भारत में जलवायु परिवर्तन के जोखिम

Submitted by RuralWater on Sun, 12/20/2015 - 09:53
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 19 दिसम्बर 2015
जलवायु परिवर्तन की बढ़ती बारम्बारता, सघनता के प्रभावों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों की माँग को सम्मान देते हुए विश्व के तमाम देश नियंत्रण तापमान को सदी के आखिर तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने पर सहमत हुए हैं। पहले यह सीमा 2.0 डिग्री सेल्सियस तय की गई थी। तात्पर्य यह कि नियंत्रण कार्बन स्पेस अभी बहुत कम है। दो डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य के मद्देनज़र 2011 से 2100 के मध्य नियंत्रण कार्बन स्पेस 1000 गिगा टन सीओ-2 था। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव समूचे विश्व में तेजी से परिलक्षित हो रहे हैं। कोई बीस साल हो चुके हैं, जब से यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के बैनर तले तमाम देश जलवायु पर चर्चा करने के लिये मिलते-बैठते रहे हैं।

बीते 30 नवम्बर से 11 दिसम्बर तक विश्व के 190 से ज्यादा देश पेरिस में फिर एकत्रित हुए ताकि विश्व स्तर पर ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन पर कोई समझ बन सके। 21वीं कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (कोप 21) का आयोजन कोपेनहेगन में कोप 15 के दौरान नियंत्रण वार्ता टूटने के छह वर्ष पश्चात हुआ।

स्पष्ट है कि विश्व तब से खासा आगे बढ़ चुका है। कोप 21 में भारत को प्रमुख भागीदार देश माना जा रहा था, जो वार्ता के सिरे चढ़ने या टूट जाने में प्रमुख भूमिका निभाने की स्थिति में था। जलवायु परिवर्तन में भारत का बहुत कुछ दाँव पर लगा है। इस तय को समझा जा सकता है। सो, नियंत्रण वार्ता में उसका किरदार महत्त्वपूर्ण है और रहेगा, इसे भी समझा जा सकता है।

भारत नियंत्रण समझौते में जलवायु परिवर्तन से पड़ने वाले दुष्प्रभावों को शामिल किये जाने के महत्त्व पर अरसे से रोशनी डालता रहा है। दूसरी तरफ, विकसित देश राहत सम्बन्धी कार्रवाई की बात कहते रहे हैं।

भारत जलवायु परिवर्तन से पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर चिन्तित है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के शोध से निष्कर्ष निकला है कि जलवायु में बदलाव के चलते 2050 तक गेहूँ, चावल और मक्का पर 220 बिलियन अमेरिकी डॉलर (मौजूदा कीमतों के आधार पर) का बोझ बढ़ जाएगा।

सीईईडब्ल्यू, आईआईएम, अहमदाबाद और आईआईटी, गाँधीनगर के शोधों से पता चला है कि भारत के करीब 450 जिलों में रह रहे आठ सौ मिलियन लोग अभी तापमान बढ़ने के दुष्प्रभावों से पीड़ित हैं। जलवायु परिवर्तन से हिमालय पर होने वाले पारिस्थितिकीय बदलाव विनाशकारी साबित हो सकते हैं।

भारत नियंत्रण जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी वार्ताओं में वित्तीय एवं तकनीक सम्बन्धी सहयोग के महत्त्व को शामिल कराने में सफल रहा है।

तापमान को लेकर वैश्विक सहमति


जलवायु परिवर्तन की बढ़ती बारम्बारता, सघनता के प्रभावों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों की माँग को सम्मान देते हुए विश्व के तमाम देश नियंत्रण तापमान को सदी के आखिर तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने पर सहमत हुए हैं। पहले यह सीमा 2.0 डिग्री सेल्सियस तय की गई थी। तात्पर्य यह कि नियंत्रण कार्बन स्पेस अभी बहुत कम है।

