अपनाना शामिल है।

हालांकि जो मुद्दा भारत और चीन को बांटता है, वह सीमा विवाद से आगे का है। चीन-भारत संबंधों में पानी मुख्य सुरक्षा मुद्दे के रूप में उभर रहा है। यह दोनों देशों के बीच आपसी विवाद का बड़ा कारण बना हुआ है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि गंगा को छोड़कर एशिया की तमाम बड़ी नदियों का उद्गम चीनी नियंत्रण वाला तिब्बत क्षेत्र है।

यहां तक कि गंगा की दो प्रमुख सहायक नदियां भी यहीं से होकर आती हैं। देखा जाए तो चीन और भारत दोनों ही जल संकट से त्रस्त हैं। खेती और बड़े उद्योगों को ध्यान में रखते हुए इन दोनों देशों में पानी की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है। साथ ही बढ़ते मध्यम वर्ग को पानी की अधिक आवश्यकता पड़ रही है। दोनों देश पूरे साल पानी की तंगी झेल रहे हैं। प्रति व्यक्ति आय की तरह मध्यपूर्व क्षेत्र प्रति व्यक्ति पानी की आपूर्ति में भी पिछड़ा हुआ है।

अगर पानी की मांग वर्तमान दर से बढ़ती रही है तो इसकी कमी के कारण उद्योग और कृषि की विकास दर में कमी आ जाएगी। पानी की कमी से खाद्य पदार्थो का निर्यात करने वाले भारत और चीन प्रमुख निर्यातकों में शामिल नहीं हो पाएंगे, जिसके कारण वैश्विक खाद्य संकट गंभीर हो सकता है। भारत की कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल चीन से ज्यादा है।

भारत में कृषि योग्य भूमि 16.05 करोड़ हेक्टेयर है जबकि चीन में मात्र 13.71 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि है, लेकिन प्रमुख भारतीय नदियों का उद्गम तिब्बत है। तिब्बत के विशाल ग्लेशियर, भूमिगत जल के विपुल स्त्रोत और समुद्र तल से काफी अधिक ऊंचाई के कारण पोलर ध्रुवों के बाद तिब्बत ताजा पेयजल का विश्व का सबसे बड़ा स्त्रोत है।

हालांकि खतरनाक बात यह है कि आज चीन तिब्बत क्षेत्र से अन्य नदियों को जोड़ने की बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहा है। इससे इस क्षेत्र से निकलने वाली नदियों का पानी भारत नहीं पहुंच पाएगा और भारत व अन्य संबद्ध देशों की अनेक नदियां सूख जाएंगीहालांकि खतरनाक बात यह है कि आज चीन तिब्बत क्षेत्र से अन्य नदियों को जोड़ने की बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहा है। इससे इस क्षेत्र से निकलने वाली नदियों का पानी भारत नहीं पहुंच पाएगा और भारत व अन्य संबद्ध देशों की अनेक नदियां सूख जाएंगी, किंतु इससे पहले कि पानी स्थानांतरित करने की ये परियोजनाएं चालू हों, चीन को एक व्यवस्थागत नीति तैयार कर लेनी चाहिए और जिन देशों में चीन के उद्गम वाली नदियां बहती हैं उनसे परस्पर सहयोग पर आधारित समझौता कर लेना चाहिए।

बड़े बांध, बैराज, नहरें और सिंचाई तंत्र पानी को एक राजनीतिक हथियार में बदल सकते हैं। एक ऐसा हथियार जो युद्ध के दौरान विध्वंस मचा सकता है और शांति काल में संबद्ध देशों का असंतोष दूर कर सकता है। यहां तक कि नाजुक समय में पानी के संबंध में उपयुक्त आंकड़े जारी न करके इसे एक राजनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

लाभ की स्थिति में रहने वाले देश के खिलाफ प्रभावित देशों को अपनी सैन्य क्षमता इतनी बढ़ा लेनी चाहिए कि पानी पर नियंत्रण के मामले में नुकसान की स्थिति के बीच संतुलन बिठाया जा सके। हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश में पिछले कुछ वर्षो के दौरान आई बाढ़ का कारण यही है कि चीन ने अपनी परियोजनाओं से पानी छोड़ने के संबंध में भारत को पूर्व सूचना जारी नहीं की थी।

असलियत यह है कि तिब्बत से निकलने वाली अधिकांश अंतरराष्ट्रीय नदियों पर चीन बांध बनाने में जुटा है। जिन नदियों पर अब तक कोई परियोजना शुरू नहीं की गई है वे सिंधु और सलवीन हैं। सिंधु पाकिस्तान से होती हुई भारत पहुंचती है जबकि सलवीन बर्मा और थाईलैंड से गुजरती है।