दो डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य के मद्देनज़र 2011 से 2100 के मध्य नियंत्रण कार्बन स्पेस 1000 गिगा टन सीओ-2 था। अगर 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल किया जाना है, तो यह कम होकर 550 गिगा टन सीओ-2 रह जाता है। पेरिस कोप से पूर्व ज्यादातर देशों ने अपने-अपने इंटेंडिड नेशनलिस्ट डिटरमाइंड कंट्रिब्यूशंस (आईएनडीसी) प्रस्तुत किये।

आईएनडीसी विभिन्न देशों द्वारा उत्सर्जन में कमी लाने की इच्छा और प्रयासों को बयाँ करती हैं। चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ मिलकर 290 गिगा टन सीओ-2 का उत्सर्जन करेंगे। मतलब यह कि 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल करने के लिये जरूरी है कि ये तीनों और विश्व के अन्य देश 2030 तक उत्सर्जन के स्तर में खासी कमी लाएँ।

भारत ने आईएनडीसी का खासा ऊँचा स्तर रखने की इच्छा व्यक्त की है। वह 2030 तक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में इतनी कमी लाएगा जो जीडीपी का 33-35 प्रतिशत होगा। बिजली उत्पादन में जीवाश्म ईंधन का कम उपयोग करेगा। 2030 तक बिजली उत्पादन में 40 प्रतिशत हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से होगा।

कोप 21 के दौरान भारत विकसित देशों पर दबाव बनाए हुए था। खासकर अमेरिका पर कि वे कॉमन बट डिफ्रेंशियेटिड रिस्पोंसिबिलिटीज (सीबीडीआर) के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त को अपनाना बन्द करें। लेकिन भारत की सफलता ही कही जाएगी कि वह समझौते के पाठ में सीबीडीआर के मुद्दे को सैद्धान्तिक रूप से रखवा सका।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत लगातार जलवायु न्याय, कॉमन बट डिफ्रेंशियेटिड रिस्पोंसिबिलिटीज, टिकाऊ जीवनशैली को नियंत्रण जलवायु परिवर्तन पर होने वाली वार्ता में महत्त्वपूर्ण मुद्दों के रूप में शामिल कराने में सफल रहा। इससे भारत की वार्ता करने की क्षमता और राजनयिक ताकत का पता चलता है।

भारत विकसित देशों की यह माँग मानने से इनकार करने में भी सफल रहा कि वह कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन और कोयला उपयोग के लक्ष्य को घोषित करे।

कोप 21 भी विकसित देशों के उत्सर्जन स्तर की रिपोर्टिंग और उसकी समीक्षा प्रणाली की बात कहता है। अब इस बाबत विकसित देशों के प्रयासों की नियत अन्तराल पर समीक्षा हुआ करेगी। इस बाबत सूचना का उपयोग भारत और अन्य विकासशील देश विकसित विश्व पर दबाव बनाने में कर सकेंगे। उन्हें प्रतिबद्धताएँ पूरी करने को विवश कर सकेंगे।

इन महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों के अलावा भारत की कुछ नाकामियाँ भी रहीं। भारत और अन्य विकासशील देश विकसित देशों को ज्यादा वित्त मुहैया कराने को तैयार नहीं कर पाये। विकासशील देशों के लिये उत्सर्जन से पार पाने में धन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अगर वित्तीय सहयोग नहीं मिला तो लक्ष्य पूरे होने में अड़चन पेश होगी।

ग्रीन क्लाइमेट फंड (जीसीएफ) के तहत 2020 तक 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर मुहैया कराने में विकसित विश्व सहमत हुआ है, जबकि इससे कहीं ज्यादा धन की दरकार है। कोप 21 के दौरान भारत के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और भारत के वार्ताकारों ने अपनी अग्रणी भूमिका को महसूस कराया। वे विश्व के बड़े देशों के दबाव में नहीं दिखे।

अपनी माँगों को समझौते के पाठ में शामिल करा सके। भविष्य में जलवायु परिवर्तन पर होने वाली वार्ताओं में भारत की भूमिका निश्चित ही बढ़ने जा रही है। भारत के समक्ष अवसर है कि स्वच्छ ऊर्जा बाजारों का विकास करे। लगता है कि भारत इस दिशा की ओर अग्रसर भी है।

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