हालांकि येनान प्रांत में स्थानीय निकाय भूकंप संभावित क्षेत्र में सलवीन नदी पर बांध बनाने की योजना बना रहा है। भारत चीन पर बराबर दबाव बना रहा है कि वह पारदर्शिता अपनाए, पानी से संबंधित आंकड़ों का आदान-प्रदान करे, किसी भी नदी के प्राकृतिक प्रवाह को न मोड़े और सीमा पार से भारत में आने वाली नदियों का जल कम न करे, लेकिन जल संबंधी आंकड़ों के आदान-प्रदान और सहयोग के लिए 2007 में स्थापित संयुक्त विशेषज्ञ स्तर के तंत्र का कोई खास फायदा नहीं हुआ है।

चीन का सबसे खतरनाक विचार है ब्रह्मपुत्र को मोड़ना। तिब्बत में यारलंग तसांग्पो और चीन में यलजैंग्बू के नाम से जाने जानी वाली ब्रह्मंपुत्र का रुख चीन उत्तार की तरफ मोड़ना चाहता है। यह संसार के सबसे ऊंचे स्थान से निकलने वाली नदी है। यह सबसे तेज प्रवाह वाली नदियों में से एक है।ब्रह्मंपुत्र नदी का रुख मोड़कर इसे येलो नदी में डालने की योजना के बारे में चीन सार्वजनिक रूप से बात नहीं करना चाहता क्योंकि इस परियोजना के शुरू होते ही निम्नवर्ती चीन का भारत और बांग्लादेश के साथ जल युद्ध छिड़ जाएगा। यह योजना भारत के पूर्वोत्तार के मैदानों और पूर्वी बांग्लादेश के पर्यावरण को पूरी तरह बिगाड़ सकती है।

2005 में सरकार के सहयोग से प्रकाशित पुस्तक 'तिब्बत का पानी चीन को बचा सकता है' में ब्रह्मपुत्र का रुख उत्तर की ओर मोड़ने की योजना के बारे में खुलासा किया गया है। नदी का रुख बदलने के लिए चीन परमाणु विस्फोट का सहारा लेना चाहता है। नौवें दशक में जेनेवा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वार्ता में चीन प्रस्ताव रख चुका है कि इस काम के लिए उसे परमाणु परीक्षण निषेध संधि की शर्तो से छूट दी जाए।

पहला तो यह कि चीन तीन बड़ा बांध बनाना चाहता है, जो चीन की दीवार के बाद इंजीनियरिंग श्रेष्ठता का सबसे बड़ा नमूना होगा, जबकि इन बांधों की निर्माण योजना में पर्यावरण संबंधी चिंताओं की अनदेखी की जा रही है। दूसरा कारण है राष्ट्रपति हू जिंताओ, जिनकी पृष्ठभूमि में दो मूल तत्व आते हैं- पानी और तिब्बत।अब मुद्दा यह नहीं रह गया है कि चीन ब्रह्मंपुत्र का रुख बदलेगा या नहीं, बल्कि यह है कि चीन ऐसा कब करेगा। जैसे ही प्राधिकरण तकनीकी औपचारिकताएं पूरी कर लेगा, वैसे ही योजना शुरू हो जाएगी। चीन ने वह स्थान भी चिह्निंत कर लिया है, जहां से इसका रुख मोड़ा जाना है। तिब्बत के पानी को उत्तार की तरफ ले जाने की चीन की महत्वाकांक्षा के पीछे दो महत्पूर्ण पहलू हैं।

पहला तो यह कि चीन तीन बड़ा बांध बनाना चाहता है, जो चीन की दीवार के बाद इंजीनियरिंग श्रेष्ठता का सबसे बड़ा नमूना होगा, जबकि इन बांधों की निर्माण योजना में पर्यावरण संबंधी चिंताओं की अनदेखी की जा रही है। दूसरा कारण है राष्ट्रपति हू जिंताओ, जिनकी पृष्ठभूमि में दो मूल तत्व आते हैं- पानी और तिब्बत।

चीन की पनबिजली परियोजनाएं और योजनाएं यह स्मरण दिलाने के लिए काफी हैं कि तिब्बत चीन-भारत के बीच विवाद का सबसे बड़ा कारण रहा है। छह दशक पहले जब चीन ने तिब्बत तक अपना विस्तार किया था तो यह एक बंजर भूमि भर थी, लेकिन तिब्बत भारत और चीन के बीच राजनीतिक सेतु भी बन सकता है। इसके लिए पानी को सहयोग का स्त्रोत बनाना पड़ेगा, टकराव का नहीं।

(ब्रह्मा चेलानी: लेखक रक्षा एवं विदेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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